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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1199 · सारंग

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अंग
1199
सारंग
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  1. हरि हरि अंम्रित नामु देहु पिआरे ॥
  2. गोबिद की ऐसी कार कमाइ ॥
  3. मेरा मनु राम नामि मनु मानी ॥

गुरु राम दास जी · शबद · राग सारंग

हरि हरि अंम्रित नामु देहु पिआरे ॥

सारग महला 4 ॥
हरि हरि अंम्रित नामु देहु पिआरे ॥
जिन ऊपरि गुरमुखि मनु मानिआ तिन के काज सवारे ॥1॥ रहाउ ॥
जो जन दीन भए गुर आगै तिन के दूख निवारे ॥
अनदिनु भगति करहि गुर आगै गुर कै सबदि सवारे ॥1॥
हिरदै नामु अंम्रित रसु रसना रसु गावहि रसु बीचारे ॥
गुर परसादि अंम्रित रसु चीनि॑आ ओइ पावहि मोख दुआरे ॥2॥
सतिगुरु पुरखु अचलु अचला मति जिसु द्रिड़ता नामु अधारे ॥
तिसु आगै जीउ देवउ अपुना हउ सतिगुर कै बलिहारे ॥3॥
मनमुख भ्रमि दूजै भाइ लागे अंतरि अगिआन गुबारे ॥
सतिगुरु दाता नदरि न आवै ना उरवारि न पारे ॥4॥
सरबे घटि घटि रविआ सुआमी सरब कला कल धारे ॥
नानकु दासनि दासु कहत है करि किरपा लेहु उबारे ॥5॥3॥

हिन्दी अर्थ: सारंग महला 4 ॥ हे प्यारे गुरू! मुझे परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम बख्श हे भाई! जिन मनुष्यों पर गुरू का मन पतीज जाता है। (गुरू) उनके सारे काम सवार देता है। 1। रहाउ। हे भाई! जो मनुष्य निमाणे हो के गुरू के दर पर गिर जाते हैं। (गुरू) उनके सारे दुख दूर कर देता है। वे मनुष्य गुरू के सन्मुख रह के हर वक्त परमात्मा की भक्ति करते रहते हैं। गुरू के शबद की बरकति से (उनके जीवन) सुंदर बन जाते हैं। 1। हे भाई! जो मनुष्य अपने हृदय में परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस बसाते हैं। जीभ से उसको सलाहते हैं। मन में उस नाम-रस को विचारते हैं। जिन्होंने गुरू की कृपा से आत्मिक जीवन देने वाले नाम-रस को (अपने अंदर) पहचान लिया। वे मनुष्य (विकारों से) खलासी पाने वाला दरवाजा खोज लेते हैं। 2। हे भाई! जो गुरू-पुरख अडोल-चित्त रहने वाला है। जिसकी मति (विकारों के मुकाबले में) सदा अटल रहती है। जिसके अंदर सदा अडोलता टिकी रहती है जिसको सदा हरी-नाम का सहारा है। उस गुरू के आगे मैं अपने प्राण भेट करता हूँ। उस गुरू से मैं (सदा) सदके जाता हूँ। 3। हे भाई! (गुरू वाला पासा छोड़ के) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया वाली दौड़-भाग के कारण माया के मोह में (ही) फसे रहते हैं। उनके अंदर आत्मिक जीवन की तरफ से बे-समझी का घोर अंधकार (बना रहता है)। उनको नाम की दाति देने वाला गुरू दिखता ही नहीं। वह मनुष्य (विकारों भरे संसार-समुंद्र के) ना इस पार ना उस पार (पहुँच सकते हैं। संसार-समुंद्र के बीच ही गोते खाते रहते हैं)। 4। हे भाई! जो परमात्मा सबमें व्यापक है। हरेक शरीर में मौजूद है। सारी ताकतों का मालिक है। अपनी कला से सृष्टि को सहारा दे रहा है। उसके दर पर उसके दासों का दास नानक विनती करता है (और कहता है: हे प्रभू!) मेहर करके मुझे (इस संसार-समुंद्र से) बचाए रखें। 5। 3।

गुरु राम दास जी · शबद · राग सारंग

गोबिद की ऐसी कार कमाइ ॥

सारग महला 4 ॥
गोबिद की ऐसी कार कमाइ ॥
जो किछु करे सु सति करि मानहु गुरमुखि नामि रहहु लिव लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गोबिद प्रीति लगी अति मीठी अवर विसरि सभ जाइ ॥
अनदिनु रहसु भइआ मनु मानिआ जोती जोति मिलाइ ॥1॥
जब गुण गाइ तब ही मनु त्रिपतै सांति वसै मनि आइ ॥
गुर किरपाल भए तब पाइआ हरि चरणी चितु लाइ ॥2॥
मति प्रगास भई हरि धिआइआ गिआनि तति लिव लाइ ॥
अंतरि जोति प्रगटी मनु मानिआ हरि सहजि समाधि लगाइ ॥3॥
हिरदै कपटु नित कपटु कमावहि मुखहु हरि हरि सुणाइ ॥
अंतरि लोभु महा गुबारा तुह कूटै दुख खाइ ॥4॥
जब सुप्रसंन भए प्रभ मेरे गुरमुखि परचा लाइ ॥
नानक नाम निरंजनु पाइआ नामु जपत सुखु पाइ ॥5॥4॥

हिन्दी अर्थ: सारंग महला 4 ॥ हे भाई! परमात्मा की सेवा-भगती की कार इस प्रकार किया करें कि जो कुछ परमात्मा करता है उसको ठीक माना करें। और गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ी रखा करें। 1। रहाउ। हे भाई! (जिस मनुष्य को अपने मन में) परमात्मा से प्रीति अति मीठी लगती है। उसको (दुनिया वाली) अन्य सारी प्रीत भूल जाती हैं। (उसके अंदर) हर वक्त आत्मिक आनंद बना रहता है। उसका मन (प्रभू की याद में) रीझ जाता है। उसके प्राण परमात्मा की जोति के साथ एक-मेक हुए रहते हैं। 1। हे भाई! जब मनुष्य प्रभू के गुण गाता है, तब ही उसका मन (माया की भूख से) तृप्त हो जाता है। उसके मन में शांति आ बसती है। सतिगुरू जी जब उस पर दयावान होते हैं, तब वह मनुष्य परमात्मा के चरणों में चित्त जोड़ के परमात्मा के साथ मिलाप हासिल कर लेता है। 2। हे भाई! आत्मिक आनंद की सूझ के द्वारा जिस मनुष्य ने जगत के मूल-प्रभू में सुरति जोड़ के उसका सिमरन किया। उसकी मति में आत्मिक जीवन का प्रकाश हो गया। उसके अंदर परमात्मा की ज्योति प्रकट हो गई। आत्मिक अडोलता के द्वारा परमात्मा की याद में मन एकाग्र करके उसका मन (उस याद में) रीझ गया। 3। पर, हे भाई! (जिन मनुष्यों के) हृदय में ठॅगी बसती है। वह मनुष्य (सिर्फ) मुँह से हरी-नाम सुना-सुना के (अंदर-अंदर से) ठॅगी का व्यवहार करते रहते हैं। हे भाई! (जिस मनुष्य के) हृदय में (सदा) लोभ बसता है। उसके हृदय में माया के मोह का घोर अंधेरा बना रहता है। वह मनुष्य इस प्रकार है जैसे वह दानो के बग़ैर सिर्फ तोह (छिलके) ही कूटता रहता है और तोह कूटने की मुश्किलें ही सहता रहता है। 4। हे नानक! जब मेरे प्रभू जी (किसी मनुष्य पर) बहुत प्रसन्न होते हैं, तब वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर प्रभू जी के साथ प्यार डालता है। तब वह माया के मोह से निर्लिप करने वाला हरी-नाम मन में बसाता है। और नाम जपते हुए आत्मिक आनंद पाता है। 5। 4।

गुरु राम दास जी · शबद · राग सारंग

मेरा मनु राम नामि मनु मानी ॥

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सारग महला 4 ॥
मेरा मनु राम नामि मनु मानी ॥
मेरै हीअरै सतिगुरि प्रीति लगाई मनि हरि हरि कथा सुखानी ॥1॥ रहाउ ॥
दीन दइआल होवहु जन ऊपरि जन देवहु अकथ कहानी ॥
संत जना मिलि हरि रसु पाइआ हरि मनि तनि मीठ लगानी ॥1॥
हरि कै रंगि रते बैरागी जिन॑ गुरमति नामु पछानी ॥
पुरखै पुरखु मिलिआ सुखु पाइआ सभ चूकी आवण जानी ॥2॥
नैणी बिरहु देखा प्रभ सुआमी रसना नामु वखानी ॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 ॥ (तब से) मेरा मन परमात्मा के नाम में रीझ गया है। हे भाई! (जब से) गुरू ने मेरे दिल में परमात्मा का प्यार पैदा कर दिया है, (तब से) परमात्मा की सिफत-सालाह मेरे मन को प्यारी लग रही है। 1। रहाउ। हे प्रभू जी! मुझ गरीब सेवक पर दया करें। मुझ दास को कभी ना खत्म होने वाली अपनी सिफत-सालाह की दाति बख्शें। हे भाई! जिस मनुष्य ने संत-जनों को मिल के परमात्मा के नाम का स्वाद चखा। उसके मन में उसके हृदय में परमात्मा की सिफत-सालाह मीठी लगने लग जाती है। 1। हे भाई! जिन मनुष्यों ने गुरू की मति पर चल कर परमात्मा के साथ सांझ डाल ली। वे मनुष्य परमात्मा के प्यार रंग में रंगे जाते हैं। वे मनुष्य माया के मोह से उपराम हो जाते हैं। हे भाई! जिस मनुष्य को सर्व-व्यापक प्रभू मिल गया। उसको आत्मिक आनंद प्राप्त हो गया। 2। हे भाई! हे स्वामी! मेरे अंदर चाहत है कि आँखों से मैं आपके दर्शन करता रहूँ। जीभ से आपका नाम जपता रहूँ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1199 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।