हिमालय के उत्तुंग शिखरों पर, जहाँ गंगा अपने विशाल पाट में उतरकर बहती है, बदरिकाश्रम नामक वह पावन तीर्थ बसा था। वहीं एकान्त में बैठे भगवान् विष्णु के दो अंश, नर और नारायण, कठोर तप में लीन थे। धर्म के जो पुत्र हुए, उनमें से ये दोनों मुनिश्रेष्ठ इस हिमशिखर पर आकर ब्रह्मचिन्तन में डूब गए थे। पूरे एक हजार वर्ष तक उन्होंने ऐसा उग्र तप किया कि उसके ताप से चराचर सारा संसार सन्तप्त हो उठा।
यह आँच देवराज इन्द्र के आसन तक जा पहुँची। सहस्राक्ष के मन में क्षोभ उठा। वे सोचने लगे कि ये धर्मपुत्र तपस्वी यदि पूर्णरूप से सिद्ध हो गए, तो कहीं मेरा श्रेष्ठ आसन ही न ग्रहण कर लें। इनके तप में किसी भाँति विघ्न डालना चाहिए। यही विचारकर इन्द्र अपने उत्तम ऐरावत पर सवार हुए और शीघ्रता से गन्धमादन पर्वत की ओर चल पड़े।
वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि तप के प्रभाव से देदीप्यमान वे दोनों ऋषि उगते हुए दो सूर्यों की भाँति प्रतीत हो रहे हैं। इन्द्र चकित होकर सोचने लगे, क्या ब्रह्मा और विष्णु प्रकट हो गए हैं, या दो सूर्य एक साथ उदित हो आए हैं? पास जाकर उन्होंने कहा, हे धर्मनन्दन! आपका क्या प्रयोजन है, बताइए। मैं श्रेष्ठ वर देने के लिए ही आया हूँ; अदेय हो तो भी दूँगा, क्योंकि आपकी तपस्या से मैं परम प्रसन्न हूँ।
माया हारी, तब कामदेव की सेना चली
किन्तु ध्यान में मग्न वे दोनों दृढ़चित्त ऋषि कुछ न बोले। इन्द्र ने बार-बार वर माँगने को कहा, पर उत्तर न पाकर उन्होंने अपनी भयदायिनी मोहिनी माया रच दी। भेड़िये, सिंह और व्याघ्र जैसे हिंसक जन्तु प्रकट कर उन्होंने ऋषियों को डराना चाहा; फिर वर्षा, आँधी और अग्नि उत्पन्न कर बारम्बार भय दिखाया। पर धर्मपुत्र वे दोनों मुनि इस भय से तनिक भी विचलित न हुए, आसन से हिले तक नहीं। हारकर इन्द्र अपने भवन लौट गए।
घर पहुँचकर वे दुखी मन से विचार करने लगे। ये दोनों तो महाविद्या, आदिशक्ति, सनातनी परा–प्रकृति का ध्यान कर रहे हैं। देवता और असुरों की रची सारी माया जिस भगवती से ही उपजती है, उनके उपासक को भला कौन डिगा सकता है, चाहे वह कितना ही बड़ा मायावी क्यों न हो? जिसके हृदय में वाग्बीज, कामबीज और मायाबीज विराजते हों, उसे विचलित करना किसी के वश की बात नहीं।
अब इन्द्र ने कामदेव और वसन्त को बुलाया और कहा, हे कामदेव! आप रति और वसन्त को लेकर, अनेक अप्सराओं के साथ, गन्धमादन के उस बदरिकाश्रम में शीघ्र जाइए। वहाँ नर और नारायण एकान्त में तप कर रहे हैं। अपने पंचबाणों से उनके चित्त को कामासक्त कर दीजिए। जब ब्रह्मा, शिव, चन्द्रमा और स्वयं मैं भी आपके बाणों से मोहित हो जाते हैं, तब उन दोनों की क्या गणना? आपकी सहायता के लिए रम्भा, तिलोत्तमा आदि अप्सराओं का समूह भी भेज रहा हूँ।
कामदेव ने विनयपूर्वक चेताया, हे इन्द्र! मैं आपका कार्य अवश्य करूँगा। यदि वे विष्णु, शिव, ब्रह्मा या सूर्य का ध्यान करते होंगे, तो मेरे वश में आ जाएँगे। किन्तु जो केवल कामराज महाबीज ‘क्लीं’ का चिन्तन करते हुए महाशक्तिस्वरूपा देवी की उपासना में लगे हैं, ऐसे देवीभक्त पर मेरे बाणों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। फिर भी इन्द्र के आग्रह पर वह विशाल दल पूरी तैयारी के साथ उस स्थान की ओर चल पड़ा।
असमय में उतरा वसन्त
सबसे पहले उस पर्वतश्रेष्ठ पर वसन्त पहुँचा। देखते-देखते सारे वृक्ष पुष्पित हो उठे और उन पर भ्रमरों के समूह मँडराने लगे। आम, मौलसिरी, तिलक, किंशुक, साल, ताल, तमाल और महुआ फूलों से लद गए। डालियों पर कोयलों की मनोहर कूक गूँज उठी, पुष्पों से भरी लताएँ ऊँचे पर्वतों पर चढ़ने लगीं। मन्द, सुगन्धित और सुखद स्पर्शवाली दक्षिण की हवाएँ बहने लगीं, और उस समय मुनियों की वृत्तियाँ भी चंचल हो उठीं। तभी रति के साथ कामदेव अपने पंचबाण छोड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा, और संगीत में प्रवीण रम्भा तथा तिलोत्तमा स्वर-ताल में बँधे मधुर गीत गाने लगीं।
उस मधुर गान, कोयलों की कूक और भ्रमरों के गुंजार से दोनों मुनिवरों का ध्यान भंग हो गया। असमय में वसन्त का आगमन और सारे वन को पुष्पों से सजा देखकर वे चिन्तित हो उठे। नारायण विस्मित होकर नर से कहने लगे, हे भाई! देखिए, ये सब वृक्ष पुष्पों से लदे शोभा पा रहे हैं, कोयलें कूक रही हैं, भ्रमरों की पंक्तियाँ विराज रही हैं। यह वसन्तरूपी सिंह अपने पलाशपुष्परूपी तीखे नखों से शिशिररूपी भयानक हाथी को विदीर्ण करता हुआ यहाँ आ पहुँचा है।
फिर उन्होंने उस साकार वसन्तश्री का वर्णन किया, मानो कोई सुन्दरी सामने खड़ी हो, जिसके हाथ लाल अशोक हैं, चरण किंशुक के फूल, केश नील अशोक, मुख विकसित श्याम कमल, नेत्र नील कमल, अधर बन्धुजीव के पुष्प, दाँत खिले कुन्द, कान आम के बौर, स्वर कोयल का, और मत्त हंस की-सी जिसकी चाल है। नारायण बोले, हे देवर्षे! निश्चय जानिए, असमय में यह वसन्त हमारी तपस्या में विघ्न डालने ही आया है। यह गीत देवांगनाओं का है; भयभीत होकर असुरों के शत्रु इन्द्र ने ही यह उपक्रम रचा है, इसमें और कोई कारण नहीं।
जंघा से उर्वशी का प्राकट्य
नारायण यह कह ही रहे थे कि कामदेव के साथ मेनका, रम्भा, तिलोत्तमा, पुष्पगन्धा, सुकेशी, महाश्वेता, मनोरमा, घृताची, चन्द्रप्रभा, सोमा, विद्युन्माला और कांचनमालिनी जैसी असंख्य अप्सराएँ प्रत्यक्ष दिखाई पड़ीं। उनकी संख्या सोलह हजार पचास थी। कामदेव की उस विशाल सेना को देखकर दोनों मुनि चकित रह गए। दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से सजी वे देवांगनाएँ प्रणाम कर सामने खड़ी हो गईं और छलपूर्वक कामवासना बढ़ानेवाले गीत गाने लगीं।
नारायण ने वह गीत सुना और प्रेमपूर्वक कहा, आप सब आनन्द से बैठिए, मैं आपका आतिथ्य-सत्कार करूँगा; आप स्वर्ग से यहाँ आई हैं, अतः हमारी अतिथि हैं। पर तभी मुनि नारायण के मन में कुछ अभिमान जाग उठा। वे सोचने लगे, निश्चय ही इन्द्र ने हमारे तप में बाधा डालने के लिए इन्हें भेजा है। ये बेचारी क्या हैं! मैं अभी अपना तपोबल दिखाता हूँ और इनसे भी अधिक दिव्य रूपवाली नवीन अप्सराएँ रच देता हूँ।
ऐसा विचारकर उन्होंने हाथ से अपनी जंघा पर आघात किया, और तत्काल एक सर्वांगसुन्दरी स्त्री प्रकट हो गई। वह भगवान् नारायण के ऊरुदेश से उत्पन्न हुई थी, इसीलिए उसका नाम उर्वशी पड़ा। वहाँ खड़ी अप्सराएँ उसे देखकर विस्मय से चकित रह गईं। फिर उनकी सेवा के लिए मुनि ने उतनी ही और अत्यन्त सुन्दर अप्सराएँ रच दीं, जो हाथों में उपहार लिए, हँसती और मधुर गीत गाती हुई हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गईं।
जीता हुआ मन
इन्द्र की भेजी वे अप्सराएँ उस विस्मयकारिणी उर्वशी को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठीं। उनके मुखकमल खिल उठे, रोमांच से अंग पुलकित हो गए। वे हाथ जोड़कर बोलीं, हम मूर्ख अप्सराएँ आपकी स्तुति कैसे करें? आपके धैर्य और तप के प्रभाव को देखकर हम परम विस्मय में पड़ गई हैं। ऐसा कौन होगा जो हमारे कटाक्षरूपी विष में बुझे बाणों से न जले, फिर भी आपके मन को तनिक भी व्यथा न हुई! अब हम जान गईं कि आप दोनों साक्षात् विष्णु के परम अंश और शम-दम के निधान हैं। हम आपकी सेवा के लिए नहीं, देवराज का कार्य सिद्ध करने आई थीं। शाप देने में समर्थ होते हुए भी आप मुनियों ने हम अपराधिनियों को स्वजन समझकर क्षमा कर दिया; विवेकी महात्मा तुच्छ फल देनेवाले शाप में अपने तप का अपव्यय नहीं करते।
उन विनम्र देवसुन्दरियों का वचन सुनकर काम और लोभ को जीत लेनेवाले वे धर्मपुत्र प्रसन्न होकर बोले, हम आप सब पर अत्यन्त प्रसन्न हैं। अपना मनोरथ बताइए। इस सुन्दर नयनोंवाली उर्वशी को साथ लेकर आप सब स्वर्ग को प्रस्थान कीजिए। ऊरु से प्रकट हुई इस उर्वशी को हमने इन्द्र के प्रसन्नार्थ ही दे दिया है। सब देवताओं का कल्याण हो; अब कभी किसी की तपस्या में विघ्न मत डालिएगा।
पर वे अप्सराएँ लौटने के बदले चरणों में झुक गईं। बोलीं, हे नारायण! परम भक्ति से हम आपके चरणकमलों का सांनिध्य पा चुकीं; अब कहाँ जाएँ? यदि प्रसन्न होकर वर देना ही चाहते हैं, तो आप हमारे पति बन जाइए। जिन उर्वशी आदि को आपने रचा है, वे आपकी आज्ञा से स्वर्ग चली जाएँ; हम सोलह हजार पचास अप्सराएँ यहीं रहकर आप दोनों की सेवा करेंगी। धर्मज्ञ मुनियों ने प्रेमासक्त स्त्रियों की आशा भंग करना हिंसा कहा है; हे जगत्पते! आप हमारा त्याग न कीजिए।
नारायण ने स्थिर होकर उत्तर दिया, इन्द्रियों को जीतकर मैंने पूरे एक हजार वर्ष यहाँ तप किया है; उसे भला कैसे नष्ट कर दूँ? सुख और धर्म का नाश करनेवाले वासनात्मक सुख में मेरी कोई रुचि नहीं। पाशविक धर्म-जैसे सुख में विवेकी पुरुष कैसे प्रवृत्त हो सकता है? अप्सराएँ फिर भी अनुनय करती रहीं कि पाँचों सुखों में स्पर्श-सुख ही सर्वश्रेष्ठ और आनन्द का मूल है। पर जिसका मन एक हजार वर्ष की तपस्या में पक चुका था, उसे न व्याघ्र-सिंह का भय डिगा सका, न वर का लोभ, न रूप की माया। जिस गर्व के साथ वे अप्सराएँ चली आई थीं, वह गर्व वहीं चूर हो गया, और ऊरु से जन्मी उर्वशी को नारायण ने इन्द्र के प्रसन्नार्थ भेंट कर दिया।
श्रीमद्भागवत में भी नर-नारायण के तप और अप्सराओं के गर्व-भंग की यह कथा आती है, किन्तु देवीभागवत का यह वर्णन अपने ही ढंग का और अधिक विस्तृत है, जहाँ अप्सराओं की संख्या भी बड़ी है और उनका अनुनय भी।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)