विपश्चित: चार दिशाएँ

कथा · 17

विपश्चित: चार दिशाएँ, चार आत्माएँ

राजा को ब्रह्मांड के चारों किनारे देखने थे। माँ सरस्वती ने कहा – तो तुम्हें चार होना पड़ेगा। फिर चार राजा निकले, हर एक एक दिशा में। हर एक की अपनी कथा है।

राजा विपश्चित बहुत जिज्ञासु थे। हर बात पूछते। बचपन से ऐसे थे। माँ-पिता थक जाते। शिक्षक भी थक जाते।

बड़े होकर राजा बने, तो जिज्ञासा और बढ़ी। राज्य चला रहे थे, मगर मन में एक प्रश्न खाए जाता था – “इस ब्रह्मांड के किनारे क्या हैं? चारों दिशाओं में जाकर देखूँ तो क्या मिलेगा?”

उन्होंने ऋषियों से पूछा। हर एक ने कुछ अलग कहा। किसी ने कहा, “अंत है।” किसी ने कहा, “नहीं है।” किसी ने कहा, “अंत है, मगर तुम तक नहीं पहुँच सकते।” विपश्चित संतुष्ट नहीं हुए।

आख़िर उन्होंने एक बड़ा यज्ञ किया। माँ सरस्वती को आह्वान किया। हफ़्तों आहुति दी। माँ प्रसन्न होकर प्रकट हुईं। हाथ में वीणा। पीछे एक हलकी रोशनी।

वर

“बेटा, क्या चाहिए?”

विपश्चित ने हाथ जोड़े। “माँ, मुझे ब्रह्मांड की चारों दिशाएँ देखनी हैं। उत्तर का अंत क्या है, दक्षिण का, पूरब का, पश्चिम का।”

माँ मुस्कुराईं। “बेटा, यह बहुत बड़ी इच्छा है। एक देह में नहीं देख सकते। बहुत बड़ा है ब्रह्मांड। एक जीवन में सब चार किनारों तक पहुँचना संभव नहीं।”

“तो?”

“तुम्हें चार होना पड़ेगा। तुम्हारी आत्मा चार में बँट जाएगी। हर एक एक दिशा में जाएगी। हज़ारों वर्षों बाद चारों लौटेंगे।”

राजा कुछ रुके। चार में बँटना? क्या यह ख़तरनाक नहीं?

“माँ, क्या मैं वापस एक हो पाऊँगा?”

“हाँ। चारों लौटेंगे, और एक हो जाएँगे। मगर तुम पहले जैसे नहीं रहोगे। तुम चार-गुना हो जाओगे।”

“चार-गुना मतलब?”

“चार दृष्टियाँ एक देह में। एक चीज़ देखोगे, चार पहलू दिखेंगे। बोझ भी होगा। मगर मुक्ति भी।”

विपश्चित ने सोचा। फिर हाथ जोड़े। “तथास्तु।”

माँ ने उन्हें छुआ। उनके भीतर कुछ खिंचा। फिर वो चार बन गए। चार विपश्चित खड़े थे, एक जैसे, मगर हर एक की एक दिशा थी।

उत्तर का विपश्चित

उत्तर वाले विपश्चित ने उत्तर की ओर पाँव रखा। हिमालय पार किया। ठंडी हवा। बर्फ़ ही बर्फ़।

पहले मनुष्यों के राज्य मिले। फिर वो भी पीछे रह गए। यक्षों के लोक आए। बड़े-बड़े पहरेदार, अद्भुत हथियार। उन्होंने विपश्चित को रोका, मगर माँ का वर साथ था। वो आगे बढ़े।

कुबेर का नगर देखा – सोने की दीवारें, हीरों के छप्पर। मगर विपश्चित को धन में रुचि नहीं थी। आगे चले।

पहाड़ इतने ऊँचे कि सोच भी न पहुँचे। हर पहाड़ पर एक देवता का वास। वो कई देवताओं से मिले। हर एक ने उन्हें रुकने को कहा। मगर वो रुके नहीं।

आख़िर एक जगह पर पहुँचे जहाँ कुछ नहीं था। पहाड़ ख़त्म। बादल ख़त्म। हवा भी ख़त्म।

केवल शून्यता। ख़ाली स्थिर मौन।

उत्तरी विपश्चित ने वहाँ बैठकर देखा। बहुत देर तक। उन्होंने जाना – उत्तर का अंत शून्य है। एक स्थिर शून्य, जिसमें कुछ नहीं हिलता।

दक्षिण का विपश्चित

दक्षिण वाले ने दक्षिण की ओर। पहले हरे जंगल, फिर सूखे रेगिस्तान, फिर असुर लोक।

असुर लोक में रंग-बिरंगे राक्षस मिले। कुछ सोते थे, कुछ जागते थे। कोई अच्छा भी था, कोई बुरा भी। उन्होंने विपश्चित को कई जगह रोका, मगर माँ का वर ले आया।

पाताल लोक देखा। सर्प थे, वहाँ की पृथ्वी अलग रंग की। नीचे से ऊपर देखो तो आसमान भी अलग।

आगे चले। यम स्वयं मिले। उन्होंने पूछा, “विपश्चित, इतनी दूर?” विपश्चित ने कहा, “दिशा का अंत खोज रहा हूँ।” यम मुस्कुराए। “जाओ। मगर लौटना मेरे रास्ते से।”

विपश्चित आगे चले। आख़िर एक जगह पर पहुँचे जहाँ अग्नि का महासागर था। अंत्यहीन। हर तरफ़ आग। मगर उन्हें जलाई नहीं। वो खड़े रहकर देखते रहे।

दक्षिण का अंत अग्नि है। एक जलाने वाला महासागर, जिसमें सब कुछ शुद्ध हो जाता है।

पूरब का विपश्चित

पूरब वाले ने पूरब की ओर। सूरज की दिशा। हर रोज़ की पहली रोशनी की दिशा।

दिनभर के देशों को पार किया। जहाँ-जहाँ सूरज जल्दी निकलता था। फिर देवताओं के लोक आए। चमकीले महल। दिव्य प्राणी।

इंद्र का स्वर्ग देखा – अमरावती। नंदन वन। अप्सराओं का नाच। उन्होंने विपश्चित को रोकने की कोशिश की। मगर वो आगे बढ़े।

और आगे – वो जगह आई जहाँ हर रूप जन्म लेता है। एक विशाल द्वार। उस द्वार से सब कुछ निकलता था – मनुष्य, पशु, देवता, वस्तुएँ। सब वहाँ से जन्मते।

विपश्चित कुछ देर वहाँ बैठे। उन्होंने देखा – कैसे एक नया प्राणी जन्म लेता है। पहले एक हलका सा भाव। फिर रूप बनता। फिर रंग। फिर देह। फिर वो द्वार से बाहर निकल जाता।

पूरब का अंत जन्म-द्वार है। हर रूप यहीं से आता है।

पश्चिम का विपश्चित

पश्चिम वाले ने पश्चिम की ओर। छाया की दिशा।

दिन ढलते देशों से गुज़रे। फिर प्रेत-लोक मिला। सूक्ष्म देहों वाले प्राणी। मरे हुए लोगों की आत्माएँ। उन्होंने विपश्चित से बातें कीं। कई ने कहा, “हम कब छूटेंगे?” विपश्चित ने जवाब नहीं दिया, क्योंकि उन्हें ख़ुद नहीं पता था।

आगे चले। कुछ धुँधले लोक मिले। जहाँ रूप होते-होते मिटते थे।

आख़िर एक द्वार आया – पूरब के द्वार जैसा, मगर उल्टा। यह द्वार रूपों को निगलता था। हर रूप जो जीवन जी चुका था, यहाँ आकर मिटता था।

विपश्चित ने देखा – कैसे एक प्राणी ख़त्म होता है। पहले देह छूटती। फिर पहचान। फिर स्मृतियाँ। फिर बस एक हलका सा सा भाव। फिर वो भी मिट जाता।

पश्चिम का अंत मृत्यु-द्वार है। हर रूप यहीं समाता है।

वापसी और एकता

हर विपश्चित अपनी दिशा का अनुभव कर रहा था। हर एक के लिए हज़ारों साल बीत रहे थे। मगर यज्ञ-शाला में, माँ सरस्वती के पास, समय रुका हुआ था। एक मुहूर्त ही बीता था।

आख़िर सब चार लौटे।

उत्तर वाला आया – उसकी आँखों में शून्य की गहराई।

दक्षिण वाला आया – उसकी आँखों में अग्नि की चमक।

पूरब वाला आया – उसकी आँखों में जन्म का उल्लास।

पश्चिम वाला आया – उसकी आँखों में मृत्यु की शांति।

चारों खड़े थे यज्ञ-शाला में। एक-दूसरे को देखते हुए।

माँ ने उन्हें छुआ। चारों एक हो गए। एक विपश्चित खड़ा था। मगर अब उसके भीतर चार दृष्टियाँ थीं।

उसकी आँखों में एक फ़र्क़ था। वो किसी एक दिशा में नहीं देख सकता था बिना दूसरी तीन को याद किए। उत्तर देखता तो दक्षिण की आग याद आती। पूरब देखता तो पश्चिम का द्वार। हर दिशा हर दूसरी दिशा को छूती।

वापस राज्य में

राजा घर लौटा। राज चलाया। मगर अब उसके फ़ैसले अलग थे।

कोई आता शिकायत लेकर। एक सुनाता, “मेरे पड़ोसी ने मेरी ज़मीन हड़पी।” विपश्चित सुनते। मगर वो उत्तर के शून्य से सुनते – वहाँ कोई ज़मीन नहीं। दक्षिण की अग्नि से सुनते – वहाँ सब कुछ जल जाता है। पूरब के द्वार से सुनते – रूप आते हैं, ज़मीन भी एक रूप है। पश्चिम के द्वार से सुनते – सब रूप जाते हैं, ज़मीन भी जाएगी।

फिर वो फ़ैसला करते। मगर बहुत हलके से। वो किसी एक तरफ़ से नहीं सोचते। हमेशा चार पहलुओं को साथ रखते।

लोगों ने पूछा, “महाराज, आप ऐसे क्यों सोचते हैं?”

उन्होंने हँसकर कहा, “मैं चार हूँ। एक के जैसा दिखता हूँ, बस।”

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, हम सोचते हैं हम एक हैं। मगर भीतर हम कई हैं। जो विपश्चित की तरह सब कोनों को देख सके, वही पूरा है। एक तरफ़ से देखना अधूरापन है। चार तरफ़ से देखना संपूर्णता।”

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