कथा · 34
हेतुक का जादू-नगर: एक हिरण के पीछे, बीस साल
हेतुक एक मायावी था। उसने एक नगर रचा, और उसकी हर गली में एक असम्भव बात रख दी। एक दुकान जो रोज़ अपनी जगह बदलती, एक प्रासाद जिसके भीतर एक और छोटा प्रासाद, एक घण्टी जो बजने से पहले ही गूँजती। फिर वो अपनी ही रचना भूल गया, और तब तक भूला रहा जब तक उसके गुरु ने आकर याद नहीं दिलाया।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या एक जादूगर अपना ही जादू भूल सकता है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हेतुक नाम के एक जादूगर की कथा सुनो। उन्होंने एक पूरा नगर रचा, फिर उसमें ख़ुद रहने लगे, और कुछ समय बाद वो यह भूल गए कि वो किसी और जगह से आए थे। एक स्तर पर यह कथा हम सब की है।”
अकेलापन

हेतुक एक जादूगर थे, और एक पुराने पहाड़ की ढलान पर अकेले रहते थे।
वो ढलान बहुत साधारण थी।
ऊबड़-खाबड़ पत्थर, बीच-बीच में थोड़ी घास, एक झरना, और एक गुफा जिसमें हेतुक रहते थे। बहुत बरस वो ऐसे ही रहे।
हेतुक के पास एक बहुत पुरानी विद्या थी।
उन्होंने यह विद्या बहुत बरस पहले एक गुरु से सीखी थी, जो अब नहीं रहे थे। इस विद्या से वो अपनी कल्पना से चीज़ें रच सकते थे।
पर अब तक उन्होंने इसका उपयोग नहीं किया था, क्योंकि गुरु ने मना किया था।

गुरु ने कहा था – “हेतुक, यह विद्या ख़तरनाक है। अगर तुम इससे रचना शुरू करोगे, तो अपनी ही रचना में फँस सकते हो। बहुत साधक फँसे हैं। मैं तुम्हें यह विद्या इसलिए सिखा रहा हूँ कि तुम्हें इसके बारे में पता हो। पर इसका उपयोग मत करो।”
हेतुक मान गए, और बहुत बरस उन्होंने इसका उपयोग नहीं किया।
पर एक दिन उनके भीतर एक विचार आया – मैं बहुत अकेला हूँ, न कोई बात करने वाला, न कोई देखने वाला।
अगर मैं अपनी विद्या से एक नगर रचूँ, तो शायद मुझे साथी मिले।
उन्होंने अपने गुरु की बात याद की, पर उसे एक तरफ़ रख दिया।
उन्होंने सोचा – “गुरुदेव ने जो कहा, वो उनकी बात थी। मैं अलग हूँ। मैं फँसूँगा नहीं।”
नगर

हेतुक ने अपनी माया चलाई। उन्होंने आँखें बन्द कीं, अपनी कल्पना को खुला छोड़ा, और हाथ हिलाए।
पहले उनके सामने एक रोशनी आई, फिर एक हलचल।
और फिर एक नगर दिखा।
वह नगर साधारण नहीं था। ऊँची दीवारें थीं और उन पर पहरेदार। बाज़ार में दुकानें थीं जहाँ हर तरह की चीज़ें बिक रही थीं। हर देवता के मन्दिर थे, बीच में एक बड़ा महल था, और हर तरफ़ गलियाँ फैली थीं।
हेतुक ने अपनी कल्पना को और बढ़ाया।
राजा, मन्त्री, ब्राह्मण, व्यापारी, कारीगर, प्रजा – हज़ारों लोग नगर में भर गए।
हर एक की अपनी पहचान थी। राजा बड़े डील-डौल के थे, लम्बी दाढ़ी और तेज़ आँखों वाले। मन्त्री बूढ़े थे, सफ़ेद बालों वाले और चलने में धीमे। व्यापारी मोटे थे और उनके हाथ में हमेशा कोई हिसाब रहता, जबकि कारीगर पतले थे और उनके हाथ में हमेशा कोई न कोई काम। और बाक़ी प्रजा साधारण थी, अपने-अपने काम में लगी हुई।
हेतुक ने नगर में जीवन भर दिया। लोग सुबह उठते, काम करते, शाम को घर लौटते और रात को सोते। बाज़ार में चहल-पहल रहती, मन्दिर में घण्टियाँ बजतीं, और महल में दरबार लगता।
पर नगर में कुछ बातें ऐसी थीं जो असली नगरों में नहीं होतीं।

बाज़ार के बीच एक दुकान थी, जो हर रोज़ अपनी जगह बदलती। कभी पूर्व कोने में, कभी पश्चिम के नज़दीक, कभी मन्दिर के सामने। इस दुकान को ढूँढने वाला हर रोज़ नए रास्ते से चलता था। दुकानदार बूढ़ा था। वो हर ग्राहक को एक ही चीज़ बेचता, पर हर ग्राहक के लिए वो चीज़ अलग होती। एक के लिए कपड़ा, एक के लिए दाल, एक के लिए कोई छोटी मूर्ति। पर सबकी क़ीमत एक ही थी, एक तांबे का सिक्का।
राज-प्रासाद के बीच में एक कक्ष था जिसमें कोई जाता नहीं था, और जिसका दरवाज़ा हमेशा बन्द रहता। उस कक्ष के भीतर, सेवक कहते, एक छोटा राज-प्रासाद था, उसी प्रासाद का छोटा रूप। और उस छोटे प्रासाद के भीतर एक और बन्द कक्ष था, और उसके भीतर एक और छोटा प्रासाद, और ऐसे ही आगे।
मन्दिर की एक घण्टी ऐसी थी जो बजने से पहले गूँजती। हर पुजारी यह जानता था। वो घण्टी के पास खड़े होते, गूँज सुनते, फिर घण्टी पर हाथ मारते। पर अगर कोई बिना गूँज सुने घण्टी पर हाथ मारता, तो कोई आवाज़ नहीं आती।
नदी के एक मोड़ पर पानी दो दिशा में बहता, एक धारा उत्तर को और एक दक्षिण को, दोनों एक ही समय। बीच में स्त्रियाँ पानी भरतीं। उन्हें दोनों धाराओं से थोड़ा-थोड़ा पानी लेना होता, क्योंकि सिर्फ़ एक से लिया हुआ पानी घड़े को भारी कर देता और घड़ा टूट जाता।
नगर की उत्तरी दीवार पर एक चित्रकार रहता था। वो एक चित्र बनाता, पूरा बनाता, फिर दीवार पर लगाता। पर अगले दिन वो चित्र बदल जाता। चित्र में जो लोग होते वो और बूढ़े हो जाते, जो पेड़ होते वो और बड़े हो जाते, और जो बादल होते वो और छोटे हो जाते। चित्रकार ने हज़ारों बार यह देखा, पर उसे रोकने का कोई तरीक़ा उसके पास नहीं था। बस वो हर सुबह जाता और अपने चित्रों को बदलते देखता।
नगर के लोग इन सब बातों के साथ रहते थे। यह बातें उनके लिए साधारण थीं, क्योंकि उन्होंने यही जाना था।
कोई अजनबी जब नगर में आता तो रुक जाता, और उसके भीतर बहुत प्रश्न उठते। पर लोग उसे समझा देते – “भाई, यहाँ ऐसा ही होता है। आदत हो जाएगी।”
(पर अजनबी कभी नगर में आते ही नहीं थे, क्योंकि नगर तो हेतुक की कल्पना में था। बाहर से कोई कैसे आता? पर हेतुक ने अपनी कल्पना में अजनबी भी रचे थे, क्योंकि नगर बिना अजनबियों के अधूरा रहता।)
हेतुक ने ख़ुद भी उस नगर में एक रूप ले लिया।

वो उस नगर के राजा बने। उस राजा का नाम हेतुक नहीं था, कोई और नाम था, पर भीतर वो वही हेतुक थे।
रहना
हेतुक नगर में राजा की तरह रहने लगे।
पहले कुछ दिन उन्हें इसमें मज़ा आया।
राजा की भूमिका, दरबार में बैठना, प्रजा को सुनना, न्याय करना। बहुत से सेवक उनकी सेवा करते और बहुत से मन्त्री उनकी राय माँगते।
बहुत सी स्त्रियाँ उनकी पत्नी बनीं। यूँ बहुत बरस बीत गए।
भूलना
धीरे-धीरे हेतुक के साथ एक बात होने लगी। वो भूल गए कि यह नगर उन्होंने ही बनाया था।
पहले उन्हें कभी-कभी याद आ जाता, रात को सोते समय एक हलचल-सी उठती।
उन्हें लगता – मैं कोई और था, कहीं और, एक पहाड़ पर, एक गुफा में। पर सुबह होते-होते वो राज-काज में यह भूल जाते।
फिर वो हलचल भी कम होती गई, और एक दिन पूरी तरह ग़ायब हो गई।
अब हेतुक को लगने लगा कि यह नगर असली है, यह प्रजा असली है, यह मन्त्री असली हैं, और मैं इस नगर का राजा हूँ।
हेतुक राज्य चलाते, न्याय करते, प्रजा से बात करते। पर अब उन्हें यह याद नहीं था कि यह सब उन्हीं की माया है।
बरस
बहुत बरस बीते।
हेतुक के बच्चे हुए, बच्चे बड़े हुए, और उन्होंने अपने बच्चों के विवाह कराए। हेतुक ख़ुद बूढ़े होते गए।
राज्य ख़ूब फैला, क्योंकि हेतुक एक अच्छे राजा थे, जो न्याय करते थे और प्रजा के लिए सोचते थे।
लोग कहते – “महाराज हेतुक जैसा राजा हमने कभी नहीं देखा।”
हेतुक यह सुनकर ख़ुश होते। उनकी कुटिया वाला पुराना जीवन अब बहुत दूर था, और उनकी असली पहचान का कोई निशान नहीं बचा था।
नगर का जीवन
राजा हेतुक के नगर में जीवन बहता रहता था।
सुबह होते ही बाज़ार खुलते और व्यापारी अपनी दुकानें खोलते, जहाँ सब्ज़ी, फल, कपड़े और गहने बिकते।
स्त्रियाँ नदी पर पानी भरने आतीं और आपस में बातें करतीं। पुरुष खेतों पर जाते, और उनके साथ वो बच्चे भी जिन्हें खेती सीखनी थी। मन्दिर में पुरोहित घण्टी बजाते और पूजा करते, और प्रजा दर्शन को आती।
दोपहर को नगर शान्त हो जाता और लोग अपने घरों में होते।
शाम को बाज़ार फिर खुलते, लोग आते-जाते और बच्चे खेलते।
और रात होते ही नगर सो जाता।
यह सब बहुत बरस तक चलता रहा।
पर एक छोटी-सी बात थी।
नगर के लोगों को कभी-कभी एक अजीब-सी अनुभूति होती – जैसे वो असली नहीं हैं, जैसे कोई और उन्हें देख रहा है, जैसे उनके जीवन का कोई नियन्त्रक कहीं है।
पर यह अनुभूति बहुत हलकी थी, आती और जाती रहती, और कोई इस पर ज़्यादा सोचता नहीं था।

बस एक बूढ़ी स्त्री थी, जो रोज़ नदी पर पानी भरने आती। उसने एक बार अपनी सखी से कहा – “बहन, मुझे लगता है हम सब किसी का सपना हैं।”
सखी हँसकर बोली – “बावली। हम असली हैं।”
बूढ़ी ने बस इतना कहा – “शायद।” पर भीतर वो जानती थी।
उसने अपनी सखी से और कुछ नहीं कहा, पर भीतर ही भीतर वो सोचती रही।
एक दिन वो मरी। मरते समय उसकी आँखें खुली थीं, और उसने अपने आप से कहा – “मैं असली नहीं थी, पर मेरा प्रेम असली था।”
और वो चली गई।
आना
एक दिन एक तपस्वी उस नगर में आए।
तपस्वी बूढ़े थे, उनका देह पतला था और उनकी आँखें तेज़ थीं। उन्होंने नगर देखा, नगर के लोगों को देखा, और राजा के बारे में सुना।
तपस्वी राजमहल के द्वार पर पहुँचे और पुकारा – “हेतुक।”
पहरेदार आए और बोले – “महाशय, हमारे राजा का नाम हेतुक नहीं है।”
तपस्वी बोले – “बुलाओ। मैं उनसे मिलना चाहता हूँ।”
पहरेदार चकित होकर बोले – “पर महाशय…”
तपस्वी ने फिर कहा – “बुलाओ।”
पहरेदार अन्दर गए और राजा को बताया – “महाराज, एक बूढ़े तपस्वी आए हैं जो आप से मिलना चाहते हैं। पर वो आपका कोई और नाम लेते हैं।”
राजा ने पूछा – “कोई और नाम? क्या नाम?”
पहरेदार बोले – “हेतुक।”
यह सुनकर राजा के भीतर एक हलचल-सी उठी, जैसे कोई बहुत पुरानी आवाज़ कहीं से लौट आई हो।
राजा ने कहा – “लाओ।”

तपस्वी राजमहल में आए। राजा ने उन्हें देखा और तपस्वी ने राजा को।
तपस्वी ने पुकारा – “हेतुक।”
राजा बोले – “मेरा नाम हेतुक नहीं। मेरा नाम…” और राजा ने अपना नाम कहा। पर इस बार अपना नाम कहते समय उन्हें एक अजीब-सी अटक महसूस हुई।
तपस्वी बोले – “हेतुक, तुम भूल गए।”
राजा ने हैरान होकर पूछा – “क्या भूल गया?”
तपस्वी ने कहा – “कि यह नगर तुम्हारी माया है।”
राजा ने पूछा – “क्या मतलब?”
तपस्वी बोले।
तपस्वी ने कहा – “हेतुक, अपने भीतर देखो। तुम जादूगर हो। यह सब तुमने रचा है। तुम राजा नहीं, तुम जादूगर हो।”
राजा ने अपने मन्त्रियों की ओर देखा, जो चकित होकर बोले – “महाराज, यह बूढ़ा क्या कह रहा है?”
राजा ने उन्हें रोका – “रुको। मुझे सुनने दो।”
फिर राजा तपस्वी की ओर मुड़े – “बूढ़े, और बोलिए।”
तपस्वी ने कहा – “हेतुक, तुम एक पहाड़ की ढलान पर एक गुफा में रहते थे, और बहुत अकेले थे। एक दिन तुमने अपनी माया से यह नगर रचा, फिर इसी नगर में रहने लगे, और फिर यह भूल गए कि इसे तुमने ही रचा था।
“मैं तुम्हारा गुरु था, बहुत बरस पहले। मैंने तुम्हें यह विद्या सिखाई थी, पर मना किया था कि इसका उपयोग न करो। तुमने नहीं माना।
“अब मैं तुम्हें याद दिलाने आया हूँ।”
राजा बहुत देर तक तपस्वी को देखते रहे।
उनके भीतर एक हलचल हो रही थी।
पुरानी यादें लौट रही थीं।
याद
पहली छवि उभरी – एक छोटी गुफा, पास में एक झरना, और एक पुराना पहाड़।
दूसरी छवि – एक तपस्वी, वही तपस्वी जो अब उनके सामने था, पर बहुत पहले का। वो कहते थे, “हेतुक, यह विद्या ख़तरनाक है।”
तीसरी छवि – एक रात, जब उन्होंने सोचा था, “मैं अकेला हूँ। मैं नगर रचूँगा।”
राजा ने आँखें बन्द कीं।

धीरे-धीरे सब याद आने लगा – पहाड़ की ढलान, वो अकेलापन, वो जादू, नगर का बनाना, राजा बनना, बच्चों का होना, और राज्य का चलाना।
राजा ने आँखें खोलीं और कुछ देर चुप रहे। फिर बोले – “तपस्वी, धन्यवाद।”
तपस्वी बोले – “धन्यवाद की क्या ज़रूरत? तुम ख़ुद याद कर रहे थे, मैंने बस एक धक्का दिया।”
निर्णय
राजा अपने मन्त्रियों की ओर मुड़े – “मन्त्रियों, मुझे आप लोगों से कुछ कहना है।”
मन्त्री चकित होकर बोले – “बोलिए, महाराज।”
राजा ने कहा – “यह नगर मेरा रचा हुआ है। यह सब, आप सब, मेरी ही कल्पना हैं।”
मन्त्री हँसकर बोले – “महाराज, यह क्या मज़ाक है?”
राजा बोले – “यह मज़ाक नहीं।”
मन्त्री बोले – “पर महाराज, हम तो असली हैं। हम सोचते हैं, हम काम करते हैं, हम जीते हैं।”
राजा ने कहा – “हाँ, पर यह सब मेरी कल्पना के भीतर है। मैंने यह नगर बहुत बरस पहले रचा था, फिर मैं भूल गया, और अब मुझे याद आ रहा है।”
मन्त्रियों ने एक-दूसरे को देखा।
राजा बोले – “मैं अब अपने असली देह में लौटूँगा।”
मन्त्री बोले – “महाराज, पर हमारा क्या?”
राजा कुछ देर सोचते रहे।
फिर बोले – “मन्त्रियों, यह बात आप पूरी तरह समझेंगे नहीं, पर मैं कोशिश करूँगा। आप लोग मेरी कल्पना से हैं, पर एक स्तर पर आप अपने भी हैं। आपने अपने अनुभव बनाए, आपके पास अपनी कथाएँ हैं।
“जब मैं अपने असली देह में लौटूँगा, तो यह नगर अपने आप में कुछ समय और रहेगा, शायद बहुत बरस।
“पर एक दिन यह भी मिटेगा, क्योंकि मेरी कल्पना के बिना यह रह नहीं सकता।
“तब तक आप अपनी कथाएँ जिएँ। मुझे माफ़ करिए कि मैंने यह सब रचा, और अब बीच में छोड़ रहा हूँ।”
मन्त्रियों ने सिर झुकाया। उनके चेहरे पर अब वो हैरानी नहीं थी, बल्कि एक समझ थी। शायद वो भी एक स्तर पर जानते थे कि वो किसी और की कल्पना से हैं।
राजा ने अपने देह से बाहर देखा।
लौटना
नगर वहीं था, पर अब वो जानते थे कि यह माया है। राजा ने हाथ हिलाए।
नगर हलका होने लगा।
बाज़ार की वो चलती-फिरती दुकान सबसे पहले हलकी हुई। उसके बूढ़े दुकानदार ने अपने ग्राहक को आख़िरी सिक्का लौटाया और ख़ुद हलका हो गया। ग्राहक एक पल रुका, फिर वो भी हलका हो गया।
राज-प्रासाद के बीच का वो बन्द कक्ष खुला। उसके भीतर का छोटा प्रासाद हलका हुआ, उसके भीतर का और छोटा कक्ष भी। एक के बाद एक, हर भीतरी प्रासाद हलका होकर अगले को खींचता गया। और आख़िरी प्रासाद, जो इतना छोटा था कि शायद उसे नापने वाला कोई न था, वो भी हलका हो गया।
मन्दिर की वो घण्टी आख़िरी बार गूँजी। पर इस बार बजने से पहले की गूँज नहीं थी, बजने के बाद की थी। पुजारी ठिठक गए, क्योंकि उन्होंने कभी इस घण्टी की बाद-गूँज नहीं सुनी थी। पर वो आख़िरी गूँज थी।
नदी के मोड़ पर दोनों धाराएँ रुकीं। बीच में पानी एक पल को स्थिर हुआ, फिर हलका हुआ, फिर हवा में घुल गया।
चित्रकार अपने आख़िरी चित्र के पास खड़ा था। चित्र के लोग उसकी आँखों के सामने और बूढ़े हुए, फिर मरे, फिर हलके हो गए। चित्रकार ने धीरे से कहा – “बहुत बरस का काम, और एक पल में।” फिर वो भी हलका हो गया।
दीवारें पारदर्शी हो गईं और लोग धुँधले पड़ने लगे।
हेतुक की चेतना अपने असली देह की ओर लौटी।

जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो वो पहाड़ की ढलान पर अपनी गुफा में थे, अकेले।
उनका देह बहुत पुराना हो चुका था। बाल पूरे सफ़ेद थे और चेहरे पर झुर्रियाँ, पर देह अब भी जीवित था।
बाहर तपस्वी खड़े थे।
हेतुक बोले – “गुरुदेव।”
तपस्वी ने पूछा – “लौट आए? क्या सीखा?”
हेतुक बोले – “गुरुदेव, मैंने सीखा कि माया का सबसे बड़ा ख़तरा यह नहीं कि वो हमें झूठ दिखाती है। माया का सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि हम उसे रचने के बाद ख़ुद को भूल जाते हैं।”
तपस्वी बोले – “हेतुक, यही बात मैं बहुत बरस पहले कहना चाहता था, पर तुम तब नहीं समझे।”
हेतुक बोले – “गुरुदेव, अब समझा।”
तपस्वी ने कहा – “हेतुक, तुम बहुत भाग्यवान हो। बहुत साधक अपनी कल्पनाओं में फँसकर मर जाते हैं। तुम लौट आए।”
हेतुक बोले – “गुरुदेव, मेरा भाग्य आप थे। आप नहीं आते, तो मैं नगर में ही मर जाता।”
तपस्वी ने पूछा – “हेतुक, अब आगे क्या?”
हेतुक ने सोचकर कहा – “गुरुदेव, अब मैं यहीं रहूँगा, पर माया नहीं रचूँगा। बस अपनी चेतना में रहूँगा।”
तपस्वी ने पूछा – “अकेले?”
हेतुक बोले – “अकेले। पर अब अकेलेपन से डर नहीं। मैंने जान लिया कि अकेलापन क्या है। यह बस मेरी एक धारणा है। अगर मैं अपनी चेतना में रहूँ, तो मैं कभी अकेला नहीं।”
तपस्वी मान गए।
फिर तपस्वी बोले – “हेतुक, एक और बात। तुम्हारा नगर अब भी कहीं है, शायद एक कमज़ोर रूप में। पर वहाँ कुछ लोग हैं जिन्हें तुमने रचा, और उनकी अपनी कथाएँ हैं।”
हेतुक ने पूछा – “मुझे क्या करना चाहिए?”
तपस्वी ने कहा – “उन्हें जाने दो। तुम्हारी कल्पना के बिना वो धीरे-धीरे फीके पड़ जाएँगे। पर तुम उन्हें ज़बरदस्ती नहीं मिटा सकते, क्योंकि यह उनकी कथा है।”
हेतुक मान गए।
तपस्वी चले गए।
हेतुक अपनी गुफा में बहुत बरस रहे, बिना किसी रचना के।
कभी-कभी रात को उन्हें वो पुराना राज्य याद आता, अपनी प्रजा, अपने मन्त्री, अपनी पत्नियाँ, अपने बच्चे। पर अब वो याद उन्हें खींचती नहीं थी, बस एक स्मृति बनकर रह जाती।
बहुत बरस बाद हेतुक ने अपना देह शान्ति से छोड़ दिया।
उनकी कुटिया बहुत बरस तक वहीं रही, फिर वो भी मिट गई। पर कथा रह गई। लोग कहते – “एक जादूगर थे, हेतुक। उन्होंने एक नगर रचा, फिर उसी में फँसे, फिर लौट आए।
“यह कथा हम सब की है। हम सब अपनी कल्पनाओं में रहते हैं, बस हमें यह पता नहीं।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मैं भी अपनी ही माया भूल गया हूँ?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हम सब भूले हुए हैं। हम अपनी ही कथा में फँस गए हैं। यह तपस्या इसी के लिए है, याद लाने के लिए।”
राम ने पानी की ओर देखा और पूछा – “गुरुदेव, क्या मेरे लिए भी कोई तपस्वी आएगा?”
वसिष्ठ बोले – “राम, तुम्हारे लिए मैं आया। मैं तुम्हारा हेतुक का गुरु हूँ। बस तुम जादूगर नहीं, राजा हो, और तुम्हारी कथा अलग है।
“पर मूल बात एक है। तुम जिस संसार में हो, वो तुम्हारी ही चेतना का रूप है। यह बात भीतर बैठ जाए, तो तुम्हारा संसार वैसा ही रहेगा, पर तुम उसके भीतर अलग हो जाओगे।”
राम मान गए।
राम ने फिर कहा – “गुरुदेव, हेतुक की कथा में एक और बात।”
वसिष्ठ ने पूछा – “क्या?”
राम बोले – “हेतुक ने अपने नगर में एक रानी से बहुत बच्चे पैदा किए। वो बच्चे क्या हुए?”
वसिष्ठ बोले – “राम, अच्छा प्रश्न। जब हेतुक की चेतना नगर से लौटी, तब वो बच्चे भी हलके हो गए। वो किसी और चेतना से नहीं थे, बस हेतुक की कल्पना से थे। हेतुक की कल्पना गई, तो वो भी गए।”
राम कुछ देर सोचकर बोले – “गुरुदेव, यह तो विचित्र है, क्योंकि वो बच्चे अपने आप में चेतन थे, फिर भी ख़त्म हो गए।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह बात गहरी है, बहुत साधक इस पर सोचते हैं। पर एक बात समझो। उन बच्चों की चेतनाएँ कहीं नहीं गईं, बस उनके रूप गए। चेतना तो सबके लिए एक ही है। बच्चों की चेतना हेतुक की चेतना ही थी, और हेतुक की चेतना अब भी है।”
राम बोले – “गुरुदेव, यह बात मुझे पूरी तरह समझ नहीं आ रही।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह बात बहुत बरस के बाद समझ आती है।”
राम कुछ देर मौन रहे।
फिर राम ने पूछा – “गुरुदेव, एक और प्रश्न। हेतुक के नगर के जो लोग हलके हुए, क्या उन्हें पता था?”
वसिष्ठ बोले – “राम, कुछ को पता था।”
राम ने पूछा – “कौन से?”
वसिष्ठ बोले – “वो जिनकी आँखें खुली थीं।”
राम ने पूछा – “मतलब?”
वसिष्ठ ने कहा – “राम, वो बूढ़ी स्त्री जो मरने से पहले समझ गई थी, उसकी कथा मैंने तुम्हें बताई। वो जान गई थी कि वो किसी की कल्पना से है, और उसी ज्ञान के साथ गई। शायद इससे उसकी चेतना हलकी हुई। पर बाक़ी लोगों को नहीं पता था।”
राम बोले – “गुरुदेव, मेरे लिए तो इसमें एक सबक है। अगर मैं भी किसी की कल्पना से हूँ, तो मुझे यह जल्दी जान लेना चाहिए।”
वसिष्ठ बोले – “राम, तुम जानने की राह पर हो।”
राम ने पानी की ओर देखा।
फिर राम ने पूछा – “गुरुदेव, जब मैं राजा बनूँगा, तो मेरे राज्य के लोग, क्या वो भी मेरी कल्पना से होंगे?”
वसिष्ठ बोले – “राम, यहाँ बात थोड़ा अलग है। तुम्हारे राज्य के लोग किसी और की कल्पना से नहीं होंगे, उनकी अपनी चेतनाएँ होंगी। पर तुम्हारे राज्य का स्वरूप, उसकी संरचना, उसकी मर्यादाएँ, वो तुम्हारी सोच से बनेंगी। तुम जो सोचोगे, वही होगा।”
राम बोले – “गुरुदेव, यह तो बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है।”
वसिष्ठ ने कहा – “हाँ।”
दोनों कुछ देर मौन रहे।
फिर राम बोले – “गुरुदेव, मुझे डर लग रहा है।”
वसिष्ठ ने पूछा – “क्यों?”
राम बोले – “क्योंकि मेरी सोच से ही मेरी प्रजा का जीवन बनेगा।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह डर अच्छा है, यह तुम्हें सावधान रखेगा। पर बहुत डर नहीं, क्योंकि डर से निर्णय कमज़ोर पड़ जाते हैं। बस इतना डर कि तुम सोच-समझकर निर्णय लो।”
राम ने फिर पूछा – “गुरुदेव, मेरी सोच कैसी हो?”
वसिष्ठ ने कुछ देर सोचकर कहा – “राम, तुम्हारी सोच में करुणा हो, न्याय हो, सच्चाई हो। अगर ये तीन हों, तो तुम्हारा राज्य अच्छा होगा।”
राम बोले – “मैं ये तीनों रखूँगा।”
वसिष्ठ ने कहा – “बहुत अच्छा, राम।”
बाहर रात हो चली थी, और राम को हलकी जम्हाई आई।
दोनों उठे और घर की ओर चले।
रास्ते में राम बोले – “गुरुदेव, हेतुक की कथा मेरे लिए एक चेतावनी है।”
वसिष्ठ ने पूछा – “क्या?”
राम बोले – “अपने ही नगर में मत फँसो।”
वसिष्ठ बोले – “बहुत अच्छी समझ।”
घर के पास पहुँचने तक दोनों मौन रहे।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के विभिन्न संदर्भों पर आधारित है। हेतुक की कथा माया-निर्माण और माया-भूलन के सिद्धान्त का सीधा रूपक है। एक जादूगर जो अपनी ही रचना में फँस जाता है, यह संसार के सिद्धान्त का सबसे सीधा चित्रण है। और तपस्वी का लौटकर अपने शिष्य को याद दिलाना, यह गुरु की भूमिका का सुन्दर उदाहरण है।
दर्शन-दृष्टि
हेतुक एक जादूगर है। उसके गुरु ने मना किया था, फिर भी अकेलेपन से तंग आकर वो अपनी विद्या से एक पूरा नगर रच देता है। नगर बसता है, उसमें लोग आ जाते हैं, हेतुक उनके बीच रहने लगता है, और कुछ समय बाद वो भूल जाता है कि उसने ही इसे रचा था। कथा यह कहती है कि माया कोई बाहरी छल नहीं, चेतना की अपनी रचना है जिसे वो ख़ुद रचकर भूल जाती है, और भूलने के बाद वो उसी रचना की प्रजा बन जाती है।
आदि शङ्कराचार्य (788-820) ने अपनी ब्रह्मसूत्र भाष्य में अध्यास (superimposition) की व्याख्या की, कि चेतना अपने ऊपर अपनी ही रचना का आरोप कर देती है, और आरोपित को असली मान लेती है। हेतुक की कथा इसी अध्यास का दृश्य रूप है। नगर वस्तुतः उसी का है, पर उसने अपने को नगर का निवासी मान लिया, और अब उसे नगर ज़्यादा असली लगता है अपने मूल रूप से। मुक्ति तब आती है जब वो दोनों के बीच के सम्बन्ध को फिर से पहचान ले।