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श्रीराम का नवरात्र-व्रत

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वर्षा बीत चुकी थी, और किष्किन्धा के उस पर्वत-शिखर पर श्रीराम अब भी सीता के वियोग में डूबे थे। बालि का वध कर, सुग्रीव को राज्य सौंपकर, चार मास उन्होंने वहीं व्यतीत किए थे; लक्ष्मण के धैर्यभरे वचनों से मन कुछ शान्त तो हुआ था, किन्तु जानकी की स्मृति का घाव हरा ही रहा। दोनों भाई परस्पर आगे की मन्त्रणा कर ही रहे थे कि आकाश-मार्ग से देवर्षि नारद, अपनी महती वीणा बजाते और बृहद्रथन्तर साम गाते हुए, वहाँ उतर आए। अमित तेजवाले श्रीराम ने उठकर उन्हें श्रेष्ठ आसन दिया, अर्घ्य और पाद्य से उनका पूजन किया, और हाथ जोड़कर उनके समीप बैठ गए।

श्रीराम की सम्पूर्ण कथा इस संग्रह के रामायण खण्ड में है; यहाँ देवीभागवत का वही विशिष्ट कोण है, जहाँ रावण-विजय का मूल देवी-आराधना और नवरात्र-व्रत बताया गया है।

नारद का रहस्योद्घाटन

नारद ने प्रेमपूर्वक कुशल पूछकर कहा, “हे राघव! आप इस समय साधारण मनुष्य के समान शोकाकुल क्यों हैं? मैं जानता हूँ कि दुष्ट रावण सीता को हर ले गया है; देवलोक में मैंने सुना कि अपनी मृत्यु को न पहचानकर, मोह के वश होकर उसने जनकनन्दिनी का हरण किया है। हे काकुत्स्थ! आपका जन्म ही रावण के निधन के लिए हुआ है, और इसी कार्यसिद्धि के लिए सीता का हरण हुआ है।”

फिर उन्होंने एक रहस्य खोला: “पूर्वजन्म में वैदेही एक मुनि की तपस्विनी कन्या थीं। वन में तप करती उस कन्या को देखकर रावण ने उससे पत्नी बनने की प्रार्थना की; तिरस्कृत होकर उसने बलपूर्वक उसके केश पकड़ लिए। रावण के स्पर्श से दूषित अपनी देह त्यागने की इच्छा से, अत्यन्त कुपित उस तापसी ने शाप दिया कि हे दुरात्मन्, आपके विनाश के लिए मैं गर्भ से नहीं, अयोनिजा श्रेष्ठ स्त्री के रूप में प्रकट होऊँगी; और यह कहकर उसने शरीर त्याग दिया। लक्ष्मी के अंश से उत्पन्न यही सीता वही हैं, जिन्हें भ्रमवश माला समझकर नागिन धारण करनेवाले की भाँति रावण अपने ही वंश के नाश के लिए हर लाया है। हे अनघ! आप भी विष्णु के अंश से, देवताओं की प्रार्थना पर, इसी रावण के नाश के लिए मनुवंश में अवतीर्ण हुए हैं। धैर्य धारण कीजिए; सतीधर्मपरायण सीता लंका में दिन-रात आपका ध्यान करती रह रही हैं। इन्द्र ने एक पात्र में कामधेनु का अमृततुल्य दूध उनके पास भेजा है, जिसे पीकर वे भूख-प्यास के दुःख से रहित हो गई हैं; उन कमलनयनी को मैंने स्वयं देखा है।”

नवरात्र-व्रत का परामर्श

“हे राघवेन्द्र! अब मैं रावण के नाश का उपाय बताता हूँ। इसी आश्विन मास में आप श्रद्धापूर्वक नवरात्रव्रत कीजिए। उपवास तथा जपहोम के विधान से किया गया भगवती का पूजन समस्त सिद्धियों को देनेवाला है; देवी को पवित्र बलि देकर और दशांश हवन करके आप पूर्ण शक्तिशाली बन जाएँगे। पूर्वकाल में भगवान् विष्णु ने, शिव ने, ब्रह्मा ने और स्वर्ग में इन्द्र ने भी यही व्रत किया था। विश्वामित्र, भृगु, वसिष्ठ और कश्यप भी इसे कर चुके हैं; जिनकी पत्नी हर ली गई थी, उन गुरु बृहस्पति ने भी यही व्रत किया था। इन्द्र ने वृत्रासुर के वध के लिए, शिव ने त्रिपुर के संहार के लिए और विष्णु ने सुमेरु पर्वत पर मधु-दैत्य के वध के लिए यही व्रत किया था। अतः हे राजेन्द्र! रावण के वध और सीता की प्राप्ति के लिए आप भी आलस्यरहित होकर विधिपूर्वक यह व्रत कीजिए।”

राम के पूछने पर कि वे देवी कौन हैं, नारद ने कहा: “वे देवी नित्या, सनातनी और आद्याशक्ति हैं; समस्त मनोरथ पूर्ण करती और सब कष्ट दूर कर देती हैं। वे ही मेरे पिता ब्रह्मा की सृष्टिशक्ति, विष्णु की पालन-शक्ति और शंकर की संहार-शक्ति हैं। सृष्टि के आरम्भ में जब ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, इन्द्र, पृथ्वी और पर्वत कुछ भी नहीं रहता, तब वही निर्गुणा, कल्याणमयी परा प्रकृति परमपुरुष के साथ विहार करती हैं; फिर सगुणा होकर पहले ब्रह्मा आदि को रचती और उन्हें शक्तियाँ देकर तीनों भुवनों की रचना करती हैं। उन विद्यास्वरूपा, वेदों की आदिकारण भगवती को जान लेने पर प्राणी संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है। इस व्रत में मैं ही आचार्य बनूँगा, क्योंकि देवताओं का कार्य करने में मेरा उत्साह बड़ा है। किसी समतल भूमि पर पीठासन बनाकर उस पर जगदम्बिका की स्थापना कीजिए और विधिपूर्वक नौ दिन उपवास कीजिए।”

सिंहवाहिनी दुर्गा का वरदान

नारद के वचन को सत्य मानकर प्रतापी श्रीराम ने एक सुन्दर पीठासन बनवाकर उस पर अम्बिका की स्थापना की, और आश्विन मास आने पर उसी श्रेष्ठ पर्वत पर भगवती का पूजन किया। उपवासपरायण श्रीराम ने विधिपूर्वक होम, बलिदान और पूजन किया; दोनों भाइयों ने प्रेमपूर्वक वह व्रत सम्पन्न किया। सम्यक् पूजित होकर, अष्टमी की अर्धरात्रि में भगवती दुर्गा सिंह पर सवार होकर उन्हें साक्षात् दर्शन दे गईं। भक्ति से प्रसन्न होकर, पर्वत के शिखर पर स्थित होकर, उन्होंने मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा:

“हे राम, हे महाबाहो! मैं आपके व्रत से सन्तुष्ट हूँ; अपने मन का अभिलषित वर माँग लीजिए। आप पवित्र मनुवंश में नारायण के अंश से उत्पन्न हुए हैं। पूर्वकाल में मत्स्यरूप धारण कर आपने वेदों की रक्षा की; कच्छप बनकर मन्दराचल को पीठ पर धारण कर समुद्र-मन्थन कराया; वराह बनकर पृथ्वी को दाँतों पर उठाया और हिरण्याक्ष का वध किया; नरसिंह बनकर प्रह्लाद की रक्षा और हिरण्यकशिपु का वध किया; वामन बनकर बलि को छला; और परशुराम के रूप में क्षत्रियों का अन्त कर पृथ्वी ब्राह्मणों को दे दी। अब देवताओं की प्रार्थना पर आप दशरथपुत्र श्रीराम के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। देवताओं के अंश से उत्पन्न ये बलशाली वानर मेरी शक्ति से सम्पन्न होकर आपके सहायक होंगे; शेषनाग के अंश से उत्पन्न आपके अनुज लक्ष्मण रावण-पुत्र मेघनाद का वध करेंगे। पापी रावण का वध करके आप सुखपूर्वक राज्य कीजिए; ग्यारह हज़ार वर्ष तक भूतल पर राज्य कर पुनः आप देवलोक को प्रस्थान करेंगे। वसन्त ऋतु के नवरात्र में एक बार फिर श्रद्धापूर्वक मेरी पूजा कीजिए।”

विजयदशमी और सेतुबन्ध

यह कहकर भगवती दुर्गा वहीं अन्तर्धान हो गईं। प्रसन्न मन से श्रीराम ने उस व्रत का समापन किया, दशमी तिथि को विजया-पूजन कर और अनेक प्रकार के दान देकर वहाँ से प्रस्थान किया। वानरराज सुग्रीव की सेना और अनुज लक्ष्मण के साथ, साक्षात् परा शक्ति की प्रेरणा से पूर्णकाम श्रीराम समुद्र-तट पर पहुँचे; वहाँ सेतु-बन्ध कराकर उन्होंने देवशत्रु रावण का संहार किया, विभीषण को लंका का राजा बनाया, और अयोध्या लौटकर निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया। इसी नवरात्र-व्रत के प्रभाव से अमित तेजवाले श्रीराम ने पृथ्वी पर महान् सुख प्राप्त किया।

व्यासजी कहते हैं कि जो मनुष्य भक्तिपूर्वक देवी के इस उत्तम चरित्र का श्रवण करता है, वह अनेक सुखों का उपभोग कर परम पद प्राप्त कर लेता है; और यद्यपि अन्य बहुत-से विस्तृत पुराण हैं, किन्तु उनमें से कोई इस श्रीमद्देवीभागवत के तुल्य नहीं है।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)