लुल्ला परिवारLulla Family
English
← संग्रह
क्रियाएँ
देवीशक्ति, रक्षा और रूपांतरण

महिषासुर-वध

इस पृष्ठ पर

पढ़ने में लगभग 9 मिनट

महिषासुर-वध

अपने सेनापति असिलोम और बिडालाख्य के मारे जाने का समाचार सुनकर महिषासुर खिन्न और उदास हो उठा। क्रोध में भरकर उसने सारथि दारुक को आज्ञा दी कि हज़ार गधों से जुता हुआ, ध्वजा-पताकाओं से सजा और अनेक आयुधों से भरा उसका अद्भुत रथ तुरन्त ले आए। रथ द्वार पर आ खड़ा हुआ, पर तभी उस महाबली दानव के मन में एक कपट सूझा। उसने सोचा कि यदि वह अपने भैंसे के रूप में जाएगा तो सींगोंवाले उस विकराल रूप को देखकर देवी अवश्य विरक्त हो जाएँगी; स्त्रियों को तो सुन्दर रूप और चातुर्य ही भाता है। यही विचारकर उसने भैंसे का रूप त्याग दिया और एक कान्तिमान् पुरुष बन गया, जो सब आयुध धारण किए, केयूर और हार पहने, धनुष-बाण लिए दूसरे कामदेव-सा प्रतीत हो रहा था। इसी मनोहर वेश में अपनी विशाल सेना के साथ वह देवी की ओर चला।

उस मायावी दैत्यराज को आता देख देवी ने अपना शंख बजाया। उस विस्मयकारी ध्वनि को सुनकर वह दैत्य हँसता हुआ भगवती के समीप आया।

महिष का प्रणय-प्रस्ताव

हे देवी! उसने मीठी वाणी में कहना आरम्भ किया, इस परिवर्तनशील संसार में स्त्री हो या पुरुष, सब सुख ही चाहते हैं; और सुख संयोग में ही मिलता है, वियोग में नहीं। संयोग अनेक प्रकार का होता है: माता-पिता और पुत्र का संयोग उत्तम, भाई-भाई का मध्यम, और नाव में संयोग से इकट्ठे हुए लोगों का संयोग अधम कहा गया है; किन्तु समान अवस्थावाले नर-नारी का संयोग सबसे उत्तम कहा गया है। यदि आप मुझ वीर के साथ संयोग करें तो अत्युत्तम सुख पाएँगी। मैंने इन्द्र आदि सब देवताओं को संग्राम में जीत लिया है; मेरे भवन के सारे दिव्य रत्न आप भोगें, आप मेरी पटरानी बन जाइए, मैं तो आपका दास हूँ। आपके कहने से मैं देवताओं से वैर भी छोड़ दूँगा। हे मधुरभाषिणी! मेरा मन आपके रूप पर मोहित हो गया है; शरणागत की रक्षा करना सब धर्मों में उत्तम धर्म है, इसलिए काम-बाणों से आहत मुझ शरणागत की रक्षा कीजिए।

यह सुनकर वरवर्णिनी भगवती हँसकर बोलीं, मैं परमपुरुष के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष को नहीं चाहती। हे दैत्य! मैं उन्हीं की इच्छाशक्ति हूँ, मैं ही सारे संसार की सृष्टि करती हूँ; वे विश्वात्मा मुझे देख रहे हैं, मैं उनकी कल्याणमयी प्रकृति हूँ। जैसे चुम्बक के संयोग से साधारण लोहे में भी चेतना आ जाती है, वैसे ही उनके सांनिध्य से मैं सचेतन हो जाती हूँ, अन्यथा मैं जड़ हूँ; विषय-भोग की इच्छा मुझमें कभी नहीं होती। आप मन्दबुद्धि हैं जो स्त्री-संग चाहते हैं; स्त्री तो पुरुष को बाँधनेवाली शृंखला कही गई है, और उस बन्धन में पड़ा प्राणी कभी नहीं छूटता। सुख चाहते हैं तो मन में शान्ति धारण कीजिए। अब या तो पाताललोक चले जाइए, अथवा मेरे साथ युद्ध कीजिए; सब देवताओं ने आपके नाश के लिए ही मुझे यहाँ भेजा है। आपने वाणी से मित्रता दिखाई है, इसलिए मैं प्रसन्न हूँ; सज्जनों में सात पग साथ चलने से ही मित्रता हो जाती है, इसीलिए मैं आपको जीवित जाने देती हूँ; पर मरना चाहें तो प्रसन्नता से मुझसे युद्ध कीजिए।

मन्दोदरी का दृष्टान्त

यह सुनकर काममोहित दानव फिर मीठे स्वर में बोला कि आप-जैसी कोमलांगी युवती पर प्रहार करते मुझे भय लगता है; आप-जैसी सुनयना का वध कर मुझे क्या यश मिलेगा, स्त्री-हत्या, बाल-हत्या और ब्रह्म-हत्या का पाप तो अत्यन्त जघन्य होता है; और बलपूर्वक ले जाने में सच्चा सुख नहीं। विष्णु लक्ष्मी के साथ, ब्रह्मा सावित्री के साथ, शंकर पार्वती के साथ और इन्द्र शची के साथ ही शोभा पाते हैं; पति के बिना कौन स्त्री चिरस्थायी सुख पा सकी है? मुझे ठुकराकर आप मन्दोदरी की भाँति पछताएँगी। तब भगवती ने पूछा कि वह मन्दोदरी कौन थी, उसने किस राजा को ठुकराया और किस धूर्त को पति बनाया; और महिष ने वह कथा विस्तार से सुनाई। सिंहल देश के धर्मात्मा राजा चन्द्रसेन की पुत्री मन्दोदरी अत्यन्त रूपवती थी। पिता ने मद्रराज सुधन्वा के पुत्र कम्बुग्रीव से उसका विवाह करना चाहा, पर मन्दोदरी ने कहा कि वह आजीवन कुमारी रहकर तप करेगी; पराधीनता ही संसार का सबसे बड़ा दुःख है, ससुराल की सेवा, सौत का क्लेश और वैधव्य, स्त्री के लिए विवाह में सुख कहाँ। फिर एक दिन उपवन में मार्ग भूले कोसल-नरेश वीरसेन ने भी विवाह का प्रस्ताव रखा, पर ऐसे सुन्दर, कुलीन और अनुकूल वर को भी उसने हठ और वैराग्य के कारण ठुकरा दिया। किन्तु आगे चलकर, जब उसकी छोटी बहन इन्दुमती का स्वयंवर हुआ, तब वहीं मन्दोदरी मद्रदेश के एक धूर्त और चतुर राजा चारुदेष्ण को देखकर कामातुर हो उठी और उसी को पति बना बैठी। वह धूर्त राजा दासियों के साथ रमण करता रहा; यह देखकर मन्दोदरी ने उसे बहुत धिक्कारा और उसे महान् सन्ताप हुआ; आत्महत्या को महापाप और पिता के घर लौटने को सखियों में उपहास जानकर वह भोग त्यागकर पति के घर ही शोक में जलती रही। हे कल्याणी! उसी प्रकार आप भी मुझ राज-पति का अनादर करके पीछे कामातुर होकर किसी मूर्ख और कायर का आश्रय लेकर पछताएँगी।

भगवती तनिक भी विचलित न हुईं। बोलीं, हे मन्दबुद्धि! जब-जब साधुओं पर संकट आता है, तब-तब उनकी रक्षा के लिए मैं देह धारण करती हूँ। वास्तव में मैं निराकार और अजन्मा हूँ, फिर भी देवताओं की रक्षा के लिए रूप और जन्म धारण करती हूँ। देवताओं ने आपका वध करने के लिए मुझसे प्रार्थना की थी; आपको मारकर ही मैं निश्चिन्त हो जाऊँगी। अब युद्ध कीजिए, अथवा पाताल चले जाइए।

रूप बदलता दानव और अन्तिम प्रहार

देवी के ऐसा कहते ही महिषासुर धनुष लेकर संग्रामभूमि में डट गया। उसने पत्थर पर घिसे नुकीले बाण छोड़े, पर भगवती ने अपने लौहमुख बाणों से उन्हें बीच में ही काट डाला। तभी दुर्धर नामक दैत्य बीच में आकर विषैले बाणों की वर्षा करने लगा; देवी ने तीखे बाणों से उसे पर्वत-शिखर की भाँति धराशायी कर दिया। फिर अस्त्रों का ज्ञाता त्रिनेत्र सात बाणों से देवी पर टूटा, पर जगदम्बा ने उन बाणों को बीच में काटकर अपने त्रिशूल से त्रिनेत्र को मार डाला। इसके बाद आया अन्धक, जिसने अपनी लोहमयी गदा सिंह के मस्तक पर मारी; क्रोध में भरे सिंह ने अपने नखों से उस बलशाली दानव को विदीर्ण कर उसका मांस खा लिया।

अपने वीरों को मरा देख महिषासुर विस्मित हुआ और और भी वेग से तीखे बाण छोड़ने लगा; देवी ने उन्हें पहुँचने से पहले ही काट डाला और अपनी गदा से उसकी छाती पर प्रहार किया। उस प्रहार से वह मूर्च्छित होकर गिरा, पर वेदना सहकर उठ खड़ा हुआ और क्रोध में लौटकर उसने सिंह के मस्तक पर गदा मारी। अब वह अपने कपट-रूप बदलने लगा। पहले वह सिंह बनकर देवी के मतवाले सिंह को नखों से चीरने लगा; देवी ने सर्प-सदृश तीखे बाणों से उसे बींध डाला। फिर वह मदमत्त हाथी का रूप धरकर अपनी सूँड से एक विशाल पर्वत-शिखर उठाकर चण्डिका पर फेंकने लगा; भगवती ने उस शिखर को तिल-तिल काट डाला और प्रचण्ड अट्टहास किया, और उनका सिंह उछलकर गजरूपधारी महिष को विदीर्ण करने लगा। तब उसने आठ पैरोंवाले भीषण शरभ का रूप लिया, जिसके सिर पर जगदम्बा ने तलवार से प्रहार किया, और अन्त में फिर भैंसे का रूप धरकर सींगों से देवी पर आघात करने लगा। पूँछ घुमाकर वह पर्वतों को सींगों पर उछालता और हँसकर देवी पर फेंकता हुआ गरजा कि आज मैं आपको मार डालूँगा; आप व्यर्थ ही अपने को बलवती समझकर मुखर हो रही हैं; आपको मारकर मैं उन सब धूर्त देवताओं को भी मारूँगा जो स्त्री को आगे करके मुझे जीतना चाहते हैं।

देवी बोलीं, अरे मूर्ख! व्यर्थ अभिमान मत कीजिए; रणभूमि में ठहर जाइए। आपको मारकर ही मैं देवताओं को निर्भय बनाऊँगी। इतना कहकर भगवती ने मद्य से भरा सोने का पात्र लेकर बार-बार उसका पान किया, और मीठे द्राक्षारस को पीकर बड़े वेग से त्रिशूल उठाकर उस दानव पर झपटीं। देवता प्रेमपूर्वक पुष्पवर्षा करते और जय-जयकार करते रहे; आकाश में स्थित ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व, नाग और किन्नर वह युद्ध देख आनन्दित होते रहे। महिष बार-बार मायामय शरीर धारण कर प्रहार करता रहा, तब क्रोध से लाल नेत्रवाली चण्डिका ने अपने तीखे त्रिशूल से उस पापी के हृदयदेश पर बलपूर्वक आघात किया। वह मूर्च्छित होकर भूमि पर गिरा, पर मुहूर्त भर बाद उठकर पैरों से देवी को मारने और भयंकर गर्जन करने लगा।

तब भगवती ने सहस्र अरोंवाला उत्तम चक्र हाथ में लेकर ऊँचे स्वर में कहा, अरे मदान्ध! अपने गले को काट डालनेवाले इस चक्र की ओर देखिए; अब तनिक देर ठहरकर यमलोक के लिए प्रस्थान कीजिए। यह कहकर जगदम्बा ने वह दारुण चक्र चला दिया, जिसने उस दानव का सिर काट डाला। उसके कण्ठ की नली से उष्ण रक्त वैसे ही बहने लगा जैसे गेरू से रँगा लाल जल पर्वत से बहता हो, और सिर कटने पर उसका धड़ घूमता हुआ भूमि पर गिर पड़ा।

देवताओं का विजयघोष गूँज उठा। भगवती का महाबली सिंह भूख से व्याकुल-सा रणभूमि में भागते दानवों को खाने लगा। महिष के मरते ही शेष बचे दानव भयभीत होकर पाताल भाग गए, और भूमण्डल के देवता, मुनि, मनुष्य तथा साधुजन परम आनन्दित हुए। चण्डिका रणभूमि छोड़कर एक पवित्र स्थान में विराजमान हो गईं, और देवता उनकी स्तुति करने की इच्छा से शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)