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रुद्राक्ष की महिमा और गुणनिधि

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षडानन कार्तिकेय ने एक दिन गिरिशायी महादेव से पूछा कि रुद्राक्ष की ऐसी महिमा किस कारण है। तब भगवान् शंकर ने जो कथा सुनायी, वही आगे चलकर श्रीनारायण ने नारदजी को कह सुनायी।

त्रिपुर नामक दैत्य ने ब्रह्मा और विष्णु समेत सारे देवताओं को जीत लिया था, और कोई उसे रोक न पाता था। तब कैलासपति महादेव ने उसके संहार और देवताओं के उद्धार के लिए अघोर नामक उस अचिन्त्य महास्त्र का चिन्तन आरम्भ किया, जो समस्त विघ्नों का नाश करनेवाला, दिव्य और प्रज्वलित था। एक हज़ार दिव्य वर्ष तक वे नेत्र खोले उसी ध्यान में बैठे रहे। फिर उनके व्याकुल नेत्रों से जल की कुछ बूँदें भूमि पर गिर पड़ीं।

उन्हीं अश्रु-बिन्दुओं से रुद्राक्ष के बड़े-बड़े वृक्ष उग आये। महादेव की आज्ञा से, सब प्राणियों के कल्याण के लिए, वे अड़तीस प्रकार के रुद्राक्ष हुए। उनके दाहिने सूर्य-नेत्र से उत्पन्न रुद्राक्ष कपिल वर्ण के थे, बारह प्रकार के; बायें चन्द्र-नेत्र से श्वेत वर्ण के, सोलह प्रकार के; और तीसरे अग्नि-नेत्र से कृष्ण वर्ण के, दस प्रकार के। यही अश्रुओं से जन्मा रुद्राक्ष आगे चलकर तीनों लोकों में शिव का सबसे प्रिय चिह्न बना।

रुद्राक्ष का वर्ण और मुख

श्वेत वर्ण का रुद्राक्ष जाति से ब्राह्मण कहा गया, रक्त वर्ण का क्षत्रिय, मिश्र वर्ण का वैश्य और कृष्ण वर्ण का शूद्र। पर सबसे बड़ी बात उसके मुखों में है। एक मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् शिवस्वरूप है और ब्रह्महत्या तक का पाप मिटा देता है; पाँच मुखवाला कालाग्नि नामक रुद्र का रूप है और अभक्ष्य-भक्षण तथा वर्जित संसर्ग से लगे पापों से छुड़ाता है। छह मुखवाला कार्तिकेय का रूप है, उसे दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए; आठ मुखवाला साक्षात् विनायक है और अन्न, वस्त्र तथा स्वर्ण की वृद्धि करता है; दस मुखवाला देवेश्वर जनार्दन है और ग्रह, पिशाच, वेताल तथा ब्रह्मराक्षसों से उपजे विघ्नों को शान्त कर देता है। ग्यारह मुखवाला एकादश रुद्र है, और चौदह मुखवाला तो स्वयं शिव के नेत्र से उपजा; उसे मस्तक पर धारण करनेवाले का शरीर शिवतुल्य हो जाता है।

ऐसे रुद्राक्षों की माला गूँथकर, गन्धोदक और पंचगव्य से शुद्ध कर, मन्त्रों का न्यास करके उसे प्रतिष्ठित किया जाता है। कण्ठ, मस्तक, कान, भुजा और मणिबन्ध पर उसे नित्य श्रद्धापूर्वक धारण करना चाहिए, और उसी माला पर संयतचित्त होकर जप करना चाहिए। स्नान, दान, जप, होम, देवपूजन, प्रायश्चित्त, श्राद्ध और दीक्षा के समय उसे अवश्य धारण करने का विधान है; इस माला पर जपा गया मन्त्र अनन्त फल देता है। जो एक सौ आठ रुद्राक्षों की माला धारण करता है, वह प्रतिक्षण अश्वमेध का फल पाता है और अपनी इक्कीस पीढ़ियों को तार कर अन्त में शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है।

एक रुद्राक्ष की महिमा

महादेव ने कहा: हे पुत्र! रुद्राक्ष से बढ़कर न कोई स्तोत्र है, न कोई व्रत। सब अक्षय दानों में रुद्राक्ष का दान विशेष है। जो किसी शान्त शिवभक्त को उत्तम रुद्राक्ष देता है, उसके पुण्य की सीमा मैं भी नहीं कह सकता। जो मनुष्य पाप करके भी रुद्राक्ष धारण कर ले, वह सब पापों से छूट जाता है; ऐसा जाबालोपनिषद् कहती है। जो भस्म और रुद्राक्ष धारण करता है, वह ब्राह्मण हो या चाण्डाल, गुणवान् हो या निर्गुण, म्लेच्छ हो या सब पातकों से युक्त, केवल रुद्राक्ष धारण से ही रुद्रस्वरूप हो जाता है। गले में रुद्राक्ष बँधा हुआ कुत्ता भी यदि मर जाय तो मुक्ति पा जाता है, फिर मनुष्य की तो बात ही क्या। जो प्रयाणकाल में रुद्राक्ष धारण किये मृत्यु को प्राप्त होता है, वह रुद्रत्व को पाता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जो मन में धारण करने की भावना रखता है, पर धार नहीं पाता, वह भी इस लोक में शिवलिंग की भाँति नमस्कार के योग्य है। और जो आलस्यवश भी केवल रुद्राक्ष धारण कर ले, उसे पाप उसी तरह स्पर्श नहीं करते जैसे अन्धकार सूर्य को नहीं छू पाता।

इसी महिमा का एक प्रमाण महादेव ने सुनाया। पर्वत के मार्ग पर एक गधा रुद्राक्ष का बोझ ढोया करता था। एक दिन किसी पथिक ने अधिक बोझ लादकर उसे हाँका; थका हुआ वह गधा भार सँभाल न सका और भूमि पर गिरकर प्राण त्याग गया। पर मरते ही महादेव की कृपा से वह त्रिशूल लिये, तीन नेत्रोंवाला, महेश्वर-रूप में उनके पास जा पहुँचा। पशु तक जिस रुद्राक्ष के स्पर्श से तर गया, उसकी महिमा भला कौन नाप सकता है।

कुमार्गी गुणनिधि

फिर महादेव ने एक और प्राचीन उपाख्यान कहा। कोसल-देश में गिरिनाथ नामक एक ब्राह्मण रहता था, महाधनी, धर्मात्मा, वेद-वेदांग का पारगामी और यज्ञपरायण। उसका एक पुत्र था, गुणनिधि नाम से विख्यात, युवा और कामदेव-सा सुन्दर। नाम में तो गुणों का निधि, पर आचरण में उससे उलटा। रूप और मद से भरे उस युवक ने अपने गुरु सुधिषण की पत्नी मुक्तावली को मोहित कर लिया।

कुछ दिन यह सम्पर्क चलता रहा। फिर गुरु के भय से उसने उन्हें विष दे दिया और निर्भय होकर वहीं रम गया। जब माता-पिता को कुछ भनक लगी, तब उसने उन्हें भी विष देकर मार डाला। भोग-विलास में सारा धन उड़ जाने पर वह ब्राह्मणों के घरों में चोरी करने लगा। सुरापान में सदा उन्मत्त रहने के कारण जाति ने उसे बहिष्कृत कर दिया और गाँववालों ने गाँव से बाहर निकाल दिया। तब वह मुक्तावली को साथ लेकर घने वन में चला गया, और मार्ग पर बैठकर धन के लोभ से आते-जाते अनेक ब्राह्मणों को मार डालने लगा।

यमदूत और शिवदूत

बहुत समय बीता, और अन्ततः वह नीच प्राणी मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसे ले जाने के लिए हज़ारों यमदूत आ पहुँचे; पर उसी क्षण शिवलोक से शिव के गण भी वहाँ आ गये, और दोनों में परस्पर विवाद छिड़ गया। यमदूतों ने पूछा: ‘हे शम्भु के सेवको! बताइए, इसमें ऐसा कौन-सा पुण्य है जो आप इसे शिवलोक ले जाना चाहते हैं?’

शिवदूतों ने उत्तर दिया: ‘यह जिस स्थान पर मरा है, उसी भूमि के दस हाथ नीचे एक रुद्राक्ष दबा पड़ा है। उसी रुद्राक्ष के प्रभाव से हम इसे शिव के पास ले जायेंगे।’ और सचमुच, वह गुणनिधि दिव्य रूप धारण कर विमान पर चढ़कर शिवदूतों के साथ शंकरलोक चला गया। जिसने जीवन भर एक भी सत्कर्म न किया, गुरु और माता-पिता तक को मार डाला, उसे भी अनजाने अपने पास पड़े एक ही रुद्राक्ष ने तार दिया।

यह महिमा सुनकर षडानन कार्तिकेय कृतार्थ हो गये। श्रीनारायण ने नारदजी से कहा कि इसी से तत्त्वदर्शी जन इस रुद्राक्ष-धारण को महाव्रत कहते हैं, और यही रुद्राक्ष सब पापों का नाश करनेवाला तथा महान् पुण्यफल देनेवाला है।

आधार: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)