महाराज शर्याति की पुत्री सुकन्या एक दिन अपनी सखियों के साथ वन में खेलती हुई सरोवर के तट तक जा पहुँचीं। लताओं से घिरे एक विशाल बाँबी पर उनकी दृष्टि पड़ी, जिसके दो छिद्रों में से जुगनू की भाँति दो ज्योतियाँ प्रकाश कर रही थीं। बालसुलभ कौतूहल से भरकर उन्होंने सोचा कि न जाने यह कौन-सी चमकनेवाली वस्तु है, और एक नुकीला काँटा लेकर उन दोनों छिद्रों में चुभो दिया। तभी उन्हें जान पड़ा कि काँटा किसी गीली वस्तु से भीग गया है और बाँबी के भीतर से ‘हा-हा’ की मन्द ध्वनि सुनायी पड़ी। आश्चर्य से भरी वह राजकुमारी यह सोचती हुई वहाँ से चली गयीं कि न जाने मेरे हाथों क्या हो गया।
उसी क्षण एक विचित्र विपत्ति आ खड़ी हुई। राजा शर्याति के समस्त सैनिकों तथा हाथी, घोड़े और ऊँट आदि सभी प्राणियों के मल-मूत्र का अवरोध हो गया। मन्त्रियों सहित राजा इस कष्ट से व्याकुल होकर विचारने लगे कि यह अपकार किसने किया। खोज करने पर ज्ञात हुआ कि सरोवर के पश्चिमी तट पर घोर तपस्या करनेवाले भृगुनन्दन च्यवन मुनि के साथ अवश्य ही किसी ने अनिष्ट किया है; अग्नि के समान तेजस्वी उस तपस्वी का अपमान होने से ही हम सबको यह कष्ट भोगना पड़ रहा है।
तब सुकन्या ने डरते हुए अपने पिता से सब कुछ कह दिया कि खेलते समय उन्होंने बाँबी के दो चमकते छिद्रों में काँटा चुभो दिया था। राजा शीघ्र ही उस बाँबी के पास पहुँचे, मुनि के शरीर पर जमी मिट्टी हटायी, और भीतर महान् वेदना से पीड़ित च्यवन को देखकर दण्ड की भाँति भूमि पर गिरकर प्रणाम किया। हाथ जोड़कर उन्होंने विनती की कि हे महाभाग! मेरी बालिका ने अनजाने में यह अपराध कर दिया है; मुनिगण तो क्रोधशून्य होते हैं, अतः आप इसे क्षमा कर दें।
मुनि का वर और राजा का धर्मसंकट
च्यवन बोले कि हे राजन्! मैं कभी लेशमात्र भी क्रोध नहीं करता; आपकी पुत्री के द्वारा पीड़ा पहुँचाये जाने पर भी मैंने आपको शाप नहीं दिया। किन्तु इस समय मुझ निरपराध के नेत्रों में पीड़ा उत्पन्न हो गयी है, मैं अन्धा और बूढ़ा हो गया हूँ; इस अवस्था में मेरी सेवा कौन करेगा? यदि आप सचमुच क्षमा चाहते हैं तो अपनी कमलनयनी कन्या मुझे मेरी सेवा के लिए सौंप दीजिये। यह सुनकर राजा घोर चिन्ता में पड़ गये; न ‘दूँगा’ कहते बना, न ‘नहीं दूँगा’। वे सोचने लगे कि देवकन्या के समान अपनी इस सुन्दरी पुत्री को इस अन्धे तथा वृद्ध मुनि को देकर मैं भला कैसे सुखी रह सकूँगा। घर लौटकर उन्होंने मन्त्रियों से मन्त्रणा की, पर मन्त्री भी इस विषम संकट में कुछ न कह सके।
तब अपने पिता और मन्त्रियों को चिन्ता से आकुल देखकर सुकन्या उनका अभिप्राय समझ गयीं और मुसकराकर बोलीं कि हे पिताजी! मेरे लिए आप चिन्ता न करें, अब मुझे मुनि को सौंप दीजिये; इसी से समस्त प्रजा को सुख प्राप्त होगा। मैं सन्तुष्ट होकर उस निर्जन वन में अपने परम पवित्र वृद्ध पति की अगाध श्रद्धा से सेवा करूँगी और सती–धर्म का पालन करूँगी; भोग-विलास में मेरी तनिक भी अभिरुचि नहीं है। जैसे अरुन्धती और अनसूया अपने पातिव्रत्य से प्रसिद्ध हुईं, वैसे ही मैं भी आपकी कीर्ति बढ़ानेवाली हूँगी। पुत्री का यह स्नेहभरा वचन सुनकर राजा विधिपूर्वक विवाह सम्पन्न कर उसे मुनि को सौंप आये। मुनि ने राजा का दिया कोई उपहार नहीं लिया, केवल अपनी सेवा के लिए राजकुमारी को ही स्वीकार किया। सुकन्या ने आभूषण और सुन्दर वस्त्र त्यागकर वल्कल तथा मृगचर्म धारण कर लिया; उसे इस वेश में देखकर सभी रानियाँ रो पड़ीं और म्लानमुख राजा नगर लौट गये।
वल्कल पहने राजकन्या की सेवा
राजा के चले जाने पर वह साध्वी बाला पतिसेवा और अग्निसेवा में तल्लीन हो गयीं। वह स्वादिष्ट फल तथा कन्द-मूल लाकर मुनि को अर्पित करतीं, उन्हें स्नान कराकर पवित्र आसन पर बिठातीं और नित्यकर्म की सामग्री उनके आगे रख देतीं। भली-भाँति पकाये गये नीवार का भोजन कराकर वह बड़े प्रेम से ताम्बूल देतीं, रात में उनके चरण दबातीं, ग्रीष्म में पंखे से शीतल वायु करतीं और शीतकाल में सम्मुख अग्नि प्रज्वलित रखतीं। इस प्रकार वह प्रसन्न मन से दिन-रात अपने वृद्ध पति की आराधना में लगी रहतीं।
अश्विनीकुमारों का प्रलोभन
किसी समय सूर्य के दोनों पुत्र अश्विनीकुमार क्रीड़ा करते हुए च्यवन के आश्रम के पास आ पहुँचे। सरोवर में स्नान करके लौटती हुई उस सर्वांगसुन्दरी सुकन्या को देखकर वे दोनों देववैद्य मुग्ध हो गये और पूछने लगे कि हे शुचिस्मिते! सच बताइये, आप किसकी पुत्री हैं और आपके पति कौन हैं? आप तो सौन्दर्य में दूसरी लक्ष्मी की भाँति प्रतीत हो रही हैं। लज्जा से भरी राजकुमारी ने उत्तर दिया कि मैं राजा शर्याति की पुत्री और च्यवन मुनि की पतिव्रता भार्या हूँ; मेरे पतिदेव वृद्ध तथा नेत्रहीन हैं, मैं प्रसन्न मन से उनकी सेवा करती रहती हूँ।
तब अश्विनीकुमार उन्हें बहकाने लगे कि हे विशाललोचने! ऐसे नेत्रहीन तथा बूढ़े मुनि को पति रूप में पाकर आप अपनी इस नवीन युवावस्था को क्यों व्यर्थ कर रही हैं? हमीं दोनों में से किसी एक को अपना पति बना लीजिये और हमारे साथ देवलोक में अनेक सुखों का भोग कीजिये। यह सुनकर वह मितभाषिणी थर-थर काँपने लगीं, फिर धैर्य धारण करके दृढ़ता से बोलीं कि हे सूर्यपुत्रो! आप समस्त प्राणियों के कर्मों के साक्षी भगवान् सूर्य के पुत्र हैं; मुझ पतिव्रता से आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मेरे पिताजी ने मुझे इन्हीं योगपरायण मुनि को सौंप दिया है, अतः व्यभिचारिणी स्त्रियों के मार्ग का अनुसरण मैं कैसे करूँ! यदि आप न मानें तो मैं आप दोनों को शाप दे दूँगी।
सरोवर से निकले तीन एक-से युवक
उनके इस पातिव्रत्य से परम प्रसन्न होकर अश्विनीकुमारों ने कहा कि हे सुश्रोणि! हम देवताओं के श्रेष्ठ वैद्य हैं; हम आपके पति को रूपवान् तथा युवा बना देंगे। तब हमारे समान रूप और अवस्थावाले हम तीनों में से आप किसी एक को पति चुन लीजियेगा। सुकन्या ने अपने पति के पास जाकर यह अद्भुत बात कह दी। च्यवन ने कहा कि उनकी शर्त तुरन्त स्वीकार कर लीजिए, इसमें कोई सोच-विचार न कीजिए। तब वे तीनों उस सरोवर में प्रविष्ट हुए और तत्क्षण एक-से रूप, अवस्था, स्वर और वेशभूषावाले तीन दिव्य युवक बनकर बाहर निकले, जो दिव्य कुण्डलों तथा आभूषणों से सुशोभित थे।
उन तीनों को एक-जैसा देखकर सुकन्या असमंजस में पड़ गयीं और व्याकुल होकर सोचने लगीं कि मैं इनमें से किसका वरण करूँ! अपने पति को छोड़कर किसी दूसरे को मैं कभी नहीं चुन सकती। ऐसा दृढ़ निश्चय करके वह कल्याणस्वरूपिणी परा भगवती के ध्यान में लीन हो गयीं और प्रार्थना करने लगीं कि हे जगदम्बे! मैं महान् कष्ट से पीड़ित होकर आपकी शरण में आयी हूँ; आप मेरे पातिव्रत्य की रक्षा करें और मुझे मेरे पति का दर्शन करा दें। इस प्रकार स्तुति करने पर भगवती त्रिपुरसुन्दरी ने शीघ्र ही सुखदायक ज्ञान उनके हृदय में उत्पन्न कर दिया। तब समान रूपवाले उन तीनों पर भली-भाँति दृष्टि डालकर उस साध्वी ने अपने सच्चे पति च्यवन का वरण कर लिया, जिससे दोनों अश्विनीकुमार परम सन्तुष्ट हुए। अन्य परम्पराओं में सुकन्या अपनी सूझ-बूझ से पति को पहचानती हैं, किन्तु इस देवीभागवत में वे भगवती की शरण लेती हैं और उन्हीं की कृपा से सच्चे पति का ज्ञान पाती हैं।
सुन्दर रूप, नेत्र, यौवन तथा अपनी भार्या को पुनः पाकर च्यवन अत्यन्त हर्षित हुए। उन्होंने अश्विनीकुमारों से कहा कि आप दोनों ने मेरा महान् उपकार किया है, अतः मैं आपको वह वस्तु प्रदान करूँगा जो देवताओं तथा दानवों के लिए भी अलभ्य है। एक बार सुमेरुपर्वत पर ब्रह्माजी के महायज्ञ में इन्द्रदेव ने आप दोनों को ‘वैद्य’ कहकर सोमपात्र ग्रहण करने से रोक दिया था; अब मैं राजा शर्याति के यज्ञ में देवराज इन्द्र के समक्ष ही आपको सोमपान का अधिकारी बना दूँगा। यह सुनकर अश्विनीकुमार हर्षपूर्वक स्वर्ग को लौट गये और च्यवन सुकन्या को साथ लेकर अपने आश्रम पर रहने लगे।
यज्ञ में इन्द्र से टकराव
कुछ काल बीतने पर महाराज शर्याति की पत्नी अपनी पुत्री के विषय में चिन्तित हो उठीं और अपने पति से बोलीं कि आपने वन में एक अन्धे मुनि को पुत्री सौंप दी थी; वह न जाने जीवित है अथवा नहीं, आप जाकर उसे देख आइये। राजा रथ पर बैठकर आश्रम की ओर चल पड़े। वहाँ देवपुत्र के समान नवयौवन से सम्पन्न एक मुनि को देखकर वे सन्देह करने लगे कि कहीं मेरी पुत्री ने कामवश उस वृद्ध मुनि का वध करके किसी अन्य को पति तो नहीं बना लिया! क्रोध से भरकर उन्होंने सुकन्या को कठोर वचन कहे। तब सुकन्या ने पिता के पास जाकर सारी बात बतायी कि हे पिताजी! ये आपके जामाता च्यवन मुनि ही हैं; अश्विनीकुमारों ने दयापूर्वक इन्हें ऐसा कान्तिमान् तथा कमलनयन बना दिया है। च्यवन ने भी राजा को सारा वृत्तान्त विस्तार से कह सुनाया, जिसे सुनकर राजा परम प्रसन्न हुए।
तब च्यवन ने राजा से कहा कि मैं आपका यज्ञ कराऊँगा, आप सामग्री जुटाइये। मैंने अश्विनीकुमारों को सोमपान का अधिकारी बनाने की प्रतिज्ञा की है, और इन्द्र के कुपित होने पर मैं अपने तेजबल से उन्हें शान्त कर दूँगा। राजा ने यह बात स्वीकार की और एक उत्तम यज्ञशाला का निर्माण कराया। वसिष्ठ आदि प्रमुख मुनियों को बुलाकर भृगुवंशी च्यवन ने यज्ञ आरम्भ कराया। इन्द्रसहित सभी देवता वहाँ उपस्थित हुए और दोनों अश्विनीकुमार भी सोमपान की इच्छा से आ पहुँचे। जब च्यवन उन्हें सोमरस ग्रहण कराने लगे, तब इन्द्र ने उन्हें रोका कि ये तो केवल चिकित्सक हैं, सोमपान के अधिकारी नहीं। च्यवन ने उत्तर दिया कि ये वर्णसंकर नहीं, अपितु भगवान् सूर्य की धर्मपत्नी से उत्पन्न हुए हैं; ये किस दोष के कारण सोमपान के योग्य नहीं हैं? मैंने इन्हें सोमपान का अधिकारी बना दिया है, अतः इन्हें सोमरस अवश्य पिलाऊँगा। इन्द्र के मना करने पर भी वहाँ उपस्थित कोई देवता च्यवन से कुछ न कह सका, और अत्यन्त तेजस्वी उन मुनि ने अपने तपोबल के द्वारा सोमरस का भाग लेकर अश्विनीकुमारों को दे दिया।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)