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विभीषण का समर्पण: उपदेश का मर्म

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राम की वाणी पूरी हो चुकी है। सारा धर्ममय रथ आँखों के सामने खड़ा है। अब बारी विभीषण की है। जो कुछ पल पहले संशय से भरे थे, उनके भीतर क्या बीत रही है, तुलसीदास इसे एक ही दोहे में रख देते हैं।

सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।
एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥

प्रभु के वचन सुनकर विभीषण हर्ष से भर उठे और उनके चरण-कमल थाम लिए। और भीतर से जो भाव उमड़ा वह यह था। हे राम, हे कृपा और सुख के भण्डार, युद्ध की बात के बहाने आपने तो मुझे जीवन का उपदेश दे दिया। यही विभीषण का समर्पण है। न कोई तर्क, न कोई और प्रश्न, बस चरणों में झुका हुआ एक कृतज्ञ हृदय। जो संशय से आरम्भ हुआ था, वह चरण-वंदन पर आकर पूरा हुआ।

ठहरकर देखिए तो यह पूरा उपदेश किस चतुराई से रचा गया है। राम युद्ध के ऐन मुहाने पर खड़े होकर, रावण से भिड़ने से ठीक पहले, विभीषण को समझाते हैं कि असली युद्ध और है। बाहर का रण तो होगा ही। पर जो रथ सच में जिताता है, वह हमारे अपने गुणों का बना है।

एक बार उस रथ के अंगों को फिर याद कर लीजिए। पहिये हैं शौर्य और धैर्य। ध्वजा-पताका हैं सत्य और शील। घोड़े हैं बल, विवेक, दम और परहित, और उनकी लगाम हैं क्षमा, कृपा और समता। सारथी है ईश्वर का भजन। ढाल है विरक्ति, तलवार है संतोष, फरसा है दान, शक्ति है बुद्धि, और धनुष है विज्ञान। तरकश है निर्मल अचल मन, तीर हैं सम, यम और नियम, और सबसे अभेद्य कवच है गुरु और विप्र का सम्मान। इनमें से अधिकतर अंग भीतर के हैं, बाहर के नहीं। और सबसे बड़ी बात यह कि ये एक-दूसरे पर टिके हैं। एक भी कमज़ोर पड़े तो रथ अधूरा रह जाता है।

इसीलिए विभीषण गीता आज भी उतनी ही सच्ची है जितनी उस रणभूमि पर थी। जिस दिन आप अपने भीतर एक अंग भी थोड़ा और दृढ़ कर लें, समझिए उस दिन संसार-रूपी उस महा-अजेय शत्रु को आपने थोड़ा और पीछे धकेल दिया।

आधार: तुलसीदास, रामचरितमानस, लंकाकाण्ड