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शुक की मुक्ति: ज्ञात तत्त्व में विश्रान्ति

कथा · 29

शुक की मुक्ति: ज्ञात तत्त्व में विश्रान्ति

शुक अपने विचार से सत्य तक पहुँचते हैं, व्यास से उसी की पुष्टि सुनते हैं और फिर भी उनके मन को विश्राम नहीं मिलता। राजा जनक उन्हें राजमहल में तीन बार सात-सात दिन की स्थितियों से गुज़रने के बाद अपने पास बुलाते हैं। उत्तर शुक पहले से जानते हैं, पर उसे इतना निश्चित होना है कि खोज की प्रवृत्ति स्वयं समाप्त हो जाए।

जो सन्देह शेष रह गया

महाराज दशरथ की सभा में श्रीराम ने गहरा वैराग्य प्रकट किया था। विश्वामित्र ने समझ लिया कि जो जानना चाहिए, उसका बहुत-सा भाग राम के विवेक में पहले ही स्पष्ट हो चुका है। ज्ञान और स्थिर विश्रान्ति के बीच केवल थोड़ा-सा आवरण बचा था।

दशरथ के पास स्वर्णासन पर कृष्ण द्वैपायन व्यास बैठे थे। उनका वर्ण अञ्जन पर्वत की तरह गहरा और तेज सूर्य की तरह उज्ज्वल था। विश्वामित्र ने राम की दशा समझाने के लिए व्यासपुत्र शुक का इतिहास सुनाया।

शुक ने शास्त्रों का अध्ययन किया था और संसार के स्वरूप पर बहुत समय तक विचार किया था। उन्होंने इच्छा, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, प्राण, जन्म और मृत्यु की जाँच की। विचार उन्हें उस एक चेतन सत्ता तक ले गया, जिसमें सभी भेद प्रकट होते हैं।

बुद्धि उस निष्कर्ष को स्वीकार करती थी। मन अब भी यह मानने को तैयार नहीं था कि इससे आगे कुछ शेष नहीं।

इन्द्रिय-विषयों का आकर्षण समाप्त हो चुका था। फिर भी शुक सोचते थे कि कहीं उनकी समझ किसी अन्तिम तत्त्व के पहले तो नहीं रुक गई। यह संशय उन्हें भोग की ओर नहीं ले गया। उसने ज्ञात सत्य को विश्रान्ति बनने से रोक रखा था।

व्यास उस समय सुमेरु पर एकान्त में थे। शुक श्रद्धापूर्वक उनके पास पहुँचे।

उन्होंने पूछा, “पिताजी, संसार का यह विस्तार कैसे उत्पन्न हुआ? इसका अन्त कैसे और कब होता है? इसका विस्तार और अवधि कितनी है? यह शरीर का है, इन्द्रियों का, मन का, प्राण का, इन सबके समूह का, किसी अन्य परिवर्तनशील तत्त्व का या निर्विकार चेतना का?”

व्यास ने आरम्भ से अन्त तक पूरा विषय समझाया। मन के संकल्प और उससे जुड़ी पहचान के द्वारा बन्धन और संसार का आभास उठता है। संकल्प जड़ से शान्त हो जाए तो वही एक आत्मा स्पष्ट रहती है।

शुक ने वही सत्य सुना, जिस तक वे अपने विचार से पहुँच चुके थे। पहले से ज्ञात बात पिता से सुनने पर भी वह निश्चितता नहीं आई, जिसकी वे प्रतीक्षा कर रहे थे।

व्यास ने कठिनाई पहचान ली। पिता और पुत्र का सम्बन्ध स्वयं शुक के संकोच का एक भाग बन गया था। उसी वक्ता के और शब्द संशय को नई सामग्री देते, उसका आधार नहीं हटाते।

व्यास ने कहा, “तुमने जो जाना है, उससे आगे कोई तत्त्व मैं नहीं जानता। मिथिला के राजा जनक के पास जाओ। वे ज्ञातव्य तत्त्व को जानते हैं और तुम्हारे शेष भ्रम को दूर कर सकते हैं।”

विदेहनगरी की यात्रा

शुक सुमेरु से उतरे और मिथिला की सुरक्षित विदेहनगरी पहुँचे। द्वारपालों ने व्यासपुत्र को पहचानकर जनक को सूचना दी कि वे राजद्वार पर खड़े हैं।

जनक शुक के स्वभाव से परिचित थे। वे देखना चाहते थे कि उपेक्षा, प्रवेश और सुख, इन तीनों में से किसी का प्रभाव अभी उनकी जिज्ञासा पर पड़ता है या नहीं।

कोई बुलावा नहीं आया।

शुक सात दिन तक बाहरी द्वार पर स्थित रहे। उन्होंने पिता की प्रतिष्ठा के आधार पर प्रवेश नहीं माँगा। विलम्ब को अपमान नहीं बनाया और सम्मान न मिलने की कथा मन में नहीं रची। जिस प्रश्न ने उन्हें विदेह तक पहुँचाया था, वही उनके सामने स्पष्ट रहा।

राजमहल के द्वार पर पहली परीक्षा में समभाव से स्थित शुक

सात दिन बाद जनक ने उन्हें राजमहल के आँगन में आने की अनुमति दी। राजा से दूरी कुछ कम हुई, पर दर्शन फिर भी नहीं मिला। शुक अगले सात दिन वहीं स्थित रहे।

प्रवेश से उत्साह नहीं बढ़ा। आगे की प्रतीक्षा से रोष नहीं आया। दूसरा सप्ताह भी पहले सप्ताह जैसी समता में बीत गया।

फिर जनक ने उन्हें अन्तःपुर में पहुँचाया। तीसरे सात दिनों तक युवतियों ने विविध भोजन परोसे और सुख के अनेक साधन उनके सामने रखे। अब मौन और प्रतीक्षा की जगह स्वागत, सुविधा और भोग उपस्थित थे।

शुक ने जो उचित था उसे स्वीकार किया, पर आने के उद्देश्य से उनकी दृष्टि नहीं हटी। बाहर रोके जाने पर वे व्याकुल नहीं हुए थे और भीतर सम्मान मिलने पर आकर्षित नहीं हुए।

इक्कीस दिन पूरे हो गए। उपेक्षा उन्हें घायल नहीं कर सकी। राजसत्ता की निकटता उन्हें प्रसन्न नहीं कर सकी। सुख उन्हें जिज्ञासा से अलग नहीं कर सका।

जनक का उत्तर

अब जनक ने शुक को अपने पास बुलाया। राजा उठे, प्रणाम किया और उस साधक का आदरपूर्वक स्वागत किया, जिसकी वृत्ति तीनों स्थितियों में स्थिर सिद्ध हुई थी।

शुक की स्थिरता परखने के बाद उन्हें स्वीकार करने को तैयार राजा जनक

उन्होंने कहा, “आप परम पुरुषार्थ के सभी आवश्यक साधन पूर्ण कर चुके हैं। अब क्या जानना चाहते हैं?”

शुक ने वही प्रश्न रखा, जो व्यास से पूछा था। “संसार का यह विस्तार कैसे उत्पन्न होता है और कैसे समाप्त होता है?”

जनक ने समझाया कि एक सर्वव्यापी चेतन आत्मा ही पूरे विश्व में व्याप्त है। मन के संकल्प से उसी में बन्धन और संसार का आभास होता है। संकल्प जड़ से शान्त हो जाए तो मुक्ति स्पष्ट है।

यह उत्तर शुक के अपने विवेक और व्यास के उपदेश से पूर्णतः मिलता था।

शुक ने कहा, “मेरा विचार यही दिखाता है। पिताजी ने यही कहा और अब आपने भी इसकी पुष्टि की है। उपनिषदों के महावाक्य और निर्णय देने वाले शास्त्र भी सहमत हैं कि संसार अन्तःकरण अथवा संकल्प से उठता है और उसके पूर्ण क्षय से समाप्त होता है। कृपा करके बताइए कि क्या शेष है, जिससे यह सत्य मेरे हृदय में अचल और सन्देहरहित हो जाए।”

जनक ने उत्तर दिया, “अब जानने योग्य कुछ शेष नहीं। आपने तत्त्व को पहचाना और अपने गुरु से सुन लिया है। एक चेतन आत्मा ही सत्य है। आपका वैराग्य दृढ़ है और जिन तीन अवस्थाओं से आप गुज़रे, उन्होंने दिखा दिया कि परिस्थिति आपकी समझ पर शासन नहीं करती। किसी और शिक्षा की प्रतीक्षा छोड़ दीजिए।”

जनक ने शुक की निष्कामता की प्रशंसा की। उसका उद्देश्य शुक, व्यास और जनक के बीच कोई श्रेष्ठता-क्रम बनाना नहीं था। वह उस विश्वास को दृढ़ कर रही थी, जिसे शुक अपने ही ज्ञान से रोकते आए थे।

अन्तिम सन्देह इस धारणा पर टिका था कि कोई आख़िरी उत्तर किसी दूसरे मन में छिपा है। जनक की पुष्टि ने उसी कल्पित भण्डार को हटा दिया।

ज्ञान विश्रान्ति बना

शुक मौन हो गए। शोक, भय, इच्छा और अनिश्चय शान्त हो गए। सत्य अब निरीक्षण के लिए सामने रखा निष्कर्ष नहीं था। वही आधार था, जिसमें निरीक्षण, निष्कर्ष और निरीक्षक प्रकट होते थे।

राजमहल के तीन सप्ताह ने यह ज्ञान उत्पन्न नहीं किया था। उन दिनों ने उस वृत्ति की स्थिरता दिखा दी, जिसमें ज्ञान स्थित था। जनक के शब्दों ने फिर ज्ञात सत्य के आगे कुछ और खोजने की आदत समाप्त कर दी।

शुक विदेह से चले गए और सुमेरु के एक ऐसे पुण्य प्रदेश में पहुँचे, जो समाधि के अनुकूल था। वहाँ उन्होंने निर्विकल्प समाधि ग्रहण की, जिसमें विचारों का विभाजन शेष नहीं रहता।

वे दस हजार वर्ष तक उसी समाधि में स्थित रहे। प्रारब्ध समाप्त होने पर शरीर की गति पूरी हुई। कथा उस अन्त की तुलना तेल समाप्त होने पर दीपक के शान्त हो जाने और बूँद के समुद्र में मिल जाने से करती है। शुक ने देह के पार की मुक्ति, विदेहमुक्ति, प्राप्त की।

विश्वामित्र ने श्रीराम की ओर देखा

विश्वामित्र यह इतिहास किसी दूर के महापुरुष की जीवनी के रूप में नहीं सुना रहे थे। उसका प्रयोजन दशरथ की सभा में उनके सामने बैठा था।

श्रीराम का वैराग्य और विवेक भी परिपक्व हो चुका था। उन्हें तर्क और अनुभव से पुष्ट ऐसा उपदेश चाहिए था, जिससे थोड़ा-सा शेष आवरण हटे और बुद्धि अपने ही निष्कर्ष में विश्राम पाए।

इसीलिए विश्वामित्र ने वसिष्ठ से राम को शिक्षा देने का अनुरोध किया। शुक का इतिहास दिखाता था कि सही ज्ञान के बाद और विश्वसनीय गुरु से उसकी पुष्टि सुन लेने के बाद भी संशय बच सकता है। धैर्यपूर्ण संवाद ज्ञान को उस अन्तिम दूरी से पार ले जाता है।

जनक ने शुक को कोई गुप्त सिद्धान्त नहीं दिया। उन्होंने पहले से उपस्थित सत्य के आगे खोजते रहने की आवश्यकता समाप्त कर दी। उसी विश्रान्ति से दस हजार वर्ष की निर्विकल्प समाधि और शुक के जीवन की पूर्णता सामने आई।

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