कुंददंत के सौ प्रश्न

कथा · 35

कुंददंत के सौ प्रश्न

ऋषि के पास सौ सवाल थे, हर एक गहरा। वसिष्ठ जी ने कहा – “मैं तीनों के तीनों एक उत्तर से दे दूँगा।” फिर कुछ ऐसा कहा कि एक भी नहीं पूछा गया।

ऋषि कुंददंत बहुत विद्वान थे। शास्त्र पढ़े थे। तर्क करते थे। मगर उनका मन शांत नहीं था।

उनके पास सौ प्रश्न थे। हर एक लंबा। हर एक गूढ़।

“आत्मा क्या है?”

“आत्मा शरीर में कहाँ रहती है?”

“मरने पर कहाँ जाती है?”

“माया कब शुरू हुई?”

“मुक्ति का असली अर्थ क्या है?”

“ज्ञान बाहर से आता है या भीतर से?”

एक के बाद एक। सौ प्रश्न।

उन्होंने अपने प्रश्न लिखे। एक पुराने ताड़पत्र पर। फिर ऋषियों के पास गए।

हर ऋषि कोशिश करते। एक-दो प्रश्नों का जवाब देते। मगर सौ का नहीं हो पाता। और हर जवाब से कुंददंत के मन में और प्रश्न उठते।

एक दिन उन्हें बताया गया – “वसिष्ठ जी से पूछो। वो सब जानते हैं।”

कुंददंत हिमालय गए। वसिष्ठ जी की कुटिया में पहुँचे।

“महाराज, मेरे पास सौ प्रश्न हैं। आप सबका उत्तर दें।”

वसिष्ठ जी ने पूछा, “सौ?”

“हाँ। मैंने लिख रखे हैं।”

वसिष्ठ जी ने ताड़पत्र देखा।

“ठीक है। मैं तुम्हें एक उत्तर से सबका जवाब दूँगा।”

कुंददंत ने हँसा। “महाराज, यह कैसे हो सकता है? सौ अलग प्रश्न हैं। हर एक का अपना उत्तर होना चाहिए।”

“यह तुम्हारी समझ है। सुनो।”

वसिष्ठ जी कुछ देर चुप रहे। फिर बोले।

“मन।”

कुंददंत ने आँखें ऊपर उठाईं। “क्या?”

“मन। यह उत्तर है।”

“मगर…”

वसिष्ठ जी ने कहा, “तुम्हारा हर प्रश्न मन में उठता है। ‘आत्मा क्या है?’ – यह प्रश्न मन का है। ‘मरने पर कहाँ जाती है?’ – मन का। ‘माया कब शुरू हुई?’ – मन का।

“और हर उत्तर – जो भी मैं दूँ – तुम्हारे मन में पकड़ेगा। मन ही सुनेगा, मन ही समझेगा, मन ही फिर अगला प्रश्न उठाएगा।

“प्रश्न मन है। उत्तर मन है। पूछने वाला मन है। सुनने वाला मन है।

“मन ख़ुद से सवाल पूछता है, ख़ुद को जवाब देता है, और फिर ख़ुद से असंतुष्ट रहता है।”

कुंददंत रुक गए।

“तो उपाय क्या है?”

“मन को रोको।”

“कैसे?”

“पहले देखो कि तुम मन नहीं हो। तुम वो हो जो मन को देख रहा है। फिर मन अपने आप शांत हो जाता है।”

कुंददंत ने ताड़पत्र देखा। पहला प्रश्न पढ़ने लगे – “आत्मा क्या है?”

उनके होंठ हिले। मगर शब्द नहीं निकले।

उन्होंने महसूस किया – प्रश्न पूछने के लिए मन को चलना होगा। और अगर मन रुक जाए, तो प्रश्न ही नहीं उठता।

उन्होंने ताड़पत्र नीचे रख दिया।

“महाराज…” आवाज़ काँपी।

वसिष्ठ जी मुस्कुराए। “अब समझ आया?”

“मेरे प्रश्न ही मेरे बंधन थे।”

“हाँ। प्रश्न पूछना ज़रूरी है, मगर एक हद तक। फिर प्रश्न ख़ुद ज़ंजीर बन जाते हैं। तब प्रश्नों को छोड़ देना ही उत्तर है।”

कुंददंत ने प्रणाम किया। ताड़पत्र वहीं छोड़ा। चले गए।

आगे चलकर वो भी एक शांत मुनि बने। कोई पूछता तो हँसकर कहते, “मेरे पास सौ प्रश्न थे। एक उत्तर ने उन्हें भगा दिया।”

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, ज्ञान का मार्ग सवालों से शुरू होता है। मगर सवालों पर ख़त्म नहीं होता। एक जगह आती है जहाँ सवाल ही बाधा बन जाता है। उस जगह पर रुक जाओ। मन से बाहर खड़े हो जाओ। बाक़ी अपने आप होगा।”

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