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धर्ममय रथ: संसार-रिपु पर विजय

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अब राम पूरे रथ को एक ही दृष्टि में समेट देते हैं। इतने अंग गिनाने के बाद वे उस सार पर आते हैं जिसके लिए यह सारा वर्णन था।

सखा धर्ममय अस रथ जाकें।
जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥

मित्र, राम कहते हैं, जिसके पास ऐसा धर्ममय रथ है, उसे कहीं कोई शत्रु नहीं जीत सकता। न कोई तीर बड़ा है, न कोई तलवार, न कवच, न बाहरी रथ। सबसे ऊपर है यह धर्म का रथ। जिसने भीतर सत्य, संयम, करुणा और ईश्वर की ओर लगी सुरति गढ़ ली, बाहर का साज-सामान उसे परिभाषित नहीं करता।

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥

और फिर राम एक ऐसी बात कहते हैं जो पूरे रूपक को आकाश जितना ऊँचा कर देती है। संसार स्वयं महा-अजेय शत्रु है, ऐसा शत्रु जिसे जीतना सबसे कठिन है। पर जिस वीर का यह रथ दृढ़ है, वह इस संसार-रिपु को भी जीत सकता है। ध्यान दीजिए, राम अब विभीषण को मतिधीर कहकर पुकारते हैं, स्थिर बुद्धि वाला। जो कुछ पल पहले संशय में काँप रहे थे, वही अब धीर-मति कहलाए। यही तो इस उपदेश की कारीगरी है। बाहर रावण से युद्ध होना ही है, और राम जीतेंगे भी। पर जो सच्चा शत्रु है, वह भीतर बैठा है, और उससे लड़ाई हम सब रोज़ लड़ते हैं। जिसका धर्म-रथ दृढ़ है, वही इस भीतरी युद्ध का विजेता है।

यहीं तुलसीदास का कौशल पूरी तरह खुलता है। युद्ध के बीचोंबीच खड़े होकर वे युद्ध से भी बड़ी बात कह जाते हैं। बाहरी रथ किसी का भी छिन सकता है, पर यह भीतर का रथ कोई छीन नहीं सकता। जिसने इसे एक बार गढ़ लिया, उसकी विजय किसी की कृपा पर नहीं टिकती, अपने ही गुणों पर टिकती है। इसीलिए यह एक पंक्ति सदियों से लोगों के मन में ठहरी हुई है, चाहे वे किसी भी रण में उतरे हों।

आधार: तुलसीदास, रामचरितमानस, लंकाकाण्ड