सती का देह अग्नि में भस्म हो चुका था। भगवान् शिव व्याकुल होकर भटके, फिर किसी एकान्त में प्रपंच से शून्य हो, समाधि में भगवती के स्वरूप का ध्यान करने लगे। उनके इस वैराग्य के साथ मानो तीनों लोकों का सौभाग्य भी सूख गया; सारा जगत् शक्तिहीन हो उठा, हृदयों का आनन्द जाता रहा और प्राणी अपनी मर्यादा से विचलित हो गये।
उसी काल में तारक नाम का महादैत्य उठ खड़ा हुआ। ब्रह्मा से उसने ऐसा वर पा लिया कि केवल शिव का औरस पुत्र ही उसका संहार कर सकेगा; और शिव तो पत्नीहीन थे। निर्भय होकर वह तीनों लोकों को रौंदने लगा। हारे हुए देवता वैकुण्ठ पहुँचे तो विष्णु ने ढाढ़स बँधाया: मणिद्वीप की भुवनेश्वरी सदा जागती रहती हैं। जैसे माता डाँटते समय भी सन्तान पर कभी निर्दय नहीं होती, वैसे ही जगदम्बा हैं; अतः निष्कपट मन से उन परमाम्बा की शरण में जाइए।
सब देवता हिमालय के शिखर पर आ जुटे और पुरश्चरण में लग गये: कोई समाधि में, कोई नाम-जप में, कोई सूक्तपाठ में, और कितने ही हल्लेखा-बीज से पराशक्ति की उपासना में। बहुत वर्ष यों ही बीते। तब चैत्र शुक्ल की नवमी को, शुक्रवार के दिन, अकस्मात् एक महान् ज्योति प्रकट हुई: करोड़ों सूर्यों-सी दीप्त, न ऊँची न नीची, न स्त्रीरूप न पुरुषरूप। देवताओं ने धैर्य धरकर देखा तो वह एक अति सुन्दरी नवयौवना कुमारी के रूप में दिखी: तीन नेत्रोंवाली, चार भुजाओं में पाश, अंकुश, वर और अभय धारण किये। आँसुओं से रुँधे कण्ठवाले देवता उन करुणामूर्ति को प्रणाम कर स्तुति करने लगे।
वचन जो हिमालय के घर उतरा
देवताओं ने भगवती को शिवा, प्रकृति, दुर्गा, कालरात्रि, स्कन्दमाता और महालक्ष्मी कहकर नमस्कार किया; उन्हें विराट्, सूत्रात्मा और अव्याकृत रूपोंवाली, प्रणव और हींकार की मूर्ति कहा; और ‘तत्’ तथा ‘त्वम्’ दोनों पदों के जो लक्ष्यार्थ हैं, वही अखण्डानन्दस्वरूपा आप हैं, ऐसा कहकर सिर झुकाया। प्रसन्न होकर भगवती बोलीं: आप अपना प्रयोजन कहिए; मैं तो भक्तों की कामना पूर्ण करनेवाला कल्पवृक्ष हूँ।
देवताओं ने अपना दुःख कहा कि तारक दिन-रात पीड़ित कर रहा है, और शिव के औरस पुत्र के बिना उसका अन्त नहीं। भगवती ने कहा: ‘गौरी’ नाम की मेरी शक्ति हिमालय के घर प्रकट होगी; आप ऐसा यत्न कीजिए कि वही शिव को दी जाय और आपका कार्य सिद्ध करे। हिमालय बड़ी भक्ति से मेरी उपासना कर रहे हैं, इसलिए उनके घर जन्म लेना मैंने प्रिय माना है। यह सुनकर हिमालय अश्रुपूर्ण नेत्रों से बोले: कहाँ मैं जड़, अचल पर्वत और कहाँ आप सच्चिदानन्दस्वरूपिणी! फिर उन्होंने वह स्वरूप, जो समस्त वेदान्त का सिद्धान्त है, तथा वेदसम्मत ज्ञान, भक्ति और योग का उपदेश माँगा। तब भगवती ने श्रुतियों में छिपे रहस्य को खोलना आरम्भ किया।
माया, जो सदा हमारी सहचरी है
भगवती बोलीं: पहले केवल मैं ही थी, और कुछ नहीं। उस समय मेरा रूप चित्, संवित् और परब्रह्म कहलाता था; उसका न कोई उपमान है, न उसमें कोई विकार। मेरी एक स्वतःसिद्ध शक्ति है, जो माया कहलाती है। वह न सत् है न असत्; जैसे अग्नि में उष्णता, वैसे ही वह सदा मेरी सहचरी है। प्रलय में जीव, काल और कर्म उसी में अभेद रूप से विलीन हो जाते हैं, और सृष्टि के समय मैं उसी शक्ति के योग से बीजरूप को प्राप्त होती हूँ।
उन्होंने सृष्टि का क्रम खोला: उसी अव्यक्त से आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी क्रमशः उपजे; इन पाँच सूक्ष्म भूतों से लिंगशरीर बना, और पंचीकरण से पाँच स्थूल भूत तथा यह विराट् शरीर रचा गया। शुद्धसत्त्वप्रधान प्रकृति माया है, मलिनसत्त्वप्रधान अविद्या। शुद्ध माया में परमात्मा का प्रतिबिम्ब वही सर्वज्ञ ईश्वर है; अविद्या में जो प्रतिबिम्ब पड़ता है, वही जीव, जो अपने ही अज्ञान से दुःखों का आश्रय बन जाता है। जैसे घड़े की उपाधि से घटाकाश महाकाश से भिन्न जान पड़ता है, वैसे ही जीव और ईश्वर का भेद माया का रचा है; वस्तुतः दोनों एक ही तत्त्व हैं।
वह विराट्, जिसे देखकर देवता काँप उठे
भगवती ने कहा: यह समस्त चराचर जगत् मेरी ही मायाशक्ति से उपजा है और मुझमें ओतप्रोत है। मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हूँ; सूर्य, चन्द्र और तारे; पशु-पक्षी, चाण्डाल और साधु, स्त्री, पुरुष और नपुंसक भी मैं ही हूँ। जो कुछ भीतर-बाहर दिखता या सुनाई देता है, उन सबमें व्याप्त होकर मैं ही स्थित हूँ। तब हिमालय ने प्रार्थना की कि यदि कृपा हो, तो अपना वही समष्टि विराट् रूप दिखाइए।
भगवती ने अपना परात्पर विराट् रूप प्रकट किया: द्युलोक जिसका मस्तक, चन्द्र-सूर्य नेत्र, दिशाएँ कान, वेद वाणी, वायु प्राण और पृथ्वी जंघा; अनेक ज्वालाओं से घिरा, सहस्र मस्तक और सहस्र चरणोंवाला वह रूप करोड़ों सूर्यों-सा दीप्त और महाभीषण था। उसे देखकर देवता हाहाकार कर उठे, हृदय काँप गये और मूर्च्छा आ गई; यह स्मृति भी जाती रही कि यही तो जगदम्बा हैं। चारों दिशाओं में खड़े वेदों ने उन्हें फिर चेतना दी। तब गद्गद कण्ठ से वे बोले: हे माता, अपराध क्षमा कीजिए, इस अलौकिक रूप को समेट लीजिए और वही परम सुन्दर रूप दिखाइए। कृपासिन्धु भगवती ने वह घोर रूप समेटकर पुनः कोमल, करुणापूर्ण मनोहर रूप दिखा दिया, और देवता निर्भय हो शान्तचित्त हुए।
ज्ञान का मार्ग: कर्म से संन्यास तक
भगवती बोलीं: कहाँ आप मन्दभाग्य देवता और कहाँ यह अद्भुत रूप! मेरी कृपा के बिना इसे न वेदाध्ययन से देखा जा सकता है, न यज्ञ-तप से। अब ब्रह्मविद्या सुनिए। परमात्मा ही उपाधि के भेद से जीव कहलाता है और घटीयन्त्र की भाँति जन्म-मरण में घूमता रहता है; इसका मूल अज्ञान है। अज्ञान का नाश केवल ज्ञान से होता है, कर्म से नहीं, क्योंकि कर्म तो अज्ञान से ही उपजता है। फिर भी चित्त की शुद्धि के लिए वैदिक कर्म आवश्यक हैं; शम, दम, तितिक्षा और वैराग्य के प्रकट होने तक ही उनकी उपयोगिता है।
फिर, भगवती ने कहा, साधक संन्यास लेकर श्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण ले और निष्कपट भक्ति से नित्य वेदान्त का श्रवण करे। वह ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य का चिन्तन करे: ‘तत्’ पद का लक्ष्यार्थ मैं हूँ, ‘त्वम्’ पद का लक्ष्यार्थ जीव है, और भागत्यागलक्षणा से दोनों की एकता का बोध होते ही अद्वैत बुद्धि उदय होती है। तीनों देह और उनके भीतर के पाँच कोश जब त्यागे जाते हैं, तब वही शेष रहता है जिसे श्रुति ‘नेति-नेति’ कहकर पुकारती है। यह आत्मा न जन्मती है न मरती, अणु से सूक्ष्म और महान् से भी महान् है। शरीर रथ है, बुद्धि सारथि, मन लगाम और इन्द्रियाँ घोड़े; जो विवेकी सारथि से मन को वश में रखता है, वही संसार-मार्ग को पार कर मेरे परम पद को पाता है।
योग की विधि और कुण्डलिनी का जागना
हिमालय ने साङ्ग योग जानना चाहा। भगवती ने कहा: जीवात्मा और परमात्मा की एकता ही योग है, और उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य विघ्न डालते हैं। इनके पार जाने के लिए योग के आठ अंग हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। उन्होंने अहिंसा, सत्य और अस्तेय आदि यम तथा तप, सन्तोष और आस्तिकता आदि नियम बताये; पद्म, स्वस्तिक, भद्र, वज्र और वीर, ये पाँच आसन गिनाये; और पूरक, कुम्भक तथा रेचक के क्रम से प्राणायाम की विधि खोली।
फिर उन्होंने कुण्डलिनी का रहस्य कहा: इस शरीर में साढ़े तीन करोड़ नाड़ियाँ हैं, जिनमें इडा, पिंगला और सुषुम्ना प्रधान हैं। सुषुम्ना के भीतर स्वयम्भूलिंग है, उसके ऊपर मायाबीज हीं, और उसके ऊपर शिखा के आकार की लाल कुण्डलिनी, जो मुझसे अभिन्न है। मूलाधार से आरम्भ कर स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा, इन चक्रों को भेदते हुए साधक कुण्डलिनी को सहस्रार तक ले जाय, वहाँ शिव के साथ उसका ऐक्य ध्यावे, और उस अमृतधारा से चक्रों की देवताओं को तृप्त करके पुनः उसे मूलाधार में लौटा लाये। ऐसा नित्य अभ्यास करनेवाले में वे सब गुण उपजते हैं, जो मुझ जगज्जननी में हैं।
भक्ति, जो सबसे सुगम और सबसे ऊँची है
हिमालय ने पूछा कि अपरिपक्व वैराग्यवाले मध्यम अधिकारी को भी सहज ज्ञान कैसे हो। भगवती बोलीं: मोक्ष के तीन मार्ग हैं: कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग; इनमें भक्तियोग सबसे सुगम है, क्योंकि वह केवल मन से सधता है और देह को पीड़ा नहीं देता। गुणभेद से भक्ति भी तीन प्रकार की है: जो दूसरों को सताने के लिए दम्भ से की जाय वह तामसी, जो अपने ही कल्याण और यश की कामना से भेदबुद्धि के साथ की जाय वह राजसी, और जो पाप धोने तथा मेरी प्रसन्नता के लिए, सेव्य-सेवक के भाव से की जाय वह सात्त्विकी है, जो परा भक्ति तक ले जाती है।
फिर उन्होंने परा भक्ति का वर्णन किया: नित्य मेरे गुणों का श्रवण और नाम का संकीर्तन, तैलधारा-सी अखण्ड चित्तवृत्ति मुझमें लगाये रखना, सामीप्य-सायुज्य आदि मुक्तियों तक की कामना न रखना, सेव्य-सेवक के भाव से मोक्ष की भी अभिलाषा न करना, और सब प्राणियों में मेरा ही रूप देखकर किसी से द्रोह न करना। ऐसी भक्ति जिसके हृदय में उपजती है, वह उसी क्षण मेरे चिन्मय रूप में विलीन हो जाता है; भक्ति की पराकाष्ठा ही ज्ञान है। इसी प्रसंग में भगवती ने अपने प्रिय तीर्थ, व्रत और उत्सव भी गिनाये: कोलापुर, विन्ध्यवासिनी और कामाख्यायोनिमण्डल जैसे स्थान; नवरात्र और सोमवार जैसे व्रत; और झूला, रथ तथा पवित्रोत्सव, जिनमें सुवासिनी स्त्रियों, कुमारियों और बटुकों को अपना ही रूप समझकर भोजन कराया जाय।
पूजा का रहस्य और भगवती का अन्तर्धान
अन्त में हिमालय ने पूजा की विधि पूछी। भगवती ने कहा: मेरी पूजा दो प्रकार की है, बाह्य और आभ्यन्तर; और बाह्य भी वैदिकी तथा तान्त्रिकी। धर्म से भक्ति और भक्ति से ज्ञान उपजता है; प्रमाण केवल श्रुति-स्मृति हैं, अतः मुमुक्षु को सदा वेद का ही आश्रय लेना चाहिए। जब तक अन्तःपूजा में अधिकार न हो, तब तक साधक मूर्ति, यन्त्र या हृदयकमल में मेरे सगुण रूप का ध्यान कर उपचारों से पूजन करे; और अधिकार होने पर चित्त को मेरे ज्ञानमय रूप में लीन कर दे, क्योंकि उपाधिरहित ज्ञान ही मेरा परम रूप है। सारी पूजा हल्लेखा हीं मन्त्र से हो, जो समस्त मन्त्रों की परम नायिका है; और यह रहस्यमयी विद्या कभी अभक्त या धूर्त के सामने प्रकट न करना।
यह कहकर भगवती वहीं अन्तर्धान हो गईं, और देवता उनके दर्शन से कृतार्थ हुए। तदनन्तर वे हैमवती देवी हिमालय के घर ‘गौरी’ के रूप में प्रकट हुईं और आगे चलकर शंकर को दी गईं; उन्हीं से कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिन्होंने तारकासुर का संहार किया। यही भगवती पूर्व में समुद्रमन्थन के समय देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर रमा के रूप में सागर से प्रकट हुई थीं, जिन्हें देवताओं ने विष्णु को सौंपा। व्यासजी ने कहा: हे राजन्, गौरी और लक्ष्मी की उत्पत्ति से जुड़ा देवीगीता का यह प्रसंग सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाला, स्वयं पवित्र और दूसरों को भी पवित्र करनेवाला है।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)