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शम्बर का मायानगर: दाम, व्याल और कट की उत्पत्ति

कथा · 33

शम्बर का मायानगर: दाम, व्याल और कट की उत्पत्ति

दैत्यराज शम्बर जब सोता या किसी दूसरे लोक में जाता, देवता उसकी सेना के सेनानायकों का वध कर देते थे। बार-बार की विफलता के बाद उसने तीन ऐसे विशाल रक्षक रचे, जिनका न कोई पूर्वजन्म था, न संचित वासना।

श्रीराम ने तीन नामों का अर्थ पूछा

वसिष्ठ ने श्रीराम को दाम, व्याल और कट की अवस्था से बचने तथा भीम और भास की शोकमुक्त स्थिति प्राप्त करने की शिक्षा दी। श्रीराम ने दोनों पदों को उनके इतिहास के साथ समझाने की प्रार्थना की।

वसिष्ठ ने कहा, “पहले दाम, व्याल और कट की उत्पत्ति सुनिए।”

कथा पाताल की आश्चर्यमयी गहराइयों में आरम्भ हुई। वहाँ दैत्यराज शम्बर रहता था। वह माया की विद्या में इतना समर्थ था कि उसका संकल्प भवन, उद्यान, जीव, आकाशीय प्रकाश और सेना का दृश्य रूप ले लेता था।

आकाश में रचा हुआ नगर

शम्बर ने आकाश में एक नगर रचा। उसमें देवताओं के मन्दिर बने और कृत्रिम सूर्य तथा चन्द्रमा उसे प्रकाश देने लगे। रत्नों से चमकते भवनों में अपार सम्पत्ति थी। रत्नों के समान सुन्दर स्त्रियों का गायन अप्सराओं की कला को चुनौती देता था।

उसके उद्यानों में वे वस्तुएँ साथ दिखाई देती थीं, जिन्हें सामान्य ऋतुएँ अलग रखती हैं। चन्द्रमा जैसे फल हर ऋतु के फूलों के बीच लटके थे। नीले कमलों के साथ स्वर्णकमल और स्वर्णिम सारस दिखाई देते थे। रत्नों से बने हंस जल में खड़े थे और सोने की शाखाओं पर कमल की कलियाँ लगी थीं। मन्दार के फूल हवा से झरते रहते थे।

उसके उद्यान भवन में ठण्डे और गरम स्नानागार थे, और ऋतु के अनुसार शीतल कक्ष तथा अग्निकुण्ड बने थे। उसकी माया ने चन्दन के वृक्षों की पंक्तियाँ लगाई थीं, जिन पर सर्प लिपटे थे। आँगनों में घुटनों तक फूल भरे रहते और अन्तःपुर में घूमता रत्नप्रकाश तारों जैसा लगता था।

पाताल का रात्रि-आकाश सौ चन्द्रमाओं से भरा जान पड़ता था। शम्बर अपने इष्टदेव के सामने युद्धगीत गाता था। शम्बर के बनाए हाथियों का वैभव देवताओं के गजों, यहाँ तक कि इन्द्र के ऐरावत के गर्व को भी चुनौती देता था।

नगर के भीतर और बाहर तीनों लोकों की दुर्लभ सम्पदा एकत्र थी। दैत्य सामन्त शम्बर की आज्ञा के आगे झुकते थे। उसकी सेना ऐसे राजा की छाया में रहती थी, जो हर हानि की जगह माया से नया रूप खड़ा कर सकता था।

देवताओं के बार-बार आक्रमण

देवताओं ने इस वैभव की एक व्यावहारिक सीमा पहचान ली। शम्बर जब सोता या किसी दूसरी जगह जाता, वे उसकी सेना पर टूट पड़ते थे।

इससे क्रुद्ध होकर शम्बर ने वृक्ष तोड़ डाले और अपनी सेना की रक्षा के लिए सेनानायक नियुक्त किए। उन्हें उसकी अनुपस्थिति में पूरी शक्ति की रक्षा करनी थी। देवताओं ने फिर अवसर की प्रतीक्षा की और एक एक करके उनका वध कर दिया।

शम्बर ने दूसरे उग्र सेनापति बनाए और नियुक्त किए। हर नया नायक सेना को सम्भालने योग्य दिखाई देता। देवता उसकी चाल समझते और दैत्यराज के बाहर जाते ही उसे मार देते।

लगातार होती हानि से शम्बर क्रुद्ध हो उठा। वह अपने शत्रुओं का पीछा करता हुआ स्वर्ग से भी ऊपर उनके स्थान तक जा पहुँचा। उसके भय से देवता अपने लोक से ऐसे भागे, जैसे शिव और गौरी के वृषभ को देखकर डरपोक हिरन घनी झाड़ियों में भाग जाते हैं।

शम्बर उन्हें खोजता हुआ देवताओं के स्वर्गलोक में घुसा। नगर लगभग खाली था। छोटे देवता विलाप कर रहे थे और अप्सराएँ रो रही थीं। उसने बहुमूल्य वस्तुएँ ले लीं, लोकपालों के नगर जला दिए और अपने लोक लौट गया।

उस आक्रमण ने शम्बर की शक्ति दिखाई, पर सेना की समस्या बनी रही। देवता छिपे रहते। वह किसी सेनानायक को नियुक्त करके दूसरी ओर जाता तो वे निकलते, नए रक्षक को मारते और फिर अदृश्य हो जाते।

शम्बर ने तीनों लोकों में उन्हें खोजा और बहुत खोज के बाद उनके छिपने का स्थान पा लिया। उसकी शक्ति, सम्पत्ति और माया उस समय के लिए विश्वसनीय सेनापति नहीं दे पा रही थीं, जब उसकी अपनी दृष्टि सेना पर नहीं होती थी।

शम्बर ने उपाय बदला

पहले सेनानायकों के साथ पुराने संस्कार आए थे। वे चोट और जीवनरक्षा, लाभ और हानि जानते थे। यही इतिहास साहस दे सकता था और यही संकोच, भय तथा निजी बचाव की गणना भी पैदा कर सकता था।

शम्बर ने निजी इतिहास बनने से पहले ही योद्धा रचने का निश्चय किया। माया से उसने तीन अत्यन्त विशाल और भयंकर दैत्य उत्पन्न किए। वे अपनी विशाल देहों के साथ पुराने उड़ते पर्वतों की तरह आकाश में उठे और साक्षात् मृत्यु जैसे भयंकर दिखाई देते थे।

उसने उनके नाम दाम, व्याल और कट रखे। नामों में ही उनके कार्य रखे गए। दाम जाल की तरह शत्रु को फँसाएगा। व्याल सर्प की भाँति उन्हें लपेट लेगा। कट चटाई की तरह उन्हें ढककर बाँध लेगा।

तीनों का कोई पूर्वजन्म नहीं था। पुराने कर्म ने उनके लिए कोई निजी इतिहास नहीं बनाया था और संचित वासना ने चाह तथा बचाव का कोई स्थायी ढंग नहीं रचा था।

निजी पहचान से पहले का कर्म

वसिष्ठ ने बताया कि वे मनुष्यों की तरह पूर्वकर्मों के बीज से ठोस और स्थूल देह लेकर नहीं जन्मे थे। वे कृत्रिम शक्तियाँ और वायु जैसे रूप थे, शम्बर के मन में उठी छवियों की प्रतिकृतियाँ।

इसी अवस्था ने उन्हें आरम्भ में प्रबल बनाया। जीवन का मोह रखने वाला योद्धा उसके छिनने की कल्पना करता है। विजय से आसक्त योद्धा पराजय की आशंका करता है। नए सेनानायकों के भीतर विचार की ये दोनों शृंखलाएँ अनुपस्थित थीं।

दैत्यराज का विश्वास

शम्बर ने तीनों रक्षकों को देखा और बहुत प्रसन्न हुआ। उसे लगा कि देवताओं द्वारा पहचानी गई दुर्बलता अब दूर हो गई है। ये सेनानायक पिछली हार की स्मृति और बचाए जाने वाले निजी भविष्य के बिना अपने स्थान पर डटे रहेंगे।

उसने उनकी रक्षा में अपनी सेना को मेरु की स्वर्णशिला की तरह अचल देखा। दिशाओं के हाथियों के दाँत भी उस शिला को हिला नहीं सकेंगे, ऐसा उसे विश्वास था।

वसिष्ठ ने कथा के इस भाग को शम्बर के इसी विश्वास पर समाप्त किया। दाम, व्याल और कट रचे जा चुके थे, उनके नाम और कार्य निश्चित हो गए थे और शम्बर ने उन्हें तुरन्त सेनाओं के आगे देवताओं का नाश करने भेज दिया। वे भय, महत्त्वाकांक्षा तथा संशय के बिना शम्बर की इच्छा पर चलते थे।

युद्ध अब आरम्भ होने वाला था। वसिष्ठ ने पहले श्रीराम को वह ठीक अवस्था दिखा दी, जिसमें तीनों युद्ध में उतरेंगे: कर्म उपस्थित था, चैतन्य उपस्थित था और इन दोनों के चारों ओर निजी इतिहास अभी नहीं बना था।