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सावित्री और सत्यवान

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गोलोक की उस पुरानी कथा को श्रीनारायण नारद से कह रहे थे। मद्रदेश के राजा अश्वपति ने विधिपूर्वक वेदमाता भगवती सावित्री की आराधना की और मन्त्रों के सारभूत स्तोत्रराज से जब स्तुति पूरी की, तब उनके सामने सहस्र सूर्यों के समान तेज से दीप्त देवी प्रकट हुईं। अपने प्रभामण्डल से दिशाओं को आलोकित करती हुई वे प्रसन्नवदना मुसकराईं और, जैसे माता अपने पुत्र से कहती है, वैसे ही मधुर वाणी में राजा से बोलीं कि हमें आपके मन की कामना ज्ञात है और आपकी पत्नी की भी। आपकी साध्वी पत्नी कन्या चाहती हैं और आप पुत्र की इच्छा रखते हैं; ये दोनों अभिलाषाएँ क्रम से पूर्ण होंगी। इतना कहकर देवी ब्रह्मलोक चली गईं और राजा अपने घर लौट आए।

सावित्री नाम की कन्या

समय पर राजा के यहाँ पहले कन्या का जन्म हुआ। भगवती सावित्री की आराधना के प्रभाव से स्वयं श्रेष्ठ देवी कमला ही पुत्री-रूप में अवतरित हुई थीं। अश्वपति ने उस कन्या का नाम सावित्री रखा। वह शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई और यथासमय रूप तथा यौवन से सम्पन्न हो गई। बड़ी हुई तो उसने स्वयं अपने वर का वरण किया, द्युमत्सेन के सत्यनिष्ठ, सत्यशील और अनेक गुणों से युक्त पुत्र सत्यवान को। राजा ने रत्नमय भूषणों से अलंकृत कर वह कन्या उन्हें सौंप दी, और सत्यवान बड़े हर्ष से उसे लेकर अपने घर चले गए।

वन में गिरता हुआ वृक्ष

विवाह को एक वर्ष बीता। एक दिन सत्यपराक्रमी सत्यवान अपने पिता की आज्ञा से फल और लकड़ी लाने वन में गए। साध्वी सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चली गई। दैवयोग से सत्यवान वृक्ष से गिर पड़े और उनके प्राण निकल गए। तभी दक्षिण दिशा के स्वामी यमराज वहाँ आए और मृत सत्यवान के अँगूठे के बराबर सूक्ष्म शरीर को साथ लेकर प्रस्थान करने लगे। संयमनीपुरी के स्वामी और साधुओं में श्रेष्ठ उस धर्मराज ने जब उस सुन्दरी को अपने पीछे-पीछे आते देखा, तो मधुर वाणी में कहा।

हे सावित्री! यह मानव-शरीर धारण किए आप कहाँ जा रही हैं? यदि आप अपने पति के साथ जाना चाहती हैं, तो पहले इस शरीर का त्याग कीजिए, क्योंकि विनाशशील मनुष्य इस नश्वर पांचभौतिक देह को लेकर हमारे लोक कभी नहीं जा सकता। हे साध्वि! भारतवर्ष में आए हुए आपके पति की आयु अब पूर्ण हो चुकी है; अपने कर्मों का फल भोगने के लिए सत्यवान हमारे लोक जा रहे हैं। प्राणी कर्म के अनुसार ही जन्म और मृत्यु पाता है; सुख, दुःख, भय और शोक भी कर्म से ही आते हैं। अपने ही कर्म के प्रभाव से जीव इन्द्र बन सकता है, ब्रह्मा का पुत्र बन सकता है, अथवा हरि का दास बनकर जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो सकता है; और अपने ही कर्म से वह वृक्ष, पशु, कीट अथवा असुर की योनि भी पा जाता है। इतना कहकर यमराज मौन हो गए।

यमराज से सावित्री का प्रश्न

पर सावित्री रोई नहीं। पतिव्रता और दृढ़ निश्चयवाली उस मनस्विनी ने परम भक्ति से धर्मराज की स्तुति की और फिर ऐसे प्रश्न पूछे जिन्हें बड़े-बड़े ज्ञानी भी सहज नहीं पूछ पाते। कर्म क्या है और उसे कराने वाला कौन है? देही कौन है और देह क्या है? ज्ञान, बुद्धि और प्राण क्या हैं? इन्द्रियाँ कौन-सी हैं, उनके देवता कौन हैं, भोक्ता कौन है, भोग क्या है, निष्कृति क्या है, जीव कौन है और परमात्मा कौन हैं, यह सब आप कृपा करके हमें बताइए।

धर्मराज ने उत्तर दिया कि वेद में जो प्रतिपादित है वही धर्म है और वही परम मंगलकारी कर्म है; इसके विपरीत जो अवैदिक है वह अशुभ है। संकल्परहित और अहैतुकी देवसेवा ही कर्म को निर्मूल करने वाली है और वही पराभक्ति देती है; जो मनुष्य ब्रह्म की भक्ति करता है वही जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक और भय से रहित होकर मुक्त हो जाता है। उन्होंने बताया कि कर्म का बीजरूप सदा फल देने वाला है, और कर्म तो स्वयं परमात्मा तथा परा प्रकृति का ही रूप है; पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, ये पाँच सूत्ररूप महाभूत सृष्टि की रचना में लगते हैं। कर्म करने वाला देही जीव ही अन्तर्यामी रूप से भोक्ता भी है; सुख-दुःख का अनुभव ही भोग है और उससे छूटना ही निष्कृति। सत् और असत् का भेद कराने वाला ज्ञान है, विवेचनमयी शक्ति बुद्धि है, वायु के भेद प्राण हैं, और इन्द्रियों में प्रमुख, ईश्वर का अंश तथा कर्मों का प्रेरक मन है। नेत्र, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा, ये इन्द्रियाँ प्राणियों को कभी सुख और कभी दुःख देती हैं, और सूर्य, वायु, पृथ्वी तथा ब्रह्मा आदि इनके देवता हैं। जो प्राण और देह को धारण करता है वह जीव है, और प्रकृति से परे सर्वव्यापी निर्गुण ब्रह्म ही परमात्मा है। इतना कहकर धर्मराज ने कहा कि हे वत्से! अब आप सुखपूर्वक लौट जाइए।

किन्तु सावित्री ने हाथ जोड़कर कहा कि अपने प्राणनाथ और ज्ञान के सागर आपको छोड़कर हम कहाँ जाएँ। फिर उसने और भी पूछा, किस कर्म से जीव किस योनि में जाता है, किससे स्वर्ग और किससे नरक मिलता है, किस कर्म से मुक्ति होती है और किससे गुरु के प्रति भक्ति, कौन रोगी होता है और कौन दीर्घजीवी, तथा नरक कितने प्रकार के हैं। इन प्रश्नों की गहराई देखकर यमराज विस्मय में पड़ गए।

धर्मराज का वरदान

हँसकर धर्मराज बोले कि हे वत्से! इस समय आपकी अवस्था तो केवल बारह वर्ष की है, किन्तु आपका ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, ज्ञानियों और योगियों से भी बढ़कर है। हे पुत्रि! आप भगवती सावित्री के वरदान से उन्हीं की कला से जन्म लेकर सती सावित्री के नाम से विख्यात हैं; राजा अश्वपति ने अपनी तपस्या से आपको उन्हीं सावित्री के सदृश कन्या-रूप में पाया है। जैसे लक्ष्मी विष्णु की गोद में और भवानी शिव के वक्षःस्थल पर, जैसे अदिति कश्यप के, अहल्या गौतम के, शची महेन्द्र के, रोहिणी चन्द्र के, रति कामदेव के, स्वाहा अग्नि के, स्वधा पितरों के और सन्ध्या सूर्य के पास सौभाग्यवती प्रिया बनकर सुशोभित होती हैं, वैसे ही हे प्रिये! आप भी सत्यवान की सौभाग्यवती प्रिया के रूप में सुशोभित हों; यह वर हमने आपको दे दिया। इसके अतिरिक्त और जो अभीष्ट हो, वह भी माँग लीजिए।

सावित्री बोलीं कि हे महाभाग! सत्यवान से हमें सौ औरस पुत्र प्राप्त हों, हमारे पिता के भी सौ पुत्र हों, हमारे श्वशुर को नेत्र-ज्योति लौट आए और उन्हें राज्य भी मिल जाए; और अन्त में, एक लाख वर्ष बीतने पर हम सत्यवान के साथ भगवान श्रीहरि के धाम चली जाएँ, यह वर भी हमें दीजिए। साथ ही जीवों के कर्मफल और संसार से उद्धार का उपाय सुनने की भी हमें बड़ी उत्कण्ठा है। धर्मराज ने प्रसन्न होकर कहा कि हे महासाध्वि! आपके सभी मनोरथ पूर्ण होंगे। इन वरदानों के साथ ही सत्यवान का जीवन लौट आना निश्चित हो गया, क्योंकि जिस पत्नी को सत्यवान से सौ पुत्र और अन्त में उन्हीं के साथ हरि का धाम मिलना था, उसका पति भला मृत कैसे रहता। फिर यमराज जीवों के कर्मफल का विस्तृत रहस्य कहने लगे, कौन किस लोक में जाता है और कौन-सा दान कितना फल देता है; यह लम्बा प्रसंग आगे तक चलता रहा।

यह आख्यान महाभारत के वनपर्व में भी आता है, किन्तु देवीभागवत का यह वर्णन प्रकृति और देवी के फलक पर अपने ही ढंग का है; यहाँ सावित्री यमराज को आँसुओं से नहीं, अपने तर्क और तत्त्वज्ञान से जीतती हैं और स्वयं भगवती सावित्री की कला कही गई हैं।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)