कथा · 17
विपश्चित: चार दिशाएँ, चार आत्माएँ
राजा को ब्रह्मांड के चारों किनारे देखने थे। माँ सरस्वती ने कहा कि इसके लिए आपको चार होना पड़ेगा। फिर चार राजा निकले, हर एक एक दिशा में, और हर एक की अपनी कथा बन गई।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, संसार कितना बड़ा है?”

वसिष्ठ बोले – “राम, एक राजा थे, विपश्चित। उन्होंने यही प्रश्न पूछा, और उसका जवाब ढूँढने के लिए उन्होंने अपने को चारों दिशाओं में बाँट दिया। उनकी कथा सुनो।”
संकल्प
विपश्चित एक राजा थे, और उनके पास सब कुछ था – बड़ा राज्य, बड़ी सेना, प्रिय पत्नी और होनहार बच्चे।
पर एक रात वो अपनी छत पर बैठे थे। ऊपर तारे थे और नीचे पूरा नगर।
उन्होंने सोचा कि मेरा राज्य आख़िर कितना बड़ा है।
मैंने अपनी सीमाएँ देखी हैं। उत्तर में पहाड़ हैं, पूर्व में समुद्र, दक्षिण में जंगल, और पश्चिम में रेगिस्तान।
पर मेरी सीमाओं के पीछे क्या है, और उसके पीछे, और उसके भी पीछे?
विपश्चित का मन इसी प्रश्न में फँस गया।
अगली सुबह उन्होंने अपने ब्राह्मणों को बुलाया।
उन्होंने पूछा – “भगवन्, संसार का अन्त कहाँ है?”
ब्राह्मणों ने अलग-अलग जवाब दिए।

एक ने कहा – “महाराज, संसार के सात द्वीप हैं, और हर द्वीप के बीच एक समुद्र। सबसे बाहर सबसे बड़ा समुद्र है, उसके पार स्वर्ग, और उसके भी पार ब्रह्मलोक।”
दूसरे ने कहा – “महाराज, चौदह लोक हैं, सात ऊपर और सात नीचे। ऊपर के लोकों में देव, ब्रह्मा और विष्णु रहते हैं, और नीचे के लोकों में दैत्य, यम, तथा सबसे नीचे पाताल।”
तीसरे ने कहा – “महाराज, यह तो छोटी बात है। हज़ारों ब्रह्माण्ड हैं, हर ब्रह्माण्ड का अपना ब्रह्मा, और हर ब्रह्माण्ड में चौदह लोक।”
विपश्चित ने सब सुना, और उनके भीतर एक अन्तर हो गया।
ये सब सुनी हुई बातें हैं। हर ब्राह्मण कुछ अलग कहता है। फिर कोई एक ही सत्य कैसे हो सकता है?
मैं ख़ुद देखूँगा।
तप
विपश्चित ने तप किया। राज्य अपने बेटे को सौंप दिया और ख़ुद एक पहाड़ की चोटी पर जा बैठे। यों बहुत बरस बीत गए।
एक दिन ब्रह्मा प्रसन्न होकर प्रकट हुए।
ब्रह्मा बोले – “विपश्चित, क्या चाहते हो?”
“भगवन्, मुझे संसार का अन्त देखना है।”
ब्रह्मा बोले – “विपश्चित, यह बहुत मुश्किल काम है।”
“फिर भी मुझे करना है।”
“क्यों?”
“क्योंकि मेरे ब्राह्मण अलग-अलग बातें कहते हैं, और मैं ख़ुद जानना चाहता हूँ।”

ब्रह्मा बोले – “विपश्चित, यह बात तो अच्छी है, पर तुम्हें एक बात पता होनी चाहिए। संसार का अन्त ढूँढने में तुम जीवन भर लगा दोगे, और शायद फिर भी न पाओ।”
“मैं तैयार हूँ।”

“तो ठीक है। मैं तुम्हें एक वर देता हूँ। तुम चार रूप ले सकते हो – एक रूप पूर्व जाएगा, एक पश्चिम, एक उत्तर और एक दक्षिण। हर रूप उतना ही दूर जा सकेगा जितनी तुम्हारी शक्ति कहेगी।”
विपश्चित ने सिर झुकाकर वर स्वीकार किया।
चार रूप
और विपश्चित चार हो गए।
पूर्व
पूर्व वाला विपश्चित चल पड़ा।
पहले उसने अपनी सीमाएँ पार कीं, फिर एक दूसरा राज्य, फिर तीसरा, फिर चौथा। उसने पहाड़ पार किए, नदियाँ पार कीं, और एक समुद्र भी पार किया।
समुद्र पार करना सबसे कठिन था। वह इतना बड़ा था कि एक किनारे से दूसरा किनारा दिखता ही नहीं था।

विपश्चित ने एक नाव ली और एक साथी के संग रवाना हो गए।
कई दिन और कई रातें समुद्र में बीतीं, और बहुत तूफ़ान झेलने पड़े।
एक बार साथी डर गया और बोला – “महाराज, हम मर जाएँगे।”
विपश्चित बोले – “मित्र, अगर मरना ही है तो मरना है। पर पहले समुद्र के दूसरे किनारे तक तो पहुँचें।”
आख़िर वो दूसरे महाद्वीप पर पहुँच गए।
वहाँ अलग ही लोग थे। उनका देह इनसे थोड़ा अलग था, उनकी भाषा बिल्कुल अलग, उनके देव अलग, और उनका खान-पान भी अलग।
विपश्चित ने इशारों से, जैसे-तैसे, उनसे बात की।
“तुम्हारे राज्य के पीछे क्या है?”
“और राज्य, और लोग।”
“और उसके पीछे?”
“पता नहीं। हम वहाँ कभी नहीं गए।”
वो आगे बढ़े। समुद्र के बाद महाद्वीप, फिर समुद्र, फिर महाद्वीप, और यों कई बरस बीतते चले गए।

एक महाद्वीप पर ऐसे लोग मिले जिनके चार हाथ थे, एक तरफ़ दो और दूसरी तरफ़ दो।
विपश्चित ने उनके राजा से पूछा – “महाराज, चार हाथ का क्या लाभ?”
राजा बोले – “राजा, हम एक हाथ से अपनी पत्नी का हाथ पकड़ सकते हैं, एक से अपने बच्चे का, एक से अपना भोजन और एक से अपना काम। सब एक साथ।”
विपश्चित ने पूछा – “पर इसमें कुछ खोते भी तो होगे?”
राजा एक पल चुप रहे, फिर बोले – “हाँ। हमें चुनना नहीं आता, क्योंकि हमारे लिए सब एक साथ है। पर तुम लोग चुनते हो। हाथ कम होने से तुम्हें यह सीखना पड़ता है।”
विपश्चित ने यह बात गाँठ बाँध ली।
(विपश्चित ने उस रात अपनी रुकी हुई नाव में बैठकर सोचा – “मेरे पास दो ही हाथ हैं। मैंने जीवन भर बहुत बार चुना है। पत्नी या राज्य, तप या प्रजा, और अब अन्त ढूँढना या लौटना। चुनना ही तो जीवन है।”)
एक महाद्वीप पर ऐसे लोग मिले जो हवा में उड़ सकते थे।
उनका देह बहुत हलका था और हड्डियाँ पंछियों जैसी खोखली। उनकी पीठ पर पंख जैसा कुछ नहीं था, फिर भी वो अपनी इच्छा से हवा में स्थिर रह जाते थे।
विपश्चित ने उनके साथ एक रात बिताई। वो उन्हें उड़ान नहीं सिखा सकते थे, क्योंकि विपश्चित का देह ठोस था, पर उन्होंने उसे एक जाल में बिठाकर ऊपर ले जाने में मदद की।
ऊँचाई से विपश्चित ने नीचे देखा।
नीचे समुद्र था, महाद्वीप थे, पेड़ और नदियाँ थीं, और जहाँ क्षितिज था, वहाँ भी बस ज़मीन ही ज़मीन फैली हुई थी।
विपश्चित ने एक पल को साँस रोककर सोचा – “यह तो बहुत छोटा सा हिस्सा है, और इसके पार भी और है।”
उड़ने वाले लोगों के राजा बोले – “राजा, ऊँचाई से हर चीज़ छोटी दिखती है। पर ऊपर से देखने पर भी संसार ख़त्म नहीं होता।”
विपश्चित ने यह सुना और आगे का रास्ता पकड़ा।
एक महाद्वीप पर ऐसे लोग मिले जो पानी के नीचे रह सकते थे। उन्होंने भी यही कहा – “हमारे पीछे और लोक हैं।”
विपश्चित आगे बढ़ता रहा, और कई बरस यों ही बीत गए।
वो एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ आकाश ही अलग था। तारे अलग, सूरज अलग। वहाँ भी एक राजा था और एक प्रजा।
विपश्चित ने पूछा – “तुम्हारे आगे क्या है?”
राजा बोले – “हमारे आगे और संसार हैं।”
विपश्चित यह सुनकर फिर आगे चल पड़ा।
पश्चिम
पश्चिम वाला विपश्चित भी चल पड़ा। पहले उसने अपनी सीमाएँ पार कीं, फिर एक दूसरा राज्य, फिर तीसरा। उसने रेगिस्तान पार किए, पहाड़ पार किए, और दूसरे महाद्वीप तक पहुँच गया।
रेगिस्तान पार करना कठिन था। रेत बारीक थी, गेरुए रंग की, और दिन में इतनी गर्म कि नंगे पाँव चलना नामुमकिन। विपश्चित ने ऊँट पर सफ़र किया, एक साथी, एक बूढ़े गाइड और तीन ऊँटों के संग।
दोपहर में वो रुक जाते, एक चादर तानकर उसके नीचे लेट जाते, और हवा में रेत की एक महीन आवाज़ बहती रहती।
रात को रेगिस्तान बदल जाता, ठण्डा हो जाता, और आकाश में इतने तारे उग आते कि उन्हें गिनना नामुमकिन था।
गाइड बूढ़ा था और हर रात विपश्चित को अपने पुरखों की कोई कथा सुनाता।
एक रात उसने कहा – “राजा, रेगिस्तान में जो खो जाता है, वो रेत में मिल जाता है। उसकी हड्डियाँ बाद में कोई मुसाफ़िर ढूँढ निकालता है।”
विपश्चित ने पूछा – “और जो खोते नहीं?”
“राजा, वो भी एक तरह से खो ही जाते हैं। बस उनकी हड्डियाँ कहीं और मिलती हैं।”
विपश्चित यह सुनकर हँस पड़े।
(उस रात विपश्चित ने देर तक तारों को देखा। उन्हें लगा कि हर तारा एक संसार है, और हर संसार में एक राजा है, और हर राजा अपना अन्त ढूँढ रहा है। यह सोचकर उनका मन कुछ हलका हुआ, कि वो इस खोज में अकेले नहीं हैं।)
यों कई दिन और बीते।
रेगिस्तान के पार उन्होंने एक नई दुनिया देखी, जहाँ हरियाली थी, नदियाँ थीं और पेड़ थे। वहाँ के लोग सुन्दर थे, उनका देह पतला पर मज़बूत, आँखें भूरी और बाल सुनहरे।
विपश्चित ने उनसे पूछा – “तुम्हारे पीछे क्या है?”
“और भूमि, और लोग।”
“और उसके पीछे?”
“और, और।”
वो आगे बढ़े, और यों कई बरस और बीत गए।
एक स्थान पर ऐसे लोग मिले जिनकी चार आँखें थीं, दो आगे और दो पीछे।
विपश्चित ने हैरानी से पूछा – “तुम पीछे भी देख सकते हो? क्या यह अच्छी बात है?”
लोग हँसे और बोले – “महाराज, यह दो तरह की है। हम पीछे देख सकते हैं, तो कोई शत्रु पीछे से नहीं आ पाता। पर हम पीछे की हर चीज़ भी देखते हैं, अच्छी हो या बुरी, और यह एक बोझ भी है।”
विपश्चित ने यह बात समझकर सिर हिलाया।
वो आगे बढ़ चले।
उत्तर
उत्तर वाला विपश्चित बर्फ़ के देशों में गया। पहले उसने एक हिमालयी राज्य पार किया, और फिर बर्फ़ ही बर्फ़ शुरू हो गई।
बर्फ़ में चलना और ही तरह का था। हर क़दम पर पाँव एक मुलायम सी आवाज़ देते। दूर तक केवल सफ़ेद फैला था, और आसमान कभी नीला, कभी धूसर, कभी पूरा बादलों से ढका रहता।
बहुत बरस वो बर्फ़ में चले। उनका देह तप से मज़बूत हो चुका था, इसलिए ठंड का असर कम पड़ता, पर पाँव बार-बार बर्फ़ में धँस जाते।
बर्फ़ में आवाज़ें अलग ही होती हैं, बहुत साफ़ पर बहुत महीन। कहीं दूर कोई पेड़ टूटता, तो आवाज़ ऐसे आती जैसे ठीक कान के पास।
विपश्चित को यह स्वच्छता अच्छी लगी, पर साथ ही एक डर भी हुआ, क्योंकि इस स्वच्छता में हर चीज़ बड़ी हो जाती है, हर सोच भी।
(एक रात विपश्चित ने सपना देखा। उनकी पत्नी एक छज्जे पर खड़ी थीं, सर्द हवा में, और उन्होंने कुछ कहा। पर बर्फ़ की उस स्वच्छता में भी वह आवाज़ विपश्चित तक नहीं पहुँची, सिर्फ़ उनके होंठ हिलते दिखे। विपश्चित जागे और देर तक यह याद करने की कोशिश करते रहे कि वो क्या कह रही थीं, पर याद नहीं आया।)
बर्फ़ के बीच एक पुराना राज्य था। उसकी इमारतें बर्फ़ की बनी थीं, और उसके लोग बहुत गोरे थे, आँखें नीली और बाल बचपन से ही सफ़ेद।

वहाँ का राजा बहुत पुराना था, उसकी उम्र हज़ारों बरस की, क्योंकि बर्फ़ के देश में लोग बहुत बूढ़े होते थे।
विपश्चित ने पूछा – “महाराज, आपके राज्य के पीछे क्या है?”
राजा बोले – “मुझे नहीं पता, पर कुछ ज़रूर है।”
“आपने नहीं देखा?”
“नहीं। मैं अपने राज्य से कभी बाहर ही नहीं गया।”
“क्यों?”
“क्योंकि मेरा यहाँ रहना ज़रूरी है। अगर मैं चला जाऊँ, तो मेरा राज्य बिखर जाएगा।”
विपश्चित ने पूछा – “पर आपको पता है कि बाहर कुछ है?”
“हाँ। मेरे यहाँ कभी-कभी राही आते हैं, और वो कहानियाँ सुनाते हैं।”
विपश्चित कुछ देर सोचकर बोले – “महाराज, तो मैं ही जाऊँगा।”
“जाओ। पर तुम वापस कभी नहीं आओगे। बर्फ़ के पार बहुत बर्फ़ है, और उसके पार और। यह अन्तहीन है।”
विपश्चित ने यह चेतावनी सुनी।
और वो आगे चल पड़े।
दक्षिण
दक्षिण वाला विपश्चित जंगलों में गया।
जंगल बहुत घने थे, पेड़ इतने ऊँचे कि प्रकाश ज़मीन तक मुश्किल से पहुँचता था।
जंगल की हवा गीली थी, और नथुनों में मिट्टी तथा पुरानी पत्तियों की एक मीठी गन्ध भर जाती। दिन और रात दोनों ही हरे रंग के लगते, बस रात में हरा रंग और गहरा हो जाता।
यहाँ जानवर बड़े और बहुत प्रकार के थे, कुछ तो ऐसे जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखे थे।
एक रात विपश्चित एक पेड़ के नीचे अपनी आग के पास बैठे थे। दूर से किसी तेंदुए की धीमी आवाज़ आई, तो विपश्चित ने आग को थोड़ा बड़ा कर लिया।

तभी पेड़ की एक डाली से कोई बूँद टपकी और विपश्चित ने ऊपर देखा। ऊपर एक मेंढक था, इतना पारदर्शी कि उसके देह से अन्दर की हड्डियाँ तक दिखती थीं।
विपश्चित बोले – “यहाँ तो हर चीज़ अलग है।”
(उस रात उन्हें लगा कि जंगल उन्हें ध्यान से देख रहा है, हर पेड़ और हर पत्ता। यह बात डराने वाली नहीं थी, पर कुछ अजीब ज़रूर लगी। शायद, उन्होंने सोचा, जंगल भी एक चेतना है, उतनी ही जागृत जितनी कोई मनुष्य।)
जंगल के बीच एक छोटा सा राज्य था।
वहाँ के लोग पेड़ों पर रहते थे, और उनके घर डालियों पर बने थे।
उनके राजा ने हँसकर कहा – “हमारे जंगल के परे और जंगल हैं। हमने ऐसा सुना है।”
विपश्चित ने यह सुना और आगे बढ़े।
जंगल के बीच कई और राज्य मिले, हर एक के अपने रिवाज और अपनी भाषा। एक राज्य में लोग पंछियों से बात कर सकते थे, एक में पेड़ों से, और एक में ज़मीन से।
विपश्चित ने यह सब देखा, और यों कई बरस बीत गए।
और ऊँचाई
चारों विपश्चित अपनी-अपनी यात्रा में और भी बहुत कुछ देखते रहे।
पूर्व वाला एक दिन एक ऐसे प्रदेश में पहुँचा जहाँ लोग प्रकाश से बने थे। उनका देह प्रकाश का था, माँस का नहीं। वो न खाना खाते, न साँस लेते, फिर भी रहते, चलते और बात करते थे।
पूर्व वाले ने उनके राजा से पूछा – “महाराज, आप कैसे जीते हैं?”
राजा बोले – “मित्र, हम जीते नहीं, हम होते हैं। जीना और होना अलग बातें हैं।”
“ज़रा समझाइए।”
“जीने का मतलब है साँस लेना, खाना खाना, बच्चे पैदा करना। और होने का मतलब है बस होना। हम बिना देह की ज़रूरतों के बस होते हैं।”
विपश्चित ने यह बात मन में बैठा ली।
पश्चिम वाला एक ऐसी जगह पहुँचा जहाँ लोगों के पास एक ख़ास सिद्धि थी, वो अपने सपनों को असली बना सकते थे।
पश्चिम वाले ने उनके राजा से पूछा – “महाराज, यह सिद्धि कैसी है?”
राजा बोले – “हम जो सपना देखते हैं, वो हमारे जागने पर भी बना रहता है। हमारा देह उस सपने को बाहर ले आता है।”
“बहुत विचित्र।”
“हाँ, पर इसमें एक समस्या भी है।”
“क्या?”
“अगर हमारा कोई बुरा सपना हो, तो वो भी असली बन जाता है। ऐसा बहुत बार हुआ है। एक स्त्री ने सपने में अपने पति को मरते देखा, और सुबह वो सचमुच मरे मिले।”
विपश्चित ने पूछा – “तो फिर आप कैसे जीते हैं?”
“हम अपने सपनों को बहुत सावधानी से सम्हालते हैं, और बच्चों को सिखाते हैं कि अच्छे सपने देखो।”
विपश्चित ने यह सुना और आगे बढ़े।
उत्तर वाले ने बर्फ़ के बीच एक ऐसी गुफ़ा पाई जहाँ हज़ारों बरस की प्रतिध्वनियाँ रहती थीं। मतलब, जो भी आवाज़ कभी उस गुफ़ा में हुई थी, वो वहाँ अब भी मौजूद थी।
उत्तर वाले ने एक प्रतिध्वनि सुनी – “मेरी माँ कहाँ हैं?” यह किसी बच्चे की बहुत पुरानी आवाज़ थी।
विपश्चित ने सोचा कि यह बच्चा शायद हज़ारों बरस पहले अपनी माँ को ढूँढ रहा था, और उसकी आवाज़ अब भी यहीं गूँज रही है। विपश्चित ने देर तक उस आवाज़ को सुना।
फिर उत्तर वाले ने एक प्रार्थना की – “बच्चे, तुम जहाँ भी हो, तुम्हें तुम्हारी माँ मिले।”
विपश्चित ने सोचा कि शायद उनकी प्रार्थना का कोई असर न हो, पर एक स्तर पर उन्हें लगा कि बच्चे ने उसे सुन लिया।
दक्षिण वाला जंगल के एक ऐसे हिस्से में पहुँचा जहाँ पेड़ बोलते थे।
एक पुराने पेड़ ने विपश्चित से कहा – “मित्र।”
विपश्चित ठिठककर बोले – “पेड़।”
“मैंने तुम्हें देखा है, तुम्हारे पूर्वजों को भी।”
“मुझे?”
“हाँ। तुम पिछले जन्मों में कई बार इस जंगल से गुज़र चुके हो।”
विपश्चित ने पूछा – “पेड़, मुझे एक बात बताइए। क्या मेरी यात्रा का कोई अन्त है?”

पेड़ की हँसी पत्तियों के हिलने जैसी थी। पेड़ बोला – “मित्र, अन्त बाहर नहीं है, अन्त भीतर है।”
यह बात विपश्चित ने पहले भी सुनी थी, पर एक पेड़ से सुनना और ही बात थी।
और देश
यों कई बरस और बीत गए।
पूर्व वाला विपश्चित एक ऐसे द्वीप पर पहुँचा जहाँ लोग पानी में रहते थे। उनका देह पानी के लिए बना था – नाक नहीं, गलफड़े; पूँछ और पतले पैर।
विपश्चित ने एक तट पर रुककर देखा। लोग थोड़ी देर के लिए पानी से बाहर आते और फिर लौट जाते। तभी एक स्त्री बाहर आई, उसके देह से पानी टपक रहा था और उसकी आँखें बड़ी, गोल थीं।
स्त्री ने विपश्चित को देखकर पूछा – “आप कौन हैं?”
“मैं विपश्चित हूँ, एक राजा। संसार का अन्त ढूँढ रहा हूँ।”
स्त्री हँसकर बोली – “राजा, संसार का कोई अन्त नहीं।”
“पर मुझे तो ढूँढना है।”
“तो ढूँढिए। हमारे द्वीप के पीछे और बहुत द्वीप हैं।”
स्त्री पानी में लौट गई, और विपश्चित आगे चल पड़े।
पश्चिम वाला विपश्चित एक ऐसे प्रदेश में पहुँचा जहाँ रात होती ही नहीं थी। सूरज हमेशा आकाश में रहता, पर एक ही जगह स्थिर, चलता नहीं था।
विपश्चित ने एक नागरिक से पूछा – “भाई, यहाँ रात कब होती है?”
“राजा, हमारे यहाँ रात होती ही नहीं।”
“फिर आप सोते कैसे हैं?”
“हम बारी-बारी से सोते हैं। हर एक के पास एक छोटी कुटिया है जो प्रकाश को रोक लेती है, और उसी में हम सोते हैं।”
विपश्चित बोले – “बड़ा विचित्र है।”
“राजा, हमें तो यह विचित्र नहीं लगता। हमने तो यही जाना है।”
विपश्चित ने सोचा कि हर जगह जो है, वो वहाँ के लिए सामान्य है। मेरे लिए विचित्र, उनके लिए साधारण। संसार की कोई एक परिभाषा नहीं।
विपश्चित आगे चल पड़े।
उत्तर वाला विपश्चित बर्फ़ के पार एक ऐसे प्रदेश में पहुँचा जहाँ कुछ भी नहीं था। न कोई पेड़, न जानवर, न आदमी, न इमारत। बस सफ़ेद ज़मीन और एक पीला आकाश।
विपश्चित ने सोचा कि यहाँ तो कुछ भी नहीं है। पर तभी एक हलकी आहट हुई, बिल्कुल पास से, जैसे कुछ चल रहा हो।
विपश्चित ने देखा तो ज़मीन से उठता एक छोटा सा पारदर्शी जीव था। विपश्चित ने उसे ध्यान से देखा, और जीव ने भी उन्हें देखा।
जीव बोला – “राजा।”
विपश्चित चौंककर बोले – “तुम बोल सकते हो?”
“हाँ। यहाँ हम सब अदृश्य प्रजा हैं। हम पारदर्शी हैं, पर हम हैं।”
“और तुम्हारा प्रदेश?”
“यह पूरा प्रदेश पारदर्शी जीवों का है। तुम्हें कुछ नहीं दिख रहा, पर यहाँ बहुत कुछ है।”
विपश्चित ने पूछा – “तो मेरी आँखें तुम्हें कैसे देख रही हैं?”
“क्योंकि तुम भी एक स्तर पर पारदर्शी हो। बस तुम जानते नहीं।”
विपश्चित ने अपने हाथ देखे, जो ठोस थे, और बोले – “तुम झूठ बोल रहे हो।”
“राजा, तुम्हारा देह तुम्हें ठोस लगता है, पर एक स्तर पर तुम भी पारदर्शी हो। चेतना ठोस नहीं होती।”
इतना कहकर वह जीव अदृश्य हो गया।
विपश्चित ने उसे ढूँढा पर वह नहीं मिला। फिर भी वह जीव गायब नहीं हुआ था, वह वहीं था, बस विपश्चित की आँखें उसे अब देख नहीं पा रही थीं।
विपश्चित ने हँसकर कहा – “मैंने आज एक बात सीखी, कि जो दिखता नहीं, वो भी हो सकता है।”
और विपश्चित आगे चल पड़े।
दक्षिण वाला विपश्चित जंगल के पार एक पहाड़ पर पहुँचा। पहाड़ बहुत ऊँचा था और उसकी चोटी पर एक छोटा सा मन्दिर था।
विपश्चित कई दिन चढ़ते रहे, और ऊपर पहुँचकर उन्होंने मन्दिर में प्रवेश किया।
मन्दिर में पत्थर की एक बहुत पुरानी मूर्ति थी। वह किसी देवता की नहीं, बल्कि एक मनुष्य की मूर्ति थी।

विपश्चित ने ध्यान से देखा तो वह मूर्ति विपश्चित जैसी ही थी।
विपश्चित ठिठककर बोले – “यह कौन है?”
तभी एक बूढ़ा पुजारी आया।
विपश्चित ने पूछा – “पुजारी, यह मूर्ति किसकी है?”
पुजारी बोले – “महाराज, यह एक प्राचीन राजा की मूर्ति है।”
“कौन से राजा?”
“उनका नाम विपश्चित था।”
विपश्चित यह सुनकर ठिठक गए।
विपश्चित ने पूछा – “पुजारी, यह राजा कौन थे?”
“महाराज, यह बहुत पुरानी कथा है। एक राजा संसार का अन्त ढूँढ रहे थे। वो चारों दिशाओं में गए, बहुत बरस भटके, और आख़िर इसी पहाड़ पर आकर उन्होंने अपनी यह मूर्ति बनवाई और यहाँ रख दी।”
“और वो ख़ुद?”
“वो आगे चल पड़े। उनके बाद उन्हें किसी ने नहीं देखा।”
विपश्चित देर तक उस मूर्ति को देखते रहे।
मूर्ति विपश्चित जैसी थी, पर थोड़ी अलग, उसकी आँखें कुछ ज़्यादा थकी हुई थीं।
विपश्चित ने सोचा – यह मेरा कोई पिछला जन्म है, या कोई भविष्य का?
विपश्चित ने मूर्ति को प्रणाम किया और पुजारी से कहा – “पुजारी, मेरा भी नाम विपश्चित है।”
पुजारी कुछ पल रुककर बोले – “महाराज, यह कोई आश्चर्य नहीं। हर पीढ़ी में एक विपश्चित आता है, और हर पीढ़ी में एक संसार का अन्त ढूँढता है। कोई पाता नहीं, पर हर एक अपना संग्रह बना जाता है।”
विपश्चित ने पूछा – “पुजारी, क्या मैं भी अपनी मूर्ति बनवाऊँ?”
“नहीं, महाराज। आपकी मूर्ति तो पहले से ही है। आपने उसे अभी देखा।”
विपश्चित इस उत्तर पर चुप रह गए।
फिर विपश्चित मन्दिर से बाहर निकले और आगे चल पड़े।
हज़ारों बरस
यों बहुत बरस बीत गए और चारों विपश्चित चलते ही रहे। हर एक ने अपने सफ़र में हज़ारों राज्य, हज़ारों लोग और हज़ारों रिवाज देखे।
हर एक ने सोचा कि कहीं तो अन्त होगा, कहीं तो कोई किनारा होगा। पर अन्त नहीं आया।
जहाँ तक जाते, आगे और था। जो लोग मिलते, उनके पीछे और लोग थे। जो आकाश दिखता, उसके पीछे और आकाश था।
एक दिन चारों विपश्चित एक साथ थक गए।
वो आपस में बात नहीं कर सकते थे, क्योंकि चारों अलग-अलग दिशाओं में थे, पर हर एक के भीतर एक ही बात उठी – संसार का कोई अन्त नहीं।
पूर्व वाला विपश्चित एक तट पर बैठा। उसने समुद्र देखा, और समुद्र के पार और महाद्वीप, और सोचा – अब और कितना?
पश्चिम वाला एक रेगिस्तान के बीच बैठा। उसने रेत देखी, और रेत के पार और रेत, और सोचा – अब और कितना?
उत्तर वाला बर्फ़ के बीच बैठा। उसने बर्फ़ देखी, और बर्फ़ के पार और बर्फ़, और सोचा – अब और कितना?
दक्षिण वाला जंगल के बीच बैठा। उसने पेड़ देखे, और पेड़ों के पार और पेड़, और सोचा – अब और कितना?
और चारों ने एक साथ ब्रह्मा को पुकारा।
अन्तिम क्षण
बहुत बरस बीतने के बाद चारों विपश्चित ने एक साथ एक बात अनुभव की।
चारों अलग-अलग जगहों पर थे – पूर्व वाला एक रेगिस्तान में, पश्चिम वाला एक पहाड़ी पर, उत्तर वाला बर्फ़ के बीच, और दक्षिण वाला एक नदी के किनारे।
पर चारों एक ही साथ रुके और एक ही साथ बैठ गए।
चारों के मन में एक ही बात थी – मैं चल रहा हूँ, चल रहा हूँ, चल रहा हूँ, पर कहीं पहुँच नहीं रहा। क्योंकि कहीं पहुँचना है ही नहीं।
पूर्व वाले ने रेगिस्तान की रेत देखी। रेत में अपने ही पैरों के निशान थे, बहुत बरस के निशान, पर अब वो रेत में हलके पड़ते जा रहे थे।
पश्चिम वाले ने पहाड़ी से नीचे देखा। बहुत दूर एक नगर था। विपश्चित ने सोचा – “वो नगर भी एक संसार है, उसमें भी हज़ारों कथाएँ हैं।”
उत्तर वाले ने बर्फ़ देखी। बर्फ़ में कोई चीज़ नहीं थी, पर सब कुछ था। विपश्चित ने सोचा – “जो कुछ नहीं है, वो भी कुछ है। यह बर्फ़ भी चेतना का ही एक रूप है।”
दक्षिण वाले ने नदी देखी। नदी हमेशा की तरह बह रही थी। विपश्चित ने सोचा – “यह नदी जहाँ से शुरू होती है, वहीं से ख़त्म भी। शुरू और ख़त्म एक ही हैं।”
चारों ने एक साथ हाथ ऊपर उठाए, बिना शब्दों की एक प्रार्थना।
फिर चारों ने ब्रह्मा को पुकारा।
मिलन
चारों रूप एक साथ ब्रह्मा के पास लौटे।
“भगवन्।”
ब्रह्मा बोले – “बोलो, विपश्चित।”
“भगवन्, हम चारों दिशाओं में हज़ारों बरस चले, पर अन्त नहीं मिला। हर जगह आगे और ही था।”
ब्रह्मा बोले – “विपश्चित, अब समझ आया?”
“नहीं, भगवन्। मुझे तो अब और भी हैरानी है।”
“कैसी हैरानी?”
“भगवन्, संसार इतना बड़ा आख़िर कैसे है?”

ब्रह्मा बोले – “विपश्चित, संसार उतना ही बड़ा है जितनी चेतना। चेतना की कोई सीमा नहीं, और संसार चेतना का ही बाहरी रूप है, इसलिए संसार की भी कोई सीमा नहीं।
“तुम बाहर जाकर अन्त ढूँढ रहे थे, पर बाहर अन्त है ही नहीं। अन्त तो ख़ुद चेतना में है।
“चेतना में अन्त का मतलब अन्त नहीं, बल्कि अन्त की धारणा का अन्त है। जब तुम्हें यह समझ आ जाता है कि सब चेतना ही है, तो तुम्हें अन्त की ज़रूरत ही नहीं रहती।”
विपश्चित ने सिर झुकाकर कहा – “भगवन्, एक प्रश्न और।”
“पूछो।”
“तो मेरी इस सारी यात्रा का क्या लाभ हुआ?”
ब्रह्मा बोले – “विपश्चित, अगर तुम यह यात्रा न करते, तो कभी न जान पाते। जानने के लिए चलना ज़रूरी था। अब तुम जानते हो, और यह जानकारी तुम्हारी अपनी है।
“और एक बात। तुमने जो देखा, वो भी कोई कम बात नहीं। तुमने हज़ारों लोग, हज़ारों रिवाज और हज़ारों कथाएँ देखीं। यह सब जानकारी तुम्हारे साथ रहेगी।”
विपश्चित ने यह बात स्वीकार की।
फिर विपश्चित का चार रूप एक हो गया, और विपश्चित अपने राज्य लौटे।
और एक बात
ब्रह्मा के सामने विपश्चित ने एक और प्रश्न पूछा।
“भगवन्।”
“बोलो।”
“क्या मेरी पत्नी मुझे याद करती है?”
ब्रह्मा कुछ पल चुप रहे, फिर बोले – “विपश्चित, तुम्हारी पत्नी का देह बहुत बरस पहले चला गया। पर उनकी चेतना है, और वह चेतना तुम्हें याद करती है।”
विपश्चित ठिठककर बोले – “पत्नी का देह?”
“हाँ। तुम बहुत बरस से चल रहे हो, पृथ्वी पर सौ बरस से भी ज़्यादा। पत्नी इतनी देर जीवित नहीं रह सकती थी।”
विपश्चित के भीतर एक हलचल उठी, और बहुत बरस आँखों के आगे घूम गए।
“और मेरे बच्चे?”
“उनका भी देह चला गया। उनके बच्चे भी बूढ़े हो चुके हैं, और उनके बच्चे भी।”
“और मेरा राज्य?”
“राज्य चलता रहा। तुम्हारे वंशज राज करते रहे, पर अब वंश बदल चुका है।”
विपश्चित ने पूछा – “भगवन्, तो मेरा घर?”
“विपश्चित, तुम्हारा घर अब नहीं रहा। पर एक स्तर पर तुम कहीं भी घर बना सकते हो। चेतना का घर देह से बँधा नहीं होता।”
विपश्चित ने हलकी हँसी के साथ पूछा – “भगवन्, मैंने यह यात्रा आख़िर क्यों की?”
“विपश्चित, क्योंकि तुम्हारी प्यास तुम्हें यहाँ तक ले आई। अब तुम जानते हो कि बाहर कोई अन्त नहीं, और अब तुम भीतर देख सकते हो।”
विपश्चित ने पूछा – “भगवन्, क्या मैं अपनी पत्नी की चेतना से मिल सकता हूँ?”
ब्रह्मा बोले – “विपश्चित, ज़रूर मिलो। बस आँखें बन्द करो।”
विपश्चित ने आँखें बन्द कीं और अपनी पत्नी को सोचा, उनका चेहरा, उनकी हँसी।
और भीतर एक हलकी सी हलचल हुई।
“पत्नी?”
“पति।”
विपश्चित ने आँखें खोलीं। ब्रह्मा हँस रहे थे।
ब्रह्मा बोले – “विपश्चित, मिल गए?”
“हाँ, भगवन्।”
“बस। अब तुम जब चाहो मिल सकते हो। बस आँखें बन्द करो।”
विपश्चित ने सिर झुकाकर प्रणाम किया।
रास्ते में
विपश्चित अब अपने राज्य की ओर लौटने लगे, पर एक स्तर पर वो अब पुराने विपश्चित नहीं रहे थे।
रास्ते में उन्होंने एक बहुत छोटा गाँव देखा, कुछ झोंपड़ियाँ और एक नदी।
विपश्चित एक झोंपड़ी के पास रुके, जहाँ एक स्त्री बाहर बैठी अपने बच्चे को दूध पिला रही थी।
स्त्री ने विपश्चित को देखकर कहा – “बैठिए, बाबा।”
विपश्चित बैठ गए और स्त्री ने उन्हें पानी दिया।
स्त्री ने पूछा – “बाबा, कहाँ से आ रहे हैं?”
“बहुत दूर से।”
“कितने दूर से?”
“बस, बहुत दूर से।”
स्त्री बोली – “बाबा, सब कहीं न कहीं से आते हैं, और सब कहीं न कहीं जाते हैं।”
विपश्चित उसकी ओर देखते रहे।
विपश्चित ने कहा – “बेटी, तुम्हारा गाँव छोटा है, पर तुम बड़ी ख़ुश दिख रही हो।”
स्त्री बोली – “बाबा, मैं अपनी जगह पर हूँ। मेरा पति है, मेरा बच्चा है, मेरी झोंपड़ी है, मेरी नदी है। और क्या चाहिए?”
विपश्चित कुछ पल चुप रहकर बोले – “बेटी, तुम्हें कभी और देखने का मन नहीं हुआ? और गाँव, और नगर, और दुनिया?”
स्त्री बोली – “बाबा, मन तो बहुत बार हुआ, पर मैंने कभी जाने का सोचा नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि मेरी जगह यहीं है। और मैंने एक बात सीखी है।”
“क्या?”

“बाबा, जो आप एक जगह नहीं देख सकते, वो आप कहीं भी नहीं देख सकते। और जो आप एक जगह देख सकते हैं, वो आप कहीं भी देख सकते हैं। देखना आँखों का काम नहीं, देखना भीतर का काम है।”
विपश्चित देर तक चुपचाप उसे देखते रहे।
फिर बोले – “बेटी, तुमने मुझे एक बहुत बड़ी बात सिखाई।”
“बाबा, मैंने तो कुछ नहीं सिखाया।”
“नहीं। तुमने सिखाया है।”
विपश्चित ने स्त्री को प्रणाम किया, तो वह हैरान रह गई।
“बाबा, यह क्या?”
“बेटी, तुम मेरी गुरु हो।”
स्त्री हँसकर बोली – “बाबा, मैं तो गाँव की एक साधारण स्त्री हूँ।”
“और मैं बहुत बरस तक एक उत्तर ढूँढता रहा, जो तुमने एक पल में बता दिया।”
विपश्चित कुछ पल रुककर बोले – “बेटी, अगर तुम्हें कभी किसी राजा की मदद चाहिए हो, तो मुझसे कहना।”
“बाबा, आप राजा हैं?”
“बहुत बरस पहले था।”
स्त्री ने सिर हिलाकर कहा – “बाबा, मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
विपश्चित बोले – “बेटी, यह जवाब तो और भी अच्छा है।”
विपश्चित ने स्त्री के बच्चे को देखा, जो माँ की गोद में सो रहा था।
विपश्चित को याद आया कि बहुत बरस पहले उनकी अपनी पत्नी ने भी अपने बच्चों को ऐसे ही दूध पिलाया था।
विपश्चित ने आँखें बन्द कीं और अपनी पत्नी को सोचा।
“पत्नी।”
“पति।”
विपश्चित ने आँखें खोलीं, तो स्त्री हँसकर बोली – “बाबा, सब ठीक है?”
“हाँ, सब ठीक है।”
विपश्चित उठ खड़े हुए और बोले – “बेटी, अब चलूँ।”
“बाबा, जब भी मन हो, आ जाइएगा।”
“शायद आऊँ।”
और विपश्चित आगे चल पड़े।
लौटना
विपश्चित अपने महल में पहुँचे। उनका बेटा अब बूढ़ा हो चुका था और उनके पोते राज्य चला रहे थे। विपश्चित ने अपनी पुरानी कुर्सी देखी, पर वहाँ उन्हें कोई पहचान नहीं रहा था।
तभी एक छोटा बच्चा आया, शायद उनका पड़पोता।
“दादाजी?”
विपश्चित बोले – “बेटे, मैं तुम्हारा परदादा हूँ।”
बच्चे ने हैरानी से देखा – “परदादा? वो तो बहुत बरस पहले चले गए थे।”
“मैं लौट आया हूँ।”
बच्चा अन्दर भाग गया और बहुत से लोग बाहर आ गए, सब चकित।
आख़िर विपश्चित को पहचान लिया गया, और उनके बेटे ने उन्हें गले लगा लिया।
“पिता।”
“बेटा।”
“आप कहाँ थे?”
“बहुत दूर।”
“और क्या मिला?”
विपश्चित बोले – “बेटा, बहुत कुछ मिला, और कुछ भी नहीं मिला। दोनों।”
बेटे ने कहा – “पिता, राज्य आपका है।”
“नहीं, बेटे। राज्य अब तुम्हारा है। मैं तो बस थोड़ी देर यहाँ रहूँगा।”
विपश्चित अपने पुराने महल में कुछ बरस रहे।
उन्होंने राज्य नहीं चलाया, बस अपनी कहानियाँ सुनाते रहे, और लोग हैरान होकर सुनते।
“महाराज, आपने इतनी जगहें देखीं?”
“हाँ।”
“और कहीं अन्त नहीं मिला?”
“नहीं।”
बहुत बरस बाद विपश्चित ने अपने उसी पुराने महल में देह छोड़ा। पर एक बात रह गई – उनकी कहानियाँ बच गईं, और बहुत पीढ़ियों तक लोग कहते रहे – “एक राजा था, विपश्चित। उसने संसार का अन्त ढूँढा, पर उसे अन्त नहीं मिला, क्योंकि संसार का अन्त है ही नहीं।”
राम ने यह सुनकर पूछा – “गुरुदेव, तो हमारे राज्य के पीछे भी?”
“और लोक हैं, राम। हमेशा।”
“और उनके पीछे?”
“और।”
“और उनके पीछे?”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह प्रश्न कभी रुकता नहीं। पर जब तुम्हारे भीतर यह बात बैठ जाएगी कि सब तुम्हारी चेतना के भीतर है, तो यह प्रश्न ख़ुद ही ख़त्म हो जाएगा।”
राम कुछ देर पानी की ओर देखते रहे।
फिर राम ने पूछा – “गुरुदेव, विपश्चित को आख़िर क्या मिला?”
वसिष्ठ बोले – “राम, विपश्चित को एक बात मिली जो किसी और को नहीं मिल सकती थी। उन्हें अनुभव से पता चला कि संसार अनन्त है। यह सुनकर जानना और बात है, पर अनुभव से जानना बहुत बड़ी बात है।
“और दूसरी बात। उन्होंने अपनी मूल जिज्ञासा को सम्मान दिया। बहुत लोग उसे दबा देते हैं, पर विपश्चित ने नहीं दबाया। वो उसका अन्त ढूँढने निकल पड़े, और जो मिला, वो उनका अपना था।”
राम ने यह बात मन में बैठा ली।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण और स्थिति प्रकरण के बिखरे संदर्भों पर आधारित है। विपश्चित की चार-दिशा यात्रा एक प्रसिद्ध दार्शनिक कथा है, जो अनन्तता और चेतना की सीमा-हीनता को दर्शाती है। चार रूप लेकर चारों दिशा में जाना, और सब का एक ही उत्तर लाना, यह कथा की संरचना है। इस कथा को आधुनिक भौतिकी के अनन्त-ब्रह्माण्ड सिद्धान्त के बहुत पुराने पूर्वज के रूप में देखा जा सकता है।
दर्शन-दृष्टि
विपश्चित संसार का अन्त ढूँढने निकलते हैं, चार दिशाओं में। हर दिशा में पहाड़, समुद्र, द्वीप, और लोक मिलते हैं, पर अन्त नहीं। एक दिशा का अन्त दूसरी सृष्टि का आरम्भ निकलता है। आख़िर वो लौटते हैं, इस बोध के साथ कि अन्त बाहर नहीं, अन्त इस प्रश्न में था कि अन्त कहाँ है। कथा यह कहती है कि लोक अनन्त है क्योंकि चेतना अनन्त है, और जो चीज़ चेतना का प्रसार है उसे चेतना ही नाप सकती है, पैर नहीं।
स्वामी विवेकानन्द (1863-1902) ने अपनी Jnana Yoga (1896, व्याख्यान-संग्रह) में बार-बार कहा कि वेदान्त का ब्रह्म कोई बाहरी अनन्त नहीं, वो हमारी अपनी चेतना का असली विस्तार है, और बाहर खोजने वाला उसी को बाहर खोज रहा है जो उसके भीतर है। विपश्चित की चार-दिशा यात्रा इसी का दृश्य रूप है। हर दिशा में जाकर वो एक ही चीज़ पाते हैं, और जो हर जगह मिले वो किसी जगह का नहीं, हर जगह से बड़ा है।