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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1113 · तुखारी

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अंग
1113
तुखारी
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  1. हरि सिमरि एकंकारु साचा सभु जगतु जिंनि उपाइआ ॥
  2. अंतरि पिरी पिआरु किउ पिर बिनु जीवीऐ राम ॥

हरि सिमरि एकंकारु साचा सभु जगतु जिंनि उपाइआ ॥

अंग 1112 से चला आ रहा अंश

हरि सिमरि एकंकारु साचा सभु जगतु जिंनि उपाइआ ॥
पउणु पाणी अगनि बाधे गुरि खेलु जगति दिखाइआ ॥
आचारि तू वीचारि आपे हरि नामु संजम जप तपो ॥
सखा सैनु पिआरु प्रीतमु नामु हरि का जपु जपो ॥2॥
ए मन मेरिआ तू थिरु रहु चोट न खावही राम ॥
ए मन मेरिआ गुण गावहि सहजि समावही राम ॥
गुण गाइ राम रसाइ रसीअहि गुर गिआन अंजनु सारहे ॥
त्रै लोक दीपकु सबदि चानणु पंच दूत संघारहे ॥
भै काटि निरभउ तरहि दुतरु गुरि मिलिऐ कारज सारए ॥
रूपु रंगु पिआरु हरि सिउ हरि आपि किरपा धारए ॥3॥
ए मन मेरिआ तू किआ लै आइआ किआ लै जाइसी राम ॥
ए मन मेरिआ ता छुटसी जा भरमु चुकाइसी राम ॥
धनु संचि हरि हरि नाम वखरु गुर सबदि भाउ पछाणहे ॥
मैलु परहरि सबदि निरमलु महलु घरु सचु जाणहे ॥
पति नामु पावहि घरि सिधावहि झोलि अंम्रित पी रसो ॥
हरि नामु धिआईऐ सबदि रसु पाईऐ वडभागि जपीऐ हरि जसो ॥4॥
ए मन मेरिआ बिनु पउड़ीआ मंदरि किउ चड़ै राम ॥
ए मन मेरिआ बिनु बेड़ी पारि न अंबड़ै राम ॥
पारि साजनु अपारु प्रीतमु गुर सबद सुरति लंघावए ॥
मिलि साधसंगति करहि रलीआ फिरि न पछोतावए ॥
करि दइआ दानु दइआल साचा हरि नाम संगति पावओ ॥
नानकु पइअंपै सुणहु प्रीतम गुर सबदि मनु समझावओ ॥5॥6॥

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! उस एक सर्व व्यापक और सदा-स्थिर परमात्मा (का नाम) सिमरते रहिए। जिसने सारा जगत पैदा किया है और हवा पानी आग (आदि तत्वों) को (मर्यादा में) बाँधा हुआ है। हे मेरे मन ! (वही मनुष्य नाम सिमरता है जिसको) गुरू ने जगत में (परमात्मा का यह) तमाशा दिखा दिया है (और नाम में जोड़ा हुआ है)। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम सदा जपते रहिए जपते रहिए। यही है मित्र। यही है सज्जन। यही है प्यारा प्रीतम। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम ही है अनेकों संजम। अनेकों जप और अनेकों तप। हे मेरे मन ! नाम जपने से ही आप धार्मिक मर्यादा में चलने वाले हैं। नाम जपने से ही आपको ऊँचे आत्मिक जीवन की समझ मिलती है। 2। हे मेरे मन ! आप (परमात्मा के चरणों में) अडोल टिके रहा करें। (इस तरह) आप (विकारों की) चोट नहीं खाएँगे। हे मेरे मन ! (यदि आप परमात्मा के) गुण गाते रहें। तो आप आत्मिक अडोलता में लीन रहेंगे। हे मन ! प्रेम से परमात्मा के गुण गाने से (गुण) आपके अंदर रस जाएँगे। (हे मेरे मन !) यदि आप गुरू की बख्शी हुई आत्मिक जीवन की सूझ का सुरमा (अपनी आत्मिक आँखों में) डाल लें। तो सारे जगत को रौशनी देने वाला दीपक (-प्रभू आपके अंदर जल उठेगा)। गुरू के शबद की बरकति से (आपके अंदर आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश (हो जाएगा)। आप (कामादिक) पाँच वैरियों को (अपने अंदर से) मार लेंगे। हे मेरे मन ! (अगर आप परमात्मा के गुण गाते रहेंगे। तो अपने अंदर से दुनिया के सारे) डर काट के निर्भय हो जाएँगे। इस संसार-समुंद्र से पार लांघ जाएँगे जिसमें से पार लांघना मुश्किल है। हे मन ! अगर गुरू मिल जाए तो परमात्मा जीव के सारे काम सँवार देता है। हे मन ! जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं कृपा करता है उसका (सुंदर आत्मिक) रूप हो जाता है। परमात्मा के साथ उसका प्यार बन जाता है। 3। हे मेरे मन ! ना आप (जन्म के समय) अपने साथ कुछ ले कर आए थे। ना आप (यहाँ से चलने के वक्त) अपने साथ कुछ लेकर जाएँगे (व्यर्थ ही माया के मोह के फंदों में फँस रहे हैं)। हे मन ! (माया के मोह के फंदों से) तभी आपका छुटकारा होगा। जब आप (माया की खातिर) भटकन को छोड़ देंगे। हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम का धन इकट्ठा कीजिए। नाम का सौदा (कीजिए)। हे मन ! अगर आप गुरू के शबद के द्वारा (अपने अंदर प्रभू का) प्यार पहचान लें। तो शबद की बरकति से (विकारों की) मैल दूर कर के आप पवित्र हो जाएँगे। आप सदा कायम रहने वाला घर-महल ढूँढ लेंगे। हे मेरे मन ! आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस मजे लगा के पिया करें। आप (लोक-परलोक की) इज्जत (लोक-परलोक की) प्रसिद्धि कमा लेंगे। प्रभू की हजूरी में पहुँच जाएँगे। हे मन ! (सदा) परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। (नाम का) स्वाद गुरू के शबद द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। हे मन ! बड़ी किस्मत से (ही) परमात्मा की सिफतसालाह की जा सकती है। 4। हे मेरे मन ! (जैसे) सीढ़ियों के बगैर (कोई भी मनुष्य) कोठे (की छत) पर नहीं चढ़ सकता (वैसे ही उच्च आत्मिक ठिकाने पर बसते परमात्मा तक सिमरन की सीढ़ी के बिना पहुँच नहीं हो सकती)। हे मेरे मन ! बेड़ी के बिना कोई मनुष्य नदिया के उस पार नहीं पहुँच सकता। हे मन ! सज्जन प्रभू ! बेअंत प्रभू। प्रीतम प्रभू (विकारों की लहरों से भरपूर संसार-समुंद्र के) उस पार (बसता है)। गुरू के शबद की सूझ (ही इस संसार-समुंद्र के उस पार) लंघा सकती है। हे मन ! यदि आप साध-संगति में मिल के आत्मिक आनंद लेते रहें (तो भी आप इस संसार-समुंद्र के परले पासे पहुँच जाएँ। जो भी मनुष्य साध-संगति में मिल के नाम जपता है। उसको) दोबारा पछताना नहीं पड़ता (क्योंकि उसको संसार-समुंद्र की विकार-लहरों की चोटें दुख नहीं दे सकतीं)। नानक विनती करता है- हे दयालु प्रभू ! (मेरे ऊपर) दया करें। मुझे अपने सदा-स्थिर नाम का दान दें। मैं आपके नाम की संगति हासिल करी रखूँ। हे प्रीतम ! (मेरी विनती) सुनिए (मेहर करें) मैं गुरू के शबद द्वारा अपने मन को (आत्मिक जीवन की) सूझ देता रहूँ। 5। 6।

अंतरि पिरी पिआरु किउ पिर बिनु जीवीऐ राम ॥

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तुखारी छंत महला 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंतरि पिरी पिआरु किउ पिर बिनु जीवीऐ राम ॥
जब लगु दरसु न होइ किउ अंम्रितु पीवीऐ राम ॥
किउ अंम्रितु पीवीऐ हरि बिनु जीवीऐ तिसु बिनु रहनु न जाए ॥
अनदिनु प्रिउ प्रिउ करे दिनु राती पिर बिनु पिआस न जाए ॥
अपणी क्रिपा करहु हरि पिआरे हरि हरि नामु सद सारिआ ॥
गुर कै सबदि मिलिआ मै प्रीतमु हउ सतिगुर विटहु वारिआ ॥1॥
जब देखां पिरु पिआरा हरि गुण रसि रवा राम ॥

हिन्दी अर्थ: तुखारी छंत महला 4 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। (हे सखिए !) मेरे हृदय में प्रभू-पति का प्यार बस रहा है। प्रभू-पति के मिलाप के बिना आत्मिक जीवन (कभी) नहीं मिल सकता। (हे सखी !) जब तक प्रभू-पति के दर्शन नहीं होते। (तब तक) आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पीया नहीं जा सकता। (हे सखी ! प्रभू-पति के दर्शनों के बिना) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (कभी भी) पीया नहीं जा सकता। प्रभू-पति की याद के बिना आत्मिक जीवन नहीं मिल सकता। प्रभू-पति के मिलाप के बिना आत्मिक शांति नहीं मिल सकती। (हे सखी ! जिस जीव-स्त्री के हृदय में प्रभू-पति का प्यार बसता है। वह) हर वक्त दिन रात प्रभू-पति को बार-बार याद करती रहती है। (हे सखी !) प्रभू-पति के मिलाप के बिना (माया की) तृष्णा दूर नहीं होती (जैसे स्वाति-नक्षत्र की वर्षा-बूँद के बिना पपीहे की प्यास नहीं मिटती)। हे प्यारे हरी ! (जिस जीव पर) आप अपनी मेहर करते हैं। वह हर वक्त हरी-नाम को (अपने हृदय में) बसाए रखता है। हे भाई ! मैं (अपने) गुरू से सदा सदके जाता हूँ। (क्योंकि) गुरू के शबद की बरकति से मुझे (भी) प्रभू-प्रीतम मिल गया है। 1। हे सखी ! जब मैं प्यारे प्रभू-पति के दर्शन करती हूँ। तब मैं बड़े स्वाद से उस हरी के गुण याद करती हूँ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1113 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।