कालिन्दी के शीतल तट पर छह राजकुमार निराहार बैठे थे। वैवस्वत मनु के ये पुत्र थे करूष, पृषध्र, नाभाग, दिष्ट, शर्याति और त्रिशंकु; सब के सब महापराक्रमी, पर उस समय उनके मन में न राज्य था, न विजय, केवल भगवती की आराधना थी। उन्होंने अलग-अलग पार्थिव मूर्तियाँ बनाकर भाँति-भाँति के उपचारों से पूजा की, और फिर आहार भी छोड़ते चले गये; पहले सूखे पत्तों पर, फिर वायु पर, फिर जल, धूम्र और अन्त में सूर्य की किरणों पर जीवन धारण करते हुए घोर तप करने लगे।
बारह वर्ष बीते। उनकी बुद्धि इतनी निर्मल हो गयी कि सारा जगत् उन्हें अपने ही भीतर दिखायी पड़ने लगा। तभी सहस्रों सूर्यों-सी कान्ति लिये जगदीश्वरी प्रकट हुईं। छहों राजकुमार भाव-विह्वल होकर स्तुति करने लगे और वर माँगा कि उन्हें निष्कण्टक राज्य, दीर्घजीवी सन्तान, अखण्डित भोग और सबसे अपराजेयता प्राप्त हो। भगवती ने ‘तथास्तु’ कहकर एक बात और जोड़ दी: ‘आप सब मेरी कृपा से क्रमशः मन्वन्तरों के अधिपति बनेंगे।’ और ऐसा ही हुआ। वे ही छहों आगे चलकर दक्षसावर्णि नवें, मेरुसावर्णि दसवें, सूर्यसावर्णि ग्यारहवें, चन्द्रसावर्णि बारहवें, रुद्रसावर्णि तेरहवें और विष्णुसावर्णि चौदहवें मनु हुए, और भ्रामरी की कृपा से महान् तेज तथा बल के स्वामी बने।
यहीं नारदजी ने पूछा: ‘ये भ्रामरी देवी कौन हैं, कैसे प्रकट हुईं, किस स्वरूपवाली हैं? मैं भगवती की कथारूपी अमृत का पान करके भी तृप्त नहीं होता; अमृत पीनेवाले की मृत्यु तो सम्भव है, किन्तु इस कथा के श्रोता की नहीं।’ तब श्रीनारायण ने वह अद्भुत आख्यान सुनाया।
अरुण की तपस्या और ब्रह्माजी का वरदान
पूर्वकाल में अरुण नामक एक महाबली दैत्य था, देवताओं का बैरी, अत्यन्त क्रूर, पाताल में रहनेवाला। देवताओं को जीतने की धुन में वह हिमालय की ओर गया और गंगा के अत्यन्त शीतल जल के पास बैठकर पद्मयोनि ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगा, यह सोचकर कि एकमात्र वे ही उसके रक्षक हो सकते हैं। श्वास रोककर, तमोगुण से भरा, सकाम भाव से वह गायत्री–मन्त्र के जप में लीन हो गया। दस हज़ार वर्ष तक जलकण पीकर, फिर दस हज़ार वर्ष वायु के आहार पर, और फिर दस हज़ार वर्ष पूर्णतः निराहार रहकर उसने तप किया।
इस तप से उसके शरीर से ऐसी अग्नि उठी जो सारे जगत् को जलाने लगी। ‘यह क्या, यह क्या’ कहते हुए देवता काँप उठे और ब्रह्माजी की शरण गये। चतुर्मुख ब्रह्माजी गायत्री सहित हंस पर सवार होकर वहाँ पहुँचे। उस दैत्य का उदर सूख चुका था, शरीर क्षीण था, आँखें ध्यान में मुँदी थीं, और वह अपने तेज से दूसरी अग्नि-सा जान पड़ता था। ब्रह्माजी ने कहा: ‘हे वत्स! आपका कल्याण हो, मन में जो हो, माँग लीजिए।’
अरुण ने उठकर प्रणाम किया और यही वर माँगा कि उसकी मृत्यु कभी न हो। ब्रह्माजी ने समझाया कि जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक मृत्यु के ग्रास बनते हैं, तब अमरता का आग्रह बुद्धिमानों को शोभा नहीं देता; कोई दूसरा वर माँगिए। तब अरुण ने कहा: ‘तो यही दीजिए कि मेरी मृत्यु न युद्ध में हो, न अस्त्र–शस्त्र से, न किसी पुरुष से, न स्त्री से, न दो पैरवाले प्राणी से, न चार पैरवाले से, और न उभय आकारवाले से; साथ ही ऐसा बल दीजिए कि देवताओं पर मेरी विजय ठहर जाय।’ ब्रह्माजी ‘तथास्तु’ कहकर अपने लोक लौट गये।
वर पाते ही अरुण के भीतर अभिमान भर आया। उसने पाताल के दैत्यों को बुलाया, वे उसे अपना राजा बना बैठे, और उसने अमरावती की ओर दूत भेज दिया। दूत का सन्देश सुनते ही देवराज इन्द्र काँप उठे और देवताओं के साथ पहले ब्रह्मलोक, फिर शिवलोक भागे। इधर अरुण ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया; अपनी तपस्या से अनेक रूप धरकर उसने सूर्य, चन्द्र, यम और अग्नि तक के अधिकार अलग-अलग अपने वश में कर लिए। स्थानभ्रष्ट देवता कैलास पर शंकरजी को अपनी दुःखगाथा सुनाने लगे।
गायत्री का त्याग
शंकरजी भी सोच में पड़ गये, क्योंकि ब्रह्माजी का वरदान अटल था: न युद्ध, न शस्त्र, न नर, न नारी, न दो पैरवाला, न चार पैरवाला, कोई उसे मार नहीं सकता था। तभी एक सन्तोषदायिनी आकाशवाणी हुई: ‘भगवती भुवनेश्वरी की आराधना कीजिए। गायत्री-जप में लगा हुआ यह अरुण यदि गायत्री की उपासना छोड़ दे, तभी उसकी मृत्यु सम्भव है।’
यह सुनकर देवताओं ने युक्ति की। देवराज इन्द्र ने गुरु बृहस्पति को बुलाकर कहा: ‘हे गुरो! किसी प्रकार ऐसा कीजिए कि अरुण गायत्री-जप छोड़ दे। तब तक हम सब ध्यानयोग में भगवती की उपासना करते हैं।’ यह कहकर सब देवता जम्बूनदेश्वरी भगवती के पास जाकर मायाबीज के जप में लीन हो गये, और बृहस्पति शीघ्र ही अरुण के पास जा पहुँचे।
दैत्यराज ने पूछा: ‘हे मुनि! आप यहाँ किस प्रयोजन से आये? मैं आपका पक्षधर तो हूँ नहीं, सदा शत्रु ही हूँ।’ बृहस्पति ने बड़ी सहजता से उत्तर दिया: ‘जिन देवी की हम आराधना करते हैं, उन्हीं की उपासना तो आप भी अनवरत करते हैं; फिर कहिए, आप हमारे पक्ष में कैसे नहीं हुए?’ देवमाया से मोहित वह दैत्य अभिमान में भर गया, और यह सिद्ध करने को कि वह देवताओं का शत्रु ही है, उसने परम गायत्री-मन्त्र का जप ही छोड़ दिया। जप छूटते ही वह तेजशून्य हो गया। बृहस्पति चुपचाप लौट आये और इन्द्र को सारा वृत्तान्त कह सुनाया।
भ्रामरी का प्राकट्य
बहुत समय बीता, और एक दिन जगन्माता प्रकट हुईं। करोड़ों सूर्यों-सी प्रभा, करोड़ों कामदेवों-सा सौन्दर्य; अंगों पर अद्भुत अनुलेपन, दो सुन्दर वस्त्र, विचित्र माला और आभूषण। उनकी मुट्ठी में अद्भुत भौंरे थे, हाथों में वर और अभय की मुद्रा; वे शान्त थीं, करुणा के अमृत-सागर-सी। चारों ओर असंख्य भ्रामरियाँ ‘ह्रींकार’ का गान करती हुई उन्हें घेरे थीं। ब्रह्मा और विष्णु को आगे करके देवगण उनकी वेदप्रतिपादित स्तुति करने लगे, उन्हें सृष्टि-स्थिति-संहार की कर्त्री, दुर्गा, काली, तारा, त्रिपुरसुन्दरी, शाकम्भरी और अनेक रूपों में नमस्कार करते हुए। और उन्होंने कहा: ‘सदा भ्रामरों से घिरी रहने के कारण ही आप भ्रामरी कही जाती हैं; उन आपको बार-बार प्रणाम है।’
देवताओं की यह मधुर स्तुति सुनकर मत्त कोकिला-सी बोलनेवाली जगदम्बा प्रसन्न हुईं और बोलीं: ‘हे देवताओ! मैं सदा प्रसन्न हूँ, अपने मन की अभिलाषा कहिए।’ देवताओं ने बड़े विनय से अपने दुःख का कारण कहा, दुष्ट अरुण के अत्याचार और ब्रह्माजी के दिये वरदान की सारी बात यथावत् कह सुनायी।
भौंरों का प्रलय
सब सुनकर महाभगवती ने अपने हाथों, पार्श्व और अग्रभाग में स्थित नाना रूपधारी भौंरों को प्रेरित किया, और साथ ही अनगिनत नये भौंरे उत्पन्न किए, जिनसे तीनों भुवन भर गये। टिड्डियों के दल-से वे झुंड निकले; अन्तरिक्ष ढँक गया, पृथ्वी पर अन्धकार छा गया, आकाश, पर्वत-शिखर, वृक्ष और वन में सर्वत्र भौंरे-ही-भौंरे हो गये। वे निकल-निकलकर दैत्यों के वक्षःस्थल को उसी तरह छेदने लगे जैसे क्रुद्ध मधुमक्खियाँ मधु चुरानेवाले को काटती हैं।
अब न अस्त्र काम आये, न शस्त्र; न दैत्य युद्ध कर सके, न आपस में एक बात कर सके। ब्रह्माजी का वरदान अपनी जगह अटल रहा, पर वह भौंरों के इस झुंड को छू तक न सका, क्योंकि ये न नर थे, न नारी, न दो पैरवाले, न चार पैरवाले, न किसी शस्त्र का प्रहार; वरदान के हर शब्द से बाहर। जो दैत्य जहाँ, जिस दशा में था, वहीं क्षणभर में अट्टहास करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुआ; अरुण भी अपने समस्त दलबल के साथ नष्ट हो गया। कार्य पूरा कर वे भौंरे लौटकर देवी के पास आ गये।
‘यह तो आश्चर्य हो गया,’ सब कहने लगे; पर जिन जगदम्बा की ऐसी माया है, उनके लिए कौन-सा कार्य कठिन है? हर्ष के सागर में डूबे देवताओं ने नाना उपचारों से देवी की पूजा की, पुष्पों की वर्षा की और जय-जयकार किया। आकाश में दुन्दुभियाँ बजीं, अप्सराएँ नाचीं, गन्धर्व गाने लगे और श्रेष्ठ मुनि वेदपाठ करने लगे। प्रसन्न महादेवी ने सबको अलग-अलग वर देकर अपनी विपुल भक्ति प्रदान की, और देखते-देखते अन्तर्धान हो गयीं। जो मनुष्य इस भ्रामरी-चरित को नित्य पढ़ता और सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर देवी-सायुज्य पा लेता है।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)