रथ अब सज गया है। पहिये, ध्वजा, घोड़े, सारथी सब अपनी जगह। अब राम उन हथियारों की बात करते हैं जो इस रथ पर सजते हैं, और उस कवच की जो सबसे अभेद्य है। पर ये सब हथियार भीतर के हैं।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा।
बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥
दान इस रथ का फरसा है, बुद्धि उसकी प्रचण्ड शक्ति, और उत्तम विज्ञान वह कठोर धनुष जिसकी डोर सहज नहीं खिंचती। राम दान को फरसा क्यों कहते हैं? क्योंकि लोभ मनुष्य का बड़ा शत्रु है, और दान वही फरसा है जो लोभ की जड़ काट देता है। जो देना सीख लेता है, उसके भीतर से बटोरने की भूख अपने आप कटने लगती है।
अमल अचल मन त्रोन समाना।
सम जम नियम सिलीमुख नाना॥
यह सबसे नया और गहरा रूपक है। तरकश वह होता है जिससे तीर निकलते हैं। राम कहते हैं कि निर्मल और अचल मन ही वह तरकश है। जिसका मन मैल से रहित और डगमगाहट से मुक्त है, उसी के भीतर से सारे सद्गुण तीर बनकर निकलते हैं। और वे तीर कौन से हैं? समता, यम और नियम के अनेक बाण।
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा।
एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥
अन्त में सबसे अभेद्य कवच। ब्राह्मण और गुरु का सम्मान, राम कहते हैं, यही ऐसा कवच है जिसे कोई भेद नहीं सकता, और इसके समान विजय का दूसरा कोई उपाय है ही नहीं। यह बड़े बल की बात है। अहंकार के तीर सबसे घातक होते हैं, और गुरु के आगे झुकना ही वह कवच है जो अहंकार को भीतर घुसने नहीं देता।
आधार: तुलसीदास, रामचरितमानस, लंकाकाण्ड