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अपने वचन की रक्षा के लिए विश्वामित्र की दक्षिणा चुकाते-चुकाते राजा हरिश्चन्द्र सब कुछ गँवा बैठे थे। राज्य पहले ही हाथ से निकल चुका था, फिर उन्हें अपनी रानी शैव्या और पुत्र रोहित को बेचना पड़ा, और अन्त में स्वयं को भी एक चाण्डाल के हाथ बेच देना पड़ा। चाण्डाल ने वह धन विश्वामित्र को सौंप दिया और आकाशवाणी ने घोषित कर दिया कि अब राजा ऋण से मुक्त हो गये हैं; आकाश से उनके मस्तक पर पुष्पवर्षा हुई, इन्द्र आदि देवताओं ने “साधु, साधु!” कहा, और राजा ने विश्वामित्र को माता-पिता के समान बताकर उनका आभार माना। विश्वामित्र ने कहा कि आज से उन्हें चाण्डाल की आज्ञा माननी होगी, और धन लेकर चले गये। किन्तु मुक्ति कहाँ! अब वे उसी चाण्डाल के दास थे। चाण्डाल ने उन्हें बाँधकर डण्डे से पीटा और अपनी बस्ती में ले जाकर बेड़ियों में डाल दिया; चार दिन तक राजा अन्न-जल त्यागकर पत्नी और पुत्र को याद करते रहे। पाँचवें दिन बेड़ियाँ खोलकर उसने काशी के दक्षिण भाग में स्थित विशाल श्मशान की रखवाली उन्हें सौंप दी, इस आदेश के साथ कि जो भी शव यहाँ आये, उसका वस्त्र शुल्क के रूप में ग्रहण करना ही उनका काम होगा; साथ ही एक जर्जर डण्डा थमाकर कहा कि सर्वत्र यह घोषणा करें, “यह डण्डा वीरबाहु का है।”
श्मशान का पहरेदार
वह श्मशान अत्यन्त भयावह था। चारों ओर खोपड़ियाँ बिखरी पड़ी थीं, फूटे घड़े और फटे वस्त्र पड़े थे, गीध और सियार दिन-रात बोलते रहते थे, और चिताओं का धुआँ सारी दिशाओं को ढके रहता था। मैले शरीरवाले, सूखी लकड़ी-से दुर्बल हुए राजा शवों की माला पहनकर अपने मस्तक को मण्डित किये रहते; शवों के पिण्डदान का बचा भात खाकर भूख मिटाते और मन-ही-मन गिनते रहते कि इस शव से यह शुल्क मिला, यह मेरा भाग, यह राजा का, यह चाण्डाल का। हाय, मेरे भृत्य कहाँ गये, मन्त्रीगण कहाँ गये, कुल-परम्परा से आया मेरा राज्य कहाँ गया, हाय मेरी प्रिया, हाय मेरा अबोध पुत्र! फिर वे सोचते कि धर्म के बिना मनुष्य का कभी कल्याण नहीं होता, अतः यत्नपूर्वक धर्म को ही धारण करना चाहिए। ऐसा विलाप करते हुए न उन्हें दिन में नींद आती, न रात में। इस प्रकार बारह महीने उन्हें सौ वर्ष के समान बीत गये।
राजकुमार की मृत्यु
उधर उनका पुत्र रोहित, जो अब एक ब्राह्मण के यहाँ रहता था, साथी बालकों के साथ वाराणसी के समीप खेलने गया। अपने स्वामी की अग्निहोत्र-सामग्री के लिए उसने कुश और समिधाएँ बटोरीं और लकड़ियों का बोझ सिर पर उठा लिया। प्यास से व्याकुल होकर वह एक जलाशय पर जल पीकर विश्राम करने लगा। जैसे ही उसने बाँबी के ढेर पर रखा बोझ फिर उठाना चाहा, विश्वामित्र की प्रेरणा से एक प्रचण्ड काला विषधर सर्प उस बाँबी से निकला और उसने बालक को डँस लिया; रोहित उसी क्षण भूमि पर गिर पड़ा। भयभीत बालक दौड़कर उसकी माता के पास पहुँचे और बोले कि आपका पुत्र साँप के काटने से चल बसा।
वज्रपात-सी वह बात सुनकर रानी शैव्या, जो अब उसी ब्राह्मण की दासी थीं, मूर्च्छित होकर गिर पड़ीं। सन्ध्या के समय रोना अशुभ मानकर वह ब्राह्मण कुपित हो गया और कठोर वचनों से बार-बार डाँटते हुए उसने रानी से घर का काम पूरा करने को कहा। रानी के पैरों पड़कर मुहूर्तभर की छुट्टी माँगने पर भी ब्राह्मण ने कहा कि उसे उनके पुत्र से क्या, वे घर का काम करें; आधी रात तक उसके पैर दबाने और अन्य काम करने के बाद ही ब्राह्मण ने उन्हें पुत्र का दाह-संस्कार करके शीघ्र लौट आने की आज्ञा दी, ताकि सवेरे का घर का काम न बिगड़े। रानी अकेली रात में विलाप करती हुई निकलीं और अपने मृत पुत्र को धरती पर पड़ा देखकर उस पर गिरकर करुण क्रन्दन करने लगीं। जन्म के समय ब्राह्मणों ने जो दीर्घायु और पृथ्वीपति होने की भविष्यवाणी की थी, हथेली के चक्र, मत्स्य, छत्र, श्रीवत्स और स्वस्तिक आदि जो शुभ चिह्न थे, सब व्यर्थ हो गये, यह कहकर वे “हा राजन्! आकर अपने मृत पुत्र को देखिए” पुकारती रहीं।
रानी का वह विलाप सुनकर नगर के पहरेदार जाग उठे और आश्चर्यचकित होकर पास आये। उन्होंने पूछा कि आप कौन हैं, यह बालक किसका है, और रात में अकेली यहाँ क्यों रो रही हैं? शोक से अवरुद्ध रानी कुछ भी न बोल सकीं और स्तब्ध-सी खड़ी रहीं। तब पहरेदारों को सन्देह हुआ कि यह अवश्य ही बालकों को खा जानेवाली कोई राक्षसी है, जो किसी का बालक यहाँ खाने के लिए उठा लायी है; कोई भली स्त्री होती तो आधी रात को बाहर क्यों होती? वे उन्हें केश पकड़कर घसीटते हुए चाण्डाल के पास ले गये और उसे सौंपकर बोले कि इस बालघातिनी का शीघ्र वध करा दीजिये। चाण्डाल ने उन्हें कुख्यात बालघातिनी बताया, कसकर बाँधा, केश पकड़कर घसीटा और रस्सियों से पीटा; फिर हरिश्चन्द्र को कठोर स्वर में आज्ञा दी कि वे बिना संकोच इस दुष्टा का वध करें।
श्मशान में पहचान
हरिश्चन्द्र ने आजीवन स्त्री-वध न करने का कठोर व्रत ले रखा था, अतः वे थर-थर काँपते हुए बोले कि मैं यह नहीं कर सकता, मुझे कोई और कार्य सौंप दीजिये। चाण्डाल ने फटकारते हुए कहा कि जो सेवक वेतन लेकर स्वामी के कार्य की उपेक्षा करता है, वह दस हजार कल्पों तक नरक से नहीं छूटता। राजा ने विनती की कि कोई कठिन से कठिन काम बताइये, आपके शत्रु को मारकर उसकी भूमि आपको दे दूँ, देवताओं सहित इन्द्र को भी जीत लूँ; पर चाण्डाल ने कहा कि दास होकर देवताओं की-सी बातें शोभा नहीं देतीं, और उनके हाथ में खड्ग थमा दिया। विवश होकर राजा ने तलवार उठायी और उस स्त्री से कहा कि आप मेरे सामने आकर बैठ जाइये; यदि मेरा हाथ चल सका तो मैं आपका सिर काट लूँगा। न राजा अपनी पत्नी को पहचान रहे थे, न रानी अपने पति को। मृत्यु की ही अभिलाषा रखती हुई रानी बोलीं कि थोड़ी दूर पर मेरा पुत्र मृत पड़ा है; जब तक मैं उसे लाकर उसका दाह न कर दूँ, तब तक प्रतीक्षा कीजिये, फिर मुझे मार डालियेगा। राजा ने स्वीकार कर लिया।
रानी सर्पदंश से मरे उस बालक को लाकर भूमि पर लिटाकर ‘हा पुत्र! हा वत्स!’ कहती हुई विलाप करने लगीं। उनका रुदन सुनकर हरिश्चन्द्र, जिनका कर्तव्य मृतक का वस्त्र शुल्क रूप में लेना था, शव के पास आये और उसका वस्त्र खींचा। बालक के अंगों में पूर्णचन्द्र-सा मुख, कमल-से नेत्र, चौड़ी छाती और लम्बी भुजाएँ, ऐसे राजलक्षण देखकर वे सोचने लगे कि किसी राजा के कुल में उत्पन्न इस बालक को यमराज ने अपने कालपाश में बाँध लिया है। तभी रानी ने विलाप करते हुए राजर्षि हरिश्चन्द्र के राज्य-नाश और पत्नी-पुत्र के बिकने की बात कही; यह सुनकर राजा ने अपनी पत्नी शैव्या और अपने मृत पुत्र रोहित को पहचान लिया। दोनों मूर्च्छित होकर गिरे, फिर सचेत होकर एक साथ विलाप करने लगे। राजा ने अपने पतन की सारी कथा कह सुनायी। तब रानी ने रुँधे कण्ठ से कहा कि स्वामी की आज्ञा पूरी करने के लिए राजा उनका सिर काट दें, ताकि आज उन्हें स्वामिद्रोह और असत्य का दोष न लगे; यह सुनते ही राजा मूर्च्छित होकर गिर पड़े। फिर रानी ने कहा कि उन्होंने गौरी, देवताओं और ब्राह्मणों की आराधना की है, उनकी कृपा से दूसरे जन्म में भी यही उनके पति होंगे। राजा जानते थे कि चाण्डाल की आज्ञा के बिना अग्नि में प्रवेश करने पर दूसरे जन्म में फिर चाण्डाल का दास बनना और रौरव नरक भोगना पड़ेगा, फिर भी पुत्र-शोक को तीनों लोकों में सबसे बड़ा दुःख मानकर उन्होंने पुत्र के शव के साथ जलती चिता में प्रवेश का निश्चय किया, और रानी से कहा कि वे ब्राह्मण के घर लौटकर देवता के समान उसकी सेवा करें। पर रानी बोलीं कि वे भी साथ ही जलेंगी, और स्वर्ग हो या नरक, पति के साथ ही भोगेंगी।
भगवती का ध्यान और देवताओं का आगमन
तब राजा हरिश्चन्द्र ने चिता तैयार करके उस पर अपने पुत्र को लिटा दिया और पत्नीसहित दोनों हाथ जोड़कर भगवती शताक्षी का ध्यान करने लगे, जो जगत् की अधिष्ठात्री हैं, पंचकोश के भीतर सदा विराजमान रहती हैं, रक्तवर्ण का वस्त्र धारण करती हैं, करुणारस की सागरस्वरूपा हैं, अनेक आयुध धारण करती हैं और निरन्तर जगत् की रक्षा में तत्पर रहती हैं।
इस प्रकार ध्यानमग्न राजा के समक्ष धर्म को आगे करके इन्द्रसहित समस्त देवता, ब्रह्मा, विश्वामित्र, मरुद्गण, रुद्रगण तथा दोनों अश्विनीकुमार सहसा उपस्थित हो गये। ब्रह्मा ने बताया कि वे साक्षात् पितामह हैं और साथ में स्वयं भगवान् धर्मदेव हैं। धर्म ने कहा कि हे राजन्! यह साहस मत कीजिये; आपकी तितिक्षा, दम और सत्त्व आदि गुणों से सन्तुष्ट होकर मैं धर्म आपके पास आया हूँ। इन्द्र ने कहा कि हे महाभाग! आज आपने पत्नी और पुत्रसहित सनातन लोकों पर विजय प्राप्त कर ली है। फिर इन्द्र ने चिता पर सोये मृत रोहित पर अमृत की वर्षा कर दी, जिससे वह बालक स्वस्थ, प्रसन्न और आनन्दित होकर उठ बैठा; पुष्पवर्षा हुई और दुन्दुभियाँ बज उठीं। राजा और रानी दिव्य मालाओं तथा वस्त्रों से अलंकृत हो गये।
इन्द्र ने राजा से कहा कि अब आप पत्नी-पुत्रसहित स्वर्गलोक के लिए प्रस्थान कीजिये। किन्तु हरिश्चन्द्र बोले कि अपने स्वामी चाण्डाल की आज्ञा और प्रत्युपकार के बिना मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगा; तब धर्म ने प्रकट किया कि राजा के भावी क्लेश को जानकर उन्होंने ही अपनी माया से चाण्डाल का रूप धारण किया था, और जो चाण्डाल की बस्ती उन्हें दिखायी पड़ी थी, वह भी उन्हीं की माया थी। तब भी राजा ने कहा कि अयोध्या के जो सब निवासी मेरे शोक से सन्तप्त हैं, उन्हें छोड़कर मैं अकेला स्वर्ग कैसे जाऊँ? जो श्रद्धालु भक्त हो, उसका त्याग करनेवाले को सुख नहीं मिलता। इन्द्र ने कहा कि उन सबके पुण्य और पाप भिन्न-भिन्न हैं, फिर स्वर्ग का भोग सबके साथ कैसे होगा? राजा बोले कि राजा प्रजा के ही बल से राज्य भोगता है, यज्ञ करता है और कुएँ-तालाब बनवाता है, अतः स्वर्ग के लोभ में मैं अपने सहायकों को नहीं छोड़ूँगा; यदि मेरे किये दान, यज्ञ और जप का फल उन सब नगरवासियों के साथ, एक दिन के लिए ही सही, बाँट दिया जाय तो मैं उनके साथ ही चलूँगा। इन्द्र ने यह स्वीकार कर लिया। तब अयोध्या के जो नागरिक संसार से विरक्त थे, वे अपने पुत्रों पर गृहस्थी का भार सौंपकर सूर्य-से तेजस्वी शरीर के साथ उत्तम विमानों पर चढ़कर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग को चल पड़े; और राजा हरिश्चन्द्र ने स्वयं अपने पुत्र रोहित का अयोध्या के राज्य पर अभिषेक करके, पुत्र और मित्रों का सम्मान कर, इच्छानुसार चलने वाले विमान में आसन ग्रहण किया। यह देखकर शुक्राचार्य ने विस्मित होकर सहिष्णुता की महिमा और दान के महान् फल की स्तुति की, जिनके बल पर राजा हरिश्चन्द्र ने इन्द्र का लोक प्राप्त कर लिया।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)