इस पृष्ठ पर
अंग
1110
तुखारी
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश
नानक अहिनिसि रावै प्रीतमु हरि वरु थिरु सोहागो ॥17॥1॥
नानक अहिनिसि रावै प्रीतमु हरि वरु थिरु सोहागो ॥17॥1॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! उस सोभाग्यवती जीव-स्त्री को प्रीतम-प्रभू दिन-रात मिला रहता है। प्रभू-पति उसका सदा के लिए कायम रहने वाला सोहाग बन जाता है। 17। 1।
पहिलै पहरै नैण सलोनड़ीए रैणि अंधिआरी राम ॥
तुखारी महला 1 ॥
पहिलै पहरै नैण सलोनड़ीए रैणि अंधिआरी राम ॥
वखरु राखु मुईए आवै वारी राम ॥
वारी आवै कवणु जगावै सूती जम रसु चूसए ॥
रैणि अंधेरी किआ पति तेरी चोरु पड़ै घरु मूसए ॥
राखणहारा अगम अपारा सुणि बेनंती मेरीआ ॥
नानक मूरखु कबहि न चेतै किआ सूझै रैणि अंधेरीआ ॥1॥
दूजा पहरु भइआ जागु अचेती राम ॥
वखरु राखु मुईए खाजै खेती राम ॥
राखहु खेती हरि गुर हेती जागत चोरु न लागै ॥
जम मगि न जावहु ना दुखु पावहु जम का डरु भउ भागै ॥
रवि ससि दीपक गुरमति दुआरै मनि साचा मुखि धिआवए ॥
नानक मूरखु अजहु न चेतै किव दूजै सुखु पावए ॥2॥
तीजा पहरु भइआ नीद विआपी राम ॥
माइआ सुत दारा दूखि संतापी राम ॥
माइआ सुत दारा जगत पिआरा चोग चुगै नित फासै ॥
नामु धिआवै ता सुखु पावै गुरमति कालु न ग्रासै ॥
जंमणु मरणु कालु नही छोडै विणु नावै संतापी ॥
नानक तीजै त्रिबिधि लोका माइआ मोहि विआपी ॥3॥
चउथा पहरु भइआ दउतु बिहागै राम ॥
तिन घरु राखिअड़ा जोु अनदिनु जागै राम ॥
गुर पूछि जागे नामि लागे तिना रैणि सुहेलीआ ॥
गुर सबदु कमावहि जनमि न आवहि तिना हरि प्रभु बेलीआ ॥
कर कंपि चरण सरीरु कंपै नैण अंधुले तनु भसम से ॥
नानक दुखीआ जुग चारे बिनु नाम हरि के मनि वसे ॥4॥
खूली गंठि उठो लिखिआ आइआ राम ॥
रस कस सुख ठाके बंधि चलाइआ राम ॥
बंधि चलाइआ जा प्रभ भाइआ ना दीसै ना सुणीऐ ॥
आपण वारी सभसै आवै पकी खेती लुणीऐ ॥
घड़ी चसे का लेखा लीजै बुरा भला सहु जीआ ॥
नानक सुरि नर सबदि मिलाए तिनि प्रभि कारणु कीआ ॥5॥2॥
पहिलै पहरै नैण सलोनड़ीए रैणि अंधिआरी राम ॥
वखरु राखु मुईए आवै वारी राम ॥
वारी आवै कवणु जगावै सूती जम रसु चूसए ॥
रैणि अंधेरी किआ पति तेरी चोरु पड़ै घरु मूसए ॥
राखणहारा अगम अपारा सुणि बेनंती मेरीआ ॥
नानक मूरखु कबहि न चेतै किआ सूझै रैणि अंधेरीआ ॥1॥
दूजा पहरु भइआ जागु अचेती राम ॥
वखरु राखु मुईए खाजै खेती राम ॥
राखहु खेती हरि गुर हेती जागत चोरु न लागै ॥
जम मगि न जावहु ना दुखु पावहु जम का डरु भउ भागै ॥
रवि ससि दीपक गुरमति दुआरै मनि साचा मुखि धिआवए ॥
नानक मूरखु अजहु न चेतै किव दूजै सुखु पावए ॥2॥
तीजा पहरु भइआ नीद विआपी राम ॥
माइआ सुत दारा दूखि संतापी राम ॥
माइआ सुत दारा जगत पिआरा चोग चुगै नित फासै ॥
नामु धिआवै ता सुखु पावै गुरमति कालु न ग्रासै ॥
जंमणु मरणु कालु नही छोडै विणु नावै संतापी ॥
नानक तीजै त्रिबिधि लोका माइआ मोहि विआपी ॥3॥
चउथा पहरु भइआ दउतु बिहागै राम ॥
तिन घरु राखिअड़ा जोु अनदिनु जागै राम ॥
गुर पूछि जागे नामि लागे तिना रैणि सुहेलीआ ॥
गुर सबदु कमावहि जनमि न आवहि तिना हरि प्रभु बेलीआ ॥
कर कंपि चरण सरीरु कंपै नैण अंधुले तनु भसम से ॥
नानक दुखीआ जुग चारे बिनु नाम हरि के मनि वसे ॥4॥
खूली गंठि उठो लिखिआ आइआ राम ॥
रस कस सुख ठाके बंधि चलाइआ राम ॥
बंधि चलाइआ जा प्रभ भाइआ ना दीसै ना सुणीऐ ॥
आपण वारी सभसै आवै पकी खेती लुणीऐ ॥
घड़ी चसे का लेखा लीजै बुरा भला सहु जीआ ॥
नानक सुरि नर सबदि मिलाए तिनि प्रभि कारणु कीआ ॥5॥2॥
हिन्दी अर्थ: तुखारी महला 1॥ हे सलोने नैनों वालिए ! (हे जीव सि्त्रए ! आत्मिक जीवन का रास्ता देखने के लिए आपको सुंदर ज्ञान नेत्र मिले थे। पर जिंदगी की रात के) पहले हिस्से में (आपकी उन) आँखों के लिए (अज्ञानता की) अंधेरी रात (बनी रहती है)। (इस आत्मिक अंधेरे में रह के) हे आत्मिक मौत सहेड़ रही जीव-सि्त्रए ! (होश कर। अपने आत्मिक जीवन का) सौदा संभाल के रख। (जो भी जीव-स्त्री यहाँ आती है। यहाँ से चले जाने की हरेक की) बारी आ जाती है। (पर। जो जीव-स्त्री माया के मोह में फस के आत्मिक जीवन की ओर से) बेपरवाह हुई रहती है। वह जमों के साथ वास्ता डालने वाला मायावी पदार्थों का रस चूसती रहती है। (ऐसी को) जगाए भी कौन। हे सुंदर नैनों वालिये ! (अगर आत्मिक जीवन से आपकी आँखों के लिए) अंधेरी रात (ही बनी रही। तो) लोक परलोक में (कहीं भी) आपको इज्ज़त नहीं मिलेगी। (ऐसी सोई हुई जीव-स्त्री के हृदय-घर में कामादिक हरेक) चोर सेंध लगाए रखता है (और। उसका हृदय-) घर लूट लेता है। हे नानक ! (कह-) हे रक्षा करने वाले प्रभू ! हे अपहुँच प्रभू ! हे बेअंत प्रभू ! मेरी बिनती सुन (मेरी जीवन-रात को विकारों को घोर अंधकार दबाए ना रखे)। हे नानक ! मूर्ख मनुष्य कभी भी (परमात्मा को) याद नहीं करता (विकारों की घोर) अंधेरी (जीवन-) रात में (उसको आत्मिक जीवन का सही रास्ता) सूझता ही नहीं। 1। हे गाफिल जीव-स्त्री ! (अब तो आपकी जिंदगी की रात का) दूसरा पहर गुजर रहा है (अब तो माया के मोह की नींद में से) सचेत हो। हे आत्मिक मौत सहेड़ रही जीव-सि्त्रए ! (अपने आत्मिक जीवन का) सौदा संभाल के रख। (आपके आत्मिक गुणों वाली) फसल (विकारों के मुँह आ के) खाई जा रही है। हे भाई ! हरी से गुरू से प्रेम डाल के (अपनी आत्मिक गुणों वाली) फसल संभाल के रखो। (विकारों के हमलों की ओर से) सचेत रहने से (कामादिक कोई भी विकार) चोर (आत्मिक जीवन के धन को) सेंध नहीं लगा सकता। हे भाई ! (विकारों में फस के) जमों के रास्ते पर ना चलो। और दुख ना पल्ले डालो। (विकारों से बचे रहने से) जमराज का डर-भय दूर हो जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में सदा कायम रहने वाला परमात्मा बसता रहता है। जो मनुष्य अपने मुँह से (परमात्मा का नाम) सिमरता रहता है। गुरू की मति की बरकति से उसके हृदय में ज्ञान और शांति के दीपक जलते रहते हैं। पर। हे नानक ! मूर्ख मनुष्य अभी भी परमात्मा को याद नहीं करता (जबकि उसकी जिंदगी की रात्रि का दूसरा पहर बीत रहा है। परमात्मा को भुला के) और-और (प्यार) में मनुष्य किसी भी हालत में आत्मिक आनंद नहीं पा सकता। 2। हे भाई ! जब जिंदगी की रात का तीसरा पहर भी गुजरता जा रहा है तब भी माया के मोह की नींद जीव पर अपना प्रभाव डाले रखती है; माया पुत्र स्त्री आदि कई किस्म के चिंता-फिक्र में मनुष्य की जीवात्मा दुखी होती रहती है। हे भाई ! मनुष्य को माया का प्यार। पुत्रों का प्यार। स्त्री का प्यार। दुनिया का प्यार (मोहे रखता है। ज्यों ज्यों मनुष्य) मायावी पदार्थों के भोग भोगता है त्यों-त्यों सदा (इनमें) फसा रहता है (और दुख पाता है)। जब मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है। तब आत्मिक आनंद हासिल करता है। और गुरू की मति की बरकति से आत्मिक मौत इसको अपने काबू में नहीं रख सकती। हे नानक ! परमात्मा के नाम से टूट के मनुष्य की जिंद हमेशा दुखी होती रहती है। जनम-मरण का चक्कर इसकी खलासी नहीं करता। आत्मिक मौत इसको मुक्त नहीं करती। हे लोगो ! जिंदगी की रात का तीसरा पहर गुजरते हुए भी (नाम से सूनी रहने के कारण मनुष्य की जिंद) त्रैगुणी माया के मोह में फसी रहती है। 3। हे भाई ! जब मनुष्य की जिंदगी की रात का चौथा पहर बीत रहा होता है तब रात से दिन हो जाता है (तब काले केस सफेद हो जाते हैं)। पर आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी (उन) मनुष्यों ने ही बचाई होती है जो हर वक्त (विकारों के हमलों से) सचेत रहता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शिक्षा ले के (विकारों के हमलों से) सचेत रहे। जो परमात्मा के नाम में जुड़े रहे। उनकी जिंदगी की रात (उनकी सारी उम्र) आसान गुजरती है। जो मनुष्य गुरू के शबद के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं। वे जनम-मरण के चक्करों में नहीं आते (विकारों से बचाने के लिए) परमात्मा (स्वयं) उनका मददगार बना रहता है। हे नानक ! (जिंदगी की रात के चौथे पहर में मनुष्य के) हाथ-पैर काँपने लगते हैं। शरीर काँपने लग पड़ता है। आँखों से कम दिखता है। शरीर राख जैसा (रूखा सा) हो जाता है (जो मनुष्य अभी भी हरी नाम चेते नहीं करता है। उसे भाग्यहीन ही समझो। युग कोई भी हो ये पक्का ही जानो कि) परमात्मा का नाम बसे बिना मनुष्य चारों युगों में दुखी रहता है। 4। हे भाई ! जब जीव की जिंदगी की मिले हुई सांसों की गाँठ खुल जाती है (श्वास खत्म हो जाते हैं)। तब परमात्मा की ओर से लिखा हुकम आ जाता है (कि हे जीव !) उठ (चलने के लिए तैयार हो जा)। जीव के सारे खाने-पीने सारे सुख रोक लिए जाते हैं। जीव को बाँध के आगे चलाया जाता है (भाव। जाना चाहे अथवा ना जाना चाहे। उसको जगत से चला लिया जाता है)। जब प्रभू की रजा होती है। जीव को यहाँ से उठा लिया जाता है। (फिर) ना जीव का यहाँ कुछ दिखता है। ना कुछ सुना जाता है। हे भाई ! हरेक जीव की यह वारी आ जाती है; (जैसे) पकी फसल (आखिर में) काटी ही जाती है। हे भाई ! जीव के हरेक घड़ी-पल के किए कर्मों का इससे लेखा माँगा जाता है। हे जीव ! अपने किए अच्छे-बुरे कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। हे नानक ! उस परमात्मा ने ऐसा सबब बना रखा है कि भले मनुष्यों को गुरू के शबद में जोड़े रखता है। 5। 2।
तारा चड़िआ लंमा किउ नदरि निहालिआ राम ॥
तुखारी महला 1 ॥
तारा चड़िआ लंमा किउ नदरि निहालिआ राम ॥
सेवक पूर करंमा सतिगुरि सबदि दिखालिआ राम ॥
गुर सबदि दिखालिआ सचु समालिआ अहिनिसि देखि बीचारिआ ॥
धावत पंच रहे घरु जाणिआ कामु क्रोधु बिखु मारिआ ॥
अंतरि जोति भई गुर साखी चीने राम करंमा ॥
तारा चड़िआ लंमा किउ नदरि निहालिआ राम ॥
सेवक पूर करंमा सतिगुरि सबदि दिखालिआ राम ॥
गुर सबदि दिखालिआ सचु समालिआ अहिनिसि देखि बीचारिआ ॥
धावत पंच रहे घरु जाणिआ कामु क्रोधु बिखु मारिआ ॥
अंतरि जोति भई गुर साखी चीने राम करंमा ॥
हिन्दी अर्थ: तुखारी महला 1॥ हे भाई ! व्यापक-स्वरूप परमात्मा (सारे जगत में अपना) प्रकाशस कर रहा है। पर उसे आँखों से कैसे देखा जाए। हे भाई ! गुरू ने अपने शबद के द्वारा (जिसको) दर्शन करवा दिए। उस सेवक के पूरे भाग्य जाग उठे। जिस मनुष्य को गुरू के शबद ने (सर्व-व्यापक परमात्मा) दिखा दिया। वह सदा-स्थिर हरी-नाम को अपने हृदय में बसा लेता है। उसके दर्शन करके वह मनुष्य दिन-रात उसके गुणों को अपने चित्त में बसाता है। वह मनुष्य (अपने असल) घर को जान लेता है। उसकी पाँचों-ज्ञानेन्द्रियां (विकारों की तरफ) भटकने से हट जाती हैं। वह मनुष्य आत्मिक मौत लाने वाले काम को क्रोध को समाप्त कर देता है। हे भाई ! गुरू के उपदेश की बरकति से उस मनुष्य के अंदर रॅबी ज्योति प्रकट हो जाती है (जो कुछ जगत में हो रहा है। उसको) वह परमात्मा के करिश्में (समझ के) देखता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1110 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।