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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1109 · तुखारी

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अंग
1109
तुखारी
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  1. आगै घाम पिछै रुति जाडा देखि चलत मनु डोले ॥
  2. कतकि किरतु पइआ जो प्रभ भाइआ ॥
  3. मंघर माहु भला हरि गुण अंकि समावए ॥
  4. पोखि तुखारु पड़ै वणु त्रिणु रसु सोखै ॥
  5. माघि पुनीत भई तीरथु अंतरि जानिआ ॥
  6. फलगुनि मनि रहसी प्रेमु सुभाइआ ॥
  7. बे दस माह रुती थिती वार भले ॥ घड़ी मूरत पल साचे आए सहजि मिले ॥

आगै घाम पिछै रुति जाडा देखि चलत मनु डोले ॥

अंग 1108 से चला आ रहा अंश

आगै घाम पिछै रुति जाडा देखि चलत मनु डोले ॥
दह दिसि साख हरी हरीआवल सहजि पकै सो मीठा ॥
नानक असुनि मिलहु पिआरे सतिगुर भए बसीठा ॥11॥

हिन्दी अर्थ: (मेरे शरीर की) गरमाहट आगे गुजर चुकी है (कम हो गई है)। उसके पीछे-पीछे शारीरिक कमजोरी (ठंड) आ रही है। ये तमाशा देख के मेरा मन घबरा रहा है (क्योंकि अभी तक आपका दीदार नहीं हो सका)। (सरकंडे आदि का हाल देख के मेरा मन डोलता है। पर) हर तरफ (बनस्पति की) हरी शाखाएँ देख के (ये धीरज बँधता है कि) अडोल अवस्था में (जो जीव) दृढ़ रहता है। उसी को प्रभू-मिलाप की मिठास (प्रसन्नता) मिलती है। हे नानक ! असू (की मीठी ऋतु) में (आप भी प्रार्थना करें और कहें-) हे प्यारे प्रभू ! (मेहर करें) गुरू के माध्यम से मुझसे मिलें। 11।

कतकि किरतु पइआ जो प्रभ भाइआ ॥

कतकि किरतु पइआ जो प्रभ भाइआ ॥
दीपकु सहजि बलै तति जलाइआ ॥
दीपक रस तेलो धन पिर मेलो धन ओमाहै सरसी ॥
अवगण मारी मरै न सीझै गुणि मारी ता मरसी ॥
नामु भगति दे निज घरि बैठे अजहु तिनाड़ी आसा ॥
नानक मिलहु कपट दर खोलहु एक घड़ी खटु मासा ॥12॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (जैसे) कार्तिक (के महीने) में (किसान को मुँजी मकई आदि सावणी की फसल की की हुई कमाई मिल जाती है। वैसे ही हरेक जीव को अपने) किए कर्मों का फल (मन में इकट्ठे हुए संस्कारों के रूप में) मिल जाता है। हे भाई ! (अपने किए भले कर्मों के अनुसार) जो मनुष्य परमात्मा को प्यारा लग जाता है (उसके हृदय में) आत्मिक अडोलता के कारण (आत्मिक जीवन की सूझ देने वाले प्रकाश का) दीपक जग उठता है (ये दीया उसके अंदर) प्रभू के साथ गहरी जान-पहचान ने जगाया हुआ होता है। जिस जीव-स्त्री का प्रभू-पति के साथ मिलाप हो जाता है (उसके अंदर) आत्मिक जीवन की सूझ देने वाले प्रकाश के आनंद का (मानो। दीए में) तेल जल रहा है। वह जीव-स्त्री उत्साह उमंग में आत्मिक आनंद पाती है। (हे भाई ! जिस जीव-स्त्री के जीवन को) विकारों ने खत्म कर दिया वह आत्मिक मौत मर गई। वह (जिंदगी में) कामयाब नहीं होती। पर जिस जीव-स्त्री को प्रभू की सिफत-सालाह ने विकारों की ओर से मार दिया (विकारों से उदासीन कर दिया), वही विकारों से बची रहेगी। हे नानक ! जिनको परमात्मा अपना नाम देता है अपनी भक्ति देता है वे (वे विकारों में भटकने की बजाय) अपने हृदय-गृह में टिके रहते हैं। (उनके अंदर) सदा ही (प्रभू-मिलाप की) चाहत बनी रहती है (वे सदा अरदास करते हैं- हे पातशाह ! हमसे) मिलें। (हमारे अंदर से विछोड़ा डालने वाले) किवाड़ खोल दें। (आपसे) एक घड़ी (का विछोड़ा) छे महीने (का विछोड़ा प्रतीत होता) है। 12।

मंघर माहु भला हरि गुण अंकि समावए ॥

मंघर माहु भला हरि गुण अंकि समावए ॥
गुणवंती गुण रवै मै पिरु निहचलु भावए ॥
निहचलु चतुरु सुजाणु बिधाता चंचलु जगतु सबाइआ ॥
गिआनु धिआनु गुण अंकि समाणे प्रभ भाणे ता भाइआ ॥
गीत नाद कवित कवे सुणि राम नामि दुखु भागै ॥
नानक सा धन नाह पिआरी अभ भगती पिर आगै ॥13॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू की सिफतसालाह की बरकति से जिस जीव-स्त्री के हृदय में प्रभू आ बसता है। उसको मंघर का महीना अच्छा लगता है। ये सदा-स्थिर प्यारा प्रभू-पति उस गुणों वाली जीव-स्त्री को प्यारा लगता है जो उसके गुण चेते करती रहती है। उसको प्रभू के साथ गहरी सांझ प्राप्त होती है। उसकी सुरति प्रभू-चरणों में टिकती है। और सारा जगत तो नाशवंत है। एक सृजनहार ही जो चतुर है समझदार है। सदा कायम रहने वाला है। प्रभू के गुण उसके हृदय में आ बसते हैं; प्रभू की रज़ा के अनुसार यह सब कुछ उस जीव-स्त्री को अच्छा लगने लग जाता है। प्रभू की सिफत-सालाह के गीत बाणी कावि सुन-सुन के प्रभू के नाम में (जुड़ के) उसका और सारा दुख दूर हो जाता है। हे नानक ! वह जीव-स्त्री प्रभू-पति को प्यारी हो जाती है। वह अपना दिली प्यार प्रभू के आगे (भेट) पेश करती है। 13।

पोखि तुखारु पड़ै वणु त्रिणु रसु सोखै ॥

पोखि तुखारु पड़ै वणु त्रिणु रसु सोखै ॥
आवत की नाही मनि तनि वसहि मुखे ॥
मनि तनि रवि रहिआ जगजीवनु गुर सबदी रंगु माणी ॥
अंडज जेरज सेतज उतभुज घटि घटि जोति समाणी ॥
दरसनु देहु दइआपति दाते गति पावउ मति देहो ॥
नानक रंगि रवै रसि रसीआ हरि सिउ प्रीति सनेहो ॥14॥

हिन्दी अर्थ: पोह (के महीने) में कोहरा पड़ता है। वह वन के घास को (हरेक वण-तृण पौधे के) रस को सुखा देता है (प्रभू की याद भुलाने से जिस मनुष्य के अंदर कोरापन जोर डालता है। वह उसके जीवन में से प्रेम-रस सुखा देता है)। हे प्रभू ! आप आ के मेरे मन में मेरे तन में मेरे मुँह में क्यों नहीं बसते। (ताकि मेरा जीवन रूखा ना हो जाए)। जिस जीव के मन में तन में सारे जगत का आसरा प्रभू आ बसता है। वह गुरू के शबद में जुड़ के प्रभू के मिलाप का आनंद लेता है। उसको चारों खाणियों के जीवों में हरेक घट में प्रभू की ही ज्योति समाई दिखती है। हे दयालु दातार ! मुझे अपना दर्शन दें। मुझे (उत्तम) बुद्धि दें। (जिसकी वजह से) मैं ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर सकूँ (और आपको हर जगह देख सकूँ)। हे नानक ! जिस मनुष्य की प्रीति जिसका प्यार परमात्मा से बन जाता है। वह प्रेमी प्रभू के प्यार में (जुड़ के) उस के गुण आनंद से याद करता है। 14।

माघि पुनीत भई तीरथु अंतरि जानिआ ॥

माघि पुनीत भई तीरथु अंतरि जानिआ ॥
साजन सहजि मिले गुण गहि अंकि समानिआ ॥
प्रीतम गुण अंके सुणि प्रभ बंके तुधु भावा सरि नावा ॥
गंग जमुन तह बेणी संगम सात समुंद समावा ॥ पुंन दान पूजा परमेसुर जुगि जुगि एको जाता ॥
नानक माघि महा रसु हरि जपि अठसठि तीरथ नाता ॥15॥

हिन्दी अर्थ: माघ (महीने) में (लोग प्रयाग आदि तीरथ पर स्नान करने में पवित्रता मानते हैं पर) जिस जीव ने अपने हृदय में ही तीर्थ पहचान लिया है उसकी जीवात्मा पवित्र हो जाती है। जो जीव परमात्मा के गुण अपने हृदय में बसा के उसके चरणों में लीन होता है। वह अडोल अवस्था में टिक जाता है जहाँ उसको सज्जन प्रभू मिल जाता है। हे सोहाने प्रीतम प्रभू ! अगर आपके गुण मैं अपने दिल में बसा के आपकी सिफतसालाह सुन के आपको अच्छा लगने लग जाऊँ। तो मैंने तीर्थ पर स्नान कर लिया (समझता हूँ)। आपके चरणों में लीनता वाली अवस्था ही गंगा यमुना व सरस्वती तीनों नदियों के मिलाप की जगह है त्रिवेणी है। वहीं मैं सातों समुंद्र समाए हुए मानता हूँ। जिस मनुष्य ने हरेक युग में व्यापक परमेश्वर के साथ सांझ डाल ली उसने (तीर्थ-स्नान आदिक) सारे पून्य कर्म दान और पूजा कर्म कर लिए। हे नानक ! माघ महीने में (तीर्थ-स्नान आदि की जगह) जिसने प्रभू का नाम सिमर के प्रभू-नाम का महा रस पी लिया। उसने अढ़सठ ही तीर्थों का स्नान कर लिया। 15।

फलगुनि मनि रहसी प्रेमु सुभाइआ ॥

फलगुनि मनि रहसी प्रेमु सुभाइआ ॥
अनदिनु रहसु भइआ आपु गवाइआ ॥
मन मोहु चुकाइआ जा तिसु भाइआ करि किरपा घरि आओ ॥
बहुते वेस करी पिर बाझहु महली लहा न थाओ ॥
हार डोर रस पाट पटंबर पिरि लोड़ी सीगारी ॥
नानक मेलि लई गुरि अपणै घरि वरु पाइआ नारी ॥16॥

हिन्दी अर्थ: (सर्दी ऋतु की कड़ाके की ठंड के बाद बहार के फिरने पर) फागुन के महीने में (लोग होलियों के रंग-तमाशों द्वारा खुशियाँ मनाते हैं। पर जिस जीव-स्त्री को अपने मन में) प्रभू का प्यार मीठा लगा। उसके मन में असल आनंद पैदा हुआ है; जिसने स्वै भाव गवाया है। उसके अंदर हर वक्त ही आनंद बना रहता है। (पर। स्वै-भाव गवाना कोई आसान खेल नहीं है) जब प्रभू स्वयं ही मेहर करता है। तो जीव अपने मन में से माया का मोह खत्म करता है। प्रभू भी मेहर करके उसके हृदय-घर में आ प्रवेश करता है। प्रभू-मिलाप के बिना ही मैंने बहुत सारे (धार्मिक) श्रृंगार (बाहर से दिखाई देते धार्मिक कर्म) किए। पर उसके चरणों में मुझे ठिकाना ना मिला। हाँ। जिसको प्रभू-पति ने पसंद कर लिया। वह सारे हार-श्रृंगारों रेशमी कपड़ों से श्रृंगारी गई। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री को प्रभू-पति ने अपने गुरू के माध्यम से (अपने साथ) मिला लिया। उसको हृदय-घर में ही पति-प्रभू मिल गया। 16।

बे दस माह रुती थिती वार भले ॥ घड़ी मूरत पल साचे आए सहजि मिले ॥

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बे दस माह रुती थिती वार भले ॥ घड़ी मूरत पल साचे आए सहजि मिले ॥
प्रभ मिले पिआरे कारज सारे करता सभ बिधि जाणै ॥
जिनि सीगारी तिसहि पिआरी मेलु भइआ रंगु माणै ॥
घरि सेज सुहावी जा पिरि रावी गुरमुखि मसतकि भागो ॥

हिन्दी अर्थ: जिस जीव-स्त्री के अडोल हुए हृदय में सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा आ टिकता है। उसको ही बारह ही महीने। सारी ऋतुएँ। सारी तिथियाँ, सारे दिन, सारी घड़ियाँ, सारे महूरत और पल भाग्यशाली लगते हैं (उसको किसी संगरांद अमावस्या आदि की ही पवित्रता का भरम-भुलेखा नहीं रहता)। (वह जीव-स्त्री किसी काम को आरम्भ करने के लिए कोई खास महूरत नहीं तलाशती। उसको यह यकीन होता है कि) जब प्यारा प्रभू मिल जाए (भाव। परमात्मा का आसरा लेने से) सब काम रास आ जाते हैं। करतार ही (सफलता देने की) सारी विधियाँ जानता है। (पर यह सिदक-श्रद्धा का आत्मिक सोहज परमात्मा स्वयं ही देता है) प्रभू ने स्वयं ही जीव-स्त्री की आत्मा को सँवारना है। और स्वयं ही उसको प्यार करना है। (उसकी मेहर से ही) जीव-स्त्री का प्रभू-पति के साथ मेल होता है। और वह आत्मिक आनंद पाती है। गुरू के द्वारा जिस जीव-स्त्री के माथे का लेख उघड़ा। (उसके अनुसार) जब प्रभू-पति ने उसको अपने चरणों के साथ जोड़ा। उसकी हृदय-सेज सुंदर हो गई है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1109 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।