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मंगलचण्डी और मनसा देवी

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प्रकृतिखण्ड की इस कथा में श्रीनारायण नारद को उन देवियों का रहस्य सुना रहे थे जो एक ही मूलप्रकृति के भिन्न-भिन्न रूप हैं। इन्हीं में दो नाम आते हैं, कल्याण करने वाली मंगलचण्डी और नागों की माता मनसा।

मंगलचण्डी: मूलप्रकृति का मंगलमय रूप

जो देवी कल्याण करने में सुदक्ष हैं, वही प्रचण्ड होकर चण्डी कहलाती हैं, और मंगलों के बीच परम मंगल होने से वे मंगलचण्डिका के नाम से विख्यात हुईं। भूमिपुत्र मंगल भी जिनकी पूजा करते हैं, और मनुवंश में उत्पन्न सात द्वीपों वाली पृथ्वी के स्वामी राजा मंगल की भी जो अभीष्ट देवी थीं, इसी से भी उनका यह नाम पड़ा। रूप-भेद से वे मूलप्रकृति भगवती दुर्गा ही हैं और स्त्रियों की अभीष्ट देवता हैं। सबसे पहले भगवान शंकर ने उनकी आराधना की थी। त्रिपुरासुर के घोर वध के समय जब उस दैत्य ने रोषपूर्वक शिवजी का विमान आकाश से नीचे गिरा दिया और वे संकट में पड़ गए, तब ब्रह्मा और विष्णु के उपदेश से शिवजी ने भगवती की स्तुति की। वे मंगलचण्डी ही थीं जिन्होंने केवल रूप बदल लिया था; प्रकट होकर वे बोलीं कि अब आपको कोई भय नहीं, स्वयं श्रीहरि वृषभ-रूप में आपका वाहन बनेंगे और हम युद्ध में शक्तिस्वरूपा होकर आपकी सहायता करेंगी। विष्णु के दिए शस्त्र से शिवजी ने उस त्रिपुर-दैत्य का वध किया और देवताओं ने सिर झुकाकर पुष्पवर्षा के साथ उनकी स्तुति की। तभी से सर्वप्रथम शिव ने, फिर मंगलग्रह ने, फिर राजा मंगल ने, फिर मंगलवार के दिन भद्र स्त्रियों ने और अन्त में समस्त देवताओं तथा मनुष्यों ने उन मंगलचण्डिका का पूजन किया।

नागों की माता मनसा

प्राचीन काल में एक बार भूमण्डल के सभी मनुष्य नागों के भय से आक्रान्त हो गए। तब वे सब मुनिश्रेष्ठ कश्यप की शरण में गए। भयभीत कश्यप ने ब्रह्मा के उपदेश से वेदबीज-मन्त्रों की रचना की और अपने मन से उन मन्त्रों की अधिष्ठात्री देवी को भी उत्पन्न किया; मन से उत्पन्न होने के कारण वे मनसा नाम से विख्यात हुईं। कुमारी अवस्था में ही वे कैलास पर भगवान शिव की उपासना करने चली गईं और भक्तिपूर्वक एक हजार दिव्य वर्षों तक उनकी सेवा की। प्रसन्न होकर आशुतोष शिव ने उन्हें महाज्ञान, सामवेद, श्रीकृष्ण का अष्टाक्षर मन्त्र, त्रैलोक्यमंगल कवच और परम मृत्युंजयज्ञान प्रदान किया। फिर शिव की आज्ञा से वे पुष्करक्षेत्र में तप करने गईं; तीन युगों तक परमात्मा श्रीकृष्ण की तपस्या करके सिद्ध हुईं और उन्होंने साक्षात् उनका दर्शन पाया। कृपानिधि श्रीकृष्ण ने उस कृशांगी बाला को यह वर दिया कि वे तीनों लोकों में पूजित हों। सबसे पहले स्वयं कृष्ण ने, फिर शिव ने और फिर देवता, मुनि, मनु, नाग तथा मनुष्यों ने उनकी पूजा की। विष के हरण में समर्थ होने से वे विषहरा कहलाईं, और आगे चलकर राजा जनमेजय के यज्ञ में नागों के प्राणों की रक्षा करने से नागेश्वरी और नागभगिनी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

जरत्कारु मुनि और आस्तीक का जन्म

कश्यप ने उन देवी को विरक्त मुनि जरत्कारु को सौंप दिया, और ब्रह्मा की आज्ञा से कामनारहित रहते हुए भी मुनि ने उन्हें पत्नी-रूप में स्वीकार कर लिया। विवाह के पश्चात् चिरकालीन तप से थके महायोगी जरत्कारु पुष्कर में एक वटवृक्ष के नीचे देवी मनसा की जंघा पर सिर रखकर सो गए। इतने में सूर्य अस्त होने लगा। साध्वी मनसा ने सोचा कि सायंकाल की सन्ध्या न करने से उनके पतिदेव को ब्रह्महत्या जैसा दोष लगेगा, अतः उन्होंने पति को जगा दिया। नींद टूटने पर जरत्कारु अत्यन्त कुपित हो उठे और सूर्य को शाप देने के लिए उद्यत हो गए; तब भगवान सूर्य देवी सन्ध्या के साथ वहाँ आकर विनयपूर्वक क्षमा माँगने लगे। मुनि शान्त तो हुए, पर अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए उन्होंने रोती हुई मनसा का परित्याग कर दिया। उस विपत्ति में व्याकुल देवी ने अपने गुरु शिव, इष्टदेव ब्रह्मा, श्रीहरि और पिता कश्यप का स्मरण किया, और वे सब वहाँ प्रकट हो गए। ब्रह्मा ने समयोचित उत्तर दिया कि हे मुनि! यदि आप अपनी धर्मपरायणा पत्नी का त्याग ही करना चाहते हैं, तो पहले इनसे एक पुत्र उत्पन्न कीजिए, क्योंकि पुत्र उत्पन्न किए बिना प्रिय भार्या का त्याग करने वाले का पुण्य जल की भाँति बह जाता है। तब जरत्कारु ने योगबल से मन्त्रोच्चारण करते हुए मनसा की नाभि का स्पर्श किया और कहा कि आपके इस गर्भ से जितेन्द्रियों में श्रेष्ठ, धार्मिक और विष्णुभक्त पुत्र उत्पन्न होगा, जो अपने कुल का उद्धार करेगा। इतना कहकर और पत्नी को ज्ञान का उपदेश देकर मुनि पुनः तप के लिए चले गए। मनसा कैलास चली गईं, जहाँ पार्वती ने उन्हें समझाया और शिव ने मंगलकारी ज्ञान दिया। वहीं परम शुभ वेला में देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जो भगवान नारायण का अंश और योगियों का गुरु था; वह बालक गर्भ में ही शिव के मुख से महाज्ञान सुनकर योगीश्वर हो चुका था। शिव ने उसका जातकर्म कराया, चारों वेद पढ़ाए और मृत्युंजय-ज्ञान दिया। अपने पति, इष्टदेव और गुरु में मनसा की अत्यधिक आस्था थी, इसी से उस पुत्र का नाम आस्तीक पड़ा।

सर्प-सत्र में नागों की रक्षा

उधर अभिमन्युपुत्र राजा परीक्षित अपने ही एक सदोष कर्म के कारण शृंगी-ऋषि के ब्रह्मशाप से ग्रस्त हो गए; ऋषि ने कौशिकी नदी का जल लेकर शाप दिया कि एक सप्ताह बीतते ही तक्षक नाग उन्हें डँस लेगा। राजा ने अपने को ऐसे सुरक्षित स्थान में बन्द कर लिया जहाँ वायु भी प्रवेश न कर सके। राजा को विषमुक्त करने जाते हुए धन्वन्तरि को मार्ग में डँसने के लिए जाता हुआ तक्षक मिल गया; दोनों में मित्रता हो गई और तक्षक ने एक मणि देकर धन्वन्तरि को लौटा दिया। फिर तक्षक ने मंच पर बैठे राजा को डँस लिया और परीक्षित तत्काल देह त्यागकर परलोक चले गए। पिता का और्ध्वदैहिक संस्कार करके राजा जनमेजय ने सर्पसत्र नामक यज्ञ आरम्भ किया, जिसमें ब्रह्मतेज से अनेक सर्प प्राण त्यागने लगे। भयभीत तक्षक इन्द्र की शरण में जा छिपा, तो ब्राह्मण-समुदाय इन्द्रसहित तक्षक को भी खींच लाने पर उद्यत हो गया। ऐसी विपत्ति में सभी देवता इन्द्र के साथ देवी मनसा के पास गए, और भयातुर इन्द्र ने भगवती की स्तुति की। तब माता की आज्ञा से मुनिवर आस्तीक यज्ञ में आए और राजा जनमेजय से इन्द्र तथा तक्षक के प्राणों की याचना की। महाराज जनमेजय ने कृपापूर्वक प्राणदान का वर दे दिया, ब्राह्मणों की आज्ञा से यज्ञ का समापन किया और विप्रों को प्रसन्नता से दक्षिणा दी। इस प्रकार माता मनसा के पुत्र आस्तीक ने नागों को जलने से बचा लिया। तत्पश्चात् ब्राह्मणों, मुनियों और देवताओं ने देवी मनसा की पूजा और स्तुति की; इन्द्र ने भी सोलह उपचारों से उनका पूजन किया और उन्हें अपनी भगिनी तथा माता के समान पूज्य कहकर वर पाया। बहुत काल तक अपने पुत्र के साथ पिता कश्यप के आश्रम में रहकर और भाइयों से सदा पूजित होकर देवी मनसा अन्त में स्वर्गलोक लौट गईं। इसी से आषाढ़-संक्रान्ति और नागपंचमी के दिन भक्तिपूर्वक जो मनसा की पूजा करता है, उसे कभी नागों का भय नहीं रहता।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)