पहिये लग गए, ध्वजा फहर उठी। अब राम उस शक्ति की बात करते हैं जो रथ को खींचती है, और उस बुद्धि की जो उसे राह दिखाती है। घोड़े, और सारथी।
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे॥
बल, विवेक, दम और परहित, ये चार घोड़े इस रथ को खींचते हैं। बल यानी सामर्थ्य, विवेक यानी भले-बुरे की परख, दम यानी अपने ऊपर संयम, और परहित यानी दूसरों के भले की ओर लगी दृष्टि। पर घोड़े बिना लगाम के बेकाबू हो जाते हैं, इसलिए राम उनमें क्षमा, कृपा और समता की रस्सी जोड़ देते हैं। बल जब क्षमा से बँधता है तो हिंसक नहीं होता, विवेक जब कृपा से बँधता है तो कठोर नहीं रहता, और दम जब समता से बँधता है तो रूखा नहीं पड़ता। हर घोड़े को उसकी अपनी लगाम चाहिए।
ईस भजनु सारथी सुजाना।
बिरति चर्म संतोष कृपाना॥
अब सबसे बड़ी बात। रथ कितना ही सुन्दर हो, बिना कुशल सारथी वह कहाँ जाएगा? राम कहते हैं कि ईश्वर का भजन ही वह सुजान सारथी है। जिसकी सुरति निरन्तर ईश्वर की ओर लगी रहती है, उसका रथ कभी गलत मोड़ नहीं लेता। और साथ ही दो और अंग आते हैं। विरक्ति उसकी ढाल है, क्योंकि दुनिया के प्रहारों से सबसे अच्छी रक्षा अनासक्ति ही देती है। और संतोष उसकी तलवार है, क्योंकि संतोष असंतोष को जड़ से काट देता है। यह सोचकर अचरज होता है कि जिसे लोग हथियार भी नहीं मानते, उसी संतोष को राम सबसे पैनी तलवार कह रहे हैं।
आधार: तुलसीदास, रामचरितमानस, लंकाकाण्ड