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नारद का स्त्री बनना: माया का रहस्य

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वैकुण्ठ में एक बार देवर्षि नारद अपनी वीणा पर गायत्री-साम गाते हुए भगवान् विष्णु के दर्शन को श्वेतद्वीप पहुँचे। शंख-चक्र-गदाधारी, मेघ-श्याम, पीताम्बरधारी विष्णु लक्ष्मी के साथ विराज रहे थे। नारद को आते देख लक्ष्मी अन्तःपुर में चली गईं। नारद ने कुछ अभिमान से पूछा, हे जगद्गुरो! मुझे आते देख माता लक्ष्मी भीतर क्यों चली गईं? मैं न कोई नीच हूँ, न धूर्त; मैं तो इन्द्रियों, क्रोध और माया को जीत लेनेवाला तपस्वी हूँ।

विष्णु मुसकराए और वीणा-सी मधुर वाणी में बोले, हे नारद! नीति यही है कि पति के अतिरिक्त किसी पुरुष के पास स्त्री न रहे। पर सुनिए, माया को जीतना बड़े-बड़े योगियों, सांख्यज्ञों और जितेन्द्रियों के लिए भी अत्यन्त कठिन है। जब मैं, शिव, ब्रह्मा और सनक आदि मुनि भी उस अजन्मा माया को नहीं जीत सके, तब आप ऐसा कभी मत कहिए कि मैंने माया जीत ली है। काल भी उसी का रूप है, जो निराकार होकर भी रूप धर लेता है, और विद्वान् हो या मूर्ख, सब उसके वश में रहते हैं।

माया को देखने की जिद

नारद के मन में सन्देह भर आया। उन्होंने पूछा, हे रमाकान्त! उस माया का रूप कैसा है, उसमें कितनी शक्ति है, वह कहाँ रहती है? मैं उसे देखना चाहता हूँ; कृपा करके उसका दर्शन कराइए। विष्णु बोले, वह त्रिगुणमयी माया सारे जगत् को व्याप कर स्थित है। यदि देखने की इच्छा है तो मेरे साथ गरुड़ पर चढ़िए; किन्तु उसे देखकर मन को विषाद में मत डालिएगा।

गरुड़ पर बैठे वे दोनों अनेक वनों, सरोवरों, नदियों और नगरों को लाँघते हुए कान्यकुब्ज नगर के पास जा पहुँचे। वहाँ कमलों से ढका, हंस और सारसों से गूँजता, क्षीरसागर के दुग्ध-सा मीठे जलवाला एक दिव्य सरोवर दिखाई पड़ा। विष्णु बोले, हे मुने! इस स्वच्छ जल में पहले आप स्नान कर लीजिए, फिर मैं करूँगा। नारद अपनी वीणा और मृगचर्म तट पर रखकर, शिखा बाँधकर, आचमन कर उस जल में उतरे।

पर जैसे ही उन्होंने डुबकी लगाई, हरि के देखते-देखते वे अपना पुरुष-रूप छोड़कर एक सर्वांगसुन्दरी नारी बन गए। उसी क्षण विष्णु उनकी वीणा और मृगचर्म लेकर गरुड़ पर सवार हो अपने धाम लौट गए, और नारद के मन से पूर्व-देह की सारी स्मृति मिट गई। वे विष्णु को भी भूल गए, अपनी वीणा को भी। सुन्दर आभूषणों से सजी वह नारी सरोवर से बाहर निकली और चकित होकर सोचने लगी, यह क्या है!

सौभाग्यसुन्दरी

तभी हाथी-घोड़ों और रथों से घिरा तालध्वज नामक एक तरुण राजा वहाँ आ पहुँचा, जो साक्षात् कामदेव-सा जान पड़ता था। पूर्णिमा के चन्द्रमा-सी मुखवाली उस रमणी को अकेली देखकर उसने पूछा, हे कल्याणि! आप कौन हैं, किसकी पुत्री हैं, यहाँ अकेली क्यों हैं? मुझ उत्तम राजा को अपना पति बनाकर मेरे साथ सुख भोगिए। नारी बोली, हे राजन्! मैं नहीं जानती कि मैं किसकी कन्या हूँ, मेरे माता-पिता कौन हैं, मुझे यहाँ कौन लाया। मेरा कोई रक्षक नहीं; मैं आपके अधीन हूँ, जैसा चाहें कीजिए।

राजा उसे रेशमी वस्त्र से ढकी सुनहली पालकी में बैठाकर बड़े हर्ष से अपने भवन ले गया, और शुभ लग्न में अग्नि को साक्षी कर उससे विवाह कर लिया। उसका नाम रखा सौभाग्यसुन्दरी। राजा उसमें ऐसा डूबा कि राजकाज छोड़कर दिन-रात उसी के साथ रमने लगा; समय बीतने का भी बोध न रहा। सौभाग्यसुन्दरी भी उसके प्रेम में बँध गई। अपना पूर्व पुरुष-शरीर और मुनि-जन्म वह पूरी तरह भूल गई, और यही सोचने लगी कि मैं इस राजा की प्रिय पटरानी हूँ, मेरा जीवन धन्य है।

बारह वर्ष एक क्षण की भाँति बीत गए। समय पाकर सौभाग्यसुन्दरी ने बारह पुत्रों को जन्म दिया, फिर आठ और; बहुओं और पौत्रों से भरा-पूरा उसका परिवार बहुत बड़ा हो गया। कभी सुख-समृद्धि आती, कभी पुत्रों के रोग से चित्त अशान्त होता, कभी बहुओं-पुत्रों के आपसी झगड़े से सन्ताप। ब्रह्मज्ञान और शास्त्र सब भूलकर वह गृहकार्यों में ही डूबी रहती और मन में यही अहंकार पालती कि मेरे पुत्र महापराक्रमी हैं, मेरी बहुएँ उत्तम कुल की हैं। यह विचार तक उसके मन में कभी न उठा कि मैं तो नारद हूँ, जिसे भगवान् ने अपनी माया से छल रखा है।

शोक-सागर और पुंतीर्थ

फिर एक दूर देश के बलवान् राजा ने तालध्वज से बैर ठान लिया और अपनी सेना लेकर कान्यकुब्ज को घेर लिया। राजा के सब पुत्र और पौत्र नगर से बाहर निकले और भयंकर संग्राम हुआ। कालयोग से सौभाग्यसुन्दरी के सारे पुत्र और पौत्र उस युद्ध में मारे गए, और शत्रु अपनी सेना लेकर लौट गया। सुनते ही सौभाग्यसुन्दरी विलाप करती हुई रणभूमि में जा पहुँची, और अपने पुत्रों-पौत्रों को भूमि पर गिरा देखकर शोक-सागर में डूब गई, हाय, मेरे पुत्र कहाँ चले गए! मुझे तो निष्ठुर दैव ने मार डाला।

तभी भगवान् मधुसूदन एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ आ पहुँचे और बोले, हे तन्वंगि! विषाद क्यों करती हैं? यह भ्रम तो पति-पुत्र के मोह से उपजा है। आप कौन हैं, ये किसके पुत्र हैं, यह विचारिए। मरे हुए स्वजनों के निमित्त घर में नहीं, तीर्थ में स्नान और तिलदान कीजिए। नारी उठी और उन ब्राह्मणरूपधारी विष्णु को आगे कर बन्धुओं तथा राजा के साथ पवित्र पुंतीर्थ पहुँची।

ब्राह्मणरूपी हरि ने कहा, हे गजगामिनि! इस पवित्र सरोवर में स्नान कीजिए और निरर्थक शोक छोड़िए। जन्म-जन्मान्तर में आपके करोड़ों पुत्र, पिता और पति हुए और मरे भी; किस-किस का शोक करेंगी? यह तो स्वप्न-सा भ्रममात्र है। नारद उस पुंतीर्थ नामक सरोवर में स्नान करने उतरे, और डुबकी लगाते ही तत्क्षण फिर पुरुष-रूप में हो गए। तट पर विष्णु उनकी वीणा हाथ में लिए अपने स्वाभाविक रूप में खड़े थे। स्नान करके ऊपर आते ही नारद को सब कुछ याद आ गया, मैं तो नारद हूँ, विष्णु के साथ यहाँ आया था, और माया से मोहित होकर स्त्री बन गया था।

माया का रहस्य

इधर राजा तालध्वज उस विप्ररूप नारद को देखकर चकित रह गया कि मेरी वह पत्नी कहाँ चली गई। वह बार-बार विलाप करने लगा, हा प्रिये! मुझ वियोगी को छोड़कर कहाँ चली गईं? आपके बिना मेरा जीवन, घर और राज्य सब व्यर्थ हैं। तब भगवान् ने उसे समझाया, हे राजेन्द्र! रोते क्यों हैं? इस बहती संसार-नदी में मनुष्यों का सम्बन्ध नाव पर चढ़े यात्रियों-सा है। संयोग और वियोग सदा दैव के अधीन हैं। जिस सुन्दरी के साथ आपका भोग बदा था, वह भोग पूरा हुआ; वह जैसे आई थी, वैसे ही चली गई।

न कहीं अकेला सुख आता है, न अकेला दुख; घटीयन्त्र की भाँति दोनों घूमते रहते हैं। यह क्षणभंगुर मनुष्य-देह अत्यन्त दुर्लभ है; इसे पाकर आत्मकल्याण कर लेना चाहिए। जिह्वा और इन्द्रियों का स्वाद तो पशु-योनि में भी सुलभ है, ज्ञान केवल इसी देह में। यह सब उसी भगवती की माया है, जिससे सारा जगत् मोहित है। ऐसा सुनकर तालध्वज को अद्भुत वैराग्य हुआ; वह अपने पौत्र को राज्य सौंपकर वन चला गया और तत्त्वज्ञान पा गया।

राजा के जाने पर बार-बार हँसते हुए विष्णु से नारद ने पूछा, हे देव! आपने मुझे छल लिया; अब मैंने माया का बल जान लिया। पर यह बताइए, सरोवर में उतरते ही मेरी पूर्व-स्मृति क्यों नष्ट हो गई थी? मन वही था, चित्त वही, फिर स्मृति कैसे मिट गई? विष्णु बोले, हे महामते! यह सब खेल महामाया का है। जैसे जागते, स्वप्न देखते और सोते प्राणी की दशा बदल जाती है, वैसे ही दूसरा शरीर पाने पर होता है। सोया हुआ मनुष्य स्वप्न में मरे पितामह से मिलता, बातें करता, भोजन करता जान पड़ता है, और जागने पर समझता है कि यह भ्रम था।

माया के गुणों की अगम्य सीमा को न मैं जानता हूँ, न शिव, न ब्रह्मा; फिर कोई मन्दबुद्धि उसे पूरा कैसे जाने? यह सारा चराचर जगत् सत्त्व, रज और तम, इन तीनों गुणों के संयोग से बना है; इनके बिना संसार क्षणभर भी नहीं टिकता। इसीलिए हे मुनीश्वर! इस मायारचित असार संसार में मोह मत कीजिए। अभी-अभी आपने स्वयं माया का प्रभाव देखा और अनेक भोग भी भोगे; फिर उस महामाया के अद्भुत चरित्र के विषय में मुझसे क्या पूछते हैं?

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)