लुल्ला परिवारLulla Family
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सुनने से पहले बना हुआ उत्तर

संपादकीय चिंतन

किसी परिचित को सुनते हुए ध्यान दीजिए कि अपना उत्तर कितनी जल्दी तैयार होने लगता है। उनका वाक्य अभी बीच में है; हम उसके अन्त का अनुमान लगा चुके हैं। कोई पुरानी शिकायत पहचान ली, कोई सलाह निकाल ली, या अपनी सफ़ाई का पहला वाक्य चुन लिया। चेहरा सुनने वाले का रहता है, भीतर बोलने की तैयारी चलती है। इस जल्दी में सामने वाला अपनी बात पूरी करने से पहले ही हमारे पुराने परिचय में समा जाता है।

गीता के अठारहवें अध्याय में कृष्ण, अपने कहे ज्ञान पर पूरी तरह विचार करके अर्जुन को अपनी इच्छा के अनुसार करने को कहते हैं। यह 18.63 का आशय है। उसके तुरन्त बाद वे फिर बोलते हैं; उपदेश और शरणागति का प्रसंग आगे चलता है। इसलिए इस एक श्लोक को उठाकर पूरे संवाद का अर्थ मनमानी की छूट कर देना उचित नहीं होगा। फिर भी यहाँ विचार करने के लिए दिया गया अवकाश ध्यान खींचता है। सुनने वाले को समझना है कि उसने क्या सुना।

किसी सलाह को मान लेने के भी कई ढंग होते हैं। कभी बात सचमुच समझ में आती है। कभी कहने वाले की उम्र, पद या अपनापन हमें सिर हिलाने को विवश कर देता है। कभी बातचीत लम्बी न हो, इसलिए हाँ कह देते हैं। विचार का अवकाश मिले तो शायद अपनी हाँ का कारण भी सुनाई दे। क्या यह निर्णय अपना है, या अभी केवल सम्बन्ध निभाने की कोशिश है?

घर की बातचीत में ऐसा अवकाश देना थोड़ा असुविधाजनक हो सकता है। सामने वाला और सोचना चाहता है तो लगता है कि बात का सम्मान नहीं हुआ। यहीं ज़रा ठहरने की जगह है। सलाह की क़द्र कभी उसके तुरन्त स्वीकार से दिखती है, कभी उस पर किए गए गम्भीर विचार से। जिसे हम अपना मानते हैं, उसके विचार का समय भी अपनापे में शामिल हो सकता है।

सुनने वाले की ओर भी कुछ काम बचा रहता है। केवल चुप रहना पर्याप्त नहीं। किसी बात को अपने शब्दों में दोहराकर देखिए; कहाँ अर्थ साफ़ है और कहाँ हमने अनुमान जोड़ दिया है? जो हिस्सा चुभा, उसे बाक़ी बात से अलग रखकर फिर सुनिए। शायद उसमें कोई तथ्य हो जिसे हम स्वीकारने से बच रहे हों। शायद तथ्य ठीक हो और उससे निकाला गया निष्कर्ष अधूरा। दोनों को अलग पहचानने के लिए मन में थोड़ी खुली जगह चाहिए।

असहमति के समय यह जगह और काम आती है। दूसरे का तर्क ठीक-ठीक समझ लेना हमें उसका अनुयायी नहीं बना देता। इतना अवश्य होता है कि हमारा उत्तर उस बात से मिलता है जो वास्तव में कही गई थी। तब पुराना हिसाब, अनुमानित नीयत और सुनी हुई बात एक ही गठरी में नहीं बँधते। बातचीत का स्वर भी शायद बदल सके। सामने वाले के वाक्य को उसके पूरे आकार में रहने दिया गया है।

अगली बार किसी निकट व्यक्ति से सलाह माँगें, तो उत्तर सुनने के बाद थोड़ी देर उसे साथ रखिए। तुरन्त धन्यवाद या प्रतिवाद के आगे भी एक सम्भव वाक्य है: मैं इस पर सोचकर आपसे फिर बात करना चाहूँगा। और यदि सलाह आपने दी है, तो उस लौटने की जगह बची रहने दीजिए। गीता का यह छोटा विराम हमारे लिए इतना प्रश्न छोड़ सकता है: अपनी बात कह चुकने के बाद, क्या हम दूसरे के विचार को भी समय दे पाते हैं?

स्रोत और इस चिंतन का दायरा

आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी महाभारत, भीष्मपर्व 42, भगवद्गीता 18.63; अगला प्रसंग 18.64 से 66 भी पढ़ा गया है। भक्तिवेदान्त बुक ट्रस्ट का स्वतंत्र अनुवाद, 18.63, से आशय मिलाया गया है।

इस प्रस्तुति का दायरा: सुनने और विचार करने पर संपादकीय चिंतन। घरेलू बातचीत के उदाहरण लेखक की विवेचना हैं, श्लोक का अनुवाद नहीं। गीता का आगे का भक्ति और शरणागति सम्बन्धी प्रसंग इस एक श्लोक में समाप्त नहीं होता।