अपने वचन की रक्षा के लिए विश्वामित्र की दक्षिणा चुकाते-चुकाते राजा हरिश्चन्द्र सब कुछ गँवा बैठे थे। राज्य पहले ही हाथ से निकल चुका था, फिर उन्हें अपनी रानी शैव्या और पुत्र रोहित को बेचना पड़ा, और अन्त में स्वयं को भी एक चाण्डाल के हाथ बेच देना पड़ा। चाण्डाल ने वह धन विश्वामित्र को सौंप दिया और आकाशवाणी ने घोषित कर दिया कि अब राजा ऋण से मुक्त हो गये हैं। किन्तु मुक्ति कहाँ! अब वे उसी चाण्डाल के दास थे। उसने काशी के दक्षिण भाग में स्थित विशाल श्मशान की रखवाली उन्हें सौंप दी, इस आदेश के साथ कि जो भी शव यहाँ आये, उसका वस्त्र शुल्क के रूप में ग्रहण करना ही उनका काम होगा।
श्मशान का पहरेदार
वह श्मशान अत्यन्त भयावह था। चारों ओर खोपड़ियाँ बिखरी पड़ी थीं, फूटे घड़े और फटे वस्त्र पड़े थे, गीध और सियार दिन-रात बोलते रहते थे, और चिताओं का धुआँ सारी दिशाओं को ढके रहता था। मैले शरीरवाले, सूखी लकड़ी-से दुर्बल हुए राजा शवों की माला पहनकर अपने मस्तक को मण्डित किये रहते; शवों के पिण्डदान का बचा भात खाकर भूख मिटाते और मन-ही-मन गिनते रहते कि इस शव से यह शुल्क मिला, यह मेरा भाग, यह राजा का, यह चाण्डाल का। हाय, मेरे भृत्य कहाँ गये, मन्त्रीगण कहाँ गये, कुल-परम्परा से आया मेरा राज्य कहाँ गया, हाय मेरी प्रिया, हाय मेरा अबोध पुत्र! ऐसा विलाप करते हुए न उन्हें दिन में नींद आती, न रात में। इस प्रकार बारह महीने उन्हें सौ वर्ष के समान बीत गये।
राजकुमार की मृत्यु
उधर उनका पुत्र रोहित, जो अब एक ब्राह्मण के यहाँ रहता था, साथी बालकों के साथ वाराणसी के समीप वन में गया। अपने स्वामी की अग्निहोत्र-सामग्री के लिए उसने कुश और समिधाएँ बटोरीं और लकड़ियों का बोझ सिर पर उठा लिया। प्यास से व्याकुल होकर वह एक जलाशय पर जल पीकर विश्राम करने लगा। जैसे ही उसने बाँबी के ढेर पर रखा बोझ फिर उठाना चाहा, विश्वामित्र की प्रेरणा से एक प्रचण्ड काला विषधर सर्प उस बाँबी से निकला और उसने बालक को डँस लिया; रोहित उसी क्षण भूमि पर गिर पड़ा। भयभीत बालक दौड़कर उसकी माता के पास पहुँचे और बोले कि आपका पुत्र साँप के काटने से चल बसा।
वज्रपात-सी वह बात सुनकर रानी शैव्या, जो अब उसी ब्राह्मण की दासी थी, मूर्च्छित होकर गिर पड़ीं। सन्ध्या के समय रोना अशुभ मानकर वह ब्राह्मण कुपित हो गया और कठोर वचनों से बार-बार डाँटते हुए उसने रानी से घर का काम पूरा करने को कहा। बहुत विनती पर, आधी रात तक उसके पैर दबाने के बाद, ब्राह्मण ने मुहूर्तभर के लिए उन्हें पुत्र के पास जाने की अनुमति दी। रानी अकेली रात में विलाप करती हुई निकलीं और अपने मृत पुत्र को धरती पर पड़ा देखकर उस पर गिरकर करुण क्रन्दन करने लगीं।
रानी का वह विलाप सुनकर नगर के पहरेदार जाग उठे और आश्चर्यचकित होकर पास आये। उन्होंने पूछा कि आप कौन हैं, यह बालक किसका है, और रात में अकेली यहाँ क्यों रो रही हैं? शोक से अवरुद्ध रानी कुछ भी न बोल सकीं और स्तब्ध-सी खड़ी रहीं। तब पहरेदारों को सन्देह हुआ कि यह अवश्य ही बालकों को खा जानेवाली कोई राक्षसी है, जो अपने ही शिशु को खा चुकी है। वे उन्हें केश पकड़कर घसीटते हुए चाण्डाल के पास ले गये और उसे सौंपकर बोले कि इस बालघातिनी का शीघ्र वध करा दीजिये। चाण्डाल ने उन्हें कुख्यात राक्षसी मानकर हरिश्चन्द्र के हाथ में तलवार पकड़ा दी और आज्ञा दी कि इसका तुरन्त वध कर दीजिए।
श्मशान में पहचान
हरिश्चन्द्र ने आजीवन स्त्री-वध न करने का कठोर व्रत ले रखा था, अतः वे थर-थर काँपते हुए बोले कि मैं यह नहीं कर सकता, मुझे कोई और कार्य सौंप दीजिये। चाण्डाल ने फटकारते हुए कहा कि जो सेवक वेतन लेकर स्वामी के कार्य की उपेक्षा करता है, वह दस हजार कल्पों तक नरक से नहीं छूटता। विवश होकर राजा ने तलवार उठायी और उस स्त्री से कहा कि आप मेरे सामने आकर बैठ जाइये; यदि मेरा हाथ चल सका तो मैं आपका सिर काट लूँगा। उस अन्धकार में न राजा अपनी पत्नी को पहचान रहे थे, न रानी अपने पति को। मृत्यु की ही अभिलाषा रखती हुई रानी बोलीं कि थोड़ी दूर पर मेरा पुत्र मृत पड़ा है; जब तक मैं उसे लाकर उसका दाह न कर दूँ, तब तक प्रतीक्षा कीजिये, फिर मुझे मार डालियेगा। राजा ने स्वीकार कर लिया।
रानी सर्पदंश से मरे उस बालक को लाकर भूमि पर लिटाकर ‘हा पुत्र! हा वत्स!’ कहती हुई विलाप करने लगीं। उनका रुदन सुनकर हरिश्चन्द्र, जिनका कर्तव्य मृतक का वस्त्र शुल्क रूप में लेना था, शव के पास आये और उसका वस्त्र खींचा। बालक की हथेलियों में चक्र, मत्स्य, श्रीवत्स तथा स्वस्तिक के चिह्न देखकर वे सोचने लगे कि किसी राजा के कुल में उत्पन्न इस बालक को यमराज ने अपने कालपाश में बाँध लिया है। तभी उनकी पूर्व-स्मृति जाग उठी और उन्होंने अपनी साध्वी पत्नी शैव्या तथा अपने पुत्र रोहित को पहचान लिया। दोनों मूर्च्छित होकर गिरे, फिर सचेत होकर एक साथ विलाप करने लगे। राजा ने अपने पतन की सारी कथा कह सुनायी। अन्त में दोनों ने निश्चय किया कि पुत्र की चिता पर वे स्वयं भी जल जायँगे। किन्तु राजा को यह भी ध्यान रहा कि बिना स्वामी की आज्ञा लिये ऐसा करने पर स्वामिद्रोह का पाप लगेगा; और भगवती गौरी की उपासिका रानी ने प्रार्थना की कि जन्म-जन्मान्तर में यही उनके पति हों।
भगवती का ध्यान और देवताओं का आगमन
तब राजा हरिश्चन्द्र ने चिता तैयार करके उस पर अपने पुत्र को लिटा दिया और पत्नीसहित दोनों हाथ जोड़कर भगवती शताक्षी का ध्यान करने लगे, जो जगत् की अधिष्ठात्री हैं, पंचकोश के भीतर सदा विराजमान रहती हैं, रक्तवर्ण का वस्त्र धारण करती हैं, करुणारस की सागरस्वरूपा हैं, अनेक आयुध धारण करती हैं और निरन्तर जगत् की रक्षा में तत्पर रहती हैं।
इस प्रकार ध्यानमग्न राजा के समक्ष धर्म को आगे करके इन्द्रसहित समस्त देवता, ब्रह्मा, विश्वामित्र, मरुद्गण, रुद्रगण तथा दोनों अश्विनीकुमार सहसा उपस्थित हो गये। ब्रह्मा ने बताया कि वे साक्षात् पितामह हैं और साथ में स्वयं भगवान् धर्मदेव हैं। धर्म ने प्रकट किया कि राजा के भावी क्लेश को जानकर उन्होंने ही अपनी माया से चाण्डाल का रूप धारण किया था; जो चाण्डाल का घर उन्हें दिखायी पड़ा था, वह भी उन्हीं की माया थी। इन्द्र ने कहा कि हे महाभाग! आज आपने पत्नी और पुत्रसहित सनातन लोकों पर विजय प्राप्त कर ली है। फिर इन्द्र ने चिता पर सोये मृत रोहित पर अमृत की वर्षा कर दी, जिससे वह बालक स्वस्थ, प्रसन्न और आनन्दित होकर उठ बैठा; पुष्पवर्षा हुई और दुन्दुभियाँ बज उठीं। राजा और रानी दिव्य मालाओं तथा वस्त्रों से अलंकृत हो गये।
इन्द्र ने राजा से कहा कि अब आप पत्नी-पुत्रसहित स्वर्गलोक के लिए प्रस्थान कीजिये। किन्तु हरिश्चन्द्र बोले कि अपने स्वामी चाण्डाल की आज्ञा और प्रत्युपकार के बिना मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगा; धर्म ने आश्वस्त करके यह शंका दूर की। तब भी राजा ने कहा कि अयोध्या के जो सब निवासी मेरे शोक से सन्तप्त हैं, उन्हें छोड़कर मैं अकेला स्वर्ग कैसे जाऊँ? जो श्रद्धालु भक्त हो, उसका त्याग करनेवाले को सुख नहीं मिलता। अतः यदि मेरे किये दान, यज्ञ और तप का फल उन सब नगरवासियों के साथ, एक दिन के लिए ही सही, बाँट दिया जाय तो मैं उनके साथ ही चलूँगा। इन्द्र ने यह स्वीकार कर लिया। विश्वामित्र ने रोहित का राज्याभिषेक करके उसे अयोध्या का राजा बना दिया, और फिर अयोध्या के समस्त नागरिक तेजस्वी होकर उत्तम विमानों पर चढ़कर अपने राजा के साथ स्वर्ग को चल पड़े। यह देखकर शुक्राचार्य ने विस्मित होकर सहिष्णुता की महिमा और दान के महान् फल की स्तुति की, जिनके बल पर राजा हरिश्चन्द्र ने इन्द्र का लोक प्राप्त कर लिया।
यह हरिश्चन्द्र-आख्यान ऐतरेय ब्राह्मण तथा मार्कण्डेय पुराण में भी मिलता है, किन्तु देवीभागवत का यह वर्णन शाक्त दृष्टि से है, जहाँ हरिश्चन्द्र भगवती शताक्षी के भक्त हैं और उनकी सारी परीक्षा धर्म की ही माया थी।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)