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अंग 1165

अंग
1165
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: Bhagat Naam Dev Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पर नारी सिउ घालै धंधा ॥
जैसे सिंबलु देखि सूआ बिगसाना ॥
अंत की बार मूआ लपटाना ॥1॥
पापी का घरु अगने माहि ॥
जलत रहै मिटवै कब नाहि ॥1॥ रहाउ ॥
हरि की भगति न देखै जाइ ॥
मारगु छोडि अमारगि पाइ ॥
मूलहु भूला आवै जाइ ॥
अंम्रितु डारि लादि बिखु खाइ ॥2॥
जिउ बेस्वा के परै अखारा ॥
कापरु पहिरि करहि संीगारा ॥
पूरे ताल निहाले सास ॥
वा के गले जम का है फास ॥3॥
जा के मसतकि लिखिओ करमा ॥
सो भजि परि है गुर की सरना ॥
कहत नामदेउ इहु बीचारु ॥
इन बिधि संतहु उतरहु पारि ॥4॥2॥8॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: और पराई औरत के साथ झखें मारता है। (पराई नारि को देख के वह ऐसे खुश होता है) जैसे तोता सिंबल वृक्ष को देख के खुश होता है (पर उस सिंबल से उस तोते को कुछ हासिल नहीं होता); आखिर में ऐसा विकारी मनुष्य (इस विकार) में ग्रसा हुआ ही मर जाता है। 1। विकारी बँदे का ठिकाना सदा उस आग में रहता है जो आग सदा जलती रहती है। कभी बुझती नहीं। 1। रहाउ। जहाँ प्रभू की भक्ति होती है (विकारी मनुष्य) वह जगह जा के नहीं देखता। (जीवन का सीधा) राह छोड़ के (विकारों के) उल्टे रास्ते पर पड़ता है। जगत के मूल प्रभू से टूट के जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है। नाम-अमृत डोल के (गिरा के) (विकारों का) जहर लाद के खाता है। 2। जैसे वैश्या के मुजरे होते हैं। (सुंदर-सुंदर) पोशाकें पहन के श्रृंगार करती हैं। वैश्या नाचती है। और बड़े ध्यान से अपने सुर को तोलती है। (बस। इस विकारी जीवन के कारण) उसके गले में जमों का फंदा पड़ता है। 3। जिस मनुष्य के माथे पर प्रभू की बख्शिश (का लेख) लिखा हुआ है (भाव। पिछले किए कर्मों के अनुसार धुर से बख्शिश होती है) वह (विकारों से) हट के सतिगुरू की शरण पड़ता है। नामदेव यह एक विचार के वचन कहता है- हे संत जनो ! गुरू की शरण पड़ कर ही (संसार-समुंद्र के विकारों से) पार लांघ सकोगे। 4। 2। 8।
संडा मरका जाइ पुकारे ॥
पड़ै नही हम ही पचि हारे ॥
रामु कहै कर ताल बजावै चटीआ सभै बिगारे ॥1॥
राम नामा जपिबो करै ॥
हिरदै हरि जी को सिमरनु धरै ॥1॥ रहाउ ॥
बसुधा बसि कीनी सभ राजे बिनती करै पटरानी ॥
पूतु प्रहिलादु कहिआ नही मानै तिनि तउ अउरै ठानी ॥2॥
दुसट सभा मिलि मंतर उपाइआ करसह अउध घनेरी ॥
गिरि तर जलु जुआला भै राखिओ राजा रामि माइआ फेरी ॥3॥
काढि खड़गु कालु भै कोपिओ मोहि बताउ जु तुहि राखै ॥
पीत पीतांबर त्रिभवण धणी थंभ माहि हरि भाखै ॥4॥
हरनाखसु जिनि नखह बिदारिओ सुरि नर कीए सनाथा ॥
कहि नामदेउ हम नरहरि धिआवह रामु अभै पद दाता ॥5॥3॥9॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: (प्रहलाद के दोनों उस्ताद। अध्यापक) संड और अमरक ने (हर्णाकश्यप् के पास) जा के फरियाद की- हम थक-हार गए हैं। प्रहलाद पढ़ता नहीं। वह हाथों से ताल बजाता है। और राम-नाम गाता है। और सारे विद्यार्थी भी उसने बिगाड़ दिए हैं। 1। (प्रहलाद) हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरता है। परमात्मा के नाम का सिमरन अपने हृदय में धारण किए रखता है। 1। रहाउ। (प्रहलाद की माँ) बड़ी रानी (प्रहलाद के आगे) तरले करती है (और समझाती है कि आपके पिता) राजे ने सारी धरती अपने वश में की हुई है (उसकी आज्ञा का उलंघन ना कर)। पर पुत्र प्रहलाद (माँ का) कहा नहीं मानता। उसने तो कोई और ही बात मन में दृढ़ की हुई है। 2। दुष्टों की जुण्डली ने मिल के सलाह कर ली- (अगर प्रहलाद नहीं मानता तो) हम इसे मार डालेंगे; पर जगत के मालिक प्रभू ने अपनी माया का स्वभाव ही बदल डाला। (प्रभू ने प्रहलाद को) पहाड़। वृक्ष। पानी। आग (इन सबके) डर से बचा लिया। 3। (अब अंदर से) डरा हुआ (पर बाहर से) क्रोधवान हो के। मौत-रूप तलवार निकाल के (बोला-) मुझे बताओ जो आपको (इस तलवार से) बचा सकता है; (आगे से) जगत का मालिक परमात्मा खम्भे में से बोलता है। 4। नामदेव कहता है-जिस प्रभू ने हर्णाकश्यप को नाखूनों से चीर दिया। देवताओं और मनुष्यों को ढारस दी (सांत्वना दी)। मैं भी उसी प्रभू को सिमरता हूँ; प्रभू ही निर्भयता का दर्जा बख्शने वाला है। 5। 3। 9।
सुलतानु पूछै सुनु बे नामा ॥
देखउ राम तुम॑ारे कामा ॥1॥
नामा सुलताने बाधिला ॥
देखउ तेरा हरि बीठुला ॥1॥ रहाउ ॥
बिसमिलि गऊ देहु जीवाइ ॥
नातरु गरदनि मारउ ठांइ ॥2॥
बादिसाह ऐसी किउ होइ ॥
बिसमिलि कीआ न जीवै कोइ ॥3॥
मेरा कीआ कछू न होइ ॥
करि है रामु होइ है सोइ ॥4॥
बादिसाहु चड़ि॑ओ अहंकारि ॥
गज हसती दीनो चमकारि ॥5॥
रुदनु करै नामे की माइ ॥
छोडि रामु की न भजहि खुदाइ ॥6॥
न हउ तेरा पूंगड़ा न तू मेरी माइ ॥
पिंडु पड़ै तउ हरि गुन गाइ ॥7॥
करै गजिंदु सुंड की चोट ॥
नामा उबरै हरि की ओट ॥8॥
काजी मुलां करहि सलामु ॥
इनि हिंदू मेरा मलिआ मानु ॥9॥
बादिसाह बेनती सुनेहु ॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: (मुहम्मद-बिन-तुग़लक) बादशाह पूछता है- हे नामे ! सुन। मैं आपके राम के काम देखना चाहता हूँ। 1। बादशाह ने मुझे (नामे को) बाँध लिया (और कहने लगा-) मैं आपका हरी। आपका बीठल। देखना चाहता हूँ। 1। रहाउ। (मेरी यह) मरी हुई गाय जीवित कर दे। नहींतो आपको भी यहीं (अभी) मार दूँगा। 2। (मैंने कहा-) बादशाह ! ऐसी बात कैसे हो सकती है। कभी कोई मरा हुआ मुड़ के नहीं जीया। 3। मेरा किया कुछ नहीं हो सकता। (तथा एक बात और भी है) वही कुछ होता है जो परमात्मा करता है। 4। बदशाह (यह उक्तर सुन के) अहंकार में आया। उसने (मेरे पर) एक बड़ा हाथी उकसा के चढ़ा दिया। 5। (मेरी) नामे की माँ रोने लगी (और कहने लगी- हे बच्चा !) आप राम छोड़ के खुदा-खुदा क्यों नहीं कहने लग जाता। 6। (मैंने उक्तर दिया-) ना मैं आपका पुत्र हूँ। ना आप मेरी माँ है; अगर मेरा शरीर भी नाश हो जाए। तो भी नामा हरी के गुण गाता रहेगा। 7। हाथी अपनी सुंड की चोट करता है। पर नामा बच निकलता है; नामे को परमात्मा का आसरा है। 8। (बादशाह सोचता है-) मुझे (मेरे मज़हब के नेता) काजी और मौलवी सलाम करते हैं। पर इस हिन्दू ने मेरा माण तोड़ दिया है। 9। (हिन्दू लोग मिल के आए। और कहने लगे।) हे बादशाह ! हमारी अर्ज सुन।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे। उनकी वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “और पराई औरत के साथ झखें मारता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।