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नामे सर भरि सोना लेहु ॥10॥
नामे सर भरि सोना लेहु ॥10॥
मालु लेउ तउ दोजकि परउ ॥
दीनु छोडि दुनीआ कउ भरउ ॥11॥
पावहु बेड़ी हाथहु ताल ॥
नामा गावै गुन गोपाल ॥12॥
गंग जमुन जउ उलटी बहै ॥
तउ नामा हरि करता रहै ॥13॥
सात घड़ी जब बीती सुणी ॥
अजहु न आइओ त्रिभवण धणी ॥14॥
पाखंतण बाज बजाइला ॥
गरुड़ चड़॑े गोबिंद आइला ॥15॥
अपने भगत परि की प्रतिपाल ॥
गरुड़ चड़॑े आए गोपाल ॥16॥
कहहि त धरणि इकोडी करउ ॥
कहहि त ले करि ऊपरि धरउ ॥17॥
कहहि त मुई गऊ देउ जीआइ ॥
सभु कोई देखै पतीआइ ॥18॥
नामा प्रणवै सेल मसेल ॥
गऊ दुहाई बछरा मेलि ॥19॥
दूधहि दुहि जब मटुकी भरी ॥
ले बादिसाह के आगे धरी ॥20॥
बादिसाहु महल महि जाइ ॥
अउघट की घट लागी आइ ॥21॥
काजी मुलां बिनती फुरमाइ ॥
बखसी हिंदू मै तेरी गाइ ॥22॥
नामा कहै सुनहु बादिसाह ॥
इहु किछु पतीआ मुझै दिखाइ ॥23॥
इस पतीआ का इहै परवानु ॥
साचि सीलि चालहु सुलितान ॥24॥
नामदेउ सभ रहिआ समाइ ॥
मिलि हिंदू सभ नामे पहि जाहि ॥25॥
जउ अब की बार न जीवै गाइ ॥
त नामदेव का पतीआ जाइ ॥26॥
नामे की कीरति रही संसारि ॥
भगत जनां ले उधरिआ पारि ॥27॥
सगल कलेस निंदक भइआ खेदु ॥
नामे नाराइन नाही भेदु ॥28॥1॥10॥
मालु लेउ तउ दोजकि परउ ॥
दीनु छोडि दुनीआ कउ भरउ ॥11॥
पावहु बेड़ी हाथहु ताल ॥
नामा गावै गुन गोपाल ॥12॥
गंग जमुन जउ उलटी बहै ॥
तउ नामा हरि करता रहै ॥13॥
सात घड़ी जब बीती सुणी ॥
अजहु न आइओ त्रिभवण धणी ॥14॥
पाखंतण बाज बजाइला ॥
गरुड़ चड़॑े गोबिंद आइला ॥15॥
अपने भगत परि की प्रतिपाल ॥
गरुड़ चड़॑े आए गोपाल ॥16॥
कहहि त धरणि इकोडी करउ ॥
कहहि त ले करि ऊपरि धरउ ॥17॥
कहहि त मुई गऊ देउ जीआइ ॥
सभु कोई देखै पतीआइ ॥18॥
नामा प्रणवै सेल मसेल ॥
गऊ दुहाई बछरा मेलि ॥19॥
दूधहि दुहि जब मटुकी भरी ॥
ले बादिसाह के आगे धरी ॥20॥
बादिसाहु महल महि जाइ ॥
अउघट की घट लागी आइ ॥21॥
काजी मुलां बिनती फुरमाइ ॥
बखसी हिंदू मै तेरी गाइ ॥22॥
नामा कहै सुनहु बादिसाह ॥
इहु किछु पतीआ मुझै दिखाइ ॥23॥
इस पतीआ का इहै परवानु ॥
साचि सीलि चालहु सुलितान ॥24॥
नामदेउ सभ रहिआ समाइ ॥
मिलि हिंदू सभ नामे पहि जाहि ॥25॥
जउ अब की बार न जीवै गाइ ॥
त नामदेव का पतीआ जाइ ॥26॥
नामे की कीरति रही संसारि ॥
भगत जनां ले उधरिआ पारि ॥27॥
सगल कलेस निंदक भइआ खेदु ॥
नामे नाराइन नाही भेदु ॥28॥1॥10॥
हिन्दी अर्थ: नामदेव के बराबर का तोल के सोना ले लें (और इसे छोड़ दें)। 10। (उसने उत्तर दिया) अगर मैं रिश्वत लूँ तो दोज़क में पड़ता हूँ। (क्योंकि इस तरह तो) मैं मज़हब छोड़ के दौलत इकट्ठी करता हूँ। 11। नामदेव के पैरों में बेड़ियाँ हैं। पर फिर भी वह हाथों से ताल दे दे के परमात्मा के गुण गाता है। 12। अगर गंगा और जमुना उल्टी भी बहने लग जाएं। तो भी नामा हरी के गुण गाता रहेगा (और दबाव में आ के खुदा खुदा नहीं कहेगा)। 13। (बादशाह ने गाय जिंदा करने के लिए एक पहर की मोहलत दी हुई थी) जब (घड़ियाल पर) सात घड़ियाँ बीतने की आवाज़ सुनी। तो (मैंने नामे ने सोचा कि) अभी तक भी त्रिलोकी का मालिक प्रभू नहीं आया। 14। (बस ! उसी वक्त) पंखों के फड़कने की आवाज़ आई। विष्णू भगवान गरुड़ पर चढ़ कर आ गया। 15। और उन्होंने अपने भगत की रक्षा कर ली। प्रभू जी गरुड़ पर चढ़ कर आ गए। 16। (गोपाल ने कहा- हे नामदेव !) अगर आप कहें तो मैं धरती टेढ़ी कर दूँ। अगर आप कहें तो इसको पकड़ के उल्टा दूँ। 17 अगर आप कहें तो मरी हुई गाय जीवित कर दूँ। और यहाँ हरेक व्यक्ति तसल्ली से देख ले। 18। (गोपाल की इस कृपा पर) मैंने नामे ने (उन लोगों को) विनती की- गाय के पिछले पैर रस्सी से बाँध दें। (फिर उन्होंने) बछड़ा छोड़कर गाय का दूध दुह लिया। 19। दूध दुह के जब उन्होंने मटकी भर ली तो वह ले के बादशाह के आगे रख दी। 20। बादशाह महलों में चला गया (और वहाँ उस पर) मुश्किल घड़ी आ गई (भाव। वह सहम गया)। अपने काज़ियों और मौलवियों के ज़रिए उसने विनती (भेज डाली) - हे हिंदू ! मुझे हुकम करें (जो हुकम आप देंगे मैं करूँगा)। मुझे बख्शें। मैं आपकी गाय हूँ। 21। 22। नामा कहता है- हे बादशाह ! सुनें। मुझे एक तसल्ली करवा दें। इस इकरार का माप यह होगा कि हे बादशाह ! आप (आगे से) सच्चाई पर चलेंगे। अच्छे स्वभाव में रहेंगे। 23। 24। (यह करिश्मा सुन देख के) घर-घर में नामदेव की बातें होने लगीं। (नगर के) सारे हिन्दू मिल के नामदेव के पास आए (और कहने लगे-) अगर अबकी बार गाय ना जिंदा होती तो नामदेव का ऐतबार जाता रहना था। 25। 26। नामदेव की शोभा जगत में बनी रही है; पर प्रभू ने अपने भगतों को। अपने सेवकों को चरणों से लगा के पार कर दिया है। (यह शोभा सुन के) निंदकों को बड़ा कलेश और बड़ा दुख हुआ है (क्योंकि वे यह नहीं जानते कि) नामदेव और परमात्मा में कोई दूरी नहीं रह गई। 27। 28। 1। 10।
जउ गुरदेउ त मिलै मुरारि ॥
घरु 2 ॥
जउ गुरदेउ त मिलै मुरारि ॥
जउ गुरदेउ त उतरै पारि ॥
जउ गुरदेउ त बैकुंठ तरै ॥
जउ गुरदेउ त जीवत मरै ॥1॥
सति सति सति सति सति गुरदेव ॥
झूठु झूठु झूठु झूठु आन सभ सेव ॥1॥ रहाउ ॥
जउ गुरदेउ त नामु द्रिड़ावै ॥
जउ गुरदेउ न दह दिस धावै ॥
जउ गुरदेउ पंच ते दूरि ॥
जउ गुरदेउ न मरिबो झूरि ॥2॥
जउ गुरदेउ त अंम्रित बानी ॥
जउ गुरदेउ त अकथ कहानी ॥
जउ गुरदेउ त अंम्रित देह ॥
जउ गुरदेउ नामु जपि लेहि ॥3॥
जउ गुरदेउ भवन त्रै सूझै ॥
जउ गुरदेउ ऊच पद बूझै ॥
जउ गुरदेउ त सीसु अकासि ॥
जउ गुरदेउ सदा साबासि ॥4॥
जउ गुरदेउ सदा बैरागी ॥
जउ गुरदेउ पर निंदा तिआगी ॥
जउ गुरदेउ त मिलै मुरारि ॥
जउ गुरदेउ त उतरै पारि ॥
जउ गुरदेउ त बैकुंठ तरै ॥
जउ गुरदेउ त जीवत मरै ॥1॥
सति सति सति सति सति गुरदेव ॥
झूठु झूठु झूठु झूठु आन सभ सेव ॥1॥ रहाउ ॥
जउ गुरदेउ त नामु द्रिड़ावै ॥
जउ गुरदेउ न दह दिस धावै ॥
जउ गुरदेउ पंच ते दूरि ॥
जउ गुरदेउ न मरिबो झूरि ॥2॥
जउ गुरदेउ त अंम्रित बानी ॥
जउ गुरदेउ त अकथ कहानी ॥
जउ गुरदेउ त अंम्रित देह ॥
जउ गुरदेउ नामु जपि लेहि ॥3॥
जउ गुरदेउ भवन त्रै सूझै ॥
जउ गुरदेउ ऊच पद बूझै ॥
जउ गुरदेउ त सीसु अकासि ॥
जउ गुरदेउ सदा साबासि ॥4॥
जउ गुरदेउ सदा बैरागी ॥
जउ गुरदेउ पर निंदा तिआगी ॥
हिन्दी अर्थ: घरु 2॥ अगर गुरू मिल जाए तो रॅब मिल जाता है। (संसार-समुंद्र से मनुष्य) पार लांघ जाता है। (यहाँ से) तैर के बैकुंठ में जा पहुँचता है। (दुनिया में) रहते हुए (विकारों से उसका मन) मरा रहता है। 1। ये यकीन जानें कि गुरू की सेवा ही सदा-स्थिर रहने वाला उद्यम है। और सब (देवताओं की) सेवा-पूजा व्यर्थ है। व्यर्थ है। व्यर्थ है। 1। रहाउ। अगर गुरू मिल जाए तो वह नाम जपने का स्वभाव पक्का कर देता है। (फिर मन) दसों दिशाओं में नहीं दौड़ता। पाँच कामादिक से बचा रहता है। (चिंता-फिकर में) झुर-झुर के नहीं खपता। 2। अगर गुरू मिल जाए तो मनुष्य के बोल मीठे हो जाते हैं। अकथ प्रभू की बातें करने लग जाता है। शरीर पवित्र हो रहता है। (क्योंकि फिर यह सदा) नाम जपता है। 3। अगर गुरू ईश्वर मिल जाए तो मनुष्य को तीनों भवनों की सूझ हो जाती है (भाव। यह समझ आ जाती है कि प्रभू तीनों भवनों में ही मौजूद है)। ऊँची आत्मिक अवस्था से जान-पहचान हो जाती है। मन प्रभू-चरणों में टिका रहता है (हर जगह से) सदा शोभा मिलती है। 4। अगर गुरू मिल जाए तो मनुष्य (दुनिया में रहता हुआ ही) सदा विरक्त रहता है। किसी की निंदा नहीं करता।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत नामदेव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1166 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।