प्रलय के अपार जल पर आकाश के बीचोंबीच वे तीनों देव उस दिव्य आभूषणों से मण्डित देवी के सम्मुख हाथ जोड़े खड़े थे। अभी-अभी जगदम्बा ने उन्हें आज्ञा दी थी कि अब निर्भय होकर सृष्टि, पालन और संहार का अपना-अपना कार्य सँभालें और अपनी विभूतियों से अण्डज, पिण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज, इन चारों प्रकार की प्रजा रचें। किन्तु ब्रह्मा ने विनयपूर्वक कहा था, “हे माता, हम तो शक्तिहीन हैं। अभी न कहीं विस्तृत पृथ्वी है, न पंचतत्त्व, न गुण, न तन्मात्राएँ और न इन्द्रियाँ; ऐसे में प्रजा की रचना कैसे करें?” यह सुनकर भगवती का मुखमण्डल मन्द मुसकान से भर उठा। उसी क्षण आकाश से एक रत्नजटित विमान उतर आया, जो मोतियों की झालरों से सुशोभित और घंटियों की ध्वनि से गुंजित था। “हे देवताओ,” देवी बोलीं, “निर्भय होकर इस पर बैठ जाइए। आज हम आपको एक अद्भुत दृश्य दिखलाएँगी।” ॐ कहकर तीनों संशयरहित भाव से उस विमान पर चढ़ गए, और देवी ने अपनी शक्ति से उसे आकाशमण्डल में उड़ा दिया।
लोक-लोक में अपने ही प्रतिरूप
मन के समान वेग से उड़ता वह विमान पहले एक ऐसे देश में जा पहुँचा जहाँ जल का नाम तक न था। वहाँ के वृक्ष सब प्रकार के फलों से लदे थे, कोयलें कूज रही थीं, और भव्य चहारदीवारी से घिरा एक मनोहर नगर यज्ञशालाओं तथा दिव्य महलों से सुशोभित था। तीनों को लगा मानो यही स्वर्ग हो; वे सोचने लगे कि इस अद्भुत नगर का निर्माण किसने किया होगा। तभी उन्होंने आखेट को जाते हुए एक देवतुल्य राजा को देखा, और विमान पर स्थित जगदम्बा को भी।
फिर विमान दूसरे रमणीक देश में पहुँचा, जहाँ पारिजात की छाया में कामधेनु खड़ी थी, समीप ही चार दाँतोंवाला ऐरावत था, और मेनका आदि अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। सैकड़ों गन्धर्व, यक्ष और विद्याधर मन्दार की वाटिकाओं में गा रहे थे, और वहाँ इन्द्र भी अपनी इन्द्राणी के साथ विराजमान थे। वरुण, कुबेर, यम, सूर्य और अग्नि को स्थित देखकर तीनों विस्मित हो उठे।
आगे विमान अलौकिक ब्रह्मलोक में जा पहुँचा। वहाँ सब देवताओं से नमस्कृत एक और ब्रह्मा विराजमान थे, जिनकी सभा में समस्त वेद अपने अंगोंसहित मूर्तरूप में उपस्थित थे। यह देखकर विष्णु और शंकर ने पूछा, “हे चतुर्मुख, ये दूसरे सनातन ब्रह्मा कौन हैं?” ब्रह्मा ने कहा कि वे स्वयं भी इन्हें नहीं जानते। विमान फिर कैलास-शिखर पर पहुँचा, जहाँ वृषभ पर आरूढ़, पंचमुख, दशभुज, मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण किए एक और शंकर अपने भवन से निकले; महाबली गजानन और षडानन उनके अंगरक्षक थे, और नन्दी आदि गण जयघोष करते पीछे-पीछे चल रहे थे। वहाँ से विमान लक्ष्मीकान्त के वैकुण्ठ जा पहुँचा, जहाँ अलसी के पुष्प-सा श्याम वर्णवाले, पीताम्बरधारी, गरुड़ पर आरूढ़ एक और विष्णु प्रकट हुए, जिन्हें लक्ष्मी चँवर डुला रही थीं। अपने ही जैसे इन सनातन प्रतिरूपों को देखकर तीनों को महान् आश्चर्य हुआ, और वे समझ न पाए कि यह किसकी लीला है।
सुधासागर के बीच विराजी भगवती
इसके बाद वह विमान मधुर जलवाले, ऊँची-ऊँची तरंगोंवाले अमृत-सागर के तट पर जा पहुँचा। वहाँ मन्दार, पारिजात, अशोक और चम्पा की वाटिकाएँ भौंरों के गुंजार से भरी थीं। उसी द्वीप में उन्होंने रत्नमालाओं से जड़ा, इन्द्रधनुष-सा शोभायमान एक शिव-आकार का पलंग देखा, जिस पर एक दिव्यांगना विराजमान थीं। उन्होंने रक्तपुष्पों की माला और रक्ताम्बर धारण किए थे, शरीर पर लाल चन्दन का लेप था, और उनकी कान्ति करोड़ों बिजलियों तथा सूर्यमण्डल को भी मानो तिरस्कृत कर रही थी। ह्रींकार बीजमन्त्र का जप करते पक्षी उनकी सेवा में लगे थे; अरुण आभावाली वे नवयौवना कुमारी साक्षात् करुणा की मूर्ति थीं। हल्लेखा और भुवनेशी नाम जपती सखियाँ उन्हें घेरे थीं, और वे षट्कोण के मध्य यन्त्रराज पर विराजमान थीं। दूर से देखने पर वे सहस्र नेत्र, सहस्र मुख और सहस्र हाथोंवाली प्रतीत होती थीं।
तीनों यही न जान पाए कि यह सुन्दरी कौन हैं; वे न अप्सरा थीं, न गन्धर्वी और न देवांगना। तब भगवान् विष्णु ने अपने अनुभव से निश्चय कर कहा, “ये साक्षात् जगदम्बा हैं, हम सबकी कारणस्वरूपा। ये ही महाविद्या, महामाया, पूर्ण और शाश्वत प्रकृति हैं; इन्हें केवल योगमार्ग से ही जाना जा सकता है। यही मूलप्रकृति परमपुरुष के सहयोग से ब्रह्माण्ड रचती हैं।” उसी समय ब्रह्मा को पूर्वजन्म की स्मृति जाग उठी: यही वह महादेवी थीं जिन्होंने प्रलयसागर में बालरूप ब्रह्मा को वटपत्र के दोने में झुलाया था, जब वे अपने पैर का अँगूठा मुख में डाले बालसुलभ चेष्टाएँ करते खेल रहे थे। गाती हुई वे उन्हें झूला झुलाती थीं। “निश्चय ही ये मेरी जननी हैं,” ब्रह्मा ने कहा, “आज मुझे पूर्व अनुभव की स्मृति जाग गई है।”
स्त्री बने त्रिदेव और चरण-नख का दर्पण
विष्णु के परामर्श पर तीनों बार-बार प्रणाम करते हुए भगवती के द्वार पर पहुँचे। द्वार पर खड़े उन तीनों को देखकर देवी ने मन्द मुसकान की और उन्हें स्त्री-रूप में परिणत कर दिया। आभूषणों से अलंकृत रूपवती युवतियाँ बने वे परस्पर एक-दूसरे को देखते हुए उनके सम्मुख खड़े रहे, और देवी ने उन पर कृपादृष्टि डाली। वहीं ब्रह्मा ने भगवती के चरणकमल के नखरूपी दर्पण में एक अद्भुत दृश्य देखा: समस्त स्थावर-जंगम ब्रह्माण्ड, स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, वायु, अग्नि, यम, सूर्य, वरुण, चन्द्रमा, कुबेर, इन्द्र, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, पितर, शेष आदि नाग और अपना जन्मस्थान कमल भी उसी नख में विराजमान था; मधु-कैटभ तथा शेषशायी महाविष्णु भी वहीं दिखायी दिए। भगवती के रचे इस प्रपंच में न जाने कितने ब्रह्माण्ड भरे थे।
इस प्रकार सौ वर्ष उस अमृतमय द्वीप में सखियों के समान बीत गए। एक बार नारीरूप में स्थित विष्णु श्रीभुवनेश्वरी की स्तुति करने लगे: “प्रकृति एवं विधात्री देवी को नमस्कार है; सच्चिदानन्दरूपिणी तथा पंचकृत्य करनेवाली भुवनेशी को बार-बार नमस्कार है। हे जननी, आज मैंने जान लिया कि यह समस्त विश्व आप में समाया है; जीव आप ही के अविनाशी अंश हैं, और उन्हें मोक्ष देने के लिए ही आपने यह जगत् रचा है। मधु-कैटभ से आपने ही हमारी रक्षा की और अपने अनेक लोक हमें दिखाए।” इसके पश्चात् शिव ने विनयपूर्वक कहा कि पूर्वजन्म में पाई नवार्ण-दीक्षा अब उन्हें स्मरण नहीं रही; उन्होंने देवी से वही मन्त्र फिर माँगा। तब भगवती ने स्पष्ट स्वर में नवाक्षर मन्त्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे का उच्चारण किया, और शिव उसे ग्रहण कर, चरणों में प्रणाम कर प्रसन्न हो गए। फिर ब्रह्मा ने भी अपने अहंकार की क्षमा माँगते हुए प्रार्थना की कि उन्हें बताया जाए कि देवी पुरुष हैं या स्त्री, जिससे वे परम शक्ति को जानकर भवसागर से मुक्त हो जाएँ।
महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का दान
अत्यन्त नम्रता से पूछे जाने पर आद्या भगवती मधुर वचन कहने लगीं: “मैं और परब्रह्म सदा एक ही हैं; भेद केवल बुद्धिभ्रम से प्रतीत होता है। जैसे एक ही दीपक उपाधिभेद से दो दिखायी देता है, वैसे ही सृष्टि के समय यह भेद उपजता है। मैं ही बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षमा, कान्ति, निद्रा, विद्या और अविद्या हूँ; मैं ही गौरी, ब्राह्मी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और वासवी शक्ति के रूप में विराजती हूँ। जल में शीतलता, अग्नि में उष्णता, सूर्य में प्रकाश और चन्द्रमा में ज्योत्स्ना मैं ही हूँ। मेरे बिना कोई जीव स्पन्दन भी नहीं कर सकता; इसीलिए दुर्बल पुरुष को लोग शक्तिहीन कहते हैं, विष्णुहीन या रुद्रहीन नहीं।”
फिर भगवती ने ब्रह्मा से कहा, “हे विधे, रजोगुण से युक्त, श्वेताम्बरधारिणी इस महासरस्वती नामक शक्ति को अपनी सहचरी के रूप में स्वीकार कीजिए; इन्हें मेरी विभूति समझकर कभी तिरस्कार न कीजिएगा। अब सत्यलोक जाकर तत्त्वबीज से चारों प्रकार की सृष्टि रचिए। कठिन कार्य आने पर श्रीहरि पृथ्वी पर अवतार लेंगे और महाबली शंकर भी आपकी सहायता करेंगे।” विष्णु से बोलीं, “हे विष्णो, इन मनोहर महालक्ष्मी को ग्रहण कीजिए; ये सदा आपके वक्षःस्थल में निवास करेंगी। आपका मुख्य गुण सत्त्व है; लक्ष्मीनारायण नामक यह संयोग मैंने ही रचा है। मेरे दिए वाग्बीज, कामराज और मायाबीज से युक्त इस मन्त्र का सदा जप कीजिए, इससे आपको मृत्यु या काल का भय न होगा।” और शिव से कहा, “हे हर, इन मनोहरा महाकाली को अंगीकार कीजिए और कैलास-शिखर पर सुखपूर्वक विहार कीजिए। आप में तमोगुण प्रधान रहेगा; रजोगुण और तमोगुण से दैत्यों का संहार कीजिए। जब भी संकट आएगा, मैं स्मरणमात्र से दर्शन दूँगी।” इस प्रकार विष्णु को महालक्ष्मी, शिव को महाकाली और ब्रह्मा को महासरस्वती सौंपकर तथा तीनों को अपना नवाक्षर मन्त्र और स्मरण का वचन देकर जगदम्बा ने उन्हें विदा किया।
उनके अद्भुत स्वरूप और प्रभाव का स्मरण करते हुए तीनों देव पुनः पुरुषरूप में आ गए और उसी विमान पर बैठ गए। किन्तु अब वहाँ न वह मणिद्वीप था, न महामाया और न सुधासागर; उस विमान के अतिरिक्त कुछ भी दृष्टिगोचर न होता था। विशाल विमान पर बैठे वे पुनः उसी महासागर के उस कमल के निकट जा पहुँचे, जहाँ भगवान् विष्णु ने मधु-कैटभ नामक दुर्धर्ष दैत्यों का वध किया था; और वहीं से त्रिगुणमयी सृष्टि का शुभारम्भ हुआ।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)