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अनन्त बिल्व: चितिशक्ति का स्वरूप

कथा · 32

अनन्त बिल्व: चितिशक्ति का स्वरूप

वसिष्ठ श्रीराम को एक ऐसे बिल्व फल पर ध्यान देने को कहते हैं, जो अनगिनत युगों से पूर्णतः पका हुआ है। उसका अदृश्य वृक्ष, अक्षय मधुरता और अमाप्य विस्तार परिचित फल को चितिशक्ति का अत्यन्त सूक्ष्म दृष्टान्त बना देते हैं।

वसिष्ठ का विलक्षण फल

वसिष्ठ ने कहा, “श्रीराम, तत्त्वज्ञान की ओर ले जाने वाला एक संक्षिप्त, रम्य और विलक्षण दृष्टान्त सुनिए।”

उन्होंने एक ऐसे बिल्व फल की कल्पना करने को कहा, जिसका विस्तार कभी मापा नहीं जा सकता। हजारों योजन भी उसकी सीमा नहीं बताते थे। अनन्त कोटि योजन की गणना भी उसके आगे अधूरी पड़ जाती थी।

असंख्य युग बीत चुके थे, फिर भी फल जीर्ण नहीं हुआ। वह सदा पूरी तरह पका रहता था, अक्षय रस से भरा और अमृत से भी अधिक मधुर। पकने से उसमें क्षय नहीं आता था। वह कभी गिरता, फटता, सूखता या अपनी नवीनता खोता नहीं था।

वसिष्ठ ने उसकी सुन्दरता और शीतल कोमलता की तुलना बालचन्द्र से की। संसारों के बीच वह मेरु की भाँति विशाल और मन्दराचल की तरह अडिग था। महाप्रलय की वह प्रचण्ड वायु भी उसे हिला नहीं सकती थी, जो पर्वतों को उखाड़ देती है।

उस बिल्व के सामने ब्रह्माण्ड पर्वत के नीचे पड़ी सरसों की पंक्तियों जैसे दिखाई देते थे। एक पूरा ब्रह्माण्ड सुमेरु के सामने रखे सरसों का दाना जितना छोटा जान पड़ता था। वसिष्ठ श्रीराम को विस्तार की उस सीमा तक ले जा रहे थे, जहाँ सामान्य माप काम नहीं करता।

ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, रुद्र और दूसरे दीर्घजीवी देवता भी उसके उद्गम को नहीं जान सके। किसी ने उसका आदि, मध्य या अन्त नहीं पाया। उसका अंकुर, वृक्ष, फूल, तना, जड़ और शाखा कभी दिखाई नहीं दिए।

उस बिल्व में कोई खोखला स्थान नहीं था। उसमें साधारण गूदा या गुठली भी नहीं थी। उत्पत्ति, परिवर्तन और परिणाम की कोई अवस्था उसमें नहीं मिलती थी। वह एक ही निर्मल, निर्विकार और स्वयं प्रकाशित घन था।

श्रीराम सुनते रहे और वसिष्ठ फल के एक-एक परिचित गुण को हटाते गए। अब वह किसी यात्री को मिलने या हाथ में उठाने वाली वस्तु नहीं रह गया था। दृष्टान्त की विलक्षणता ध्यान को भौतिक आकार से हटाकर उस सत्ता की ओर ले जा रही थी, जिसमें आकार का अनुभव होता है।

छह रसों से आगे की मधुरता

वसिष्ठ ने फिर बिल्व के रस का वर्णन किया। दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, स्वाद, गन्ध और मन से मिलने वाला प्रत्येक सुख उसी मधुरता में प्रकाशित होता था। ब्रह्मलोक का आनन्द भी उसे समाप्त नहीं कर सकता था।

उन्होंने मनुष्य के सुख से आरम्भ करके ऊँचे लोकों के आनन्द और हिरण्यगर्भ तक की अनुभूति का क्रम रखा। अनुभव किए जाने वाले हर आनन्द को उसी आधार से सामर्थ्य मिलता था। आत्मा का अपना प्रकाश उस पूरे क्रम से अधिक व्यापक था।

वसिष्ठ ने इस आत्मप्रकाश को फल की मज्जा या सार कहा। मज्जा का अर्थ छिलके के पीछे छिपा कोई पदार्थ नहीं था। वह प्रत्येक अनुभव में जानने वाली सत्ता की अन्तरंग उपस्थिति का संकेत था।

यह सार देश, काल और वस्तु से बनने वाली तीनों सीमाओं से मुक्त था। उसे यहाँ मानकर वहाँ से हटाया नहीं जा सकता था, किसी एक क्षण में बाँधकर दूसरे क्षण से अलग नहीं किया जा सकता था और किसी एक वस्तु में रखकर बाकी से दूर नहीं किया जा सकता था। आत्मा ही वह बिल्व थी।

वसिष्ठ ने चैतन्य को सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और महान से भी महान कहा। वह प्राचीन था, क्योंकि किसी स्मरणीय घटना के साथ उसका आरम्भ नहीं हुआ। वह बालक के समान नित्य नवीन था, क्योंकि आयु उसमें कोई परिवर्तन नहीं कर सकती थी।

श्रीराम ने सुना कि विविध रूप प्रकट होने पर चैतन्य अपना स्वभाव नहीं छोड़ता। “यह शरीर ही मैं हूँ” की धारणा अनुभव में भेद उत्पन्न करती है। वह भेद भी उसी प्रकाश में जाना जाता है, जो उसे सम्भव बनाता है।

काल, दिशा और संसार

अब वसिष्ठ ने बिल्व के प्रकाश में दिखाई देने वाले रूपों का विस्तार किया। उन्होंने व्यष्टि और समष्टि के अहंभाव, आकाश और शब्द, शरीर और उनके सम्बन्ध गिनाए। फिर काल की मात्राएँ रखीं: क्षण, प्रहर, दिन, मास, वर्ष और कल्प।

उन्होंने दिशा, गति, कर्म और नियति, राग और द्वेष, ग्रहण और त्याग का उल्लेख किया। “तुम”, “मैं” और “वह” के साथ ऊपर और नीचे, आगे और पीछे, निकट और दूर, वर्तमान और भविष्य भी वहीं प्रकट होते थे।

वसिष्ठ की सूची में ब्रह्माण्ड और असंख्य जीव, ब्रह्माण्ड-कमल और उनके आकार, मेरु, स्वर्ग और नरक, ऋतुएँ और आयु, अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, वृद्धावस्था और मृत्यु आ गए। ज्ञान, अज्ञान और शास्त्रों में बताए गए अनेक दृष्टिकोण भी उसी क्षेत्र में उठते थे।

श्रीराम हर बात को समझ सकते थे, क्योंकि ये सभी अनुभव में उपलब्ध थीं। प्रत्येक भेद जागरूकता में दिखाई देता और उसी से जाना जाता था। वसिष्ठ की सूची की कोई वस्तु जानने वाले प्रकाश से बाहर जाकर स्वतंत्र सत्ता सिद्ध नहीं कर सकती थी।

चेतना की सक्रिय प्रकटता को वसिष्ठ ने चितिशक्ति कहा। उसी शक्ति में ये सारे विन्यास दिखाई देते थे। उन्होंने समझाया कि उसका अपना स्वरूप शान्त और पीड़ा से अछूता रहता है। गति, दुःख और कल्पना प्रकट होते हैं, पर उन्हें प्रकाशित करने वाला आधार उनके बीच कोई अलग वस्तु नहीं बन जाता।

वसिष्ठ ने “एक” शब्द को भी संख्या की तरह पकड़ने से सावधान किया। चेतना ऐसी एक वस्तु नहीं थी, जिसके पास दूसरी वस्तु रखी जा सके। एक और अनेक की संख्या भी उसी में प्रकट होने वाला भेद थी। बिल्व सभी रूपों की समान सत्ता का संकेत था।

श्रीराम ने अर्थ पहचाना

श्रीराम ने दृष्टान्त पर विचार करके कहा, “भगवन्, आपने बिल्व फल के रूप में अखण्ड महाचैतन्य का वर्णन किया है। अहंभाव और संसार का पूरा विस्तार उसी चेतन सार में प्रकट होता है।”

वसिष्ठ ने उनकी समझ स्वीकार की और एक बात स्पष्ट की। उन्होंने ब्रह्माण्डों को बिल्व की मज्जा कहा था, पर चैतन्य में ऐसा कोई भौतिक भीतरी भाग नहीं था, जिसमें संसार रखे जा सकें।

उन्होंने कहा, “चेतना में भीतर और बाहर की कोई दीवार नहीं होती। वह पर्वत, शरीर, नगर या तारों में भौतिक रूप से बदलती नहीं है। ये सभी रूप उसकी शक्ति में दिखाई देते हैं और उसका स्वरूप अखण्ड रहता है।”

संसार की उपस्थिति चैतन्य के वास्तविक परिवर्तन के बिना होने वाली प्रकटता थी, जिसे विवर्त कहा जाता है। वसिष्ठ ने मज्जा का रूपक इस सम्बन्ध को समझने योग्य बनाया और फिर उसे किसी पात्र तथा उसके भीतर रखी वस्तु का अर्थ देने से रोक दिया।

अब श्रीराम उस वृक्ष को खोजने नहीं निकले, जिस पर यह बिल्व उगा हो, और न उसके केन्द्र तक पहुँचने के लिए किसी चाकू की आवश्यकता रही। फल की छवि, उसकी खोज, देश-काल के सभी माप और उन पर विचार करता मन एक ही जागरूकता में प्रकट हुए थे। वसिष्ठ ने उसी स्वयं प्रकाशित जागरूकता को बिल्व से सूचित होने वाली निर्विकार चितिशक्ति कहा।

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