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अंग 1318 · कानड़ा

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अंग
1318
कानड़ा
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  1. अखी प्रेमि कसाईआ हरि हरि नामु पिखंनि॑ ॥
  2. जलि थलि महीअलि पूरनो अपरंपरु सोई ॥
  3. गुरमुखि मिले सि सजणा हरि प्रभ पाइआ रंगु ॥
  4. हरि तूहै दाता सभस दा सभि जीअ तुम॑ारे ॥
  5. इछा मन की पूरीऐ जपीऐ सुख सागरु ॥
  6. हउ ढूंढेंदी सजणा सजणु मैडै नालि ॥
  7. नानक प्रीति लाई तिनि सचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥
  8. कोई गावै को सुणै को उचरि सुनावै ॥
  9. ऐसो राम राइ अंतरजामी ॥

गुरु राम दास जी · कानड़ा की वार, सलोक · राग कानड़ा

अखी प्रेमि कसाईआ हरि हरि नामु पिखंनि॑ ॥

मः 4 ॥
अखी प्रेमि कसाईआ हरि हरि नामु पिखंनि॑ ॥
जे करि दूजा देखदे जन नानक कढि दिचंनि॑ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (हे भाई! वही लोग हर जगह) परमात्मा का नाम देखते हैं। जिनकी आँखों को प्रेम ने कसक डाली होती है। पर, हे नानक! जो मनुष्य (प्रभू को छोड़ के) और-और को देखते हैं वे प्रभू की हजूरी में से निकाल दिए जाते हैं। 2।

गुरु राम दास जी · कानड़ा की वार, पउड़ी · राग कानड़ा

जलि थलि महीअलि पूरनो अपरंपरु सोई ॥

पउड़ी ॥
जलि थलि महीअलि पूरनो अपरंपरु सोई ॥
जीअ जंत प्रतिपालदा जो करे सु होई ॥
मात पिता सुत भ्रात मीत तिसु बिनु नही कोई ॥
घटि घटि अंतरि रवि रहिआ जपिअहु जन कोई ॥
सगल जपहु गोपाल गुन परगटु सभ लोई ॥13॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई!) वह बेअंत (परमात्मा) ही जल में धरती में आकाश में (हर जगह) व्यापक है। वह सारे जीवों की पालना करता है। जो कुछ वह करता है वही होता है। (हे भाई! सदा साथ निभने वाला) माता-पिता-पुत्र-भाई-मित्र उस (परमात्मा) के बिना और कोई नहीं। हे संत जनो! कोई पक्ष भी जप के देख लें (जो भी जपता है उसको निश्चय हो जाता है कि वह परमात्मा) हरेक शरीर में (सबके) अंदर व्यापक है। हे भाई! सारे उस गोपाल प्रभू के गुण याद करते रहें। वह प्रभू सारी सृष्टि में प्रत्यक्ष (बसता दिखाई दे रहा) है। 13।

गुरु राम दास जी · कानड़ा की वार, सलोक · राग कानड़ा

गुरमुखि मिले सि सजणा हरि प्रभ पाइआ रंगु ॥

सलोक मः 4 ॥
गुरमुखि मिले सि सजणा हरि प्रभ पाइआ रंगु ॥
जन नानक नामु सलाहि तू लुडि लुडि दरगहि वंञु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ हे दास नानक! (कहें: हे भाई!) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (प्रभू की याद में) जुड़े रहते हैं (और इस तरह जिन्होंने) परमात्मा का प्रेम हासिल कर लिया। वह अच्छे जीवन वाले बन जाते हैं। हे भाई! आप भी प्रभू की सिफतसालाह (सदा) करते रहें। परमात्मा की हजूरी में बेफिक्र हो के जाएगा। 1।

गुरु राम दास जी · कानड़ा की वार, सलोक · राग कानड़ा

हरि तूहै दाता सभस दा सभि जीअ तुम॑ारे ॥

मः 4 ॥
हरि तूहै दाता सभस दा सभि जीअ तुम॑ारे ॥
सभि तुधै नो आराधदे दानु देहि पिआरे ॥
हरि दातै दातारि हथु कढिआ मीहु वुठा सैसारे ॥
अंनु जंमिआ खेती भाउ करि हरि नामु सम॑ारे ॥
जनु नानकु मंगै दानु प्रभ हरि नामु अधारे ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे प्रभू! आप ही सारे जीवों को दातें देने वाले हैं। सारे जीव आपके ही (पैदा किए हुए) हैं। सारे जीव (दुनिया के पदार्थों के लिए) आपको ही याद करते हैं। और, हे प्यारे! आप (सबको) दान देते हैं। (हे भाई!) हरी दाते ने हरी दातार ने (जब अपनी मेहर का) हाथ निकाला तब जगत में (गुरू के उपदेश की) वर्षा हुई। (जो मनुष्य गुरू की शरण आता है) प्रेम, (रूप) खेती करने से (उसके अंदर परमात्मा का नाम-) फसल उग जाती है। (वह हर वक्त) परमात्मा का नाम (हृदय में) बसाता है। हे प्रभू! (आपका) दास नानक (भी आपके नाम की) ख़ैर (आपसे) माँगता है। आपका नाम (दास नानक की जिंदगी का) आसरा (बना रहे)। 2।

गुरु राम दास जी · कानड़ा की वार, पउड़ी · राग कानड़ा

इछा मन की पूरीऐ जपीऐ सुख सागरु ॥

पउड़ी ॥
इछा मन की पूरीऐ जपीऐ सुख सागरु ॥
हरि के चरन अराधीअहि गुर सबदि रतनागरु ॥
मिलि साधू संगि उधारु होइ फाटै जम कागरु ॥
जनम पदारथु जीतीऐ जपि हरि बैरागरु ॥
सभि पवहु सरनि सतिगुरू की बिनसै दुख दागरु ॥14॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (सिमरन-आराधना की बरकति से) मन की (हरेक) इच्छा पूरी हो जाती है (मन की वासनाएं समाप्त हो जाती हैं)। (हे भाई!) सुखों के समुंद्र परमात्मा का नाम जपना चाहिए गुरू के शबद से रत्नों की खान प्रभू की आराधना करनी चाहिए। प्रभू के चरणों की आराधना करनी चाहिए। हे भाई! गुरू की संगति में मिल के (नाम-जपने से संसार-समुंद्र से) पार-उतारा हो जाता है। यमराज का (लेखे वाला) कागज़ फट जाता है। प्यार के श्रोत परमात्मा का नाम जप के कीमती मनुष्य-जनम की बाज़ी जीत ली जाती है। हे भाई! सभी गुरू की शरण पड़े रहें (गुरू की शरण पड़ कर नाम जपने से मन में) दुखों का निशान ही मिट जाता है। 14।

गुरु राम दास जी · कानड़ा की वार, सलोक · राग कानड़ा

हउ ढूंढेंदी सजणा सजणु मैडै नालि ॥

सलोक मः 4 ॥
हउ ढूंढेंदी सजणा सजणु मैडै नालि ॥
जन नानक अलखु न लखीऐ गुरमुखि देहि दिखालि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ (हे सहेलिए!) मैं सज्जन (प्रभू) को (बाहर) ढूँढ रही थी (पर, गुरू के माध्यम से समझ आई है कि वह) सज्जन (प्रभू तो) मेरे साथ ही है (मेरे अंदर ही बसता है)। हे दास नानक! (कहें: हे सहेलिए!) वह प्रभू अलख है उसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। गुरू के सन्मुख रहने वाले (संत जन उसके) दर्शन करवा देते हैं। 1।

गुरु राम दास जी · कानड़ा की वार, सलोक · राग कानड़ा

नानक प्रीति लाई तिनि सचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥

मः 4 ॥
नानक प्रीति लाई तिनि सचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥
सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ हरि रसि रसन रसाई ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे नानक! (कहें: हे भाई! जिस मनुष्य के अंदर) उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा ने (अपना) प्यार (स्वयं ही) पैदा किया है (वह मनुष्य) उस (की याद) के बिना रह नहीं सकता। (जिस गुरू की) जीभ परमात्मा के नाम-रस में सदा रसी रहती है (जब वह) गुरू मिलता है तब वह पूरन प्रभू भी मिल जाता है। 2।

गुरु राम दास जी · कानड़ा की वार, पउड़ी · राग कानड़ा

कोई गावै को सुणै को उचरि सुनावै ॥

पउड़ी ॥
कोई गावै को सुणै को उचरि सुनावै ॥
जनम जनम की मलु उतरै मन चिंदिआ पावै ॥
आवणु जाणा मेटीऐ हरि के गुण गावै ॥
आपि तरहि संगी तराहि सभ कुटंबु तरावै ॥
जनु नानकु तिसु बलिहारणै जो मेरे हरि प्रभ भावै ॥15॥1॥ सुधु ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे भाई! जो कोई मनुष्य (परमात्मा के सिफत-सालाह के गीत) गाता है अथवा सुनता है अथवा बोल के (औरों को) सुनाता है। उसके अनेकों जन्मों की (विकारों की) मैल उतर जाती है वह मन-इच्छित फल पा लेता है। हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है उसका पैदा होने मरने का चक्कर समाप्त हो जाता है। (हे भाई! परमात्मा के सिफतसालाह के गीत गाने वाले मनुष्य) स्वयं (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। साथियों को पार लंघा लेते हैं। (हे भाई! सिफत-सालाह करने वाला मनुष्य अपने) सारे परिवार को पार लंघा लेता है। हे भाई! दास नानक उस मनुष्य से सदा सदके जाता है जो (सिफत-सालाह करने की बरकति से) प्यारे प्रभू को प्यारा लगता है। 15। 1। सुधु।

भगत नामदेव जी · शबद · राग कानड़ा

ऐसो राम राइ अंतरजामी ॥

रागु कानड़ा बाणी नामदेव जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसो राम राइ अंतरजामी ॥
जैसे दरपन माहि बदन परवानी ॥1॥ रहाउ ॥
बसै घटा घट लीप न छीपै ॥
बंधन मुकता जातु न दीसै ॥1॥
पानी माहि देखु मुखु जैसा ॥
नामे को सुआमी बीठलु ऐसा ॥2॥1॥

हिन्दी अर्थ: रागु कानड़ा बाणी नामदेव जीउ की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। शुद्ध स्वरूप परमात्मा ऐसा है कि वह हरेक जीव के अंदर बैठा हुआ है (पर, हरेक के अंदर बसता भी ऐसे) प्रत्यक्ष (निर्लिप रहता है) जैसे शीशे में (शीशा देखने वाले का) मुँह। 1। रहाउ। शुद्ध स्वरूप परमात्मा ऐसा है कि वह हर एक जीव के अंदर है (पर) उस पर माया का कोई असर नहीं होता। वह माया के बंधनों में फसा हुआ नहीं नजर आता। 1। आप जैसे पानी में (अपना) मुँह देखते हैं। (मुँह पानी में टिका हुआ दिखाई देता है पर उस पर पानी का कोई असर नहीं होता)। इसी तरह है नामे का मालिक (जिसको नामा) बीठल (कहता) है। 2। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी; भगत नामदेव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1318 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।