Chapter 11: विश्वरूप दर्शन योग

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अध्याय 11

विश्व-रूप दर्शन योग

ब्रह्मांडीय रूप का दर्शन
अर्जुन ने कहा, ”मुझे दिखाइए।” कृष्ण ने अपना विश्व-रूप दिखाया, सब देवता, सब लोक, समय का गला। अर्जुन काँप उठा।
55 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 10 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥

मैं काल हूँ, संसार का संहार करने वाला, बढ़ा हुआ। मैं इन सब को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हूँ। आपके बिना भी ये योद्धा नहीं बचेंगे।

गीता 11.32

विश्व-रूप, कृष्ण का ब्रह्मांडीय रूप
विश्व-रूप, सब लोक, सब देवता, सब काल कृष्ण के एक रूप में।

पाठ-संदर्भ

ग्यारहवाँ अध्याय भगवद् गीता का सबसे नाटकीय-हिस्सा है। पचपन श्लोक, और इन्हीं में कृष्ण अपना विश्व-रूप अर्जुन को दिखाते हैं। श्लोक बत्तीस की पंक्ति, “कालो अस्मि लोक-क्षय-कृत्” (मैं काल हूँ, संसार का संहार करने वाला), इतिहास में सबसे प्रसिद्ध पंक्तियों में से एक बन गयी। जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर, जिन्होंने अमेरिकी मैनहैटन-परियोजना का नेतृत्व किया, ने 16 जुलाई 1945 के ट्रिनिटी-परीक्षण के बाद इस पंक्ति को उद्धृत किया। ओपेनहाइमर भौतिक-विज्ञानी थे, पर उन्होंने संस्कृत सीखी थी और गीता को मूल में, बीसवीं सदी के तीसरे दशक में पढ़ा था। उन्होंने अपने जीवन-काल में दो-तीन बार सार्वजनिक-इंटरव्यू में यह पंक्ति दोहरायी।

अध्याय का सार

अर्जुन ने अध्याय 10 के बाद कहा, ‘आपने अपनी विभूतियाँ बता दीं। अब असली रूप दिखाइए।’ कृष्ण ने पहले बताया कि साधारण आँखों से यह दिखेगा नहीं, और ‘दिव्य-चक्षु’ दिए।

और तब वो रूप दिखा। हज़ारों मुख, हज़ारों आँखें, हज़ारों भुजाएँ। सब देवता उसी में, सब लोक उसी में, सूर्य-चन्द्र-तारे उसी में। और सामने एक मुख, जिसमें सब सेनाएँ अंदर जा रही थीं।

अर्जुन घबरा गया। पूछा, ‘आप कौन हैं?’ कृष्ण ने जवाब दिया: ‘मैं काल हूँ, संसार के नाश का कारण। यह सेनाएँ तो मार ही दी जा चुकी हैं। आप बस निमित्त बन।’

अर्जुन ने हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी कि मित्र समझकर ‘अरे कृष्ण’ कहता रहा। फिर प्रार्थना की कि वो साधारण रूप में लौट आएँ। कृष्ण लौट आए। और कहा, ‘यह रूप आपको इसलिए दिखाया कि कोई और इसे नहीं देख पाता। यह केवल भक्ति से देखा जा सकता है।’

मुख्य श्लोक

श्लोक 11.32

श्रीभगवानुवाच ।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
साधारण अनुवाद‘मैं काल हूँ, संसार का नाश करने वाला, और बढ़ता हुआ हूँ। मैं यहाँ लोकों को समेटने में लगा हूँ। आपके बिना भी, इन सब विरोधी सेनाओं में खड़े योद्धा नहीं बचेंगे।’

पूरी गीता का सबसे चौंकाने वाला कथन। यह वही ‘कालोऽस्मि’ है जो ओपेनहाइमर के मन में ट्रिनिटी-परीक्षण के समय उभरा था।

श्लोक 11.33

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
साधारण अनुवाद‘इसलिए उठ, यश पा। शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य भोग। ये पहले से ही मेरे द्वारा मार दिए गए हैं। आप बस निमित्त बन, हे सव्यसाची।’

कृष्ण का सबसे साफ़ निर्देश। ‘आप तो केवल माध्यम हैं।’ इस बोध में कर्ता-भाव गिर जाता है।

श्लोक 11.55

A small fishing boat with a golden sail rides a rough sea; figures struggle in the water around it; sunlight breaks through to the boat
विश्वरूप के बाद की प्रार्थना। काल का दर्शन हो चुका, और भक्त उसी रूप से रक्षा माँगता है।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
साधारण अनुवाद‘जो मेरा कर्म करता है, मुझे ही परम मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति-रहित है, सब प्राणियों से वैर-रहित है, हे पाण्डव, वही मुझे प्राप्त होता है।’

पूरे अध्याय का समापन सूत्र। पाँच गुण: मेरा काम, मेरा लक्ष्य, मेरा प्रेम, अनासक्ति, और सब के प्रति निर्वैरता।

सारएक वाक्य में: समय ख़ुद कृष्ण है, और जो लड़ाई होनी है वो पहले से तय। आप तो बस अपना हिस्सा निभाने के लिए हैं।