राम ने कहा था कि विजय का रथ और ही है। अब वे उसका वर्णन आरम्भ करते हैं, और तुलसीदास का सबसे प्रसिद्ध रूपक यहीं से खुलता है। यह कोई लकड़ी और लोहे का रथ नहीं। यह भीतर का रथ है, मनुष्य के अपने गुणों से गढ़ा हुआ। पहला अंग वही जो रथ को गति देता है, उसके पहिये।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
शौर्य और धैर्य, ये उस रथ के दो पहिये हैं। और सत्य तथा शील उसकी दृढ़ ध्वजा और पताका। राम बड़ी सूझ से पहिये चुनते हैं। शौर्य यानी साहस, और धैर्य यानी धीरज। अकेला साहस उतावला होकर गिरा देता है, अकेला धीरज बैठा रह जाता है। दोनों पहिये साथ घूमें, तभी रथ आगे बढ़ता है। एक ओर बढ़ने का बल, दूसरी ओर रुककर सम्हलने की शक्ति।
पताका रथ का सबसे ऊँचा, दूर से दिखने वाला चिह्न होती है। राम कहते हैं कि उस ऊँचाई पर सत्य और शील फहरने चाहिए। यहाँ एक प्रश्न अपने आप उठ खड़ा होता है, जो आप अपने भीतर पूछ सकते हैं। हम दुनिया को क्या दिखाते हैं? हमारे जीवन की सबसे ऊँची पताका पर क्या लिखा है? यदि वहाँ सत्य और शील का चिह्न लहरा रहा है, तो समझ लीजिए कि रथ सही राह पर है।
ध्यान देने योग्य है कि राम इस रथ में कहीं क्रोध या छल को स्थान नहीं देते। जो सबसे पहले आता है, वह प्रेरणा है, साहस और धीरज। इसके बाद ही सामर्थ्य और आचरण के अंग आएँगे। तुलसीदास एक-एक अंग को क्रम से रखते हैं, मानो कोई कुशल रथकार अपने हाथों से रथ जोड़ रहा हो।
आधार: तुलसीदास, रामचरितमानस, लंकाकाण्ड