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विपश्चित: चार दिशाएँ, चार अधूरे जागरण

कथा · 15

विपश्चित: चार दिशाएँ, चार अधूरे जागरण

चारों ओर से घिरे एक वृद्ध राजा ने अग्नि में अपना सिर अर्पित किया और चार देहों में लौटे। युद्ध जीतने के बाद वे चार समुद्रों के पार निकल गए। एक ही चेतना ने अलग-अलग सुख, शाप, मृत्यु और जन्म पाए। बहुत समय बाद उन्हीं में से एक राम के क्रीड़ामृग के रूप में वसिष्ठ के सामने आया।

चिदाकाश के एक कोने में ततमिति

श्रीराम ने महर्षि वसिष्ठ से पूछा, “गुरुदेव, अविद्या का विस्तार कितना है? मनुष्य जिस जगत् को सच मानकर उसके भीतर चलता है, उसकी दिशाएँ और दूरियाँ कहाँ तक जाती हैं?” वसिष्ठ ने कहा कि चेतना में उठे हुए संसार का माप किसी एक सीमा पर ठहरता नहीं। इस बात को समझाने के लिए उन्होंने राजा विपश्चित का वृत्तान्त आरम्भ किया।

लोकालोक पर्वत की सुवर्ण शिला के भीतर स्थित चिदाकाश के एक कोने में एक जगत् का अनुभव होता था। उसकी रचना इस जगत् जैसी थी। वहाँ जम्बूद्वीप में ततमिति नाम की समृद्ध नगरी थी। उस नगर के राजा विपश्चित शास्त्रज्ञ, उदार और प्रजापालक थे। ब्राह्मणों तथा विद्वानों का आदर करते, राजकार्य में सावधान रहते और रणभूमि में उनका तेज शत्रुओं को रोक देता था। उनकी उपासना अग्निदेव के प्रति एकनिष्ठ थी। राज्य की चार दिशाओं पर चार समर्थ सामन्त और सेनानायक नियुक्त थे। उनके रहते सीमाएँ सुरक्षित थीं और राजधानी को दूर के संकटों का भार बहुत कम महसूस होता था।

एक समय घटनाएँ इतनी तेजी से बदलीं कि वर्षों से व्यवस्थित रक्षा कुछ ही दिनों में टूटने लगी। पूर्व दिशा के सामन्त को ज्वर हुआ और उनकी मृत्यु हो गई। पूर्व की सीमा खुली देखकर आसपास के शत्रु आगे बढ़े। दक्षिण के सामन्त को पूर्व और दक्षिण दोनों ओर की रक्षा सँभालने भेजा गया। वे रण में मारे गए। पश्चिम के रक्षक ने उन दोनों दिशाओं को छुड़ाने के लिए सेना बढ़ाई, मगर रास्ते में पूर्व और दक्षिण के मित्र राजाओं ने उसे घेर लिया। वे भी युद्ध में गिर पड़े। उत्तर का सेनापति घायल अवस्था में राजधानी पहुँचा। उसके शरीर पर घाव थे और उसके समाचार ने राजसभा को बता दिया कि संकट अब सीमा पर नहीं, नगर के द्वारों तक चला आया है।

चारों दिशाओं की सेनाएँ एक साथ ततमिति की ओर बढ़ रही थीं। राजमन्त्रियों ने उपलब्ध उपायों का विचार किया। साम, दान और भेद के लिए अब समय और अवसर नहीं बचा था। आक्रमणकारी राजाओं ने इस आकस्मिक दुर्बलता को देखकर संधि की सम्भावना छोड़ दी थी। मन्त्रियों ने निवेदन किया कि दण्ड, अर्थात् संगठित सैन्य-बल, ही राज्य की रक्षा कर सकता है। विपश्चित ने उनकी बात ध्यान से सुनी। वृद्धावस्था उनके शरीर पर थी, फिर भी निर्णय में घबराहट नहीं आई। उन्होंने सेना को तैयार रहने की आज्ञा दी और स्वयं उस देवता की शरण में गए जिसकी आराधना जीवन भर करते आए थे।

राजा ने गंगाजल से स्नान किया, स्वच्छ वस्त्र धारण किए और अग्निशाला में प्रवेश किया। बाहर कवच बाँधे जा रहे थे, रथ सज रहे थे और दूत आदेश लेकर निकल रहे थे। भीतर अग्नि की लौ के सामने एक वृद्ध शासक अपने जीवन का लेखा देख रहा था। युद्ध की पहली चोट उसकी देह पर पड़ने से पहले उसके मन में यह स्पष्ट था कि अब सामान्य उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। राज्य को बचाने के लिए उसे अपना बचा हुआ जीवन भी उसी यज्ञ में रखना होगा जिसे वह राजधर्म कहता आया है।

अग्नि के सामने अन्तिम राजकर्म

विपश्चित ने अग्निदेव के समक्ष जीवन भर निभाए गए राजधर्म का लेखा रखा, ताकि अर्पण के समय हर उत्तरदायित्व पूरा दिखाई दे। उन्होंने कहा कि यथाशक्ति प्रजा की रक्षा की, शत्रुओं का सामना किया, विद्वानों और ब्राह्मणों को सम्मान दिया, याचकों को दान दिया, राज्य की सम्पदा बढ़ाई और अपने आश्रितों की चिन्ता रखी। सुख भोगे, युद्ध देखे और वृद्धावस्था तक राजासन का दायित्व निभाया। अब चार दिशाओं से शत्रु आए हैं और उनके चार मुख्य रक्षक मर चुके हैं।

राजा ने अग्नि से प्रार्थना की, “प्रभो, जीवन भर आपकी शरण ली है। आज मेरे पास अर्पित करने के लिए अपना सिर है। इसे स्वीकार कीजिए। मुझे चार ऐसी देहें दीजिए जिनसे मैं चारों दिशाओं में जाकर अपने शत्रुओं को रोक सकूँ। जब भी मैं स्मरण करूँ, आपकी कृपा मेरे साथ रहे।” प्रार्थना के अगले ही क्षण राजा ने तलवार उठाई। उन्होंने अपना सिर काटकर अग्नि में डाल दिया। सिर लौ में गिरा और धड़ भी उसके पीछे अग्निकुण्ड में जा पड़ा।

राजसभा और सेना के लिए वह क्षण राजा की मृत्यु जैसा रहा होगा। अग्नि के भीतर दृश्य बदल चुका था। उसी अग्निकुण्ड से चार पुरुष उठे। चारों का मुख, आयु, कद और तेज एक था। वे युवा, सुदृढ़ और कवच से सुसज्जित थे। हाथों में उत्तम आयुध थे, देहों पर युद्ध के अनुकूल वस्त्र। वे ऐसे दिखाई दिए मानो नारायण की चार भुजाएँ चार पूर्ण पुरुषों के रूप में खड़ी हों, अथवा एक ही विष्णु चार दिशाओं के लिए चार स्वरूपों में सामने आ गए हों। प्रत्येक अपने को विपश्चित जानता था। स्मृति एक ही राजजीवन की थी और सामने चार अलग रणमार्ग थे।

चारों विपश्चितों ने सेना का नेतृत्व सँभाला। पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण की ओर एक-एक राजा निकला। युद्ध में उन्होंने शस्त्रों के साथ अस्त्रों का प्रयोग किया। वायव्य अस्त्र ने शत्रु-पंक्तियों और धूल को उखाड़ दिया, पर्जन्य की शक्ति ने जल बरसाया, और अन्य दिव्य अस्त्रों ने आक्रमणकारी सेनाओं का क्रम तोड़ दिया। ततमिति को घेरने आए राजा परास्त हुए। विपश्चितों ने उन्हें राजधानी से दूर खदेड़ा और पीछा करते हुए चारों समुद्रों के तट तक पहुँच गए।

एक वृद्ध राजा का चार युवा देहों में लौटना युद्ध के प्रसंग को विचित्र चमक देता है। विपश्चित ने चार रूप इसलिए माँगे थे कि चार दिशाओं में टूट चुकी रक्षा एक साथ सँभाली जा सके। अग्नि से मिले शरीर उसी अधूरे राजकर्म को पूरा करने निकले। राजा की पुरानी स्मृति, युद्ध का अभ्यास और प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व चारों में उपस्थित था। इसलिए संकट के समय वे परस्पर आदेश की प्रतीक्षा किए बिना अपनी-अपनी दिशा में उचित निर्णय कर सके। एक जीवन का संचित अभ्यास चार रणक्षेत्रों में एक साथ फलित हुआ।

विजय के बाद भी उन्होंने जीते हुए प्रदेशों को अस्थिर नहीं छोड़ा। सीमाएँ फिर व्यवस्थित की गईं, राज्य-भागों की देखरेख बाँटी गई, योग्य शासक नियुक्त किए गए और प्रजा को हिंसा से बचाने की व्यवस्था हुई। उनकी पहली यात्रा राजधर्म से निकली थी और समुद्र-तट पर पूरी हुई। वहीं खड़े होकर दूसरी यात्रा की इच्छा उठी। सामने फैला जल उन्हें उस प्रश्न की याद दिला रहा था जिसे मन अनेक उत्तर सुनकर भी छोड़ता नहीं: इन समुद्रों के पार क्या है, सात द्वीपों और उनके घेरों के आगे कौन-सा प्रदेश है, और दृश्य जगत् का विस्तार कहाँ तक अनुभव किया जा सकता है?

समुद्रों के पार जाने का वर

चारों समुद्रों के चार तटों पर खड़े विपश्चितों ने अग्निदेव का स्मरण किया। उनका नया निवेदन युद्ध की आवश्यकता से अलग था। वे दृश्य संसार की सीमा स्वयं देखना चाहते थे। उन्होंने कहा कि जहाँ स्थूल देह जा सकती है, वहाँ वे इसी देह से जाएँ; जहाँ सामान्य देह रुक जाए, वहाँ मन्त्र से संस्कारित देह सहारा दे; जहाँ वह भी समर्थ न हो, वहाँ मन की गति से आगे बढ़ें। सिद्ध योगी जितनी दूर बिना आकस्मिक मृत्यु के जा सकते हैं, उतनी दूर देखने की सामर्थ्य उन्हें भी मिले।

अग्निदेव ने वर स्वीकार किया। फिर भी चारों उसी समय जल में नहीं उतरे। वे पहले अपने-अपने प्रशासनिक दायित्व पूरे करने लौटे। मन्त्रियों को कार्य बाँटे, सीमाओं की सुरक्षा निश्चित की और राजपरिवार को व्यवस्था समझाई। पत्नियाँ, पुत्र, परिजन और आश्रित उन्हें रोकना चाहते थे। युद्ध के बाद जीवित लौटे राजा को फिर अनजाने समुद्र में जाते देखना उनके लिए कठिन था। विपश्चितों के भीतर अब राज्य, परिवार और सम्पत्ति के प्रति वह आग्रह शिथिल हो चुका था जो यात्रा को रोक देता। उन्होंने सबको आश्वस्त किया कि व्यवस्था सुरक्षित है और जगत् का विस्तार देखकर लौटने का उनका संकल्प दृढ़ है।

चारों ने अपनी दिशा ग्रहण की। अग्नि-मन्त्र से उन्हें पाँचों भूतों पर ऐसी धारणा मिली कि जल ने उनके पाँव नहीं डुबोए। वे समुद्र की तरंगों पर उसी प्रकार चले जैसे भूमि पर चलते थे। कहीं नाव नहीं थी, साथ में कोई नाविक, सैनिक या पथदर्शक नहीं था। एक ही राजा की स्मृति लिए चार अकेले यात्री पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण की जलराशियों पर दूर होते गए।

यात्रा आरम्भ होते ही चारों के अनुभव अलग होने लगे। एक देह के सामने जो प्राणी आया, दूसरी देह ने उसे नहीं देखा। एक दिशा का आकर्षण दूसरे मन-वृत्त में नहीं उठा। एक को मिले शाप का भार दूसरे ने अनुभव नहीं किया। आरम्भ में चारों के पास समान स्मृति और समान संकल्प था, मगर प्रत्येक क्षण की संगति अपना नया संस्कार जोड़ रही थी। यही भेद आगे चलकर इतना गहरा हुआ कि एक रूप मुक्ति तक पहुँचा, एक दूर द्वीप में राज्य करता रहा, एक ब्रह्माण्डीय आवरणों के पार भटकता रहा और एक की चेतना मृग-देह में आ गई।

चार यात्राएँ, बदलती देहें

पश्चिम की ओर गए विपश्चित को समुद्र में एक विशाल मछली ने निगल लिया। वह मत्स्य-वंश का इतना बड़ा जीव था कि राजा का पूरा शरीर उसके भीतर चला गया। अग्नि के वर से सुरक्षित देह उसके लिए अपाच्य रही। बहुत समय तक असह्य भार से व्याकुल रहने के बाद उसने विपश्चित को क्षीरसागर में उगल दिया। राजा ने बाहर आकर यात्रा फिर आरम्भ कर दी। आगे कुशद्वीप में एक प्रसंग ऐसा आया जब गरुड़ उन्हें समुद्रों के पार ले गए। जिन जलराशियों को साधारण जीव की आयु भी पार न कर सके, वहाँ देवपक्षी की गति ने एक नया मार्ग खोल दिया।

दक्षिण की ओर गए विपश्चित इक्षुरस-सागर तक पहुँचे। उसके तट के नगर में मायावी विद्या जानने वाली एक यक्षिणी रहती थी। उसने राजा को अपने आकर्षण में बाँध लिया और वे उसके प्रेमी के रूप में रहने लगे। आगे शाकद्वीप में दक्ष के शाप से उनका रूप यक्ष का हो गया। इस अवस्था से तत्काल छुटकारा नहीं मिला। एक सौ वर्ष पूरे होने पर शाप निवृत्त हुआ और उनकी यात्रा फिर चल सकी। संसार देखने निकला हुआ पुरुष कभी विजेता था, कभी किसी के प्रेम में ठहरा, कभी शापित यक्ष बनकर अपने ही पिछले संकल्प की प्रतीक्षा करता रहा।

पूर्व की ओर गए विपश्चित गंगा के मुहाने पर एक मगर से भिड़े। उन्होंने उसका पेट चीर दिया, मगर नदी का प्रबल प्रवाह उन्हें बहाकर कन्यकुब्ज की ओर ले गया। वहाँ से निकलकर वे क्रौञ्चद्वीप के एक पर्वतीय प्रदेश में पहुँचे। एक राक्षस उन्हें निगल गया। राजा ने भीतर से उसकी आँतें और वक्ष काटकर बाहर आने का रास्ता बनाया। कहीं उनकी अग्नि-साधना देह बचा रही थी, कहीं युद्ध-कौशल। इस यात्रा में कोई एक स्थिर महापुरुष-रूप नहीं रहा। परिस्थितियाँ उन्हें निगलतीं, बहातीं और रोकतीं, फिर शेष इच्छा उन्हें अगली भूमि की ओर ले जाती।

उत्तर की ओर गए विपश्चित उत्तरकुरु पहुँचे और उमा-महेश्वर की आराधना की। उन्हें अणिमा आदि सिद्धियाँ मिलीं। जल में मगरों और जलहस्तियों ने उन्हें कई बार निगला और बाहर किया। सिद्धि के कारण देह नष्ट नहीं हुई। आगे वे मधुर-जल वाले समुद्र और सुवर्णभूमि तक पहुँचे। वहाँ एक सिद्ध ने किसी प्रसंग में उन्हें पत्थर हो जाने का शाप दिया। राजा की गतिशील यात्रा एक शिला की निश्चेष्ट अवस्था में रुक गई। एक सौ वर्ष बाद उसी सिद्ध ने अग्नि की कृपा से उन्हें मुक्त किया। विपश्चित फिर चल पड़े, जैसे एक शताब्दी का स्थैर्य उनके लिए मार्ग का लम्बा विराम भर हो।

इन यात्राओं का विस्तार युद्ध और संकट तक सीमित नहीं रहा। एक विपश्चित नारियल उगाने वाले देश में आठ वर्ष तक राजा रहे और वहीं के नारियलों पर उनका निर्वाह हुआ। एक ने मेरु के उत्तर में कल्पवृक्षों के वन में एक अप्सरा के साथ दस वर्ष बिताए। किसी ने क्षीरसागर के तट पर देवियों और अप्सराओं के बीच कामना के वश होकर सत्तर वर्ष बिताए। यात्रा के आरम्भ में जिस व्यक्ति ने पत्नी, पुत्र और राज्य के प्रति आसक्ति शिथिल की थी, वही नई भूमि, नई संगति और नई देह के भीतर फिर मोह ग्रहण कर रहा था। पुराना त्याग हर आगामी आकर्षण से स्वतः रक्षा नहीं करता। संस्कार का बीज उचित परिस्थिति पाकर फिर अंकुरित हो जाता है।

एक विपश्चित शाल्मली के विशाल वृक्ष पर रहने वाली पक्षिणी के घोंसले में कई वर्ष रहा। उसके अनुभव का स्तर उस पक्षी-संगति के अनुरूप हो गया। मन्दर पर्वत की लता-कुञ्ज में मन्दरी नाम की किन्नरी ने एक दिन किसी विपश्चित की सेवा की। एक दिन, आठ वर्ष, दस वर्ष, सत्तर वर्ष और एक सौ वर्ष, प्रत्येक अवधि अपने अनुभव में पूरी थी। चारों की आरम्भिक घड़ी एक साथ चली थी, अब उनकी समय-धाराएँ अपने-अपने प्रदेशों के साथ फैल रही थीं।

इन रूपान्तरणों में राजा कभी मनुष्य रहे, कभी शाप और संगति से दूसरे रूपों में पहुँचे, कभी देवताओं के लोक तक गए। अग्नि का वर उन्हें सामान्य यात्रा की सीमा से आगे ले जा रहा था। उसने उनकी जिज्ञासा समाप्त नहीं की थी। हर नए द्वीप और समुद्र के बाद आगे का क्षेत्र दिखाई देता। हर उपलब्धि के बाद मन पूछता कि इसके पार क्या है। वे जितना देखते, दृश्य का विस्तार उतना ही नई दिशा खोल देता।

श्रीराम ने यहाँ एक कठिन प्रश्न रखा। चारों विपश्चितों की चेतना यदि एक थी, तो उनकी इच्छा और कर्म अलग कैसे हुए? एक ही व्यक्ति एक दिशा में यक्षिणी के वश रह सकता है, दूसरी में उमा-महेश्वर की उपासना कर सकता है, तीसरी में नारियल-देश का राजा और चौथी में पक्षिणी का साथी कैसे बन सकता है? यदि चेतना सचमुच एक है, तो अनुभवों का यह विरोध और भेद किसके भीतर आता है?

एक संवित्, अलग-अलग वासनाएँ

वसिष्ठ ने समझाया कि स्वप्न में एक चित्त पूरा नगर, अनेक मनुष्य और उनके अलग व्यवहार उपस्थित कर देता है। स्वप्न के भीतर प्रत्येक पात्र अपने सामने की वस्तु से सम्बन्ध बनाता है। एक ही चेतना में उठे होने पर भी घटनाएँ अपनी स्थानीय संगति के अनुसार चलती हैं। विपश्चित की चार देहों में मूल संवित् एक थी। प्रत्येक देह ने अपनी दिशा के देश, काल, जीव, स्मृति और कर्म को सामने पाया। जिस विषय से बार-बार सम्बन्ध हुआ, उसी के अनुसार उसकी वासना पुष्ट हुई।

इस भिन्नता को समझने के लिए चार स्वतंत्र आत्माओं की कल्पना आवश्यक नहीं। एक आकाश अलग-अलग पात्रों के भीतर घटाकाश जैसा दिखाई देता है। पात्र का आकार बदलते ही उसके भीतर दिखाई देने वाले आकाश की रूपरेखा भी बदलती है। चेतना के स्तर पर विभाजन नहीं आता, अनुभव के स्तर पर देह और परिस्थिति की मर्यादा काम करती है। पश्चिम के सामने मछली थी, दक्षिण के सामने यक्षिणी, पूर्व के सामने गंगा का प्रवाह और उत्तर के सामने शाप देने वाला सिद्ध। प्रत्येक धारा ने अपने सामने उपस्थित सम्बन्ध को अपना वर्तमान माना।

राम को यह भी जानना था कि अग्नि से वर पाए और सिद्धियों में समर्थ ये पुरुष दुःख तथा मृत्यु के अधीन क्यों रहे। वसिष्ठ ने कहा कि धारणा की शक्ति और आत्मज्ञान का पूर्ण उदय एक वस्तु नहीं हैं। विपश्चितों का चित्त साधना से समर्थ था। अग्नि-मन्त्र ने उन्हें पाँच भूतों पर अधिकार और असाधारण यात्रा-शक्ति दी। उनके भीतर दृश्य जगत् की सीमा जानने की वासना अभी प्रबल थी। उस वासना में ज्ञाता, यात्रा और देखने योग्य जगत् का भेद बना रहा। जहाँ भेद का आग्रह रहता है, वहाँ सुख, भय, आकर्षण, शाप और मृत्यु के संस्कार अपना फल दे सकते हैं।

चारों को कुछ बोध था, इसलिए वे सामान्य राजाओं की सीमा से आगे गए। पूर्ण जागरण अभी दूर था, इसलिए नई अवस्थाओं को सत्य मानकर उनमें टिकते भी रहे। किसी देवता की कृपा से मिली सिद्धि देह को मछली के पेट में बचा सकती थी, चित्त को कामना से मुक्त करना उसके अधिकार में नहीं था। किसी शाप से सौ वर्ष पत्थर बने रहना बाहरी गतिहीनता थी; भीतर संसार देखने की वृत्ति अपना समय पूरा होने की प्रतीक्षा करती रही।

वसिष्ठ का उत्तर चार यात्राओं को एक सूत्र में रखता है। संवित् की एकता अनुभवों को एक जैसा नहीं बनाती। वासना, कर्म, स्थान और समय एक ही प्रकाश में अलग चित्र उठाते हैं। जब तक चित्रों को जानने वाला अपने को किसी विशेष चित्र की देह और कथा मानता है, उसके लिए उस कथा के सुख-दुःख वास्तविक अनुक्रम बन जाते हैं। विपश्चितों की आगे की मृत्यु और गति इसी नियम को अधिक स्पष्ट करती है।

प्रत्येक रूप अपने सामने खुलते जगत् में इतना गहरा उतरता गया कि वही वर्तमान उसकी पूरी परिस्थिति बन गया। साझा आरम्भ स्मृति में रहा, मगर नई देह-अवस्था ने अपने अनुकूल भय, सुख और समय का बोध रचा। सौ वर्ष का शाप सहने वाला और एक दिन किन्नरी की सेवा पाने वाला अपनी-अपनी धारा में अनुभव के अलग काल से गुजरा।

चार मृत्यु, चार असमान परिणाम

अत्यन्त लम्बी यात्राओं के बीच चारों स्थूल देहें अलग ढंग से समाप्त हुईं। एक विपश्चित क्रौञ्चद्वीप की सीमा के पश्चिमी भाग में एक हाथी के सामने पड़ा। हाथी ने उसे शिला से दबाया और देह कुचल गई। दूसरे को एक राक्षस उठाकर बड़वानल तक ले गया, जहाँ समुद्र के भीतर की अग्नि में वह जल गया। तीसरे को एक विद्याधर इन्द्र की सभा में ले गया। वहाँ उसने इन्द्र को प्रणाम नहीं किया। इन्द्र के शाप से उसका शरीर राख हो गया। चौथे को कुशद्वीप की सीमा पर नदी के निकट एक मगर ने पकड़कर आठ टुकड़ों में फाड़ दिया।

इन चार मृत्युओं के बाद भी परिणाम समान नहीं हुआ। देह टूट गई, मगर जिस चेतना में दूर तक देखने की वासना शेष थी, उसने उसी अनुरूप अगली अवस्था ग्रहण की। एक ने ज्ञान पाकर निर्वाण पाया, एक दूर द्वीप में शासन करता रहा, एक चन्द्रलोक और मृग-भाव से जुड़ा, और एक ब्रह्माण्ड के आवरणों के पार अपनी खोज में बढ़ता रहा।

एक विपश्चित सात द्वीपों और सात समुद्रों को पार करके घनी भूमि और फिर सुवर्णभूमि तक पहुँचा। वहाँ जनार्दन के दर्शन हुए। उनके उपदेश से उसे ब्रह्मविद्या मिली। पाँच वर्ष तक वह समाधि में स्थित रहा। संसार के विस्तार को बाहर खोजने वाली वृत्ति ज्ञान में शान्त हुई। उसने देह छोड़ दी और निर्वाण प्राप्त किया। चारों में यह वह धारा थी जिसमें यात्रा ने अपने वास्तविक विश्राम को पाया।

एक अन्य विपश्चित ने पूर्णिमा के चन्द्रमा के समीप अपने शरीर को रखकर चन्द्रभाव की धारणा की। पुरानी देह समाप्त हुई तो उसका चित्त चन्द्रमा के साथ सम्बद्ध हो गया। चन्द्रलोक के मृग के प्रति आसक्ति उठी। आगे चलकर उसने उन अवस्थाओं को छोड़ा और पर्वत की एक गुफा में मृग के रूप में जन्म लिया। राजदेह से निकली जिज्ञासा चन्द्रमा और मृग की वासना से गुजरकर एक ऐसे पशु-जीवन में पहुँच गई जिसकी पहचान बहुत समय बाद अयोध्या की सभा में खुलनी थी।

एक विपश्चित शाल्मलीद्वीप गया। उसने वहाँ के विरोधी बलों को परास्त किया और राज्य सँभाल लिया। वसिष्ठ ने राम को बताया कि वह उस समय भी वहीं शासन कर रहा है। दूर संसारों को जानने निकला राजा एक और राज्य की व्यवस्था में टिक गया। उसका राजकर्म समाप्त नहीं हुआ था; उसका स्थान और काल बदल गया था।

एक विपश्चित सातवें मधुर-जल सागर तक पहुँचा। वहाँ एक मगर ने उसे निगल लिया। वह उसके पेट में एक हजार वर्ष तक रहा और जीवित रहने के लिए उसी का मांस खाता रहा। मगर की मृत्यु पर बाहर निकला। आगे अस्सी हजार योजन चौड़ी घनी भूमि मिली, फिर दस हजार योजन विस्तार वाला सुवर्ण प्रदेश। इन दूरियों को पार करके वह देवों के बीच पहुँचा और वहाँ उसकी देह समाप्त हुई। उसे देवशरीर मिला। वह लोकालोक पर्वत पर चढ़ा और ब्रह्माण्ड के क्रमिक आवरणों के पार जाता रहा। स्थूल देह के बाद मनोमय अथवा सूक्ष्म देह उसकी गति का साधन बनी।

उस यात्री के सामने कोई अंतिम किनारा स्थिर नहीं हुआ। पृथ्वी के बाद जल, जल के बाद तेज, फिर वायु, आकाश और अधिक सूक्ष्म आवरणों की कल्पना खुलती गई। देखने की इच्छा ने हर सीमा के पार अगला दृश्य उपस्थित किया। वसिष्ठ ने कहा कि वह दीर्घ काल तक अलग-अलग जगतों में घूमता रहा। उसे पूर्ण ज्ञान नहीं हुआ था, इसलिए यात्रा की शक्ति मुक्ति में परिणत नहीं हुई। एक अन्य शेष धारा भी इसी प्रकार बाहरी विस्तारों और ब्रह्माण्डीय परतों में अपनी संस्कारगत खोज जारी रखती रही।

चार देहों की आरम्भिक समानता अब चार स्पष्ट परिणामों में खुल चुकी थी। एक को जनार्दन से ब्रह्मविद्या मिली और निर्वाण हुआ। एक शाल्मलीद्वीप में राज्य करता रहा। एक की धारा सूक्ष्म लोकों और आवरणों में चलती रही। एक चन्द्र-संबन्ध से गुजरकर मृग बना। वसिष्ठ का आरम्भिक कथन अब स्पष्ट होता है: अविद्या की अवधि नक्शे के आखिरी बिन्दु से भी आगे नए देश, काल और देह रचती जाती है। जिस वासना से दृश्य पूछा जाता है, वही नए देश, काल और देह के रूप में उसकी अवधि बढ़ाती है।

राजसभा का चितकबरा मृग

राम ने मृग का उल्लेख सुनते ही पूछा, “गुरुदेव, वह मृग अब कहाँ है?” वसिष्ठ ने दूर किसी पर्वत या अदृश्य लोक की ओर संकेत नहीं किया। उन्होंने बताया कि त्रिगर्त के राजा ने राम को जो सुन्दर क्रीड़ामृग भेंट किया है, वही उस विपश्चित की वर्तमान देह है। वह अयोध्या में राम के मृगागार में रहता है। जिन समुद्रों, द्वीपों, लोकों और आवरणों को खोजते हुए अनगिनत काल बीत गए, उनकी स्मृति उस समय एक चितकबरे पशु की चेतना में ढकी हुई थी।

राम ने सेवकों और बालकों को मृग लाने की आज्ञा दी। थोड़ी देर में एक पुष्ट, चपल और चितकबरा मृग सभा में लाया गया। उसकी आँखें चारों ओर घूम रही थीं। राजाओं, ऋषियों और सभासदों के बीच उसे अपने पूर्व जीवन का कोई स्पष्ट बोध दिखाई नहीं देता था। वह उसी क्षण के पशु-संस्कार से परिचालित था। वसिष्ठ ने राम से कहा कि सोने का मैल अग्नि में अलग होता है। विपश्चित की पुरानी उपासना का आश्रय भी अग्नि थी। उसी के माध्यम से इस मृग-भाव का आवरण हट सकता है।

महर्षि ने कमण्डलु से जल लेकर आचमन किया और चित्त को समाधि में स्थिर किया। सभा के बीच बिना लकड़ी, घी या किसी दिखते ईंधन के अग्नि प्रकट हुई। उसकी लौ धुएँ से रहित थी। दरबार के लोग विस्मय से देखते रहे। वसिष्ठ ने अग्निदेव का स्मरण करके कहा, “इस जीव की पूर्व भक्ति को याद कीजिए। यह आपका उपासक विपश्चित है। इसके मृग-भाव को दूर करके इसे वही पूर्व राजरूप दीजिए।”

मृग लौ को देखकर एक बार पीछे उछला। पशु का सहज भय उसके पैरों में आया। अगले ही क्षण वह मुड़ा और बाण की गति से अग्नि में प्रवेश कर गया। सभा के बीच उठी लौ ने उसे ढक लिया। भीतर चितकबरी देह का आकार बदलने लगा। अग्नि के तेज में एक स्वर्णवर्ण पुरुष दिखाई दिया। पशुरूप लुप्त हुआ और अग्नि भी शान्त हो गई। जहाँ मृग खड़ा था, वहाँ विपश्चित के पुराने राजसी आकार वाला एक तेजस्वी मनुष्य उपस्थित था।

अग्नि से लौटा भास

अग्नि से निकले उस पुरुष के वस्त्र स्वच्छ थे। गले में रुद्राक्ष की माला और देह पर सुवर्ण यज्ञोपवीत शोभित था। मुख शान्त था और उसका तेज इतना स्पष्ट कि सभा से विस्मय की ध्वनि उठी, “अहो, कैसी अद्भुत भा है।” उसी भा, उसी दीप्ति के कारण उसे भास कहा गया। यह नाम उसकी लम्बी यात्रा का नया आरम्भ था, किसी नई राजकीय विजय का घोष नहीं।

भास ने वहीं बैठकर मन एकाग्र किया। दो घड़ी की समाधि में पूर्व जन्मों और अवस्थाओं का क्रम स्मृति में लौट आया। ततमिति का राज्य, चार दिशाओं का आक्रमण, अग्नि में सिर का अर्पण, चार देहें, समुद्रों के पार के देश, शाप, मृत्यु, चन्द्र-संबन्ध और मृग-जीवन, सब एक चेतना के भीतर जुड़े हुए दिखाई दिए। जिस मृग को सभा में लाया गया था, उसकी दृष्टि में इनमें से कुछ भी जागा हुआ नहीं था। स्मृति खुलते ही भास समझ सका कि कितने रूप अपने समय में पूर्ण जीवन लगते रहे हैं।

वह उठकर वसिष्ठ के चरणों में झुका। महर्षि ने कहा कि बहुत लम्बे समय के बाद उसकी अविद्या का क्षय हो। इस आशीर्वाद में उसकी असाधारण यात्राओं की प्रशंसा से अधिक एक शेष साधना का संकेत था। संसारों का विस्तार देखने, सिद्धियाँ पाने और अनेक देहों से गुजरने के बाद भी आत्मज्ञान का कार्य पूरा होना था।

भास ने राम को प्रणाम किया और उनकी जय कही। राजा दशरथ ने उसका आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने कहा कि वह आसन ग्रहण करे और विश्राम पाए। भास ने विश्वामित्र तथा सभा के अन्य ऋषियों को भी प्रणाम किया और उनके बीच बैठ गया। चार समुद्रों पर चार दिशाओं में अकेला चल पड़ा राजा अब अयोध्या की सभा में शिष्य और अतिथि की विनम्रता से बैठा था।

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