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· शबद · राग सारंग
स्रवणी कीरतनु सुनउ दिनु राती हिरदै हरि हरि भानी ॥3॥
स्रवणी कीरतनु सुनउ दिनु राती हिरदै हरि हरि भानी ॥3॥
पंच जना गुरि वसगति आणे तउ उनमनि नामि लगानी ॥
जन नानक हरि किरपा धारी हरि रामै नामि समानी ॥4॥5॥
पंच जना गुरि वसगति आणे तउ उनमनि नामि लगानी ॥
जन नानक हरि किरपा धारी हरि रामै नामि समानी ॥4॥5॥
हिन्दी अर्थ: कानों से दिन-रात आपकी सिफत-सालाह सुनता रहूँ। और हृदय में आप मुझे प्यारे लगते रहें। 3। हे दास नानक! (कहें: हे भाई!) जब गुरू ने कामादिक पाँचों को (किसी अति-भाग्यशाली के) वश में कर दिया, तब विरह अवस्था में पहुँच के उसकी सुरति हरी-नाम में जुड़ जाती है। जिस मनुष्य पर प्रभू ने मेहर की, प्रभू के नाम में ही उसकी लीनता हो गई। 4। 5।
· शबद · राग सारंग
जपि मन राम नामु पड़्हु सारु ॥
सारग महला 4 ॥
जपि मन राम नामु पड़्हु सारु ॥
राम नाम बिनु थिरु नही कोई होरु निहफल सभु बिसथारु ॥1॥ रहाउ ॥
किआ लीजै किआ तजीऐ बउरे जो दीसै सो छारु ॥
जिसु बिखिआ कउ तुम॑ अपुनी करि जानहु सा छाडि जाहु सिरि भारु ॥1॥
तिलु तिलु पलु पलु अउध फुनि घाटै बूझि न सकै गवारु ॥
सो किछु करै जि साथि न चालै इहु साकत का आचारु ॥2॥
संत जना कै संगि मिलु बउरे तउ पावहि मोख दुआरु ॥
बिनु सतसंग सुखु किनै न पाइआ जाइ पूछहु बेद बीचारु ॥3॥
राणा राउ सभै कोऊ चालै झूठु छोडि जाइ पासारु ॥
नानक संत सदा थिरु निहचलु जिन राम नामु आधारु ॥4॥6॥
जपि मन राम नामु पड़्हु सारु ॥
राम नाम बिनु थिरु नही कोई होरु निहफल सभु बिसथारु ॥1॥ रहाउ ॥
किआ लीजै किआ तजीऐ बउरे जो दीसै सो छारु ॥
जिसु बिखिआ कउ तुम॑ अपुनी करि जानहु सा छाडि जाहु सिरि भारु ॥1॥
तिलु तिलु पलु पलु अउध फुनि घाटै बूझि न सकै गवारु ॥
सो किछु करै जि साथि न चालै इहु साकत का आचारु ॥2॥
संत जना कै संगि मिलु बउरे तउ पावहि मोख दुआरु ॥
बिनु सतसंग सुखु किनै न पाइआ जाइ पूछहु बेद बीचारु ॥3॥
राणा राउ सभै कोऊ चालै झूठु छोडि जाइ पासारु ॥
नानक संत सदा थिरु निहचलु जिन राम नामु आधारु ॥4॥6॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 ॥ हे (मेरे) मन! परमात्मा का नाम जपा करें। परमात्मा का नाम पढ़ा करें। (यही) श्रेष्ठ (कर्म) है। हे मन! परमात्मा के नाम के बिना और कोई (यहाँ) सदा कायम रहने वाला नहीं। और सारा पसारा ऐसा है जिससे (आत्मिक जीवन के लिए) कोई फल नहीं मिलता। 1। रहाउ। हे कमले मन! जो कुछ (जगत में) दिखाई दे रहा है वह (सब) नाशवंत है। इस में ना कुछ अपना बनाया जा सकता है ना छोड़ा जा सकता है। हे कमले! जिस माया को आप अपनी समझे बैठे हैं। वह तो छोड़ जाएँगे। (उसकी खातिर किए हुए पापों का) भार ही अपने सिर पर (ले जाएँगे)। 1। हे भाई! रत्ती-रत्ती कर के, पल-पल कर के उम्र घटती जाती है। पर मूर्ख मनुष्य (यह बात) समझ नहीं सकता। (मूर्ख) वही कुछ करता रहता है जो (आखिरी समय में) इसके साथ नहीं जाता। परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य का सदा यही कर्तव्य रहता है। 2। हे कमले! संत-जनों के साथ मिल बैठा करें। तब ही आप (माया के मोह से) खलासी का द्वार ढूँढ सकेंगे। बेशक वेद (आदिक और धर्म-पुस्तकों) का भी विचार जा के पूछ के देख लें (सब यही बताएंगे कि) साध-संगति के बिना किसी ने भी आत्मिक आनंद नहीं पाया। 3। हे भाई! कोई राजा हो। बादशाह हो। हर कोई (यहाँ से आखिर) चला जाता है। इस नाशवंत जगत-पसारे को छोड़ जाता है। हे नानक! परमात्मा के नाम को जिन्होंने अपने जीवन का आसरा बनाया है वे संत-जन (इस मोहनी माया के पसारे में) अडोल-चित्त रहते हैं। 4। 6।
· शबद · राग सारंग
काहे पूत झगरत हउ संगि बाप ॥
सारग महला 4 घरु 3 दुपदा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काहे पूत झगरत हउ संगि बाप ॥
जिन के जणे बडीरे तुम हउ तिन सिउ झगरत पाप ॥1॥ रहाउ ॥
जिसु धन का तुम गरबु करत हउ सो धनु किसहि न आप ॥
खिन महि छोडि जाइ बिखिआ रसु तउ लागै पछुताप ॥1॥
जो तुमरे प्रभ होते सुआमी हरि तिन के जापहु जाप ॥
उपदेसु करत नानक जन तुम कउ जउ सुनहु तउ जाइ संताप ॥2॥1॥7॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काहे पूत झगरत हउ संगि बाप ॥
जिन के जणे बडीरे तुम हउ तिन सिउ झगरत पाप ॥1॥ रहाउ ॥
जिसु धन का तुम गरबु करत हउ सो धनु किसहि न आप ॥
खिन महि छोडि जाइ बिखिआ रसु तउ लागै पछुताप ॥1॥
जो तुमरे प्रभ होते सुआमी हरि तिन के जापहु जाप ॥
उपदेसु करत नानक जन तुम कउ जउ सुनहु तउ जाइ संताप ॥2॥1॥7॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 घरु 3 दुपदा ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे पुत्र! (दुनिया के धन की खातिर) पिता से क्यों झगड़ा करते हैं। हे पुत्र! जिन माता-पिता ने पैदा किया और पाला होता है। उनके साथ (धन की खातिर) झगड़ा करना बुरा काम है। 1। रहाउ। हे पुत्र! जिस धन का आप गुमान करते हैं। वह धन (कभी भी) किसी का अपना नहीं बना। हरेक मनुष्य माया का चस्का (आखिरी वक्त) एक छिन में ही छोड़ के चला जाता है (जब छोड़ता है) तब उसको (छोड़ने की) आह लगती है। 1। हे पुत्र! जो प्रभू जी आपके (हम सभी के) मालिक हैं। उनके नाम का जाप किया करें। हे नानक! (कहें: हे पुत्र!) प्रभू के दास जो उपदेश आपको करते हैं अगर वह उपदेश आप (ध्यान से) सुनें तो (आपके अंदर से) मानसिक दुख-कलेश दूर हो जाएँ। 2। 1। 7।
· शबद · राग सारंग
जपि मन जगंनाथ जगदीसरो जगजीवनो मनमोहन सिउ प्रीति लागी मै हरि हरि हरि टेक सभ दिनसु सभ राति ॥1॥ रहाउ ॥
सारग महला 4 घरु 5 दुपदे पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन जगंनाथ जगदीसरो जगजीवनो मनमोहन सिउ प्रीति लागी मै हरि हरि हरि टेक सभ दिनसु सभ राति ॥1॥ रहाउ ॥
हरि की उपमा अनिक अनिक अनिक गुन गावत सुक नारद ब्रहमादिक तव गुन सुआमी गनिन न जाति ॥
तू हरि बेअंतु तू हरि बेअंतु तू हरि सुआमी तू आपे ही जानहि आपनी भांति ॥1॥
हरि कै निकटि निकटि हरि निकट ही बसते ते हरि के जन साधू हरि भगात ॥
ते हरि के जन हरि सिउ रलि मिले जैसे जन नानक सललै सलल मिलाति ॥2॥1॥8॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन जगंनाथ जगदीसरो जगजीवनो मनमोहन सिउ प्रीति लागी मै हरि हरि हरि टेक सभ दिनसु सभ राति ॥1॥ रहाउ ॥
हरि की उपमा अनिक अनिक अनिक गुन गावत सुक नारद ब्रहमादिक तव गुन सुआमी गनिन न जाति ॥
तू हरि बेअंतु तू हरि बेअंतु तू हरि सुआमी तू आपे ही जानहि आपनी भांति ॥1॥
हरि कै निकटि निकटि हरि निकट ही बसते ते हरि के जन साधू हरि भगात ॥
ते हरि के जन हरि सिउ रलि मिले जैसे जन नानक सललै सलल मिलाति ॥2॥1॥8॥
हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 घरु 5 दुपदे पड़ताल ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे (मेरे) मन! जगत के मालिक परमात्मा का नाम जपा करें (उसका नाम जपने से उस) मन के मोहने वाले परमात्मा के साथ प्यार बन जाता है। मुझे तो सारा दिन सारी रात उसी परमात्मा का ही सहारा है। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा की अनेकों उपमाएं हैं। हे स्वामी प्रभू! शुकदेव, नारद, ब्रहमा आदि देवतागण आपके गुण गाते रहते हैं। आपके गुण गिने नहीं जा सकते। हे हरी! हे स्वामी! आप बेअंत हैं। अपनी अवस्था आप स्वयं ही जानते हैं। 1। हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा के नजदीक बसते हैं। वे मनुष्य परमात्मा के साधु-जन हैं परमात्मा के भक्त हैं। हे दास नानक! परमात्मा के वह सेवक परमात्मा के साथ एक-मेक हो जाते हैं। जैसे पानी में पानी मिल जाता है। 2। 1। 8।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1200 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।