इन बिधि हरि मिलीऐ वर कामनि धन सोहागु पिआरी ॥ जाति बरन कुल सहसा चूका गुरमति सबदि बीचारी ॥1॥ जिसु मनु मानै अभिमानु न ता कउ हिंसा लोभु विसारे ॥ सहजि रवै वरु कामणि पिर की गुरमुखि रंगि सवारे ॥2॥ जारउ ऐसी प्रीति कुटंब सनबंधी माइआ मोह पसारी ॥ जिसु अंतरि प्रीति राम रसु नाही दुबिधा करम बिकारी ॥3॥ अंतरि रतन पदारथ हित कौ दुरै न लाल पिआरी ॥ नानक गुरमुखि नामु अमोलकु जुगि जुगि अंतरि धारी ॥4॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: हे जीव-स्त्री ! इस तरीके से ही (भाव। उस प्रभू के अंग-संग होने के यकीन करने पर ही) पति-प्रभू मिलता है। (जिसे मिल गया है) उस जीव-स्त्री के सौ-भाग्य जाग उठे हैं। वह पति-प्रभू को प्यारी हो गई है। गुरू की मति ले के गुरू के शबद द्वारा वह जीव-स्त्री विचारवान हो जाती है। जाति-वर्ण-कुल (आदि के) बारे में उसका भ्रम दूर हो जाता है। 1। जिस का मन (ये) मान जाता है (कि प्रभू सदा मेरे अंग-संग है) उसको अहंकार नहीं रहता। वह निर्दयता और लालच को (अपने अंदर से) भुला देती है। पति-प्रभू की प्यारी वह जीव-स्त्री अडोल अवस्था में टिक के पति-प्रभू को मिली रहती है। गुरू की शरण पड़ कर प्रभू के प्यार में वह अपने आप को सवारती है। 2। मैं परिवार और संबन्धियों के ऐसे मोह-प्यार को (अपने अंदर से) जला दूं जो (मेरे अंदर) माया के मोह का पसारा ही पसारता है। जिसके हृदय में प्रभू का प्यार नहीं। प्रभू-मिलाप का आनंद नहीं (उपजता)। वह मेर-तेर और (अन्य) विकार भरे कामों में प्रवृक्त रहती है। 3। जिस जीव-स्त्री के हृदय में प्रभू-चरणों का प्यार पैदा करने के लिए प्रभू की सिफत-सालाह के रत्न मौजूद हैं। प्रभू की वह प्यारी जीव-स्त्री (जगत में) छुपी नहीं रहती। हे नानक ! हरेक युग में ही (भाव। सदा से ही ऐसी जीव-स्त्री) गुरू की शरण पड़ कर अपने हृदय में प्रभू का अमोलक-नाम धारण करती आई है (भाव। जगत के आरंभ से ही ये मर्यादा चली आ रही है कि प्रभू की सिफत-सालाह करने से प्रभू-चरणों से प्यार बनता है)। 4। 3।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: सारंग महला 4 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! मैं परमात्मा के संत-जनों के चरणों की धूड़ (हुआ रहता हूँ)। संत-जनों की संगति में मिल के सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा प्राप्त हो जाता है। और परमात्मा सब जगह बसता दिखाई देता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जब गुरू-संत मिल जाता है। तब आत्मिक शीतलता प्राप्त हो जाती है। गुरू (मनुष्य के) सारे पाप सारे दुख काट के दूर कर देता है। (गुरू को मिलने से) प्राण खिल उठते हैं। निर्लिप और सर्व-व्यापक प्रभू अंग-संग बसता दिख जाता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य ने बड़ी किस्मत से साध-संगति प्राप्त कर ली। उसने सब जगह भरपूर परमात्मा का नाम (दिल में बसा लिया)। सत्संगियों के चरणों की धूड़ में नहा के उसने (मानो) अढ़सठ तीर्थों का स्नान कर लिया। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य को माया का झूठा मोह चिपका रहता है। उसका हृदय (विकारों से) गंदा (हुआ रहता है)। उसकी मति विकारों से खोटी मैली और होछी हुई रहती है। हे भाई ! परमात्मा की मेहर के बिना साध-संगति का मिलाप हासिल नहीं होता। अहंकार में फसा हुआ मनुष्य का मन सदा चिंता-फिक्र में टिका रहता है। 3। हे प्रभू जी ! (मेरे पर) दयावान हो। मेहर कर। मैं (आपके दर से) सत्संगियों के चरणों की धूड़ माँगता हूँ। हे नानक ! जब गुरू मिल जाता है। तब परमात्मा मिल जाता है। जिसको परमात्मा का दास (गुरू) मिलता है। उसको परमात्मा अंग-संग बसता दिखता है। 4। 1।
सारंग महला 4 ॥ गोबिंद चरनन कउ बलिहारी ॥ भवजलु जगतु न जाई तरणा जपि हरि हरि पारि उतारी ॥1॥ रहाउ ॥ हिरदै प्रतीति बनी प्रभ केरी सेवा सुरति बीचारी ॥ अनदिनु राम नामु जपि हिरदै सरब कला गुणकारी ॥1॥ प्रभु अगम अगोचरु रविआ स्रब ठाई मनि तनि अलख अपारी ॥ गुर किरपाल भए तब पाइआ हिरदै अलखु लखारी ॥2॥ अंतरि हरि नामु सरब धरणीधर साकत कउ दूरि भइआ अहंकारी ॥ त्रिसना जलत न कबहू बूझहि जूऐ बाजी हारी ॥3॥ ऊठत बैठत हरि गुन गावहि गुरि किंचत किरपा धारी ॥ नानक जिन कउ नदरि भई है तिन की पैज सवारी ॥4॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: सारंग महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा के चरणों से सदके जाना चाहिए। हे भाई ! (परमात्मा का नाम जपने के बिना) जगत (के विकारों) के संसार-समुंद्र से पार नहीं लांघा जा सकता। हे भाई ! (परमात्मा का नाम) जपा कर। परमात्मा (विकार-भरे जगत से) पार लंघा देता है। 1। रहाउ। हृदय में परमात्मा के प्रति श्रद्धा बन जाती है। मनुष्य की सुरति सेवा-भक्ति में जुड़ी रहती है। हे भाई ! सारी ताकतों के मालिक सारे गुणों के मालिक परमात्मा का नाम हर वक्त हृदय में जप के मनुष्य के हृदय में परमात्मा के गुण मन में बसते हैं। 1। हे भाई ! (जो) परमात्मा (जीवों की) पहुँच से परे है (जीवों की) ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है। (जो) सब जगह मौजूद है। सबके मन में तन में बसता है। अदृश्य है और बेअंत है वह परमात्मा तब मिल जाता है जब (मनुष्य पर) सतिगुरू जी दयावान होते हैं। तब मनुष्य उस अदृश्य प्रभू को अपने दिल में (ही) देख लेता है। 2। हे भाई ! धरती के आसरे परमात्मा का नाम सब जीवों के अंदर मौजूद है। पर परमात्मा से टूटे हुए अहंकारी मनुष्यों को कहीं दूर बसता प्रतीत होता है। माया की तृष्णा की आग में जल रहे वह मनुष्य कभी भी (इस भेद को) नहीं समझते। उन्होंने मनुष्य-जीवन की बाज़ी हारी हुई होती है (जैसे जुआरिए ने) जूए में (अपना धन)। 3। हे नानक ! जिन मनुष्यों पर गुरू ने थोड़ी जितनी भी मेहर कर दी। वे उठते-बैठते हर वक्त परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। हे भाई ! जिन पर परमात्मा की मेहर की निगाह हुई। परमात्मा ने उनकी (लोक-परलोक में) लाज रख ली। 4। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे जीव-स्त्री ! इस तरीके से ही (भाव।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।