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वृत्रासुर-वध और नहुष का पतन

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तीनों लोक बहुत दिनों से एक ही युद्ध से थके पड़े थे। एक ओर देवराज इन्द्र, दूसरी ओर त्वष्टा का पुत्र वृत्रासुर, जिसने अपने तेज से सारे ब्रह्माण्ड को ढँक लिया था और जो तीनों लोकों को भस्म कर देने तथा देवताओं को निगल जाने को उद्यत जान पड़ता था। उन दोनों का यह बैर मुनियों, गन्धर्वों, किन्नरों और मनुष्यों तक को कष्ट दे रहा था।

तब कुछ तपस्वी ऋषि बीच में पड़े। वृत्रासुर के उत्तम आश्रम में जाकर उन्होंने मीठे और नीतिभरे वचनों से कहा, हे महाभाग वृत्र! इन्द्र के साथ आपका यह वैर आप दोनों के सुख को खा रहा है। आप दोनों में स्थायी मैत्री हो जाए तो हम सब तपस्वी और गन्धर्व भी अपने आश्रमों में सुख से रह सकें। हम बीच में पड़कर शपथ करा देंगे, और इन्द्र भी आपके सम्मुख शपथ लेकर आपका मित्र बन जाएगा।

वृत्रासुर बोला, हे मुनियो! आप सब मेरे मान्य हैं। किन्तु वैरी, मूर्ख, कपटी और निर्लज्ज का विश्वास नहीं करना चाहिए। यह इन्द्र निर्लज्ज, दुराचारी और ब्राह्मणघाती है। फिर भी यदि सन्धि करनी ही है, तो एक शर्त पर। न सूखी वस्तु से, न गीली से, न पत्थर से, न काठ से, न वज्र से, और न दिन में, न रात में मेरा वध हो सके, इसी शर्त पर मैं इन्द्र से सन्धि करूँगा, अन्यथा नहीं।

ऋषियों ने आदरपूर्वक यह शर्त स्वीकार की और इन्द्र को बुलाकर सुना दी। इन्द्र ने भी मुनियों के सामने अग्नि को साक्षी करके शपथ ली। वृत्रासुर उनकी बातों में आ गया और मित्र की भाँति उनके साथ रहने लगा। दोनों कभी नन्दनवन में, कभी समुद्र के तट पर आनन्द से विचरते रहे। पर भीतर-ही-भीतर इन्द्र वध का उपाय ढूँढ़ते रहते थे।

गोधूलि की घात

वृत्र का पिता त्वष्टा जानता था कि उसके पुत्र का अपने शत्रु पर इतना विश्वास ठीक नहीं। उसने समझाया, हे पुत्र! जिससे एक बार बैर हो चुका हो, उसका विश्वास कभी मत कीजिए। यह वही इन्द्र है जिसने कभी माता के गर्भ में घुसकर गर्भ के सात टुकड़े किए, फिर हर टुकड़े के सात, और वे ही उनचास मरुद्गण बने। ऐसे छिद्रान्वेषी पर भरोसा न कीजिए। पर मृत्यु जिसके सिर पर हो, उसे कहाँ चेत आता है; वृत्र ने पिता की एक न सुनी।

एक दिन इन्द्र ने उस महादैत्य को समुद्र के तट पर अकेला देखा। वह अत्यन्त भयंकर सन्ध्याकाल था, जब न दिन रहता है न रात। इन्द्र ने सोचा, यही वह घड़ी है जिसे शर्त छू नहीं सकती, स्थान एकान्त है और शत्रु अकेला; आज ही इसे मार डालना चाहिए। यह विचारकर उन्होंने मन-ही-मन अविनाशी श्रीहरि का स्मरण किया, और पुरुषोत्तम विष्णु अदृश्यरूप से आकर इन्द्र के वज्र में प्रविष्ट हो गए।

तभी इन्द्र को समुद्र में पर्वत के समान उठता हुआ झाग दिखाई पड़ा। न वह सूखा था, न गीला, न कोई शस्त्र; इन्द्र ने उस समुद्रफेन को लीलापूर्वक उठा लिया। फिर उन्होंने परम भक्ति से जगदम्बा पराशक्ति का स्मरण किया, और स्मरण करते ही देवी ने अपना अंश उस फेन में स्थापित कर दिया। श्रीहरि से युक्त वज्र को उस फेन से ढँककर इन्द्र ने वृत्रासुर पर दे मारा। उस अचानक प्रहार से वह पर्वत की भाँति गिर पड़ा और वहीं मारा गया। इसी से देवी संसार में वृत्रनिहन्त्री नाम से विख्यात हुईं; वृत्र चूँकि प्रकटरूप से इन्द्र के हाथों गिरा, इसलिए कहा जाता है कि इन्द्र ने उसे मारा।

ब्रह्महत्या की छाया

वृत्र के गिरते ही मानो पाप की छाया चारों ओर फैल गई। हत्या के भय से भगवान् विष्णु वैकुण्ठ लौट गए, और इन्द्र भी डरकर अपनी पुरी की ओर भागे। जिन मुनियों ने बीच में पड़कर मित्रता कराई थी, वे पछताने लगे कि विश्वासघाती का साथ देकर हमारा मुनि-नाम ही व्यर्थ हो गया। उधर पुत्र के मारे जाने का समाचार पाकर त्वष्टा फूट-फूटकर रोया। विधिपूर्वक उसका पारलौकिक संस्कार करके उस शोकसन्तप्त पिता ने इन्द्र को शाप दिया कि जैसे छल और झूठी शपथ से इसने मेरे पुत्र को मारा है, वैसे ही यह भी विधाता का दिया महान् दुख भोगे।

शाप फला। वृत्र के मरते ही इन्द्र का सारा तेज हर गया। सब देवता उनकी निन्दा करने लगे, धीरे-धीरे कहने लगे कि यह तो ब्रह्महत्यारा है। ब्रह्महत्या के भय से घिरे इन्द्र को न घर में सुख था, न नन्दनवन में, न अमृत में। घबराई हुई शची से इतना कहकर वे घर से निकल पड़े और मानसरोवर चले गए। वहाँ भय और शोक से पीड़ित होकर वे एक कमलनाल में सर्प की भाँति छिपकर, सब प्राणियों से अदृश्य होकर रह गए।

इन्द्र के इस प्रकार लुप्त हो जाने पर स्वर्ग अनाथ हो गया। अनेक उत्पात होने लगे, अनावृष्टि आ पड़ी, नदियों के स्रोत सूख गए और पृथ्वी वैभवहीन हो गई। इस अराजकता को देखकर देवताओं और मुनियों ने विचार कर नहुष नामक राजर्षि को इन्द्र के आसन पर बैठा दिया।

नहुष का दर्प

राज्य पाते ही धर्मात्मा नहुष रजोगुण के वश काम के बाणों से बिंध गया। अप्सराओं से घिरा वह विषय में डूब गया, और इन्द्राणी शची के गुण सुनकर उन्हीं को पाने की ठान बैठा। उसने ऋषियों से कहा, मुझे देवताओं ने इन्द्र बनाया है, तो शची भी मेरी ही हुई; उन्हें शीघ्र मेरे भवन में भेजिए।

यह सुनकर सती शची काँप उठीं और देवगुरु बृहस्पति की शरण में गईं, हे ब्रह्मन्! नहुष से मेरी रक्षा कीजिए, मैं आपकी शरण में हूँ। बृहस्पति ने अभय दिया, हे देवि! पाप से मोहित नहुष से मत डरिए; सनातन धर्म को छोड़कर मैं आपको उसे नहीं दूँगा। जो शरणागत दुखिया को दूसरों के हाथ सौंप देता है, वह प्रलय तक नरक में पड़ा रहता है।

नहुष क्रुद्ध हुआ, पर देवताओं ने उसे समझाया कि पति के जीवित रहते पतिव्रता किसी दूसरे को पति नहीं बना सकती। तब बृहस्पति की सलाह से शची स्वयं नहुष के पास गईं और चतुराई से समय माँग लिया, हे राजेन्द्र! जब तक मैं यह निश्चय न कर लूँ कि मेरे पति इन्द्र जीवित हैं या नहीं, तब तक की मुझे मोहलत दीजिए; निश्चय होते ही मैं आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगी। मदमत्त नहुष ने प्रसन्न होकर यह बात मान ली।

इधर देवता वैकुण्ठ जाकर भगवान् विष्णु की शरण में गए। विष्णु ने कहा, इन्द्र के पाप की निवृत्ति के लिए अश्वमेध यज्ञ कराइए; उस पुण्य से इन्द्र पवित्र होकर फिर अपना पद पा लेंगे। जिनके स्मरणमात्र से पापों का जाल कट जाता है, उन जगदम्बा को प्रसन्न करने के लिए किए गए अश्वमेध का तो कहना ही क्या! नहुष भी जगन्माता की माया से मोहित होकर शीघ्र ही अपने ही पाप से नष्ट हो जाएगा। देवताओं ने बृहस्पति के नेतृत्व में इन्द्र को आश्वासन देकर अश्वमेध महायज्ञ सम्पन्न कराया, और विष्णु ने इन्द्र की ब्रह्महत्या को बाँटकर वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियों पर डाल दिया; इस प्रकार इन्द्र पापरहित हो गए, फिर भी अच्छे समय की प्रतीक्षा में जल में ही छिपे रहे।

बृहस्पति के कहने पर शची ने भगवती श्रीभुवनेश्वरी का मन्त्र विधिपूर्वक ग्रहण किया और भोगों को त्यागकर, तपस्विनी का वेश धरकर देवी की आराधना करने लगीं। कुछ समय बाद प्रसन्न होकर हंस पर सवार, त्रिनेत्रा, वरदायिनी भगवती प्रत्यक्ष प्रकट हुईं और शची को अपनी दूती के साथ मानसरोवर भेज दिया, जहाँ उन्हें अपने भयभीत और दुखी पति इन्द्र के दर्शन हुए। देवी ने वचन दिया कि वे शीघ्र ही मोहग्रस्त नहुष को इन्द्रपद से गिरा देंगी।

सर्प, सर्प

पति को पाकर भी शची का भय गया नहीं। इन्द्र ने उन्हें एक उपाय बताया, जब वह दुष्ट राजा आपको बलपूर्वक पाना चाहे, तब उससे कहिए कि हे जगत्पते! आप ऋषियों के द्वारा उठाई जानेवाली पालकी पर चढ़कर मेरे पास आइए; तभी मैं आपकी हो जाऊँगी। काम से अन्धा वह राजा मुनियों को अपनी पालकी में जोत लेगा, और तपस्वी अवश्य ही उसे शाप से भस्म कर देंगे। जगदम्बा के चरणों का स्मरण करनेवाले पर कभी संकट नहीं आता।

शची ने वैसा ही किया। नहुष ने यज्ञ-दान के पुण्य की शपथ खाकर उनका वचन मानने का वचन दिया। शची बोलीं, हे सुराधिप! मैं चाहती हूँ कि आपका वाहन ऐसा विलक्षण हो जो विष्णु, रुद्र, असुरों या राक्षसों के पास भी न हो। अपने व्रत में अटल समस्त मुनिगण आपकी पालकी ढोएँ; मैं आपको सब देवताओं से बड़ा मानती हूँ, इसीलिए आपके तेज की वृद्धि चाहती हूँ। महादेवी की रची माया से मोहित बुद्धिहीन नहुष हँसकर मान गया।

उसने सब मुनियों को बुलाया और अभिमान से कहा, हे विप्रगण! मैं अब सर्वशक्तिमान् इन्द्र हूँ; गर्व छोड़कर मेरा यह कार्य कीजिए। अगस्त्य आदि प्रमुख ऋषियों ने उसकी यह अनादरभरी बात सुनी, और भावी के वश कृपापूर्वक स्वीकार कर ली। नहुष तुरन्त एक सुन्दर पालकी पर चढ़ बैठा और दिव्य मुनियों को ढोने में लगाकर उतावला होकर पुकारने लगा, सर्प, सर्प, अर्थात् शीघ्र चलिए, शीघ्र चलिए।

काम से अन्धे उस मूर्ख ने वातापि को पचा जानेवाले और समुद्र तक को पी जानेवाले तपस्वीश्रेष्ठ अगस्त्य के मस्तक को पैर से छू दिया, और उतावलेपन में उन पर कोड़े से प्रहार भी कर दिया। तब उस आघात को स्मरण करते हुए क्रुद्ध मुनि ने शाप दे दिया, हे दुराचारी! सर्प ही जिसे इतना प्रिय है, वह वन में भयंकर विशाल सर्प ही हो जाए, जहाँ सहस्रों वर्ष तक महान् क्लेश भोगते हुए विचरण करना पड़े।

शाप पाते ही राजर्षि नहुष उन मुनिश्रेष्ठ की स्तुति करते हुए अचानक स्वर्ग से गिर पड़ा और सर्परूपधारी हो गया। बृहस्पति ने शीघ्र मानसरोवर जाकर इन्द्र को सारा वृत्तान्त कह सुनाया। नहुष के पतन की बात सुनकर इन्द्र परम प्रसन्न हुए। तब सब देवता और मुनि उस सरोवर के पास गए जहाँ इन्द्र छिपे थे, और सम्मानपूर्वक उन्हें स्वर्ग ले आए। आसन पर बैठाकर उनका पवित्र अभिषेक किया गया, और इन्द्र अपना पद पुनः पाकर प्रेमयुक्त शची के साथ नन्दनवन में विहार करने लगे।

अपने ही छल का महान् दुख भोगकर, अन्त में देवी की कृपा से ही इन्द्र ने अपना स्थान फिर पाया।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)