राग तुखारी
रात का राग, मध्य-एशियाई संगति।
तुखारी रात का राग है, गहरा। तुखार-क्षेत्र (आज का अफ़ग़ानिस्तान-तजाकिस्तान) से नाम के स्रोत का सम्बन्ध है, जो मध्य-एशियाई संगीत-परम्पराओं से इसका नाता बताता है।
ग्रंथ में तुखारी की रचनाएँ संख्या में सीमित हैं, मगर हर एक में एक दूर-देश की धुन सुनाई देती है।
"चेतु बसंतु भला भवर सुहावड़े ॥" तुखारी M1, बारहमाहा
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (22)
- तू सुणि किरत करंमा पुरबि कमाइआ ॥ सिरि सिरि सुख सहंमा देहि सु तू भला ॥अंग 1107
- सा धन सभि रस चोलै अंकि समाणीआ ॥अंग 1107
- तू सुणि हरि रस भिंने प्रीतम आपणे ॥अंग 1107
- बरसै अंम्रित धार बूंद सुहावणी ॥अंग 1107
- चेतु बसंतु भला भवर सुहावड़े ॥अंग 1107
- वैसाखु भला साखा वेस करे ॥अंग 1108
- माहु जेठु भला प्रीतमु किउ बिसरै ॥अंग 1108
- आसाड़ु भला सूरजु गगनि तपै ॥अंग 1108
- सावणि सरस मना घण वरसहि रुति आए ॥अंग 1108
- भादउ भरमि भुली भरि जोबनि पछुताणी ॥अंग 1108
- असुनि आउ पिरा सा धन झूरि मुई ॥अंग 1108
- कतकि किरतु पइआ जो प्रभ भाइआ ॥अंग 1109
- मंघर माहु भला हरि गुण अंकि समावए ॥अंग 1109
- पोखि तुखारु पड़ै वणु त्रिणु रसु सोखै ॥अंग 1109
- माघि पुनीत भई तीरथु अंतरि जानिआ ॥अंग 1109
- फलगुनि मनि रहसी प्रेमु सुभाइआ ॥अंग 1109
- बे दस माह रुती थिती वार भले ॥ घड़ी मूरत पल साचे आए सहजि मिले ॥अंग 1109
- पहिलै पहरै नैण सलोनड़ीए रैणि अंधिआरी राम ॥अंग 1110
- तारा चड़िआ लंमा किउ नदरि निहालिआ राम ॥अंग 1110
- भोलावड़ै भुली भुलि भुलि पछोताणी ॥अंग 1111
- मेरे लाल रंगीले हम लालन के लाले ॥अंग 1112
- ए मन मेरिआ तू समझु अचेत इआणिआ राम ॥अंग 1112
महला 4 (4)
महला 5 (1)
- घोलि घुमाई लालना गुरि मनु दीना ॥अंग 1117
संबंधित पृष्ठ
- बारहमाहा (M1): अंग 1107-1110
- आदि ग्रंथ index