महिषासुर के आतंक से स्वर्ग सूना पड़ा था। यज्ञ में देवताओं के लिए जो भाग निकाला जाता, उसे वह दैत्य स्वयं डकार जाता; और देवगण अपने ही लोक से खदेड़े जाकर पर्वतों की कन्दराओं में भयभीत भटकते फिरते थे। ब्रह्माजी उन्हें साथ लेकर पहले भगवान् शंकर की शरण में गए। शंकरजी ने मुसकराते हुए कहा कि उस दानव को यह वर तो हमीं लोगों ने दिया है, अब कौन-सी वरनारी उसे मार सकेगी। न हमारी भार्या रुद्राणी संग्राम में जाने योग्य हैं, न आपकी ब्रह्माणी, न इन्द्र की इन्द्राणी युद्धकला में कुशल हैं। इसलिए उन्होंने परामर्श दिया कि सब मिलकर भगवान् विष्णु के पास चलें, वही किसी उपाय से यह कार्य सिद्ध कराएँगे।
देवगण अपने-अपने वाहनों पर सवार हो शिवजी के साथ वैकुण्ठ की ओर चल पड़े। मार्ग में शीतल, मन्द, सुगन्धित हवाएँ बहने लगीं, पवित्र पक्षी मंगलमयी बोली बोलने लगे और आकाश निर्मल हो उठा। वैकुण्ठ में श्रीहरि का विशाल भवन सरोवरों और नदियों से घिरा था, जहाँ हंस, सारस और चक्रवाक कलरव कर रहे थे; उपवनों में चम्पा, अशोक, कह्लार, मन्दार और मौलसिरी खिले थे, कोयलें कूक रही थीं और मोर नाच रहे थे। द्वार पर स्वर्ण की छड़ी लिए जय और विजय खड़े थे। विजय ने भीतर जाकर भगवान् विष्णु को सब देवताओं के आगमन की बात कही, और लक्ष्मीपति उनसे मिलने के उत्साह में तुरन्त बाहर निकल आए।
एक ही उपाय शेष है
देवताओं ने हाथ जोड़कर कहा, हे दयासिन्धो! पापी, अजेय और वरदान से चूर महिषासुर से हम पीड़ित हैं; शरण में आए हुओं की रक्षा कीजिए। यह सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराते हुए बोले कि पहले भी हमलोगों ने उससे युद्ध किया था, किन्तु वह नहीं मारा जा सका। विधाता ने उसे यह वर दे रखा है कि किसी पुरुष के हाथों उसकी मृत्यु न होगी। तब भला रुद्राणी, ब्रह्माणी, इन्द्राणी या सरस्वती में से कौन देवांगना उस मदोन्मत्त को मार सकेगी? इसलिए एक ही उपाय शेष है। यदि हम सब देवताओं के तेज से कोई श्रेष्ठ रूपवती नारी उत्पन्न की जाए, तो वही समरांगण में उसे अपने पराक्रम से मार सकती है। सैकड़ों प्रकार की माया रचने में निपुण वही वीर नारी उस अभिमानी का अन्त करेगी। भगवान् विष्णु ने कहा कि अब सब देवगण अपने तेज-अंशों से प्रार्थना करें, जिससे एक तेजोराशि प्रकट हो और उससे वह भगवती जन्म लें।
तेजोराशि से भगवती का प्रकट होना
विष्णु के इतना कहते ही ब्रह्माजी के मुख से अपने आप एक असह्य तेज-पुंज निकल पड़ा, जो लाल रंग का और पद्मराग मणि के समान प्रभावाला था। फिर शंकरजी के शरीर से चाँदी के वर्णवाला, अत्यन्त तीव्र, पर्वत-सा विशाल और साक्षात् तमोगुण जैसा तेज निकला। भगवान् विष्णु के शरीर से नीलवर्ण का सत्त्वगुण-सम्पन्न दीप्तिमान् तेज प्रकट हुआ, और इन्द्र के शरीर से विचित्र आकारवाला, पूर्ण गोलाकार तेज उठा। कुबेर, यम, अग्नि और वरुण के शरीरों से भी चारों ओर महान् तेज फूटने लगा, और अन्य देवताओं के अंग-अंग से भी प्रदीप्त किरणें निकलीं। वह सारा तेज एक साथ मिलकर हिमालय-सा विशाल तेजोराशि बन गया। उसी क्षण, सबके देखते-देखते, उस पुंज से एक अत्यन्त सुन्दर, त्रिगुणात्मिका, अठारह भुजाओंवाली, तीन वर्णवाली और विश्व को मोह लेनेवाली साक्षात् महालक्ष्मी प्रकट हो गईं। उनका मुख उज्ज्वल, नेत्र कृष्णवर्ण, अधर अत्यन्त लाल और हथेलियाँ ताम्रवर्ण की थीं।
यह भी सुनने योग्य है कि किस देवता के तेज से देवी का कौन-सा अंग बना। शंकर के तेज से उनका गौरवर्ण, विशाल मुखकमल निर्मित हुआ; यमराज के तेज से घुँघराले, मेघ-जैसे काले और मनोहर केश बने। अग्नि के तेज से उनके तीन नेत्र प्रकट हुए, जो काले, लाल और श्वेत तीन वर्णों से सुशोभित थे। दोनों संध्याओं के तेज से उनकी भौंहें कामदेव के धनुष-सी टेढ़ी और चिकनी बनीं; वायु के तेज से न अधिक बड़े न छोटे मनोहर कान बने। कुबेर के तेज से तिल के फूल-सी सुन्दर नाक, और प्रजापति के तेज से कुन्द की कली-से नुकीले, समान दाँत उत्पन्न हुए। नीचे का लाल अधर अरुण के तेज से और ऊपर का ओष्ठ कार्तिकेय के तेज से बना। अठारह भुजाएँ विष्णु के तेज से, और रक्तवर्ण की अँगुलियाँ वसुओं के तेज से प्रकट हुईं। चन्द्रमा के तेज से दोनों स्तन, इन्द्र के तेज से त्रिवली-युक्त मध्यभाग, वरुण के तेज से जाँघें और ऊरु, तथा पृथ्वी के तेज से विशाल नितम्ब बने। इस प्रकार सुन्दर आकारवाली, दिव्य रूप से सम्पन्न और मधुर स्वरवाली भगवती नारी-रूप में प्रकट हुईं। उन्हें देखकर महिषासुर से पीड़ित समस्त देवता आनन्द से भर उठे।
आयुध और आभूषणों से सज्जित देवी
तब भगवान् विष्णु ने कहा कि अब सब देवता अपने-अपने शुभ भूषण और आयुध इन देवी को समर्पित करें। क्षीरसागर ने कभी न जीर्ण होनेवाले दो दिव्य रक्तवर्ण वस्त्र, निर्मल हार, करोड़ों सूर्यों-सी चमकीली चूड़ामणि, कुण्डल और कड़े दिए। विश्वकर्मा ने बाजूबंद और रत्नजटित कंकण प्रदान किए; त्वष्टा ने सूर्य-से चमकते नूपुर, सैकड़ों घण्टों-सी ध्वनि करनेवाली कौमोदकी गदा तथा अनेक अस्त्र और अभेद्य कवच अर्पित किए। महासमुद्र ने कण्ठहार और तेजोमय अँगूठियाँ, वरुण ने कभी न मुरझानेवाली कमलों की माला, वैजयन्ती, पाश तथा एक शंख भेंट किया। हिमवान् ने नाना रत्न और स्वर्ण-सा चमकीला मनोहर सिंह वाहन दिया। भगवान् विष्णु ने अपने चक्र से सहस्र अरोंवाला, दैत्यों के सिर काट लेने में समर्थ चक्र उत्पन्न कर दिया; शंकर ने अपने त्रिशूल से एक उत्तम त्रिशूल, अग्नि ने शत्रुओं का संहार करनेवाली शक्ति, और मरुत ने बाणों से भरा तरकस तथा कर्कश टंकार करनेवाला धनुष दिया। इन्द्र ने अपने वज्र से एक भयंकर वज्र और ऐरावत से उतारकर मधुर-तीव्र ध्वनिवाली घण्टा, यमराज ने अपने कालदण्ड से एक दण्ड, ब्रह्माजी ने गंगाजल से भरा कमण्डलु, काल ने खड्ग और ढाल, तथा कुबेर ने मधु से भरा सुवर्ण-पानपात्र प्रदान किया। सूर्यदेव ने अपनी किरणें उन्हें अर्पित कीं। इस प्रकार समस्त आयुधों और आभूषणों से सज्जित, सिंह पर आरूढ़ भगवती अत्यन्त सुशोभित हो उठीं, और बार-बार पानपात्र से मधु का पान करने लगीं।
त्रैलोक्यमोहिनी उस कल्याणकारिणी देवी की स्तुति करते हुए देवगण बोले, शिवा को नमस्कार है; कल्याणी, शान्ति और पुष्टि को नमस्कार है; भगवती, देवी और रुद्राणी को निरन्तर नमस्कार है। कालरात्रि, अम्बा और इन्द्राणी को नमस्कार; सिद्धि, बुद्धि, वृद्धि और वैष्णवी को नमस्कार। जो पृथ्वी के भीतर रहकर उसे नियन्त्रित करती हैं किन्तु पृथ्वी जिन्हें नहीं जान पाती, जो माया के भीतर रहकर उसे प्रेरणा देती हैं किन्तु माया जिन्हें नहीं पहचान सकती, उन जन्मरहित परमेश्वरी की हम वन्दना करते हैं। हे माता! आप अपने तेज से इस मोहग्रस्त पापी महिषासुर का वध कर डालिए; एकमात्र आप ही समस्त देवताओं की शरण हैं, हमारी रक्षा कीजिए।
भगवती का अट्टहास
सब देवताओं की स्तुति सुनकर महादेवी मुसकराईं और बोलीं कि आपलोग उस मन्दबुद्धि महिषासुर का भय त्याग दें; वर पाकर अभिमान में चूर उस दानव को मैं आज ही रण में मार डालूँगी। फिर उन्होंने कहा कि यह संसार कैसा विचित्र है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र तक भ्रम और मोह में पड़कर एक महिष से काँप उठते हैं; काल ही सुख-दुख का कर्ता और सबका ईश्वर है। इतना कहकर देवी ने ऐसा प्रचण्ड अट्टहास किया कि उसकी गर्जना से पृथ्वी काँप उठी, सारे पर्वत हिल गए, अगाध महासमुद्र में क्षोभ उठा और सुमेरु तक डोल उठा; सभी दिशाएँ गूँज उठीं। उस तीव्र ध्वनि को सुनकर देवगण प्रसन्न होकर जय-जयकार करने लगे, पर दानव भयभीत हो उठे। अभिमान में डूबा महिषासुर भी वह गर्जन सुनकर क्रोध से जल उठा और सशंकित होकर अपने दूतों को आज्ञा दी कि इस कानों को बेधनेवाले शब्द का उद्गम खोजकर उस दुष्ट को पकड़ लाएँ। दूत जब उस अठारह भुजाओंवाली, सिंह पर विराजमान, मधुपात्र से बार-बार पान करती और गरजती देवी के समीप पहुँचे, तो उनके तेज से चकाचौंध होकर, कुछ भी कहे बिना, भयभीत लौट आए और अपने स्वामी को बताने लगे कि वहाँ जो नारी है, वह न मानवी है न आसुरी, बल्कि श्रृंगार, वीर, हास्य, रौद्र और अद्भुत रसों से परिपूर्ण एक दिव्य विग्रहवाली स्त्री है, जिसे देख पाना भी कठिन है।
यही कथा देवीमाहात्म्य में भी है, किन्तु देवीभागवत का यह वर्णन अपने ही ढंग का और विस्तृत है।
आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)