Lulla Family

अंग 1125

अंग
1125
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु भैरउ महला 1 घरु 1 चउपदे
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
तुझ ते बाहरि किछू न होइ ॥
तू करि करि देखहि जाणहि सोइ ॥1॥
किआ कहीऐ किछु कही न जाइ ॥
जो किछु अहै सभ तेरी रजाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जो किछु करणा सु तेरै पासि ॥
किसु आगै कीचै अरदासि ॥2॥
आखणु सुनणा तेरी बाणी ॥
तू आपे जाणहि सरब विडाणी ॥3॥
करे कराए जाणै आपि ॥
नानक देखै थापि उथापि ॥4॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: रागु भैरउ महला 1 घरु 1 चउपदे वह अनंतशक्ति ओमकार-स्वरूप केवल एक है, उसका नाम सत्य है, वह आदिपुरुष, संसार का रचयिता है, वह भय से रहित है, वह वैर भावना से रहित (प्रेम-स्वरूप) है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति है, वह जन्म-मरण से रहित (अमर) है, वह अपने आप ही प्रगट हुआ है, गुरु-कृपा से पाया जाता है। (जगत में) कोई भी काम आपकी मर्जी के विरुद्ध नहीं हैं रहा। आप स्वयं ही सब कुछ कर-कर के संभाल करता है आप आप ही (अपने किए को) समझता है। 1। अगर जीवों को कोई कष्ट मिल रहा है। तो भी उसके विरुद्ध रोस के रूप में) हम जीव क्या कह सकते हैं। (हमें आपकी रज़ा की समझ नहीं। इसलिए हम जीवों से) कोई गिला किया नहीं जा सकता (कोई गिला फबता नहीं है)। (हे प्रभू ! जगत में) जो कुछ हो रहा है सब आपकी मर्जी के मुताबिक हैं रहा है (चाहे वह जीवों के लिए सुख है चाहे दुख है। 1। रहाउ। (अगर आपकी रजा में कोई ऐसी घटना घटित हैं जो हम जीवों को दुखदाई लगे। तब भी आपके बिना) किसी और के आगे आरजू नहीं की जा सकती। सो हम जीवों ने जो भी कोई तरला करना है (फरियाद करनी है) आपके पास ही करना है। 2। (हम जीवों को) यही फबता है कि हम आपकी सिफत-सलाह ही करें और सुनें। हे सारे आश्चर्यजनक करिश्मे करने वाले प्रभू ! आप स्वयं ही (अपने किए हुए कामों के राज़) समझता है 3। हे नानक ! जगत को रच के भी और विनाश कर के भी प्रभू स्वयं ही संभाल करता है। प्रभू स्वयं ही सब कुछ करता है स्वयं ही (जीवों से) करवाता है और स्वयं ही (सारे भेद को) समझता है (कि क्यों यह कुछ कर और करा रहा है)। 4। 1।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु भैरउ महला 1 घरु 2 ॥
गुर कै सबदि तरे मुनि केते इंद्रादिक ब्रहमादि तरे ॥
सनक सनंदन तपसी जन केते गुर परसादी पारि परे ॥1॥
भवजलु बिनु सबदै किउ तरीऐ ॥
नाम बिना जगु रोगि बिआपिआ दुबिधा डुबि डुबि मरीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु देवा गुरु अलख अभेवा त्रिभवण सोझी गुर की सेवा ॥
आपे दाति करी गुरि दातै पाइआ अलख अभेवा ॥2॥
मनु राजा मनु मन ते मानिआ मनसा मनहि समाई ॥
मनु जोगी मनु बिनसि बिओगी मनु समझै गुण गाई ॥3॥
गुर ते मनु मारिआ सबदु वीचारिआ ते विरले संसारा ॥
नानक साहिबु भरिपुरि लीणा साच सबदि निसतारा ॥4॥1॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि॥ रागु भैरउ महला 1 घरु 2॥ इन्द्र। ब्रहमा और उन जैसे अन्य अनेकों समाधियाँ लगाने वाले साधू गुरू शबद में जुड़ के ही (संसार-समुंद्र से) पार लांघते रहे। (ब्रहमा के पुत्र) सनक सनंदन व अन्य अनेकों तपी साधुगण गुरू की मेहर से ही भवजल से पार हुए। 1। गुरू के शबद (की अगुवाई) के बिना संसार-समुंद्र से पार नहीं लांघा जा सकता। (क्योंकि) परमात्मा के नाम से वंचित रहके जगत (मेर-तेर के भेद-भाव के) रोग में फसा रहता है। और मेर-तेर (के गहरे पानियों) में बार-बार डूब के (गोते खा-खा के आखिर) आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। 1। रहाउ। गुरू (आत्मिक जीवन के) प्रकाश का श्रोत है। गुरू अलख अभेव परमात्मा (का रूप) है। (गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलने से ही) गुरू की बताई हुई कार कमाने से ही तीनों भवनों (में व्यापक प्रभू) की समझ आती है। नाम की दाति देने वाले गुरू ने जिस मनुष्य को स्वयं (नाम की) दाति दी। उसको अलॅख-अभेव प्रभू मिल गया। 2। (गुरू की मेहर से) जो मन अपनी शारीरिक इन्द्रियों पर काबू पाने के लायक हो गया; वह मन मायावी फुरनों के पीछे दौड़-भाग बँद करनी मान गया। उस मन की वासना उसके अपने ही अंदर लीन हो गई। (गुरू की मेहर से वह) मन प्रभू-चरणों का मिलापी हो गया। वह मन स्वैभाव से समाप्त हो के प्रभू (-दीदार) का प्रेमी हो गया। वह मन ऊँची समझ वाला हो गया। और प्रभू की सिफत-सालाह करने लग पड़ा। 3। (पर।) हे नानक ! जगत में वह विरले बंदे हैं जिन्होंने गुरू की शरण पड़ कर अपना मन वश में किया है और गुरू के शबद को अपने अंदर बसाया है (जिन्होंने यह पदवी पा ली है)। उनको मालिक प्रभू सारे जगत में (नाको-नाक) व्यापक दिखाई दे जाता है। गुरू के सच्चे शबद की बरकति से (संसार-समुंद्र के मेर-तेर के गहरे पानी में से) वे पार लांघ जाते हैं। 4। 1। 2।
भैरउ महला 1 ॥
नैनी द्रिसटि नही तनु हीना जरि जीतिआ सिरि कालो ॥
रूपु रंगु रहसु नही साचा किउ छोडै जम जालो ॥1॥
प्राणी हरि जपि जनमु गइओ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 1॥ हे प्राणी ! आपकी आँखों में देखने की (पूरी) ताकत नहीं रही। आपका शरीर कमजोर हैं गया है। बुढ़ापे ने आपको जीत लिया है (बुढ़ापे ने आपको मात दे दी है)। आपके सिर पर अब मौत कूक रही है। ना आपका ईश्वरीय-रूप बना। ना आपको ईश्वरीय रंग चढ़ा। ना आपके अंदर ईश्वरीय आनंद आया। (बता) जमका जाल आपको कैसे छोड़ेगा। 1। हे प्राणी ! परमात्मा का सिमरन कर। जिंदगी बीतती जा रही है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु भैरउ महला 1 घरु 1 चउपदे वह अनंतशक्ति ओमकार-स्वरूप केवल एक है, उसका नाम सत्य है, वह आदिपुरुष, संसार का रचयिता है, वह भय से रहित है, वह वैर भावना से रहित (प्रेम-स्वरूप) है, वह क।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।