लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1112 · तुखारी

इस पृष्ठ पर
अंग
1112
तुखारी
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. अनदिनु रतड़ीए सहजि मिलीजै ॥
  2. मेरे लाल रंगीले हम लालन के लाले ॥
  3. ए मन मेरिआ तू समझु अचेत इआणिआ राम ॥

अनदिनु रतड़ीए सहजि मिलीजै ॥

अंग 1111 से चला आ रहा अंश

अनदिनु रतड़ीए सहजि मिलीजै ॥
सुखि सहजि मिलीजै रोसु न कीजै गरबु निवारि समाणी ॥
साचै राती मिलै मिलाई मनमुखि आवण जाणी ॥
जब नाची तब घूघटु कैसा मटुकी फोड़ि निरारी ॥
नानक आपै आपु पछाणै गुरमुखि ततु बीचारी ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: हे हर वक्त प्रेम-रंग में रंगे हुए ! आत्मिक अडोलता में टिके रहना चाहिए (भाव। हे भाई ! जो जीव-स्त्री हर वक्त परमात्मा के प्यार रंग में रंगी रहती है। जो प्रभू की याद में कभी ढील नहीं करती। जो हर वक्त आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। उस जीव-स्त्री को परमात्मा अपने चरणों से जोड़ता है)। हे भाई ! आत्मिक आनंद में आत्मिक अडोलता में टिके रहना चाहिए। (किसी अपने उद्यम पर गर्व करके इस बात का) शिकवा नहीं करना चाहिए (कि मेरा उद्यम जल्दी सफल क्यों नहीं होता। जो भी जीव-स्त्री प्रभू का मिलाप हासिल करती है) अहंकार दूर करके (ही प्रभू में) लीन होती है। जिसको गुरू मिलाता है वही मिलती है। वह सदा कायम रहने वाले प्रभू के प्रेम रंग में रंगी रहती है। अपने मन के पीछे चलने वाली जनम-मरण के चक्करों में पड़ी रहती है। हे भाई ! (जैसे) जब कोई स्त्री नाचने लग जाए तो वह घूँघट नहीं करती। (वैसे ही जो जीव-स्त्री प्रभू-प्यार की राह पर चलती है वह) शरीर का मोह छोड़ के (माया से) निर्लिप हो जाती है। हे नानक ! गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य सदा अपने जीवन को पड़तालता रहता है। उस असल जीवन राह को अपने विचार-मण्डल में टिकाए रखता है। 4। 4।

मेरे लाल रंगीले हम लालन के लाले ॥

तुखारी महला 1 ॥
मेरे लाल रंगीले हम लालन के लाले ॥
गुरि अलखु लखाइआ अवरु न दूजा भाले ॥
गुरि अलखु लखाइआ जा तिसु भाइआ जा प्रभि किरपा धारी ॥
जगजीवनु दाता पुरखु बिधाता सहजि मिले बनवारी ॥
नदरि करहि तू तारहि तरीऐ सचु देवहु दीन दइआला ॥
प्रणवति नानक दासनि दासा तू सरब जीआ प्रतिपाला ॥1॥
भरिपुरि धारि रहे अति पिआरे ॥
सबदे रवि रहिआ गुर रूपि मुरारे ॥
गुर रूप मुरारे त्रिभवण धारे ता का अंतु न पाइआ ॥
रंगी जिनसी जंत उपाए नित देवै चड़ै सवाइआ ॥
अपरंपरु आपे थापि उथापे तिसु भावै सो होवै ॥
नानक हीरा हीरै बेधिआ गुण कै हारि परोवै ॥2॥
गुण गुणहि समाणे मसतकि नाम नीसाणो ॥
सचु साचि समाइआ चूका आवण जाणो ॥
सचु साचि पछाता साचै राता साचु मिलै मनि भावै ॥
साचे ऊपरि अवरु न दीसै साचे साचि समावै ॥
मोहनि मोहि लीआ मनु मेरा बंधन खोलि निरारे ॥
नानक जोती जोति समाणी जा मिलिआ अति पिआरे ॥3॥
सच घरु खोजि लहे साचा गुर थानो ॥
मनमुखि नह पाईऐ गुरमुखि गिआनो ॥
देवै सचु दानो सो परवानो सद दाता वड दाणा ॥
अमरु अजोनी असथिरु जापै साचा महलु चिराणा ॥
दोति उचापति लेखु न लिखीऐ प्रगटी जोति मुरारी ॥
नानक साचा साचै राचा गुरमुखि तरीऐ तारी ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: तुखारी महला 1॥ हे भाई ! मनमोहक प्रभू जी अनेकों करिश्मे करने वाले हैं। मैं उस सुंदर प्रभू का (सदा के लिए) गुलाम हूँ। हे भाई ! (जिस मनुष्य को) गुरू ने अलख प्रभू की सूझ बख्श दी। (वह मनुष्य उसको छोड़ के) किसी और की तलाश नहीं करता। हे भाई ! जब प्रभू की रज़ा हुई। जब प्रभू ने (किसी जीव पर) कृपा की। तब गुरू ने उसको अलख प्रभू का ज्ञान दिया। तब उसको आत्मिक अडोलता में टिक के वह परमात्मा मिल जाता है जो जगत का सहारा है जो सब दातें देने वाला है जो सर्व-व्यापक है और सृजनहार है। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! जब आप अपना सदा-स्थिर नाम देते हैं। जब आप मेहर की निगाह करते हैं। जब आप (स्वयं संसार-समुंद्र से) पार लंघाते हैं। तब ही पार लांघ सकते हैं। आपके दासों का दास विनती करता है कि आप सारे जीवों की रक्षा करने वाले हैं। 1। हे भाई ! गुरू के शबद से (ये समझ आ जाती है कि सब जीवों को) बहुत ही प्यार करने वाला परमात्मा सब में व्यापक है। (सारी सृष्टि को) आसरा दे रहा है। बड़ी हस्ती वाला है और सब जीवों में मौजूद है। हे भाई ! सबसे बड़ी हस्ती वाला परमात्मा तीन भवनों को सहारा दे रहा है। (किसी भी जीव ने अभी तक) उस (के गुणों) का अंत नहीं पाया। वह परमात्मा अनेकों रंगों के अनेकों किस्मों के जीव पैदा करता है। (सब जीवों को) सदा (दान) देता है। और उसका भण्डारा हमेशा बढ़ता ही रहता है। हे भाई ! परमात्मा बहुत बेअंत है। वह स्वयं ही पैदा करके स्वयं ही नाश करता है। (जगत में) वही कुछ होता है जो उसको अच्छा लगता है। हे नानक ! (कहें- हे भाई ! जो जीव उस परमात्मा के) गुणों के हार में (अपने आप को) परो लेता है वह पवित्र हो चुकी जीवात्मा महान ऊँचे परमात्मा में एक-रूप हो जाती है। 2। हे भाई ! जिनके माथे पर परमात्मा की प्राप्ति का लेख लिखा होता है। वे मनुष्य परमात्मा के गुण उचार के उन गुणों में लीन हुए रहते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम उचार के सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन हुआ रहता है। उसका जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। हे भाई ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन रहने वाला मनुष्य सदा कायम प्रभू के साथ गहरी सांझ बनाए रखता है। सदा-स्थिर प्रभू के प्रेम-रंग में रंगा रहता है। उसको सदा-स्थिर प्रभू का मिलाप प्राप्त हो जाता है। उसके मन में वह प्यारा लगता रहता है। उस मनुष्य को सदा-स्थिर परमात्मा से बड़ा और कोई नहीं दिखता। वह हर वक्त सदा-स्थिर प्रभू में लीन हो रहा होता है। हे भाई ! उस मोहन (प्रभू) ने मेरा मन (भी) मोह लिया है। प्रभू उसके (माया के मोह के) बँधन काट के उसको (माया से) निर्लिप कर देता है। हे नानक ! कहें- हे भाई ! जब (कोई बहुत भाग्यशाली मनुष्य उस) अति-प्यारे-परमात्मा को मिल लेता है। उसकी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में लीन हो जाती है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य को सदा-स्थिर साध-संगति प्राप्त हो जाती है। वह मनुष्य (साध-संगति में) खोज करके सदा कायम रहने वाले परमात्मा का ठिकाना पा लेता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा के साथ गहरी सांझ प्राप्त होती है। अपने मन के पीछे चलने वाले को (यह दाति) नहीं मिलती। हे भाई ! (गुरू जिस मनुष्य को) सदा दातें देने वाले बड़े समझदार सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम-दान देता है। वह मनुष्य उस अमर अजोनी और सदा स्थिर प्रभू (का नाम सदा) जपता रहता है। उस मनुष्य को परमात्मा का आदि का सदा-स्थिर ठिकाना मिल जाता है। हे नानक ! (कहें- हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर) परमात्मा की ज्योति प्रकट हो जाती है। उस ज्योति की बरकति से उस मनुष्य का विकारों के कर्ज़े का हिसाब लिखना बंद हो जाता है (भाव। वह मनुष्य विकारों से हट जाता है)। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू का रूप हो जाता है वह मनुष्य हर वक्त सदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से ही (माया के मोह के समुंद्र में से) ये तैराकी की जा सकती है। 4। 5।

ए मन मेरिआ तू समझु अचेत इआणिआ राम ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

तुखारी महला 1 ॥
ए मन मेरिआ तू समझु अचेत इआणिआ राम ॥
ए मन मेरिआ छडि अवगण गुणी समाणिआ राम ॥
बहु साद लुभाणे किरत कमाणे विछुड़िआ नही मेला ॥
किउ दुतरु तरीऐ जम डरि मरीऐ जम का पंथु दुहेला ॥
मनि रामु नही जाता साझ प्रभाता अवघटि रुधा किआ करे ॥
बंधनि बाधिआ इन बिधि छूटै गुरमुखि सेवै नरहरे ॥1॥
ए मन मेरिआ तू छोडि आल जंजाला राम ॥
ए मन मेरिआ हरि सेवहु पुरखु निराला राम ॥

हिन्दी अर्थ: तुखारी महला 1॥ हे मेरे मन ! हे मेरे गाफिल मन ! हे मेरे अंजान मन ! आप होश करें। हे मेरे मन ! बुरे कर्म करने छोड़ दें। (परमात्मा के) गुणों (की याद) में लीन रहा करें। हे मेरे मन ! जो मनुष्य अनेकों (पदार्थों के) स्वादों में फसे रहते हैं। वे अपने किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार (परमात्मा से विछुड़े रहते हैं। इन संस्कारों के कारण ही) उन विछुड़े हुओं का (अपने आप परमात्मा के साथ) मिलाप नहीं हो सकता। हे मेरे मन ! इस संसार-समुंद्र से पार लांघना बहुत मुश्किल है। (अपने उद्यम से) पार नहीं लांघा जा सकता। जमों के डर से सहम बना रहता है। हे मेरे मन ! जमों की तरफ ले जाने वाला रास्ता बहुत दुखदाई है। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने अपने मन में सवेरे शाम (किसी भी वक्त) परमात्मा के साथ सांझ नहीं डाली। वह (माया के मोह के) मुश्किल राह में फस जाता है (इसमें से निकलने के लिए) वह कुछ भी नहीं कर सकता। (पर हाँ। माया के मोह की) रस्सी के साथ बँधा हुआ वह इस तरीके से निजात पा सकता है कि गुरू की शरण में आकर परमात्मा का सिमरन करे। 1। हे मेरे मन ! घर के मोह के फंदों को छोड़ दें। हे मेरे मन ! उस परमात्मा को सिमरते रहें। जो सब में व्यापक भी है और निर्लिप भी है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1112 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।