रणभूमि में भगवती का शंख गूँजा तो उस भीषण ध्वनि को सुनकर रक्तबीज बड़े वेग से चामुण्डा के पास आया और मीठी वाणी में बोला, हे बाले! क्या आप मुझे कायर धूम्रलोचन समझ बैठी हैं? मेरा नाम रक्तबीज है। यदि युद्ध की इच्छा है तो तैयार हो जाइए। फिर उसने भी वही राग छेड़ा कि संसार में शृंगार और शान्ति ही मुख्य रस हैं, संयोग में ही सुख है, इसलिए शुम्भ या निशुम्भ जैसे किसी महाबली को पति बना लीजिए। उसकी बातें सुनकर चामुण्डा, कालिका और अम्बिका हँस पड़ीं। मेघ-सी गम्भीर वाणी में भगवती बोलीं, मैं दूत से पहले ही कह चुकी हूँ कि तीनों लोकों में जो भी पुरुष रूप, बल और वैभव में मेरे समान हो, उसी का वरण करूँगी। जाकर शुम्भ-निशुम्भ से कह दीजिए कि मैंने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली है; अब या तो मुझसे युद्ध कीजिए, अथवा अपने स्वामी के साथ पाताल चले जाइए।
मातृशक्तियों का आगमन
यह सुनकर रक्तबीज क्रोध से भरकर देवी के सिंह पर बाण छोड़ने लगा; अम्बिका ने पत्थर पर घिसे तीखे बाणों से उसे बींध डाला और वह मूर्च्छित होकर रथ पर गिर पड़ा। अपने सेनापति को गिरा देख दैत्य-सेना हाहाकार करने लगी। तब शुम्भ ने कम्बोज देश के दानवों और कालकेय योद्धाओं समेत सारी चतुरंगिणी सेना को युद्ध में झोंक दिया। उस मदमत्त सेना को आते देख चण्डिका ने बार-बार घण्टानाद किया, धनुष की टंकार और शंखध्वनि की, और काली भी मुख फैलाकर घोर गर्जन करने लगीं। उस भयंकर शब्द को सुनकर देवी का सिंह भी गरजने लगा।
उसी समय ब्रह्मा आदि देवताओं की शक्तियाँ, जिस देवता का जैसा रूप और वाहन था वैसा ही धारण किए, चण्डिका के पास आ पहुँचीं। हंस पर सवार, अक्षसूत्र और कमण्डलु लिए ब्रह्माणी आईं; गरुड़ पर आरूढ़ शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए वैष्णवी आईं; वृषभ पर सवार त्रिशूल लिए, मस्तक पर अर्धचन्द्र और सर्प के कंगन पहने माहेश्वरी आईं; मयूर पर शक्ति लिए कौमारी, श्वेत हाथी पर वज्र लिए ऐन्द्री, प्रेत पर सूकर-रूप में वाराही, नृसिंह-सा रूप धरे नारसिंही, भैंसे पर दण्ड लिए याम्या, तथा वारुणी और कौबेरी भी अपनी-अपनी सेना के साथ रणभूमि में उपस्थित हुईं। ब्रह्माणी अपने कमण्डलु के जल के छींटे मात्र से महाबली दानवों को प्राणहीन कर देती थीं; माहेश्वरी त्रिशूल से, वैष्णवी गदा और चक्र से, ऐन्द्री वज्र से, वाराही अपनी दाढ़ों से और नारसिंही अपने नखों से दैत्यों का संहार कर रही थीं। कौमारी तीखे बाणों से, वारुणी अपने पाश में बाँधकर, और शिवदूती केवल अपने अट्टहास से ही दानवों को धराशायी कर देती थीं, और चामुण्डा तथा कालिका उन्हें खा जाती थीं।
शिव बने भगवती के दूत
लोककल्याणकारी शिवजी भी उन शक्तियों के साथ आकर चण्डिका से बोले कि देवताओं के कार्य के लिए शुम्भ-निशुम्भ तथा समस्त असुर-सेना का संहार कर दीजिए। तभी चण्डिका के शरीर से एक अत्यन्त भयंकर शक्ति प्रकट हुई, जो सैकड़ों सियारिनों के समवेत स्वर-सी ध्वनि कर रही थी। मन्द-मन्द मुसकानवाली उस शक्ति ने पंचमुख शिवजी से कहा, हे देवदेव! आप मेरे दूत बनकर शुम्भ के पास जाइए और मेरे शब्दों में कह दीजिए कि वे स्वर्ग छोड़कर पाताल चले जाएँ जहाँ प्रह्लाद और बलि रहते हैं, अथवा युद्ध की इच्छा हो तो मरने के लिए आ जाएँ। भगवती ने शिवजी को दूत बनाकर भेजा, इसीलिए वे तीनों लोकों में शिवदूती नाम से विख्यात हुईं। शंकरजी ने शुम्भ की सभा में जाकर वह सन्देश सुनाया; उस कठोर सन्देश को सुनते ही दैत्य कवच बाँधकर, शस्त्र लेकर युद्ध के लिए निकल पड़े।
रक्तबीज का रक्त और काली की प्यास
अब वही रक्तबीज फिर रणभूमि में आ डटा, और उसके साथ वह अद्भुत वर भी था जो कभी शंकरजी ने उसे दिया था कि उसके शरीर से रक्त की जो बूँद पृथ्वी पर गिरे, उसी से उसी के समान पराक्रमी दानव तुरन्त उत्पन्न हो जाए। वैष्णवी शक्ति ने अपने चक्र से उस पर आघात किया तो घाव से रक्त की धारा बह चली, और मानो पर्वत से गेरू की धारा बहती हो। पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ बूँदें गिरतीं, वहाँ-वहाँ उसी आकार के हज़ारों दानव खड़े हो जाते। ऐन्द्री ने वज्र से, ब्रह्माणी ने ब्रह्मदण्ड से, माहेश्वरी ने त्रिशूल से और कौमारी ने शक्ति से उस पर प्रहार किया, पर हर प्रहार से और रक्त बहा और नये रक्तबीज उठ खड़े हुए। सारा जगत् उन्हीं से भर गया। यह देखकर देवता भयभीत हो उठे।
तब भगवती अम्बिका ने कमलनयनी कालिका से कहा, हे चामुण्डे! अपना मुख पूरी तरह फैला लीजिए और मेरे शस्त्राघात से निकले रक्त को एक भी बूँद भूमि पर गिरने से पहले पी जाइए; साथ ही दानवों का भक्षण करती हुई रणभूमि में विचरण कीजिए। मैं बाणों, गदा, तलवार और मूसल से इन दैत्यों को मारती हूँ; जब एक भी बूँद न गिरेगी, तब नये दानव उत्पन्न नहीं होंगे और इनका नाश निश्चित है। चामुण्डा रक्तबीज के शरीर से निकला सारा रुधिर पीने लगीं और उसके कटे अंगों को खाती गईं। उसके रक्त से उत्पन्न सभी नये रक्तबीजों को भी उन्होंने मार डाला और उनका रक्त पी गईं। जब सारे कृत्रिम रक्तबीज समाप्त हो गए, तब जो वास्तविक रक्तबीज था उसे भी खड्ग से मारकर कई टुकड़े कर भूमि पर गिरा दिया। शेष दानव भयभीत होकर शुम्भ के पास भागे और उससे बोले कि अम्बिका ने रक्तबीज को मार डाला, चामुण्डा उसका सारा रुधिर पी गई; अब सन्धि कर लीजिए, इस देवी से वैर उचित नहीं। पर शुम्भ ने न माना और निशुम्भ को सेना समेत युद्ध के लिए भेज दिया।
निशुम्भ का वध
निशुम्भ रणभूमि में पहुँचकर बाणों की वर्षा करने लगा। चण्डिका ने अपना श्रेष्ठ धनुष उठाकर ऊँचे स्वर में हँसते हुए काली से कहा, हे काली! इन दोनों की मूर्खता तो देखिए, रक्तबीज का अन्त देखकर भी ये मेरी माया से मोहित होकर विजय की आशा रखते हैं। भगवती का सिंह दानव-सेना रूपी समुद्र को मथने लगा और मतवाले हाथियों-सा दानवों को नखों और दाँतों से फाड़-फाड़कर खाने लगा। तब देवी ने निशुम्भ से कहा, हे नीच! जीवित रहना चाहते हैं तो आयुध छोड़कर पाताल चले जाइए, अथवा मेरे बाणों से मरकर स्वर्ग जाइए। मदोन्मत्त निशुम्भ तीखा खड्ग और अष्टचन्द्र नामक ढाल लेकर दौड़ा और उसने सिंह के तथा भगवती के मस्तक पर प्रहार किया। भगवती ने अपनी गदा से उसका वार रोककर परशु से उसके कन्धे पर आघात किया; फिर घण्टानाद करती हुई उन्होंने बार-बार मधुपान किया। जब निशुम्भ ने गदा उठाकर फिर वार किया, तब देवी बोलीं, हे मन्दबुद्धि! तनिक ठहर जाइए, जब तक मेरी तलवार आपकी गर्दन तक न पहुँच जाए; इसके बाद आप यमपुरी अवश्य पहुँच जाएँगे। यह कहकर चण्डिका ने एकाग्रचित्त होकर अपने कृपाण से निशुम्भ का मस्तक काट दिया। सिर कटा वह विकराल धड़ गदा लिए कुछ देर घूमता रहा, फिर देवी ने बाणों से उसके दोनों हाथ-पैर भी काट डाले और वह पर्वत-सा दैत्य प्राणहीन होकर गिर पड़ा।
शुम्भ का अन्त
भाई के मारे जाने का समाचार पाकर बचे हुए सैनिकों ने शुम्भ से पलायन की प्रार्थना की, पर शुम्भ ने कहा कि जन्म लेनेवाले की मृत्यु निश्चित है; ब्रह्मा, विष्णु और शंकर तक समय आने पर नष्ट हो जाते हैं, फिर इस अनित्य शरीर के लिए अपनी स्थिर कीर्ति क्यों त्यागूँ। इतना कहकर वह अपनी चतुरंगिणी सेना समेत हिमालय की ओर चल पड़ा, जहाँ सिंहवाहिनी भगवती विराजमान थीं। उन परम सुन्दरी को देखते ही शुम्भ कामबाण से मोहित हो गया और ताना देने लगा कि युद्ध स्त्रियों का धर्म नहीं; उनके नेत्र ही बाण और भौंहें ही धनुष हैं; यदि लड़ना ही है तो लम्बे ओठों, विकराल दाँतों और बिल्ली-सी आँखोंवाली कुरूप स्त्री बन जाइए, तभी मेरा हाथ आप पर उठेगा। भगवती मुसकराकर बोलीं, हे मन्दबुद्धि! कामबाण से विमोहित होकर आप विषाद क्यों करते हैं? पहले कालिका अथवा चामुण्डा से युद्ध कर लीजिए; मैं तो केवल दर्शक बनकर खड़ी हूँ। फिर उन्होंने कालिका से कहा कि इस दानव को युद्ध में मार डालिए।
कालरूपिणी कालिका गदा उठाकर सावधानी से रण में डट गईं। शुम्भ ने गदा से उन पर प्रहार किया, पर चण्डी ने उसके सुवर्णमय रथ को चूर-चूर कर डाला और उसके सारथि को मार गिराया। तब शुम्भ अट्टहास करता हुआ पैदल ही कालिका के वक्ष पर गदा से टूट पड़ा; कालिका ने उसका वार निष्फल कर, तलवार से उसका चन्दन-चर्चित बायाँ हाथ काट डाला। हाथ कटने और रथ छिनने पर भी रक्त से लथपथ शुम्भ गदा लिए दौड़ा, तो कालिका ने हँसते-हँसते बाजूबन्द से सजा उसका दाहिना हाथ भी काट दिया। फिर जब वह पैरों से प्रहार करने बढ़ा, तब उन्होंने उसके दोनों पैर भी काट डाले। हाथ-पैर कट जाने पर भी ‘ठहरिए, ठहरिए’ कहता हुआ वह उन पर झपटा, तब कालिका ने उसके कमल-सदृश मस्तक को काट दिया, जिससे कण्ठ से रक्त की अजस्र धारा बह चली और पर्वत-सा शुम्भ भूमि पर गिरकर प्राणहीन हो गया। दैत्यराज को मरा देख इन्द्रसहित सभी देवता चामुण्डा और कालिका की स्तुति करने लगे; सुखदायक पवन बहने लगा, दिशाएँ निर्मल हो गईं, और बचे हुए दानव जगदम्बा को प्रणाम कर, आयुध छोड़कर पाताल चले गए।
यही कथा देवीमाहात्म्य में भी है, किन्तु देवीभागवत का यह वर्णन अपने ही ढंग का और विस्तृत है।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)