नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: (इस महीने) खुली जूह में बनस्पति को फूल लग जाते हैं। और (फूलों पर बैठे हुए) भँवर सुंदर लगते हैं। (मेरे हृदय का कमल-फूल भी खिल जाए। अगर) मेरा पति-प्रभू हृदय-घर में आ बसे। जिस जीव-स्त्री का पति-प्रभू हृदय-घर में ना आ बसे। उस जीव-स्त्री को आत्मिक आनंद नहीं आ सकता। उसका शरीर (प्रभू से) विछोड़े के कारण (कामादिक वैरियों के) हमलों से कमजोर हो जाता है। (चेत्र के महीने) कोयल आमों के वृक्ष पर बैठ कर मीठे बोल बोलती है (वियोगन को ये बोल मीठे नहीं लगते। चुभवें व दुखदाई लगते हैं। और विछोड़े का) दुख उससे सहा नहीं जाता। हे माँ ! मेरा मन भँवरा (अंदर के खिले हुए हृदय-कमल को छोड़ के दुनिया के रंग-तमाशों के) फूलों और डालियों पर भटकता फिरता है। यह आत्मिक जीवन नहीं। यह तो आत्मिक मौत है। हे नानक ! चेत्र के महीने में (बसंत के मौसम में) जीव-स्त्री अडोल अवस्था में टिक के आत्मिक आनंद पाती है। यदि जीव-स्त्री (अपने हृदय-) घर में प्रभू-पति को ढूँढ ले।
वैसाखु भला साखा वेस करे ॥ धन देखै हरि दुआरि आवहु दइआ करे ॥ घरि आउ पिआरे दुतर तारे तुधु बिनु अढु न मोलो ॥ कीमति कउण करे तुधु भावां देखि दिखावै ढोलो ॥ दूरि न जाना अंतरि माना हरि का महलु पछाना ॥ नानक वैसाखीं प्रभु पावै सुरति सबदि मनु माना ॥6॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: वैसाख (का महीना कैसा) अच्छा लगता है ! (वृक्षों की) नई फूटी कोमल कोपलें टहनियां (नव-विवाहिता जैसे कोमल-कोमल पक्तों का) हार-श्रृंगार करती हैं। (इन कोमल टहनियों का हार-श्रृंगार देख के पति से विछुड़ी नारी के अंदर भी पति को मिलने की कसक पैदा होती है। और वह अपने घर के दरवाजे पर खड़ी राह ताकती है। इसी तरह प्रकृति-रानी का सोहज-श्रृंगार देख के उमाह भरी) वह जीव स्त्री अपने (हृदय-) दर पर प्रभू-पति का इन्तजार करती है (और कहती है- हे प्रभू पति !) मेहर करके (मेरे हृदय-घर में) आएँ। मुझे इस बिशम संसार-समुंद्र से पार लंघाओ। आपके बिना मेरी कद्र आधी कौड़ी जितनी भी नहीं। पर। हे मित्र प्रभू ! अगर गुरू आपके दर्शन करके मुझे भी करवा दे। और अगर मैं आपको अच्छी लग जाऊँ। तो कौन मेरा मोल डाल सकता है। फिर आप मुझे कहीं दूर नहीं प्रतीत होंगे। मुझे यकीन होंगे कि आप मेरे अंदर बस रहा है। उस ठिकाने की मुझे पहचान हैं जाएगी जहाँ आप बसता है। हे नानक ! वैसाख में (कुदरत रानी का साज-श्रृंगार देख के वह जीव-स्त्री) प्रभू-पति (का मिलाप) हासिल कर लेती है जिसकी सुरति गुरू-शबद में जुड़ी रहती है। जिसका मन (सिफत-सालाह में ही) रम जाता है। 6।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: जेठ महीना (उनको ही) अच्छा लगता है जिन्हें प्रीतम कभी नहीं बिसरता। (जेठ में लू चलने से) भट्ठी की तरह स्थल तपने लग जाते हैं (इसी तरह कामादिक विकारों की आग से संसारी जीवों के हृदय तपते हैं। उनकी तपश अनुभव करके) गुरमुखि जीव-स्त्री (प्रभू-चरणों में) अरदास करती है। उस प्रभू के गुण (हृदय में) संभालती है। जो इस तपश से निराला अपने सदा स्थिर महल में टिका रहता है। उसके आगे जीव-स्त्री विनती करती है- हे प्रभू ! मैं आपकी सिफत-सालाह करती हॅूँ। ताकि आपको अच्छी लगने लग जाऊँ। आप मुझे आज्ञा दे मैं भी आपके महल में आ जाऊँ (और बाहरी तपस से बच सकूँ)। जब तक जीव-स्त्री प्रभू से अलग रह के (विकारों की तपश से) निढाल और कमजोर है। तब तक (तपश से बचे हुए प्रभू के) महल का आनंद नहीं भोग सकती। हे नानक ! जेठ (की तपाती लू) में प्रभू की सिफत-सालाह को हृदय में बसा लेने वाली जो जीव-स्त्री प्रभू के साथ जान-पहचान बना लेती है। वह उस (शांत-चित्त प्रभू) जैसी हो जाती है। उसकी मेहर से उस में एक-रूप हो जाती है (और विकारों की तपश की लू से बची रहती है)। 7।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: (जब) आसाढ़ का महीना पूरे यौवन में होता है। आकाश में सूरज तपता है। (ज्यों-ज्यों सूरज धरती की नमी को) सुखाता है। धरती दुख सहती है (धरती के जीव-जन्तु दुखी होते हैं)। धरती आग (की तरह) धधकती है। (सूरज) आग (की तरह) पानी को सुखाता है। (हरेक जीवात्मा) त्राहि-त्राहि के दुखी होती है। फिर भी सूरज अपना कर्तव्य नहीं छोड़ता (अपना काम किए जाता है)। (सूर्य का) रथ चक्कर लगाता है। कमजोर जिंद कहीं छाया का आसरा लेती है। बींडा भी बाहर जुहू में (पेड़ो की छाया में) टीं-टीं करता है (हरेक जीव तपश से जान बचाता दिखाई देता है)। (ऐसी मानसिक तपश का) दुख उस जीव-स्त्री के सामने (भाव। जीवन-यात्रा में) मौजूद रहता है। जो बुरे कर्मों (की पोटली सिर पर) बॉध के चलती है। आत्मिक आनंद सिर्फ उसको है जो सदा-स्थिर प्रभू को अपने हृदय में टिकाए रखती है। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री को प्रभू ने हरी-नाम सिमरन वाला मन दिया है। प्रभू के साथ उसका सदीवी साथ बन जाता है (उसको आसाढ़ की कहर भरी तपश जैसा विकारों का सेक छू नहीं सकता)। 8।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: (आषाढ़ की अति दर्जे की तपश में घास आदि सूख जाते हैं। उस तपश के बाद सावन महीनें में घटाएं चढ़तीं हैं। पशु पक्षी और मनुष्य तो कहीं रहे। सूखा हुआ घास भी हरा हो जाता है। उसकी हरियाली देख के हरेक प्राणी बोल उठता है-) हे मेरे मन ! सावन महीने में (वर्षा की) ऋतु आ गई है। बादल बरस रहे हैं। आप भी हरा हैं (आप भी उमंग में आ)। (परदेस गए पति की नारी का हृदय काली घटाओं को देख के तड़प उठता है। उमंग पैदा करने वाले ये सामान। विरह-वियोग में उसको दुखदाई प्रतीत होते हैं। विरह में वह यूँ कहती है-) हे माँ ! (ये बादल देख-देख के) मुझे अपना पति मन में रोम-रोम में प्यारा लग रहा है। पर मेरे पति जी तो परदेस गए हुए हैं। (जब तलक) पति घर नहीं आता। मैं आहें भर रही हूँ। बिजली चमक के (बल्कि) मुझे डरा रही है। (पति के वियोग में) मेरी सूनी सेज मुझे बहुत दुखदाई हो रही है। (पति से विछोड़े का) दुख मुझे मौत (के बराबर) हो गया है। (जिस जीव-स्त्री के अंदर प्रभू-पति का प्यार है। विरह भरी नारी की तरह) उसको प्रभू के मिलाप के बिना ना नींद। ना भूख। उसको तो कपड़ा भी शरीर पर अच्छा नहीं लगता (शरीरिक सुखों के कोई भी साधन उसके मन को बहला नहीं सकते)। हे नानक ! वही भाग्यशाली जीव-स्त्री प्रभू-पति के प्यार की हकदार हो सकती है। जो सदा प्रभू की याद में लीन रहती है। 9।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: भादों (का महीना) आ गया है। बरखा ऋतु में खड्ड-गड्ढे पानी से भरे हुए हैं। (इस नजारे का) आनंद लिया जा सकता है। (पर) जो जीव-स्त्री भर-यौवन में (यौवन के घमण्ड के) भुलेखें में गलती खा गई। उसको (पति के विछोड़े में) पछताना ही पड़ा (उसे पानी भरी जगहें नहीं भातीं)। आनंदमय बरसात के मौसम में जल-थल पानी से भर जाते हैं, काली स्याह रात को बरसात होती है। मेंढक टॅर-टॅर करते हैं। मोर कूहकते हैं। पपीहा भी ‘पिउ पिउ’ करता है। (पर पति से विछुड़ी) नारी को (इस सोहाने रंग से) आनंद नहीं मिलता। उसको तो (भादों में यही दिखता है कि) साँप डसते फिरते हैं। मच्छर डंक मारते हैं। चारों तरफ छप्पर-तालाब (बरसात के पानी से) नाको-नाक भरे हुए हैं (बिरही नारी को इसमें कोई सुहज-स्वाद नहीं दिखता)। (इसी तरह जिस जीव-स्त्री को पति-प्रभू से विछोड़े का अहिसास हो जाता है। उसको) प्रभू की याद के बिना (और किसी रंग-तमाशे में) आत्मिक आनंद नहीं मिलता। हे नानक ! (कह-) मैं तो अपने गुरू की शिक्षा पर चल कर (उसके बताए हुए रास्ते पर) चलूँगी। जहाँ प्रभू-पति मिल सकता हैं। वहीं जाऊँगी। 10।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: मायावी पदार्थों के मोह में फस के मैं गलत रास्ते पर पड़ चुकी हॅूँ। हे प्रभू ! आपको तभी मिला जा सकता है अगर आप खुद मिलाए। (जब से) दुनिया के झूठे मोह में फस के मैं दुखी हैं रही हूँ। तब से। हे पति ! आपसे बिछुड़ी हुई हूँ। पिलछी और काही (के सफेद बूर की तरह मेरे केस) सफेद हैं गए हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(इस महीने) खुली जूह में बनस्पति को फूल लग जाते हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।