भारद्वाज मुनि के आश्रम में, गंगा के तट पर, मुनिकुमारों के बीच एक राजपुत्र खेलता था। नाम था सुदर्शन। कोसल के राजा ध्रुवसन्धि उसके पिता थे, जिन्हें आखेट में एक सिंह ने मार डाला था, और उसके नाना को युद्ध में राजा युधाजित् ने। पिता के जाते ही राज्य छिन गया, और भयभीत माता मनोरमा उस बालक को लेकर विदल्ल नामक मन्त्री तथा एक धाय के साथ इसी वन में चली आई थीं। मुनियों और मुनिपत्नियों ने नीवार और वन के फलों से तीनों का पालन किया। एक दिन खेलते-खेलते किसी मुनिकुमार ने सुदर्शन को क्लीब कहकर पुकारा। बालक ने उसमें से केवल अनुस्वाररहित एक अक्षर क्ली ग्रहण कर लिया और बार-बार उसी का उच्चारण करने लगा। दैवयोग से वही कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र उस बालक को स्वयमेव प्राप्त हो गया। पाँचवें वर्ष में ही, बिना ऋषि–छन्द और बिना न्यास के, वह खेलते तथा सोते हुए मन-ही-मन उसी बीज का जप करता और उसे कभी न भूलता।
ग्यारहवें वर्ष में मुनि ने उसका उपनयन कराया और उसे वेद, धनुर्वेद तथा नीतिशास्त्र पढ़ाए; उसी मन्त्र के प्रभाव से बालक ने समस्त विद्याएँ सहज ही सीख लीं। एक बार उसने स्वप्न में उन जगज्जननी अम्बिका का प्रत्यक्ष दर्शन किया, जो रक्तवस्त्र धारण किए, रक्तवर्ण, गरुड़ पर विराजमान वैष्णवी शक्ति के रूप में प्रकट हुई थीं। फिर नदी-तट पर उपासना करते उस सुदर्शन को स्वयं भगवती जगदम्बा ने धनुष, तीक्ष्ण बाण, तूणीर और कवच प्रदान किए।
काशी की राजकुमारी का निश्चय
उन्हीं दिनों काशिराज सुबाहु की परम प्रिय पुत्री शशिकला ने बन्दीजनों के मुख से उस वनवासी राजकुमार की चर्चा सुनी, जो सब शुभ लक्षणों से सम्पन्न और मानो दूसरा कामदेव था। सुनते ही उसने मन-ही-मन उसे अपना पति चुन लिया। उसी रात जगदम्बा स्वप्न में उसके पास आकर बोलीं, “हे सुश्रोणि, सुदर्शन हमारा भक्त है; आप उसी को अपना पति स्वीकार कीजिए। हमारी आज्ञा से वह आपकी सब कामनाएँ पूर्ण करेगा।” उस मनोहर स्वरूप और इन वचनों को स्मरण कर शशिकला परम प्रसन्न हो उठी।
जब पिता सुबाहु ने कन्या के लिए स्वयंवर रचाया और देश-देश के राजा मंचों पर आ विराजे, तब शशिकला ने माता से दृढ़ता से कह दिया कि वह कामासक्त राजाओं के सम्मुख नहीं जाएगी; उसने तो पहले ही सुदर्शन का वरण कर लिया है। युधाजित् भी अपने दौहित्र शत्रुजित् को साथ लेकर वहाँ आया था, और सब राजाओं की सेनाएँ मिलकर तिरसठ अक्षौहिणी थीं। किन्तु पुत्री का निश्चय जानकर सुबाहु ने अन्तःपुर के एक गुप्त स्थान में, वैदिक रीति से, रात में ही शशिकला का विवाह सुदर्शन के साथ सम्पन्न कर दिया, और अपने जामाता को रत्नजटित रथ, मदमत्त हाथी, सिन्धुदेश के घोड़े, स्वर्णभूषित दासियाँ तथा अपार धन उपहार में दिए। प्रातःकाल जब अन्य राजाओं को विवाह की बात ज्ञात हुई, तो वे क्रोध से तमतमा उठे और नगर के बाहर निकलकर निश्चय किया कि उस बलहीन बालक को मारकर कन्या को छीन लेंगे।
मार्ग में घिरा दूल्हा
सुदर्शन ने अपने श्वसुर से विदा माँगी और नववधू शशिकला के साथ भारद्वाज-आश्रम की ओर चल पड़े; रक्षा के लिए सुबाहु भी एक विशाल सेना लेकर पीछे-पीछे चले। मार्ग में जब उन क्रुद्ध राजाओं के सैनिकों ने चारों ओर से घेर लिया, तब सुदर्शन ने विधिपूर्वक मन में भगवती चण्डिका का ध्यान किया और प्रसन्नतापूर्वक उनकी शरण ली। वे तो निरन्तर उसी एकाक्षर कामराज मन्त्र का जप कर रहे थे, अतः नववधू के साथ निर्भय और चिन्तामुक्त थे। शंख, भेरी और नगाड़े बज उठे। शत्रुजित् और युधाजित् बाण चलाने लगे, और काशिराज सुबाहु भी अपने जामाता की सहायता के लिए सेना सहित आ डटे। इस प्रकार वहाँ रोमांचकारी संग्राम छिड़ गया।
सिंहवाहिनी का प्राकट्य
उसी भयानक क्षण में सहसा भगवती प्रकट हो गईं। वे सिंह पर सवार थीं, नाना प्रकार के शस्त्रास्त्र धारण किए, दिव्य वस्त्र पहने और मन्दार की माला से सुशोभित थीं। राजा चकित होकर पूछने लगे कि सिंह पर सवार यह स्त्री कौन है और कहाँ से प्रकट हुई। सुदर्शन ने सुबाहु से कहा, “हे राजन्, इन दिव्य दर्शनवाली महादेवी को देखिए; ये मुझ पर अनुग्रह करने के लिए प्रकट हुई हैं। मैं पहले भी निर्भय था, अब और भी निर्भय हो गया।” दोनों ने प्रणाम किया। भगवती के सिंह ने ऐसी भीषण गर्जना की कि रणभूमि के हाथी काँप उठे और सभी दिशाएँ भयानक हो गईं।
अत्यन्त कुपित होकर युधाजित् ने राजाओं को ललकारा, “आप लोग इस सिंहवाहिनी स्त्री से क्यों डरते हैं? इस बलहीन बालक को कन्या सहित मार डालिए; हम सिंह के समान वीरों का भाग यह सियार लेकर न जाने पाए।” यह कहकर उसने धनुष कान तक खींचकर तीखे बाण छोड़े, किन्तु सुदर्शन ने उन्हें छूटते ही अपने बाणों से क्षणभर में काट डाला। तब भगवती चण्डिका अत्यन्त क्रुद्ध हो उठीं और युधाजित् पर बाण बरसाने लगीं। नाना रूप धारण कर, नाना शस्त्र लेकर जगदम्बा ने घमासान युद्ध किया, और कुछ ही क्षणों में शत्रुजित् तथा युधाजित् दोनों मारे जाकर अपने-अपने रथों से गिर पड़े। सर्वत्र जय-जयकार की ध्वनि गूँज उठी।
दुर्गा का वरदान और नवरात्र
शत्रुओं का निधन देखकर परम प्रसन्न सुबाहु दुर्गतिनाशिनी दुर्गा की स्तुति करने लगे: “जगत् को धारण करनेवाली, मनोरथ पूर्ण करनेवाली भगवती दुर्गा को बार-बार नमस्कार है। हे शिवे, हे मोक्षदायिनि, हे विश्वव्यापिनि, हे जगन्माता! आप ही सरस्वती हैं, आप ही सबके भीतर बुद्धि, मति और गति हैं। भक्तों की पीड़ा दूर करनेवाली आपकी स्तुति भला मैं पामर कैसे कर सकता हूँ?” प्रसन्न होकर देवी ने वर माँगने को कहा। सुबाहु ने हाथ जोड़कर याचना की, “हे माता! आप शक्तिस्वरूपा होकर दुर्गा नाम से सदा मेरी नगरी काशी में विराजमान रहें और नगर की रक्षा करती रहें। जब तक यह पृथ्वी रहे, तब तक आप इस मुक्तिपुरी में निवास करें।” भगवती ने वर दे दिया कि जब तक पृथ्वी रहेगी, तब तक वे सब लोकों की रक्षा के लिए काशी में निवास करेंगी; और फिर अन्तर्धान हो गईं।
तब वे सभी विरोधी राजा, जो अब भक्ति से भर गए थे, सुदर्शन को वैसे ही प्रणाम करने लगे जैसे देवता इन्द्र को करते हैं, और उन्हें अपना स्वामी मान लिया। सुदर्शन ने उन्हें बताया कि यह शक्ति ही सबकी आदिस्वरूपा महालक्ष्मी हैं, जो रजोगुण से सृष्टि, सत्त्वगुण से पालन और तमोगुण से संहार करती हैं; वे ही निर्गुणा परा शक्ति हैं। “बाल्यकाल में ही मुझे उनका कामराज बीजमन्त्र प्राप्त हो गया था; तभी से मैं दिन-रात उन्हीं का स्मरण करता हूँ।” भगवती ने सुदर्शन को आज्ञा दी कि वे अयोध्या जाकर अपने कुल की मर्यादा के अनुसार राज्य करें, प्रयत्नपूर्वक उनका स्मरण और पूजन करते रहें, अपने नगर में उनकी प्रतिमा स्थापित करें, तीनों समय पूजन करें, और शरत्काल में नवरात्र-विधान से उनकी महापूजा करें।
तत्पश्चात् सुबाहु काशी की ओर और धर्मात्मा सुदर्शन अयोध्या की ओर चल पड़े। सुदर्शन ने शत्रुजित् की शोकाकुल माता लीलावती को सान्त्वना दी, उन्हें अपनी माता मनोरमा के समान माना, और एक स्वर्णसिंहासन पर देवी को विराजमान कर, वैदिक विद्वानों से विधिपूर्वक उनकी प्रतिमा की स्थापना कराई। जैसे कभी इसी अयोध्या में श्रीराम और राजा रघु का धर्ममय राज्य था, वैसे ही सुदर्शन के राज्य में प्रजा सुखी रही और वर्णाश्रम-धर्म चारों चरणों से समृद्ध हुआ। कोसल देश के सभी राजाओं ने गाँव-गाँव में देवी के मन्दिर बनवाए, और तब से समस्त कोसल में प्रेमपूर्वक भगवती की पूजा होने लगी।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)