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अंग 1200

अंग
1200
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
स्रवणी कीरतनु सुनउ दिनु राती हिरदै हरि हरि भानी ॥3॥
पंच जना गुरि वसगति आणे तउ उनमनि नामि लगानी ॥
जन नानक हरि किरपा धारी हरि रामै नामि समानी ॥4॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: कानों से दिन-रात आपकी सिफत-सालाह सुनता रहूँ। और हृदय में आप मुझे प्यारा लगता रहे। 3। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) जब गुरू ने कामादिक पाँचों को (किसी अति-भाग्यशाली के) वश में कर दिया। तब विरह अवस्था में पहुँच के उसकी सुरति हरी-नाम में जुड़ जाती है। जिस मनुष्य पर प्रभू ने मेहर की। प्रभू के नाम में ही उसकी लीनता हैं गई। 4। 5।
सारग महला 4 ॥
जपि मन राम नामु पड़्हु सारु ॥
राम नाम बिनु थिरु नही कोई होरु निहफल सभु बिसथारु ॥1॥ रहाउ ॥
किआ लीजै किआ तजीऐ बउरे जो दीसै सो छारु ॥
जिसु बिखिआ कउ तुम॑ अपुनी करि जानहु सा छाडि जाहु सिरि भारु ॥1॥
तिलु तिलु पलु पलु अउध फुनि घाटै बूझि न सकै गवारु ॥
सो किछु करै जि साथि न चालै इहु साकत का आचारु ॥2॥
संत जना कै संगि मिलु बउरे तउ पावहि मोख दुआरु ॥
बिनु सतसंग सुखु किनै न पाइआ जाइ पूछहु बेद बीचारु ॥3॥
राणा राउ सभै कोऊ चालै झूठु छोडि जाइ पासारु ॥
नानक संत सदा थिरु निहचलु जिन राम नामु आधारु ॥4॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 ॥ हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम जपा कर। परमात्मा का नाम पढ़ा कर। (यही) श्रेष्ठ (कर्म) है। हे मन ! परमात्मा के नाम के बिना और कोई (यहाँ) सदा कायम रहने वाला नहीं। और सारा पसारा ऐसा है जिससे (आत्मिक जीवन के लिए) कोई फल नहीं मिलता। 1। रहाउ। हे कमले मन ! जो कुछ (जगत में) दिखाई दे रहा है वह (सब) नाशवंत है। इस में ना कुछ अपना बनाया जा सकता है ना छोड़ा जा सकता है। हे कमले ! जिस माया को आप अपनी समझी बैठा है। वह तो छोड़ जाएगा। (उसकी खातिर किए हुए पापों का) भार ही अपने सिर पर (ले जाएगा)। 1। हे भाई ! रक्ती-रक्ती कर के। पल-पल कर के उम्र घटती जाती है। पर मूर्ख मनुष्य (यह बात) समझ नहीं सकता। (मूर्ख) वही कुछ करता रहता है जो (आखिरी समय में) इसके साथ नहीं जाता। परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य का सदा यही कर्तव्य रहता है। 2। हे कमले ! संत-जनों के साथ मिल बैठा कर। तब ही आप (माया के मोह से) खलासी का द्वार ढूँढ सकेगा। बेशक वेद (आदिक और धर्म-पुस्तकों) का भी विचार जा के पूछ के देख लो (सब यही बताएंगे कि) साध-संगति के बिना किसी ने भी आत्मिक आनंद नहीं पाया। 3। हे भाई ! कोई राजा हो। बादशाह हो। हर कोई (यहाँ से आखिर) चला जाता है। इस नाशवंत जगत-पसारे को छोड़ जाता है। हे नानक ! परमात्मा के नाम को जिन्होंने अपने जीवन का आसरा बनाया है वे संत-जन (इस मोहनी माया के पसारे में) अडोल-चित्त रहते हैं। 4। 6।
सारग महला 4 घरु 3 दुपदा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काहे पूत झगरत हउ संगि बाप ॥
जिन के जणे बडीरे तुम हउ तिन सिउ झगरत पाप ॥1॥ रहाउ ॥
जिसु धन का तुम गरबु करत हउ सो धनु किसहि न आप ॥
खिन महि छोडि जाइ बिखिआ रसु तउ लागै पछुताप ॥1॥
जो तुमरे प्रभ होते सुआमी हरि तिन के जापहु जाप ॥
उपदेसु करत नानक जन तुम कउ जउ सुनहु तउ जाइ संताप ॥2॥1॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 घरु 3 दुपदा सतिगुर प्रसादि ॥ हे पुत्र ! (दुनिया के धन की खातिर) पिता से क्यों झगड़ा करते हैं। हे पुत्र ! जिन माता-पिता ने पैदा किया और पाला होता है। उनके साथ (धन की खातिर) झगड़ा करना बुरा काम है। 1। रहाउ। हे पुत्र ! जिस धन का आप गुमान करते हैं। वह धन (कभी भी) किसी का अपना नहीं बना। हरेक मनुष्य माया का चस्का (आखिरी वक्त) एक छिन् में ही छोड़ के चला जाता है (जब छोड़ता है) तब उसको (छोड़ने की) आह लगती है। 1। हे पुत्र ! जो प्रभू जी आपके (हम सभी के) मालिक हैं। उनके नाम का जाप किया करो। हे नानक ! (कह- हे पुत्र !) प्रभू के दास जो उपदेश आपको करते हैं अगर वह उपदेश आप (ध्यान से) सुनो तो (आपके अंदर से) मानसिक दुख-कलेश दूर हैं जाए। 2। 1। 7।
सारग महला 4 घरु 5 दुपदे पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन जगंनाथ जगदीसरो जगजीवनो मनमोहन सिउ प्रीति लागी मै हरि हरि हरि टेक सभ दिनसु सभ राति ॥1॥ रहाउ ॥
हरि की उपमा अनिक अनिक अनिक गुन गावत सुक नारद ब्रहमादिक तव गुन सुआमी गनिन न जाति ॥
तू हरि बेअंतु तू हरि बेअंतु तू हरि सुआमी तू आपे ही जानहि आपनी भांति ॥1॥
हरि कै निकटि निकटि हरि निकट ही बसते ते हरि के जन साधू हरि भगात ॥
ते हरि के जन हरि सिउ रलि मिले जैसे जन नानक सललै सलल मिलाति ॥2॥1॥8॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 घरु 5 दुपदे पड़ताल सतिगुर प्रसादि ॥ हे (मेरे) मन ! जगत के मालिक परमात्मा का नाम जपा कर (उसका नाम जपने से उस) मन के मोहने वाले परमात्मा के साथ प्यार बन जाता है। मुझे तो सारा दिन सारी रात उसी परमात्मा का ही सहारा है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा की अनेकों उपमाएं हैं। हे स्वामी प्रभू ! शुकदेव। नारद। ब्रहमा आदि देवतागण आपके गुण गाते रहते हैं। आपके गुण गिने नहीं जा सकते। हे हरी ! हे स्वामी ! आप बेअंत है। अपनी अवस्था आप स्वयं ही जानता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नजदीक बसते हें। वे मनुष्य परमात्मा के साधु-जन हैं परमात्मा के भक्त हैं। हे दास नानक ! परमात्मा के वह सेवक परमात्मा के साथ एक-मेक हो जाते हैं। जैसे पानी में पानी मिल जाता है। 2। 1। 8।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कानों से दिन-रात आपकी सिफत-सालाह सुनता रहूँ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।