इस पृष्ठ पर

सूत जी शौनक आदि ऋषियों को भगवती का यह आद्य चरित्र सुना रहे थे। समस्त पर्वतों में श्रेष्ठ विन्ध्याचल बड़े-बड़े वनों और विशाल वृक्षों से घिरा हुआ था; मृग, वराह, सिंह और वानर उसमें निर्भय विचरते थे, नदियों तथा झरनों के जल से वह सदा हरा-भरा रहता था, और देवता, गन्धर्व, किन्नर तथा अप्सराएँ भी उसकी शोभा बढ़ाते थे। एक दिन देवर्षि नारद प्रसन्न मन से पृथ्वी पर विचरते हुए इसी विन्ध्य के पास आ पहुँचे। पर्वतराज ने वेगपूर्वक उठकर उन्हें पाद्य-अर्घ्य देकर उत्तम आसन पर बिठाया और पूछा कि हे देवर्षे! आपका यह शुभागमन कहाँ से हुआ है।
नारद का बोया हुआ बीज
नारद बोले कि उनका आगमन सुमेरुगिरि से हुआ है, जहाँ उन्होंने इन्द्र, अग्नि, यम और वरुण के लोक देखे। इतना कहकर मुनि ने एक गहरी साँस ली। विन्ध्य के पूछने पर उन्होंने कारण बताया कि हिमालय शिव के श्वसुर होने से पर्वतों में पूज्य हैं, कैलास शिव का निवास होने से सबका पूज्य स्वामी है, और वही सुमेरु है जिसकी परिक्रमा सहस्र किरणों वाले सूर्य समस्त ग्रह-नक्षत्रों सहित सदा करते हैं। इसी से सुमेरु अपने को सब पर्वतों में श्रेष्ठ मानकर अभिमान में चूर रहता है। तपोबल वालों को इससे कोई प्रयोजन नहीं, यह कहकर नारद ब्रह्मलोक चले गए।
सूर्य का मार्ग रुक गया
मुनि के जाते ही विन्ध्य को शान्ति नहीं मिली। वह रात-दिन यही सोचता रहा कि सुमेरु को कैसे जीते; न उसे शान्ति मिलती थी, न मन स्थिर रहता था। अन्त में उसके मन में कर्तव्य के निर्णय में दोष डालने वाली बुद्धि उठ आई कि मैं अपने शिखरों से सूर्य का मार्ग ही रोक दूँगा; तब भला ये सुमेरु की परिक्रमा कैसे करेंगे, और उसका अभिमान अपने-आप खण्डित हो जाएगा। ऐसा निश्चय करके विन्ध्याद्रि अपने शिखरों से आकाश को छूता हुआ बढ़ने लगा और सारे नभ को घेरकर खड़ा हो गया, इसी प्रतीक्षा में कि कब सूर्य उदित हों और कब वह उनका मार्ग रोके। प्रातःकाल उदयाचल पर सूर्य उदित हुए, कमलिनी खिली और कुमुदिनी सिकुड़ने लगी, पर दक्षिण की ओर बढ़ते ही सूर्य का मार्ग रुक गया। सारथि अरुण ने कहा कि हे सूर्य! अत्यन्त अभिमानी विन्ध्य आपका मार्ग रोककर आकाश में खड़ा हो गया है और सुमेरु से स्पर्धा कर रहा है। सूर्य विस्मित हुए कि राहु की भुजाओं में भी जो क्षणभर न रुकता था, वही आज चिरकाल से अवरुद्ध हो गया; अब बलवान विधाता न जाने क्या करेगा। सूर्य की गति रुकते ही काल का ज्ञान लुप्त हो गया, स्वाहा और स्वधाकार नष्ट हो गए; पश्चिम तथा दक्षिण के प्राणी रात्रि के अन्धकार में सोए पड़े रहे तो पूर्व तथा उत्तर के प्राणी सूर्य की प्रचण्ड गर्मी से दग्ध होने लगे। बहुत-से प्राणी मर गए, यज्ञ-श्राद्ध रुक गए, जगत स्वधा-स्वाहा से रहित हो गया और समस्त लोकों में हाहाकार मच गया।
देवताओं की दौड़: शिव से विष्णु तक
व्याकुल होकर इन्द्रसहित सभी देवता ब्रह्मा को आगे कर भगवान शंकर की शरण में गए और सुन्दर स्तोत्रों से उनकी स्तुति की। शिव ने हँसकर उनके सब मनोरथ पूर्ण करने का वचन दिया, पर विन्ध्य का समाचार सुनकर बोले कि इस समय विन्ध्य की वृद्धि रोकने की शक्ति उनमें नहीं है; अब यह समाचार भगवान लक्ष्मीकान्त से कहना चाहिए, जो समस्त कारणों के कारण हैं। तब सब देवता शंकर को आगे करके काँपते हुए वैकुण्ठ पहुँचे और लक्ष्मी के साथ विराजमान भगवान विष्णु की गद्गद वाणी से स्तुति की। उन्होंने उन्हीं भगवान को नमस्कार किया जिन्होंने मत्स्य बनकर वेदों का उद्धार किया, कच्छप बनकर अमृत दिलाया, वराह रूप से पृथ्वी को उठाया, नृसिंह बनकर हिरण्यकशिपु को विदीर्ण किया, वामन बनकर बलि को छला, परशुराम और दशरथनन्दन राम के रूप में दुष्टों का संहार किया, कृष्ण बनकर पृथ्वी का भार उतारा और म्लेच्छों से भरे जगत् में दुष्ट राजाओं से पीड़ित प्रजा के लिए कल्कि रूप धारण किया। प्रसन्न होकर विष्णु ने उनका शोक दूर करने का वचन दिया, और जब देवताओं ने अपनी विपत्ति कही तो उन्होंने उपाय बताया कि जगज्जननी भगवती अम्बा के उपासक, परम तेजस्वी मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य इस समय काशी में विराजमान हैं; वही अगस्त्य उस विन्ध्यगिरि के तेज को शान्त कर सकते हैं। उन्हीं मोक्षदायिनी काशीपुरी में जाकर उन ओजस्वी द्विजश्रेष्ठ को प्रसन्न करके याचना कीजिए।
अगस्त्य और विन्ध्य का नत मस्तक
देवता क्षणभर में काशी पहुँचे, मणिकर्णिका में सचैल स्नान कर तथा देव-पितृ का तर्पण और दान करके अगस्त्य के उस परम पवित्र आश्रम में आए, जहाँ हिंसक पशु भी उनके प्रभाव से शान्त होकर विचरते थे और मयूर, हंस तथा सारस उसकी शोभा थे। दण्ड की भाँति चरणों में गिरकर उन्होंने वातापि का बल नष्ट करने वाले, कुम्भ से प्रकट, समस्त विद्याओं के भण्डार, लोपामुद्रा के पति उस महामुनि की स्तुति की, जिनके उदय होते ही समुद्रों का जल स्वच्छ हो जाता है, और उन्हें विन्ध्य से उत्पन्न कष्ट कह सुनाया। अगस्त्य हँसकर बोले कि इन्द्र, अग्नि और यम जैसे समर्थ देवताओं के लिए भला कौन-सा कार्य कठिन है; फिर भी यदि आपका कोई कार्य उनके सामर्थ्य से सिद्ध हो सकता हो, तो कहिए, वे उसे अवश्य करेंगे। देवताओं के निवेदन पर उन्होंने वह कार्य करना स्वीकार कर लिया। यह वचन देकर उन्होंने पत्नी लोपामुद्रा से कहा कि विन्ध्य ने सूर्य का मार्ग रोककर महान अनर्थ खड़ा कर दिया है; मोक्ष चाहनेवालों को अविमुक्त काशी कभी नहीं छोड़नी चाहिए, फिर भी काशीवासियों के सामने भी विघ्न आ ही जाते हैं, और वही विघ्न अब उनके सामने आ खड़ा हुआ है। भगवान विश्वनाथ, दण्डपाणि, कालभैरव और साक्षी-विनायक का पूजन कर, काशी के वियोग से सन्तप्त अगस्त्य अपने तपोबल-रूपी विमान पर चढ़कर पत्नी सहित आधे निमेष में विन्ध्य के समीप जा पहुँचे।
सामने विन्ध्य आकाश को ढके खड़ा था। मुनि को अपने समक्ष देखते ही वह महागिरि काँप उठा और सारा अभिमान छोड़कर, पृथ्वी की भाँति विनम्र होकर, दण्ड की तरह भूमि पर गिरकर साष्टांग प्रणाम करने लगा। उसका शिखर झुका देखकर प्रसन्नमुख अगस्त्य ने कहा कि हे वत्स! जब तक मैं लौटकर आता हूँ, तब तक आप इसी प्रकार झुके रहिए, क्योंकि मैं आपके इस ऊँचे शिखर पर चढ़ने में असमर्थ हूँ। ऐसा कहकर मुनि उसके झुके शिखरों पर से क्रमशः दूसरी ओर उतर गए और मार्ग में श्रीशैल का दर्शन करते हुए दक्षिण के मलयाचल पर जा बसे। जिन देवी की आराधना से स्वायम्भुव मनु ने अपने मन्वन्तर भर पृथ्वी का राज्य पाया, वही भगवती उस विनम्र विन्ध्य पर आकर विराजीं और समस्त लोकों में विन्ध्यवासिनी के नाम से विख्यात हुईं।
अगस्त्य और विन्ध्य की यह कथा देवीभागवत के दशम स्कन्ध में मन्वन्तर से जुड़े भगवती के आद्य चरित्र के रूप में कही गई है; इसे भक्तिपूर्वक सुनने वाला धर्म, धन और अपने अभीष्ट मनोरथ पाता है।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)