कथा · 30
शुक की मुक्ति: व्यास का बेटा, जनक की परीक्षा
वेदव्यास का बेटा शुक जन्म से जागा हुआ था। मगर पिता को विश्वास नहीं हुआ। शुक को राजा जनक के पास भेजा – परीक्षा के लिए।
व्यास जी का बेटा था शुक। जब पैदा हुआ, तब से ही अलग था। दूसरे बच्चे रोते, यह नहीं रोता। दूसरे बच्चे खेल में डूबते, यह बैठा रहता। उसकी आँखों में बहुत गहराई थी।
व्यास जी ने उसे पढ़ाया। वेद, उपनिषद, सब कुछ। शुक हर बात पकड़ लेता। मगर पकड़ते ही छोड़ देता।
एक दिन शुक ने पिता से कहा, “पिताजी, मुझे जाना है। मैं संसार में कोई चीज़ पाना नहीं चाहता।”
व्यास जी ने सोचा। उन्हें लगा बेटा अभी कच्चा है। शायद ज्ञान बस ओढ़ा हुआ है, भीतर तक नहीं उतरा। वो उसे एक परीक्षा में डालना चाहते थे।
“बेटा, मिथिला जाओ। राजा जनक के पास। उनसे ज्ञान सीखो। जो वो कहें, मानो।”
शुक चले गए।
मिथिला पहुँचे। राजमहल के द्वार पर खड़े हुए। पहरेदार ने पूछा, “कौन हो?”
“शुक। व्यास जी का बेटा।”
पहरेदार ने अंदर ख़बर भेजी। मगर जनक ने कहा, “उसे रुकने दो। मैं अभी नहीं मिल सकता।”
शुक द्वार पर रुक गए।
एक दिन। दो दिन। सात दिन।
पहरेदार उनके लिए खाना-पानी लाते। शुक चुपचाप लेते। न ग़ुस्सा करते, न शिकायत।
आठवें दिन जनक ने कहा, “उसे आँगन में बुला लो।”
शुक आँगन में आए। बैठ गए। फिर इंतज़ार।
एक दिन। दो दिन। सात दिन।
आँगन में सेवक आते-जाते। नौकरानियाँ उन्हें पानी देती। फिर आगे बढ़ जातीं। कोई पूछता न था।
आठवें दिन जनक ने कहा, “अब उसे सुगंधित कक्ष में ले जाओ।”
शुक एक भव्य कक्ष में पहुँचे। हर तरफ़ अगरबत्ती की महक। सोने का पलंग। नर्तकियाँ नाच रही थीं। मीठा भोजन रखा था। संगीत बज रहा था।
शुक एक कोने में बैठ गए। आँखें मूँद लीं। नर्तकियाँ नाचती रहीं। शुक देखते नहीं थे। संगीत बजता रहा। शुक सुनते नहीं थे। मीठा रखा रहा। शुक छूते नहीं थे।
एक दिन। दो दिन। सात दिन।
आख़िर आठवें दिन जनक स्वयं कक्ष में आए। शुक ने आँखें खोलीं।
“महाराज,” शुक ने हाथ जोड़े।
जनक ने उन्हें देखा। पाँचवीं रात कोई आम साधक टूट जाता। मीठे के लिए, संगीत के लिए, स्त्रियों के लिए। शुक नहीं टूटे।
जनक ने पूछा, “बेटे, तुम क्या चाहते हो?”
“पिताजी ने भेजा है। आपने जो कहना है, वो कहिए।”
“मगर तुम्हारा अपना क्या है? तुम क्या ढूँढ रहे हो?”
शुक मुस्कुराए। “महाराज, मैंने जब से आँखें खोली हैं, मुझे यह संसार स्वप्न जैसा लगता है। मैं कुछ नहीं ढूँढ रहा। मैं जागा हुआ हूँ।”
जनक ने शुक को देखा। उनकी आँखों में कुछ तय किया।
“शुक, तुम जागे हुए हो। तुम्हें मेरी ज़रूरत नहीं। तुम्हारे पिता को बस यह विश्वास नहीं हो रहा था। मैंने तीन परीक्षाएँ लीं – इंतज़ार, उपेक्षा, प्रलोभन। तुम तीनों में अडिग रहे। जाओ। पिता से कहो कि बेटा पूरा है।”
शुक ने प्रणाम किया। लौटे। पिता को सब बताया।
व्यास जी ने पहली बार बेटे को गले लगाया। फिर रोए। बोले, “मैंने तुझे जन्म दिया, मगर तू मुझसे आगे है। यह पिता का सबसे बड़ा सौभाग्य है।”
शुक मुस्कुराए। फिर वन को चले गए। वहीं समाधि लग गई।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, कुछ लोग जन्म से जागे होते हैं। उन्हें सीखना नहीं होता, बस होना होता है। शुक ऐसे थे। मगर पिता को संदेह था। संदेह दूर करने के लिए परीक्षा हुई। और परीक्षा में शुक ने यह दिखाया – असली जागृति वो है जो प्रलोभन में अडिग रहती है।”
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