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भैरों
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· शबद · राग भैरों
साच सबद बिनु कबहु न छूटसि बिरथा जनमु भइओ ॥1॥ रहाउ ॥
साच सबद बिनु कबहु न छूटसि बिरथा जनमु भइओ ॥1॥ रहाउ ॥
तन महि कामु क्रोधु हउ ममता कठिन पीर अति भारी ॥
गुरमुखि राम जपहु रसु रसना इन बिधि तरु तू तारी ॥2॥
बहरे करन अकलि भई होछी सबद सहजु नही बूझिआ ॥
जनमु पदारथु मनमुखि हारिआ बिनु गुर अंधु न सूझिआ ॥3॥
रहै उदासु आस निरासा सहज धिआनि बैरागी ॥
प्रणवति नानक गुरमुखि छूटसि राम नामि लिव लागी ॥4॥2॥3॥
तन महि कामु क्रोधु हउ ममता कठिन पीर अति भारी ॥
गुरमुखि राम जपहु रसु रसना इन बिधि तरु तू तारी ॥2॥
बहरे करन अकलि भई होछी सबद सहजु नही बूझिआ ॥
जनमु पदारथु मनमुखि हारिआ बिनु गुर अंधु न सूझिआ ॥3॥
रहै उदासु आस निरासा सहज धिआनि बैरागी ॥
प्रणवति नानक गुरमुखि छूटसि राम नामि लिव लागी ॥4॥2॥3॥
हिन्दी अर्थ: परमात्मा की सिफतसालाह से वंचित रह के (माया के मोह से। जम के जाल से) आप कभी बचे नहीं रह सकेंगे। आपकी जिंदगी व्यर्थ चली जाएगी। 1। रहाउ। हे प्राणी ! आपके शरीर में काम (जोर डाल रहा) है। क्रोध (प्रबल) है। अहंकार है। मल्कियतों की तमन्ना है। इन सबकी बहुत ज्यादा पीड़ा उठ रही है (इन विकारों में डूबने से आप कैसे बचेंगे?)। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का भजन करें। जीभ से (सिमरन का) स्वाद लें। इन तरीकों से (इन विकारों के गहरे पानी में से सिमरन की) तारी लगा के पार हो जाएँ। 2। हे प्राणी ! (सिफतसालाह के प्रति) आपके कान बहरे (ही रहे)। आपकी बुद्धि तुच्छ हो गई है (थोड़ी-थोड़ी बात पर आपे से बाहर हो जाना आपका स्वभाव बन गया है)। सिफतसालाह का शांत-रस आप समझ नहीं सके। अपने मन के पीछे लग के आपने कीमती मनुष्य-जन्म गवा लिया है। गुरू की शरण ना आने के कारण आप (आत्मिक जीवन के प्रति) अंधे ही रहे। आपको (आत्मिक जीवन की) समझ ना आई। 3। (हे प्राणी !) नानक विनती करता है (और आपको समझाता है कि) जो मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता है वह (विकारों के फंदों से) मुक्ति पा लेता है। प्रभू के नाम में उसकी सुरति टिकी रहती है। वह (दुनिया में विचरता हुआ भी दुनिया से) उपराम रहता है। आशाओं से निर्लिप रहता है। अडोलता की समाधि में टिका रह के वह (दुनिया से) निर्मोह रहता है। 4। 2। 3।
· शबद · राग भैरों
भूंडी चाल चरण कर खिसरे तुचा देह कुमलानी ॥
भैरउ महला 1 ॥
भूंडी चाल चरण कर खिसरे तुचा देह कुमलानी ॥
नेत्री धुंधि करन भए बहरे मनमुखि नामु न जानी ॥1॥
अंधुले किआ पाइआ जगि आइ ॥
रामु रिदै नही गुर की सेवा चाले मूलु गवाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जिहवा रंगि नही हरि राती जब बोलै तब फीके ॥
संत जना की निंदा विआपसि पसू भए कदे होहि न नीके ॥2॥
अंम्रित का रसु विरली पाइआ सतिगुर मेलि मिलाए ॥
जब लगु सबद भेदु नही आइआ तब लगु कालु संताए ॥3॥
अन को दरु घरु कबहू न जानसि एको दरु सचिआरा ॥
गुर परसादि परम पदु पाइआ नानकु कहै विचारा ॥4॥3॥4॥
भूंडी चाल चरण कर खिसरे तुचा देह कुमलानी ॥
नेत्री धुंधि करन भए बहरे मनमुखि नामु न जानी ॥1॥
अंधुले किआ पाइआ जगि आइ ॥
रामु रिदै नही गुर की सेवा चाले मूलु गवाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जिहवा रंगि नही हरि राती जब बोलै तब फीके ॥
संत जना की निंदा विआपसि पसू भए कदे होहि न नीके ॥2॥
अंम्रित का रसु विरली पाइआ सतिगुर मेलि मिलाए ॥
जब लगु सबद भेदु नही आइआ तब लगु कालु संताए ॥3॥
अन को दरु घरु कबहू न जानसि एको दरु सचिआरा ॥
गुर परसादि परम पदु पाइआ नानकु कहै विचारा ॥4॥3॥4॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 1॥ (हे अंधे जीव ! अब बुढ़ापे में) आपकी चाल बेढबी हो चुकी है। आपके हाथ-पैर निढाल हो चुके हैं। आपके शरीर की चमड़ी पर झुरड़ियां पड़ रही हैं। आपकी आँखों के आगे अंधेरा होने लग पड़ा है। आपके कान बहरे हो चुके हैं। पर अभी भी अपने मन के पीछे चल के आपने परमात्मा के नाम के साथ सांझ नहीं डाली। 1। हे (माया के मोह में) अंधे हुए जीव ! आपने जगत में जन्म ले के (आत्मिक जीवन के असली लाभ के तौर पर) कुछ भी नहीं कमाया। बल्कि आपने मूल भी गवा लिया (जो पहले कोई आत्मिक जीवन था वह भी नाश कर लिया। क्योंकि) आपने परमात्मा को अपने हृदय में नहीं बसाया। और आपने गुरू द्वारा बताए हुए कर्म नहीं किए। 1। रहाउ। (हे अंधे जीव !) आपकी जीभ प्रभू के प्यार की याद में नहीं भीगी। जब भी बोलती है फीके बोल ही बोलती है। आप सदा भले लोगों की निंदा में व्यस्त रहते हैं। आपके सारे काम पशुओं वाले होए हुए हैं। (इस तरह रहने से) ये कभी भी अच्छे नहीं हो सकेंगे। 2। (पर जीवों के भी क्या वश।) आत्मिक जीवन देने वाले श्रेष्ठ नाम के जाप का स्वाद उन विरले लोगों को आता है जिन्हें (परमात्मा स्वयं) सतिगुरू की संगति में मिलाता है। मनुष्य को जब तक सिफतसालाह का रस नहीं आता तब तक (ये ऐसे काम करता रहता है जिनके कारण) इसको मौत का डर सताता रहता है। 3। नानक यह विचार की बात कहता है कि गुरू की कृपा से जो मनुष्य सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर ही टिका रहता है और परमात्मा के बिना किसी और का दरवाजा किसी और का घर नहीं तलाशता वह सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। 4। 3। 4।
· शबद · राग भैरों
सगली रैणि सोवत गलि फाही दिनसु जंजालि गवाइआ ॥
भैरउ महला 1 ॥
सगली रैणि सोवत गलि फाही दिनसु जंजालि गवाइआ ॥
खिनु पलु घड़ी नही प्रभु जानिआ जिनि इहु जगतु उपाइआ ॥1॥
मन रे किउ छूटसि दुखु भारी ॥
किआ ले आवसि किआ ले जावसि राम जपहु गुणकारी ॥1॥ रहाउ ॥
ऊंधउ कवलु मनमुख मति होछी मनि अंधै सिरि धंधा ॥
कालु बिकालु सदा सिरि तेरै बिनु नावै गलि फंधा ॥2॥
डगरी चाल नेत्र फुनि अंधुले सबद सुरति नही भाई ॥
सासत्र बेद त्रै गुण है माइआ अंधुलउ धंधु कमाई ॥3॥
खोइओ मूलु लाभु कह पावसि दुरमति गिआन विहूणे ॥
सबदु बीचारि राम रसु चाखिआ नानक साचि पतीणे ॥4॥4॥5॥
सगली रैणि सोवत गलि फाही दिनसु जंजालि गवाइआ ॥
खिनु पलु घड़ी नही प्रभु जानिआ जिनि इहु जगतु उपाइआ ॥1॥
मन रे किउ छूटसि दुखु भारी ॥
किआ ले आवसि किआ ले जावसि राम जपहु गुणकारी ॥1॥ रहाउ ॥
ऊंधउ कवलु मनमुख मति होछी मनि अंधै सिरि धंधा ॥
कालु बिकालु सदा सिरि तेरै बिनु नावै गलि फंधा ॥2॥
डगरी चाल नेत्र फुनि अंधुले सबद सुरति नही भाई ॥
सासत्र बेद त्रै गुण है माइआ अंधुलउ धंधु कमाई ॥3॥
खोइओ मूलु लाभु कह पावसि दुरमति गिआन विहूणे ॥
सबदु बीचारि राम रसु चाखिआ नानक साचि पतीणे ॥4॥4॥5॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 1॥ हे भाई ! सारी रात कामादिक विकारों की नींद में रहते हैं। (इन विकारों के संस्कारों के) फंदे आपके गले में पड़ते जाते हैं। सारा दिन माया कमाने के धंधों में गुजार देते हैं। एक छिन एक पल एक घड़ी आप उस परमात्मा के साथ सांझ नहीं डालते जिसने यह सारा संसार पैदा किया है। 1। हे मन ! आप माया के मोह का भारी दुख सह रहे हैं (यदि आप प्रभू सिमरन नहीं करते तो इस दुख से) कैसे निजात पाएँगे। (दिन-रात माया की खातिर भटक रहे हैं। बताएँ। जब पैदा हुए थे) कौन सी माया अपने साथ ले कर आए थे। यहाँ से चलने के वक्त भी कोई चीज साथ ले के नहीं जा सकेंगे। परमात्मा का नाम जपें। यही है आत्मिक जीवन के गुण पैदा करने वाला। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने के कारण आपका हृदय-कवल प्रभू की याद से उल्टा (बेमुख) होया हुआ है। आपकी समझ तुच्छ हुई पड़ी है। (माया के मोह में) अंधे हुए मन (की अगुवाई) के कारण आपके सिर पर माया के जंजालों की गठड़ी बंधी पड़ी है। जनम-मरन (का चक्कर) सदा आपके सिर के ऊपर टिका हुआ है। प्रभू का नाम सिमरन के बिना आपके गले में मोह के फंदे पड़े हुए हैं। 2। अकड़-भरी आपकी चाल है। आपकी आँखें भी (विकारों में) अंधी हुई पड़ी हैं। परमात्मा की सिफत-सालाह की ओर ध्यान देना आपको अच्छा नहीं लगता। वेद-शास्त्र पढ़ते हुए भी (आप) त्रिगुणी माया के मोह में फँसे हुए हैं। आप (मोह में) अंधे हुए पड़े हैं। और माया की खातिर ही दौड़-भाग करते हैं। 3। हे ज्ञान-हीन जीव ! बुरी मति के पीछे लग के आप वह आत्मिक जीवन भी गँवा बैठे हैं जो पहले आपके पल्ले था (यहाँ जन्म ले कर और) आत्मिक लाभ तो आपने क्या कमाना था। हे नानक ! जिन लोगों ने सिफतसालाह की बाणी को मन में बसा के प्रभू-नाम (के सिमरन) का स्वाद चखा। वह उस सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में मस्त रहते हैं। 4। 4। 5।
· शबद · राग भैरों
गुर कै संगि रहै दिनु राती रामु रसनि रंगि राता ॥
भैरउ महला 1 ॥
गुर कै संगि रहै दिनु राती रामु रसनि रंगि राता ॥
अवरु न जाणसि सबदु पछाणसि अंतरि जाणि पछाता ॥1॥
सो जनु ऐसा मै मनि भावै ॥
आपु मारि अपरंपरि राता गुर की कार कमावै ॥1॥ रहाउ ॥
अंतरि बाहरि पुरखु निरंजनु आदि पुरखु आदेसो ॥
घट घट अंतरि सरब निरंतरि रवि रहिआ सचु वेसो ॥2॥
गुर कै संगि रहै दिनु राती रामु रसनि रंगि राता ॥
अवरु न जाणसि सबदु पछाणसि अंतरि जाणि पछाता ॥1॥
सो जनु ऐसा मै मनि भावै ॥
आपु मारि अपरंपरि राता गुर की कार कमावै ॥1॥ रहाउ ॥
अंतरि बाहरि पुरखु निरंजनु आदि पुरखु आदेसो ॥
घट घट अंतरि सरब निरंतरि रवि रहिआ सचु वेसो ॥2॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 1॥ ऐसा दास दिन-रात गुरू की संगति में रहता है (भाव। गुरू को अपने मन में बसाए रखता है)। परमात्मा (के नाम) को अपनी जीभ पर बसाए रखता है। और प्रभू के प्रेम में रंगा रहता है। वह दास सदा सिफत-सालाह के साथ सांझ डालता है (निंदा आदि किसी) और (बोल) को नहीं जानता। प्रभू को अपने अंदर बसता जान के उसके साथ सांझ डाले रखता है। 1। मेरे मन में तो (परमात्मा का) ऐसा दास प्यारा लगता है जो स्वैभाव (स्वार्थ) खत्म करके बेअंत प्रभू (के प्यार) में मस्त रहता है और सतिगुरू के द्वारा बताए हुए कर्म करता है (उन पदचिह्नों पर चलता है जो सतिगुरू ने डाले हुए हैं)। 1। रहाउ। (मुझे वह दास प्यारा लगता है जो) उस अकाल पुरख को (सदा) नमस्कार करता है जो सारे संसार का आदि है। (उस दास को परमात्मा) अंदर-बाहर हर जगह व्यापक दिखाई देता है। उस प्रभू पर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता। (उस सेवक को) वह सदा-स्थिर प्रभू हरेक शरीर में एक-रस सब जीवों के अंदर मौजूद प्रतीत होता है। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1126 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।