इस पृष्ठ पर
अंग
1198
सारंग
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश
· शबद · राग सारंग
इन बिधि हरि मिलीऐ वर कामनि धन सोहागु पिआरी ॥
इन बिधि हरि मिलीऐ वर कामनि धन सोहागु पिआरी ॥
जाति बरन कुल सहसा चूका गुरमति सबदि बीचारी ॥1॥
जिसु मनु मानै अभिमानु न ता कउ हिंसा लोभु विसारे ॥
सहजि रवै वरु कामणि पिर की गुरमुखि रंगि सवारे ॥2॥
जारउ ऐसी प्रीति कुटंब सनबंधी माइआ मोह पसारी ॥
जिसु अंतरि प्रीति राम रसु नाही दुबिधा करम बिकारी ॥3॥
अंतरि रतन पदारथ हित कौ दुरै न लाल पिआरी ॥
नानक गुरमुखि नामु अमोलकु जुगि जुगि अंतरि धारी ॥4॥3॥
जाति बरन कुल सहसा चूका गुरमति सबदि बीचारी ॥1॥
जिसु मनु मानै अभिमानु न ता कउ हिंसा लोभु विसारे ॥
सहजि रवै वरु कामणि पिर की गुरमुखि रंगि सवारे ॥2॥
जारउ ऐसी प्रीति कुटंब सनबंधी माइआ मोह पसारी ॥
जिसु अंतरि प्रीति राम रसु नाही दुबिधा करम बिकारी ॥3॥
अंतरि रतन पदारथ हित कौ दुरै न लाल पिआरी ॥
नानक गुरमुखि नामु अमोलकु जुगि जुगि अंतरि धारी ॥4॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे जीव-स्त्री! इस तरीके से ही (भाव, उस प्रभू के अंग-संग होने के यकीन करने पर ही) पति-प्रभू मिलता है। (जिसे मिल गया है) उस जीव-स्त्री के सौ-भाग्य जाग उठे हैं। वह पति-प्रभू को प्यारी हो गई है। गुरू की मति ले के गुरू के शबद द्वारा वह जीव-स्त्री विचारवान हो जाती है। जाति-वर्ण-कुल (आदि के) बारे में उसका भ्रम दूर हो जाता है। 1। जिस का मन (ये) मान जाता है (कि प्रभू सदा मेरे अंग-संग है) उसको अहंकार नहीं रहता। वह निर्दयता और लालच को (अपने अंदर से) भुला देती है। पति-प्रभू की प्यारी वह जीव-स्त्री अडोल अवस्था में टिक के पति-प्रभू को मिली रहती है। गुरू की शरण पड़ कर प्रभू के प्यार में वह अपने आप को सवारती है। 2। मैं परिवार और संबन्धियों के ऐसे मोह-प्यार को (अपने अंदर से) जला दूं जो (मेरे अंदर) माया के मोह का पसारा ही पसारता है। जिसके हृदय में प्रभू का प्यार नहीं। प्रभू-मिलाप का आनंद नहीं (उपजता)। वह मेर-तेर और (अन्य) विकार भरे कामों में प्रवृक्त रहती है। 3। जिस जीव-स्त्री के हृदय में प्रभू-चरणों का प्यार पैदा करने के लिए प्रभू की सिफत-सालाह के रत्न मौजूद हैं। प्रभू की वह प्यारी जीव-स्त्री (जगत में) छुपी नहीं रहती। हे नानक! हरेक युग में ही (भाव, सदा से ही ऐसी जीव-स्त्री) गुरू की शरण पड़ कर अपने हृदय में प्रभू का अमोलक-नाम धारण करती आई है (भाव, जगत के आरंभ से ही ये मर्यादा चली आ रही है कि प्रभू की सिफत-सालाह करने से प्रभू-चरणों से प्यार बनता है)। 4। 3।
· शबद · राग सारंग
हरि के संत जना की हम धूरि ॥
सारंग महला 4 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि के संत जना की हम धूरि ॥
मिलि सतसंगति परम पदु पाइआ आतम रामु रहिआ भरपूरि ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु संतु मिलै सांति पाईऐ किलविख दुख काटे सभि दूरि ॥
आतम जोति भई परफूलित पुरखु निरंजनु देखिआ हजूरि ॥1॥
वडै भागि सतसंगति पाई हरि हरि नामु रहिआ भरपूरि ॥
अठसठि तीरथ मजनु कीआ सतसंगति पग नाए धूरि ॥2॥
दुरमति बिकार मलीन मति होछी हिरदा कुसुधु लागा मोह कूरु ॥
बिनु करमा किउ संगति पाईऐ हउमै बिआपि रहिआ मनु झूरि ॥3॥
होहु दइआल क्रिपा करि हरि जी मागउ सतसंगति पग धूरि ॥
नानक संतु मिलै हरि पाईऐ जनु हरि भेटिआ रामु हजूरि ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि के संत जना की हम धूरि ॥
मिलि सतसंगति परम पदु पाइआ आतम रामु रहिआ भरपूरि ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु संतु मिलै सांति पाईऐ किलविख दुख काटे सभि दूरि ॥
आतम जोति भई परफूलित पुरखु निरंजनु देखिआ हजूरि ॥1॥
वडै भागि सतसंगति पाई हरि हरि नामु रहिआ भरपूरि ॥
अठसठि तीरथ मजनु कीआ सतसंगति पग नाए धूरि ॥2॥
दुरमति बिकार मलीन मति होछी हिरदा कुसुधु लागा मोह कूरु ॥
बिनु करमा किउ संगति पाईऐ हउमै बिआपि रहिआ मनु झूरि ॥3॥
होहु दइआल क्रिपा करि हरि जी मागउ सतसंगति पग धूरि ॥
नानक संतु मिलै हरि पाईऐ जनु हरि भेटिआ रामु हजूरि ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: सारंग महला 4 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! मैं परमात्मा के संत-जनों के चरणों की धूड़ (हुआ रहता हूँ)। संत-जनों की संगति में मिल के सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा प्राप्त हो जाता है। और परमात्मा सब जगह बसता दिखाई देता है। 1। रहाउ। हे भाई! जब गुरू-संत मिल जाता है, तब आत्मिक शीतलता प्राप्त हो जाती है। गुरू (मनुष्य के) सारे पाप सारे दुख काट के दूर कर देता है। (गुरू को मिलने से) प्राण खिल उठते हैं। निर्लिप और सर्व-व्यापक प्रभू अंग-संग बसता दिख जाता है। 1। हे भाई! जिस मनुष्य ने बड़ी किस्मत से साध-संगति प्राप्त कर ली। उसने सब जगह भरपूर परमात्मा का नाम (दिल में बसा लिया)। सत्संगियों के चरणों की धूड़ में नहा के उसने (मानो) अढ़सठ तीर्थों का स्नान कर लिया। 2। हे भाई! जिस मनुष्य को माया का झूठा मोह चिपका रहता है। उसका हृदय (विकारों से) गंदा (हुआ रहता है)। उसकी मति विकारों से खोटी मैली और होछी हुई रहती है। हे भाई! परमात्मा की मेहर के बिना साध-संगति का मिलाप हासिल नहीं होता। अहंकार में फसा हुआ मनुष्य का मन सदा चिंता-फिक्र में टिका रहता है। 3। हे प्रभू जी! (मेरे पर) दयावान हों। मेहर करें। मैं (आपके दर से) सत्संगियों के चरणों की धूड़ माँगता हूँ। हे नानक! जब गुरू मिल जाता है, तब परमात्मा मिल जाता है। जिसको परमात्मा का दास (गुरू) मिलता है। उसको परमात्मा अंग-संग बसता दिखता है। 4। 1।
· शबद · राग सारंग
गोबिंद चरनन कउ बलिहारी ॥
सारंग महला 4 ॥
गोबिंद चरनन कउ बलिहारी ॥
भवजलु जगतु न जाई तरणा जपि हरि हरि पारि उतारी ॥1॥ रहाउ ॥
हिरदै प्रतीति बनी प्रभ केरी सेवा सुरति बीचारी ॥
अनदिनु राम नामु जपि हिरदै सरब कला गुणकारी ॥1॥
प्रभु अगम अगोचरु रविआ स्रब ठाई मनि तनि अलख अपारी ॥
गुर किरपाल भए तब पाइआ हिरदै अलखु लखारी ॥2॥
अंतरि हरि नामु सरब धरणीधर साकत कउ दूरि भइआ अहंकारी ॥
त्रिसना जलत न कबहू बूझहि जूऐ बाजी हारी ॥3॥
ऊठत बैठत हरि गुन गावहि गुरि किंचत किरपा धारी ॥
नानक जिन कउ नदरि भई है तिन की पैज सवारी ॥4॥2॥
गोबिंद चरनन कउ बलिहारी ॥
भवजलु जगतु न जाई तरणा जपि हरि हरि पारि उतारी ॥1॥ रहाउ ॥
हिरदै प्रतीति बनी प्रभ केरी सेवा सुरति बीचारी ॥
अनदिनु राम नामु जपि हिरदै सरब कला गुणकारी ॥1॥
प्रभु अगम अगोचरु रविआ स्रब ठाई मनि तनि अलख अपारी ॥
गुर किरपाल भए तब पाइआ हिरदै अलखु लखारी ॥2॥
अंतरि हरि नामु सरब धरणीधर साकत कउ दूरि भइआ अहंकारी ॥
त्रिसना जलत न कबहू बूझहि जूऐ बाजी हारी ॥3॥
ऊठत बैठत हरि गुन गावहि गुरि किंचत किरपा धारी ॥
नानक जिन कउ नदरि भई है तिन की पैज सवारी ॥4॥2॥
हिन्दी अर्थ: सारंग महला 4 ॥ हे भाई! परमात्मा के चरणों से सदके जाना चाहिए। हे भाई! (परमात्मा का नाम जपने के बिना) जगत (के विकारों) के संसार-समुंद्र से पार नहीं लांघा जा सकता। हे भाई! (परमात्मा का नाम) जपा करें। परमात्मा (विकार-भरे जगत से) पार लंघा देता है। 1। रहाउ। हृदय में परमात्मा के प्रति श्रद्धा बन जाती है। मनुष्य की सुरति सेवा-भक्ति में जुड़ी रहती है। हे भाई! सारी ताकतों के मालिक सारे गुणों के मालिक परमात्मा का नाम हर वक्त हृदय में जप के मनुष्य के हृदय में परमात्मा के गुण मन में बसते हैं। 1। हे भाई! (जो) परमात्मा (जीवों की) पहुँच से परे है (जीवों की) ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है। (जो) सब जगह मौजूद है। सबके मन में तन में बसता है। अदृश्य है और बेअंत है वह परमात्मा तब मिल जाता है जब (मनुष्य पर) सतिगुरू जी दयावान होते हैं, तब मनुष्य उस अदृश्य प्रभू को अपने दिल में (ही) देख लेता है। 2। हे भाई! धरती के आसरे परमात्मा का नाम सब जीवों के अंदर मौजूद है। पर परमात्मा से टूटे हुए अहंकारी मनुष्यों को कहीं दूर बसता प्रतीत होता है। माया की तृष्णा की आग में जल रहे वह मनुष्य कभी भी (इस भेद को) नहीं समझते। उन्होंने मनुष्य-जीवन की बाज़ी हारी हुई होती है (जैसे जुआरिए ने) जूए में (अपना धन)। 3। हे नानक! जिन मनुष्यों पर गुरू ने थोड़ी जितनी भी मेहर कर दी। वे उठते-बैठते हर वक्त परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। हे भाई! जिन पर परमात्मा की मेहर की निगाह हुई। परमात्मा ने उनकी (लोक-परलोक में) लाज रख ली। 4। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1198 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।