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अध्याय 9: राजविद्या-राजगुह्य योग

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अध्याय 9: राजविद्या-राजगुह्य योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 9: राजविद्या-राजगुह्य योग

सार: नौवाँ अध्याय गीता का सबसे स्नेह-भरा अंश है। श्रीकृष्ण यहाँ सबसे ऊँचा और सबसे गुप्त ज्ञान खोलते हैं, कि वे सब में व्याप्त हैं फिर भी किसी से बँधे नहीं, कि प्रेम से दिया एक पत्ता तक उन्हें स्वीकार है, और कि उनके द्वार पर जात, कुल या लिंग का कोई भेद नहीं।

अब श्रीकृष्ण की वाणी और कोमल हो जाती है। वे अर्जुन से कहते हैं, हे अर्जुन, आप के मन में दोष ढूँढने का भाव नहीं है, इसलिए अब हम आपको वह ज्ञान देते हैं जो सबसे श्रेष्ठ है और सबसे गुप्त भी। इसे राजविद्या कहते हैं, विद्याओं का राजा, और राजगुह्य, रहस्यों का राजा। यह सबसे पवित्र है, अनुभव से सीधे जाना जाता है, और इसे पाने वाले को गहरी शान्ति मिलती है।

सब में, फिर भी परे

तो वह रहस्य क्या है? श्रीकृष्ण कहते हैं, यह सारा जगत हमारे अव्यक्त रूप से फैला हुआ है। सारे प्राणी हम में बसे हैं, पर हम उनमें बँधे नहीं। यह बात सुनने में उलटी लगती है, पर यही गीता का केंद्र है। जैसे आकाश हर जगह है और हर चीज़ को घेरे हुए है, फिर भी किसी वस्तु से लिपटता नहीं, वैसे ही श्रीकृष्ण सब में हैं और फिर भी सबसे परे हैं। वे सृष्टि को रचते हैं, धारते हैं, और समय आने पर अपने में समेट लेते हैं, पर इस सारे खेल में उदासीन साक्षी की तरह अछूते रहते हैं।

श्रीकृष्ण इस रहस्य को और खोलते हैं। वे कहते हैं, एक कल्प के अंत में सारे प्राणी हमारी प्रकृति में लौट आते हैं, और नए कल्प के आरंभ में हम उन्हें फिर रच देते हैं। यह रचना और यह लय बार-बार होती रहती है, पर इनमें से कोई कर्म हमें बाँधता नहीं, क्योंकि हम इस सारे काम के बीच एक उदासीन साक्षी की तरह बैठे रहते हैं, किसी में उलझे बिना।

पर लोग इस स्वरूप को पहचानते क्यों नहीं? श्रीकृष्ण एक कारण बताते हैं।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥

मूढ़ लोग हमारा तिरस्कार कर देते हैं, क्योंकि हम मनुष्य के रूप में सामने आए हैं। वे हमारे उस परम भाव को नहीं जानते कि हम सब भूतों के महान् ईश्वर हैं। (गीता 9.11)

हम अक्सर बाहरी रूप से धोखा खा जाते हैं। सामने खड़ा सारथी साधारण-सा दिखता है, तो मन मानने से हिचकता है कि यही सबका स्वामी है। यही हिचक सच्चाई को ढक लेती है। इसके विपरीत जो महात्मा हमारे इस स्वरूप को पहचान लेते हैं, वे दृढ़ मन से निरंतर हमारा गुणगान करते हैं, हमारे लिए यत्न करते हैं, और श्रद्धा से हमारी उपासना में लगे रहते हैं। ऐसे भक्तों से हम दूर नहीं रह पाते।

अनन्य भक्ति का आश्वासन

फिर श्रीकृष्ण भक्ति की पूरी तस्वीर खोलते हैं। वे कहते हैं, जो लोग बिना किसी और सहारे के, अनन्य भाव से केवल हमारा चिंतन करते हुए हमारी उपासना करते हैं, उनका सारा भार हम स्वयं उठाते हैं।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

जो अनन्य भाव से हमारा स्मरण करते हुए हमें भजते हैं, उन नित्य जुड़े रहने वाले भक्तों का योगक्षेम हम स्वयं वहन करते हैं। जो उनके पास नहीं है उसे जुटाना, और जो है उसकी रक्षा करना, यह भार हमारा है। (गीता 9.22)

यह गीता का सबसे भरोसा देने वाला वचन है। जो अपने-आप को पूरी तरह सौंप देता है, उसकी चिंता श्रीकृष्ण अपने ऊपर ले लेते हैं।

पत्ता, फूल, फल, जल

अब श्रीकृष्ण यह भी बता देते हैं कि उन तक पहुँचना कितना सरल है।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

जो भक्त प्रेम से हमें एक पत्ता, एक फूल, एक फल या थोड़ा-सा जल भी अर्पण करता है, शुद्ध मन से चढ़ाई हुई वह प्रेम-भरी भेंट हम सहर्ष ग्रहण कर लेते हैं। (गीता 9.26)

यहाँ महँगे उपहार की कोई माँग नहीं। श्रीकृष्ण को मात्रा नहीं चाहिए, भाव चाहिए। बगीचे में तोड़ा एक पत्ता भी, यदि प्रेम से दिया जाए, उन्हें उतना ही प्रिय है।

सबके लिए खुला द्वार

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥

हम सब प्राणियों के प्रति समान हैं, न कोई हमें द्वेष्य है, न कोई प्रिय। पर जो प्रेम से हमें भजते हैं, वे हम में हैं और हम उनमें। (गीता 9.29)

श्रीकृष्ण किसी का पक्ष नहीं लेते। उनका सूरज सब पर बराबर बरसता है। पर जो अपनी ओर से उन्हें चुन लेता है, उसके साथ वे भी आ खड़े होते हैं। यह रिश्ता दोनों ओर से बनता है।

श्रीकृष्ण एक और आश्वासन देते हैं जो किसी को बाहर नहीं छोड़ता। वे कहते हैं, यदि कोई बड़े से बड़ा दुराचारी भी अनन्य भाव से हमें भजने लगे, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने अपने मन का ठीक निश्चय कर लिया है। वह जल्दी ही धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति पाता है। यह वचन याद रखने योग्य है कि हमारा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

और फिर वे वह बात कहते हैं जो इस अध्याय को सबके लिए खोल देती है। वे कहते हैं, हमारी शरण में जो भी आए, वह हमें पा लेता है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, किसी भी कुल या स्थिति का हो। भक्ति की भाषा हर कोई बोल सकता है, इसमें ऊँच-नीच का कोई परदा नहीं। इसीलिए, हे अर्जुन, अपने मन को हम में लगाइए, हमारे भक्त बनिए, हमें प्रणाम कीजिए, और अपने-आप को हमें अर्पित कर दीजिए। जो ऐसा करता है, वह हमें ही पा जाता है।

यह सुनकर अर्जुन के चेहरे पर एक हल्की-सी राहत तैरती है। जिस परम तत्त्व को पाना अभी दुर्लभ लग रहा था, वह अचानक इतना पास आ गया है कि प्रेम से चढ़ाया एक पत्ता भी उस तक का पुल बन सकता है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 34 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/9/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

9.1इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे

श्रीभगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥1॥

idaṃ tu te guhyatamaṃ pravakṣyāmy anasūyave |
jñānaṃ vijñānasahitaṃ yaj jñātvā mokṣyase ’śubhāt

इदम्
यह
तु
परन्तु
ते
आपको
गुह्यतमम्
अत्यन्त गोपनीय
प्रवक्ष्यामि
मैं कहूँगा
अनसूयवे
दोषदृष्टि से रहित को
ज्ञानम्
ज्ञान
विज्ञानसहितम्
अनुभव सहित
यत्
जिसको
ज्ञात्वा
जानकर
मोक्ष्यसे
आप मुक्त हो जाएँगे
अशुभात्
अशुभ (संसार) से

अन्वय: अनसूयवे ते तु इदम् गुह्यतमम् विज्ञानसहितम् ज्ञानम् प्रवक्ष्यामि, यत् ज्ञात्वा अशुभात् मोक्ष्यसे।

दोषदृष्टि से रहित आपको मैं यह अत्यन्त गोपनीय, अनुभव सहित ज्ञान कहूँगा। इसे जानकर आप अशुभ संसार से मुक्त हो जाएँगे।

9.2राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥2॥

rājavidyā rājaguhyaṃ pavitram idam uttamam |
pratyakṣāvagamaṃ dharmyaṃ susukhaṃ kartum avyayam

राजविद्या
विद्याओं का राजा
राजगुह्यम्
गोपनीयों का राजा
पवित्रम्
पवित्र
इदम्
यह (ज्ञान)
उत्तमम्
उत्तम
प्रत्यक्षावगमम्
प्रत्यक्ष फल देने वाला
धर्म्यम्
धर्मयुक्त
सुसुखम्
बहुत सुगम
कर्तुम्
साधन करने में
अव्ययम्
अविनाशी

अन्वय: इदम् राजविद्या राजगुह्यम् उत्तमम् पवित्रम् प्रत्यक्षावगमम् धर्म्यम् कर्तुम् सुसुखम् अव्ययम् (च अस्ति)।

यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अत्यन्त पवित्र और उत्तम है। इसका फल प्रत्यक्ष है, यह धर्मयुक्त है, साधन करने में बहुत सुगम है और अविनाशी है।

9.3अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥3॥

aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya paraṃtapa |
aprāpya māṃ nivartante mṛtyusaṃsāravartmani

अश्रद्दधानाः
श्रद्धा न रखने वाले
पुरुषाः
पुरुष
धर्मस्य
धर्म में
अस्य
इस
परंतप
हे परंतप
अप्राप्य
न पाकर
माम्
मुझे
निवर्तन्ते
लौटते रहते हैं
मृत्युसंसारवर्त्मनि
मृत्युरूप संसार के मार्ग में

अन्वय: परंतप, अस्य धर्मस्य अश्रद्दधानाः पुरुषाः माम् अप्राप्य मृत्युसंसारवर्त्मनि निवर्तन्ते।

हे परंतप, इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले पुरुष मुझे न पाकर मृत्युरूप संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं।

9.4मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥4॥

mayā tatam idaṃ sarvaṃ jagad avyaktamūrtinā |
matsthāni sarvabhūtāni na cāhaṃ teṣv avasthitaḥ

मया
मुझसे
ततम्
व्याप्त है
इदम्
यह
सर्वम्
सारा
जगत्
जगत्
अव्यक्तमूर्तिना
अव्यक्त स्वरूप वाले
मत्स्थानि
मुझमें स्थित हैं
सर्वभूतानि
सब प्राणी
न
नहीं
च
और
अहम्
मैं
तेषु
उनमें
अवस्थितः
स्थित

अन्वय: अव्यक्तमूर्तिना मया इदम् सर्वम् जगत् ततम्। सर्वभूतानि मत्स्थानि, अहम् च तेषु न अवस्थितः।

अव्यक्त स्वरूप वाले मुझसे यह सारा जगत् व्याप्त है। सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, और मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

9.5न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥5॥

na ca matsthāni bhūtāni paśya me yogam aiśvaram |
bhūtabhṛn na ca bhūtastho mamātmā bhūtabhāvanaḥ

न
नहीं
च
और
मत्स्थानि
मुझमें स्थित
भूतानि
प्राणी
पश्य
देखिए
मे
मेरे
योगम्
योग को
ऐश्वरम्
ईश्वरीय
भूतभृत्
प्राणियों का धारण पोषण करने वाला
न
नहीं
च
और
भूतस्थः
प्राणियों में स्थित
मम
मेरा
आत्मा
स्वरूप
भूतभावनः
प्राणियों को उत्पन्न करने वाला

अन्वय: भूतानि च मत्स्थानि न। मे ऐश्वरम् योगम् पश्य। मम आत्मा भूतभृत् भूतभावनः च, भूतस्थः न।

और वे प्राणी भी मुझमें स्थित नहीं हैं, मेरे इस ईश्वरीय योग को देखिए। मेरा स्वरूप प्राणियों को धारण करने वाला और उन्हें उत्पन्न करने वाला है, और वह प्राणियों में स्थित नहीं है।

9.6यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥6॥

yathākāśasthito nityaṃ vāyuḥ sarvatrago mahān |
tathā sarvāṇi bhūtāni matsthānīty upadhāraya

यथा
जैसे
आकाशस्थितः
आकाश में स्थित
नित्यम्
सदा
वायुः
वायु
सर्वत्रगः
सब ओर जाने वाला
महान्
महान्
तथा
वैसे ही
सर्वाणि
सब
भूतानि
प्राणी
मत्स्थानि
मुझमें स्थित हैं
इति
ऐसा
उपधारय
जानिए

अन्वय: यथा सर्वत्रगः महान् वायुः नित्यम् आकाशस्थितः, तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानि इति उपधारय।

जैसे सब ओर विचरने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, ऐसा जानिए।

9.7सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥7॥

sarvabhūtāni kaunteya prakṛtiṃ yānti māmikām |
kalpakṣaye punas tāni kalpādau visṛjāmy aham

सर्वभूतानि
सब प्राणी
कौन्तेय
हे कौन्तेय
प्रकृतिम्
प्रकृति में
यान्ति
प्रवेश करते हैं
मामिकाम्
मेरी
कल्पक्षये
कल्प के अन्त में
पुनः
फिर
तानि
उनको
कल्पादौ
कल्प के आरम्भ में
विसृजामि
रचता हूँ
अहम्
मैं

अन्वय: कौन्तेय, कल्पक्षये सर्वभूतानि मामिकाम् प्रकृतिम् यान्ति। कल्पादौ पुनः अहम् तानि विसृजामि।

हे कौन्तेय, कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं। कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर रचता हूँ।

9.8प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥8॥

prakṛtiṃ svām avaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ |
bhūtagrāmam imaṃ kṛtsnam avaśaṃ prakṛter vaśāt

प्रकृतिम्
प्रकृति को
स्वाम्
अपनी
अवष्टभ्य
अंगीकार करके
विसृजामि
रचता हूँ
पुनः पुनः
बार बार
भूतग्रामम्
प्राणी समुदाय को
इमम्
इस
कृत्स्नम्
सम्पूर्ण
अवशम्
परवश
प्रकृतेः
प्रकृति के
वशात्
वश से

अन्वय: स्वाम् प्रकृतिम् अवष्टभ्य प्रकृतेः वशात् अवशम् इमम् कृत्स्नम् भूतग्रामम् पुनः पुनः विसृजामि।

अपनी प्रकृति को अंगीकार करके मैं इस सम्पूर्ण प्राणी समुदाय को बार बार रचता हूँ। यह समुदाय अपनी प्रकृति के वश में होने से परवश है।

9.9न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥9॥

na ca māṃ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanaṃjaya |
udāsīnavad āsīnam asaktaṃ teṣu karmasu

न
नहीं
च
और
माम्
मुझे
तानि
वे
कर्माणि
कर्म
निबध्नन्ति
बाँधते
धनंजय
हे धनंजय
उदासीनवत्
उदासीन के समान
आसीनम्
स्थित
असक्तम्
आसक्ति रहित
तेषु
उन
कर्मसु
कर्मों में

अन्वय: धनंजय, तेषु कर्मसु असक्तम् उदासीनवत् आसीनम् माम् तानि कर्माणि च न निबध्नन्ति।

हे धनंजय, उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के समान स्थित मुझे वे कर्म नहीं बाँधते।

9.10मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥10॥

mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ sūyate sacarācaram |
hetunānena kaunteya jagad viparivartate

मया
मुझ
अध्यक्षेण
अध्यक्ष के द्वारा
प्रकृतिः
प्रकृति
सूयते
रचती है
सचराचरम्
चर और अचर सहित (जगत् को)
हेतुना
कारण से
अनेन
इस
कौन्तेय
हे कौन्तेय
जगत्
जगत्
विपरिवर्तते
घूमता रहता है

अन्वय: कौन्तेय, अध्यक्षेण मया प्रकृतिः सचराचरम् (जगत्) सूयते। अनेन हेतुना जगत् विपरिवर्तते।

हे कौन्तेय, मुझ अध्यक्ष की अध्यक्षता में प्रकृति चर और अचर सहित सारे जगत् को रचती है। इसी कारण यह जगत् घूमता रहता है।

9.11अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥11॥

avajānanti māṃ mūḍhā mānuṣīṃ tanum āśritam |
paraṃ bhāvam ajānanto mama bhūtamaheśvaram

अवजानन्ति
अवज्ञा करते हैं
माम्
मेरी
मूढाः
मूढ़ लोग
मानुषीम्
मनुष्य की
तनुम्
देह को
आश्रितम्
धारण किए हुए
परम्
परम
भावम्
भाव को
अजानन्तः
न जानते हुए
मम
मेरे
भूतमहेश्वरम्
सब प्राणियों के महान् ईश्वर

अन्वय: मूढाः मम भूतमहेश्वरम् परम् भावम् अजानन्तः मानुषीम् तनुम् आश्रितम् माम् अवजानन्ति।

मूढ़ लोग मेरे उस परम भाव को नहीं जानते, जो सब प्राणियों का महान् ईश्वर है। इसीलिए वे मनुष्य की देह धारण किए हुए मेरी अवज्ञा करते हैं।

9.12मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥12॥

moghāśā moghakarmāṇo moghajñānā vicetasaḥ |
rākṣasīm āsurīṃ caiva prakṛtiṃ mohinīṃ śritāḥ

मोघाशाः
व्यर्थ आशा वाले
मोघकर्माणः
व्यर्थ कर्म वाले
मोघज्ञानाः
व्यर्थ ज्ञान वाले
विचेतसः
विक्षिप्त चित्त वाले
राक्षसीम्
राक्षसी
आसुरीम्
आसुरी
च
और
एव
ही
प्रकृतिम्
प्रकृति (स्वभाव) को
मोहिनीम्
मोह में डालने वाली
श्रिताः
आश्रित (धारण किए हुए)

अन्वय: (ते) विचेतसः मोघाशाः मोघकर्माणः मोघज्ञानाः राक्षसीम् आसुरीम् च एव मोहिनीम् प्रकृतिम् श्रिताः।

विक्षिप्त चित्त वाले वे लोग व्यर्थ आशा वाले, व्यर्थ कर्म वाले और व्यर्थ ज्ञान वाले होते हैं। वे मोह में डालने वाली राक्षसी और आसुरी प्रकृति के ही आश्रित रहते हैं।

9.13महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥13॥

mahātmānas tu māṃ pārtha daivīṃ prakṛtim āśritāḥ |
bhajanty ananyamanaso jñātvā bhūtādim avyayam

महात्मानः
महात्मा लोग
तु
परन्तु
माम्
मुझे
पार्थ
हे पार्थ
दैवीम्
दैवी
प्रकृतिम्
प्रकृति के
आश्रिताः
आश्रित
भजन्ति
भजते हैं
अनन्यमनसः
अनन्य मन वाले
ज्ञात्वा
जानकर
भूतादिम्
प्राणियों का आदि कारण
अव्ययम्
अविनाशी

अन्वय: पार्थ, दैवीम् प्रकृतिम् आश्रिताः अनन्यमनसः महात्मानः तु माम् भूतादिम् अव्ययम् ज्ञात्वा भजन्ति।

हे पार्थ, दैवी प्रकृति के आश्रित अनन्य मन वाले महात्मा लोग मुझे सब प्राणियों का आदि कारण और अविनाशी जानकर भजते हैं।

9.14सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥14॥

satataṃ kīrtayanto māṃ yatantaś ca dṛḍhavratāḥ |
namasyantaś ca māṃ bhaktyā nityayuktā upāsate

सततम्
निरन्तर
कीर्तयन्तः
कीर्तन करते हुए
माम्
मेरा
यतन्तः
यत्न करते हुए
च
और
दृढव्रताः
दृढ़ व्रत वाले
नमस्यन्तः
नमस्कार करते हुए
च
और
माम्
मुझे
भक्त्या
भक्ति से
नित्ययुक्ताः
नित्य युक्त
उपासते
उपासना करते हैं

अन्वय: दृढव्रताः नित्ययुक्ताः (ते) सततम् माम् कीर्तयन्तः यतन्तः च भक्त्या माम् नमस्यन्तः च उपासते।

दृढ़ व्रत वाले और नित्य युक्त वे भक्त निरन्तर मेरा कीर्तन करते हुए, यत्न करते हुए और भक्ति से मुझे नमस्कार करते हुए मेरी उपासना करते हैं।

9.15ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥15॥

jñānayajñena cāpy anye yajanto mām upāsate |
ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvatomukham

ज्ञानयज्ञेन
ज्ञानयज्ञ से
च
और
अपि
भी
अन्ये
दूसरे लोग
यजन्तः
पूजन करते हुए
माम्
मेरी
उपासते
उपासना करते हैं
एकत्वेन
एकत्व भाव से
पृथक्त्वेन
पृथक् भाव से
बहुधा
बहुत प्रकार से
विश्वतोमुखम्
सब ओर मुख वाले मुझको

अन्वय: अन्ये च अपि ज्ञानयज्ञेन यजन्तः एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् माम् उपासते।

और दूसरे लोग ज्ञानयज्ञ से पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं। कोई एकत्व भाव से, कोई पृथक् भाव से और कोई बहुत प्रकार से सब ओर मुख वाले मुझको उपासते हैं।

9.16अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥16॥

ahaṃ kratur ahaṃ yajñaḥ svadhāham aham auṣadham |
mantro ’ham aham evājyam aham agnir ahaṃ hutam

अहम्
मैं
क्रतुः
क्रतु (श्रौत यज्ञ)
अहम्
मैं
यज्ञः
यज्ञ (स्मार्त यज्ञ)
स्वधा
स्वधा (पितरों का अन्न)
अहम्
मैं
अहम्
मैं
औषधम्
औषधि (अन्न)
मन्त्रः
मन्त्र
अहम्
मैं
अहम्
मैं
एव
ही
आज्यम्
घृत
अहम्
मैं
अग्निः
अग्नि
अहम्
मैं
हुतम्
हवन कर्म

अन्वय: अहम् क्रतुः, अहम् यज्ञः, अहम् स्वधा, अहम् औषधम्, अहम् मन्त्रः, अहम् एव आज्यम्, अहम् अग्निः, अहम् हुतम्।

क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ। मन्त्र मैं हूँ, घृत भी मैं ही हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवन कर्म भी मैं हूँ।

9.17पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥17॥

pitāham asya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ |
vedyaṃ pavitram oṃkāra ṛk sāma yajur eva ca

पिता
पिता
अहम्
मैं
अस्य
इस
जगतः
जगत् का
माता
माता
धाता
धारण पोषण करने वाला
पितामहः
पितामह
वेद्यम्
जानने योग्य
पवित्रम्
पवित्र
ओंकारः
ओंकार
ऋक्
ऋग्वेद
साम
सामवेद
यजुः
यजुर्वेद
एव
भी
च
और

अन्वय: अहम् अस्य जगतः पिता माता धाता पितामहः (च अस्मि)। (अहम्) वेद्यम् पवित्रम् ओंकारः ऋक् साम यजुः च एव।

इस जगत् का पिता, माता, धारण पोषण करने वाला और पितामह मैं हूँ। जानने योग्य, पवित्र ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।

9.18गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥18॥

gatir bhartā prabhuḥ sākṣī nivāsaḥ śaraṇaṃ suhṛt |
prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṃ nidhānaṃ bījam avyayam

गतिः
प्राप्त करने योग्य परम धाम
भर्ता
भरण पोषण करने वाला
प्रभुः
स्वामी
साक्षी
साक्षी
निवासः
निवास
शरणम्
शरण
सुहृत्
निःस्वार्थ हितकारी
प्रभवः
उत्पत्ति
प्रलयः
प्रलय
स्थानम्
आधार
निधानम्
निधान (लय स्थान)
बीजम्
बीज
अव्ययम्
अविनाशी

अन्वय: (अहम्) गतिः भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणम् सुहृत् प्रभवः प्रलयः स्थानम् निधानम् अव्ययम् बीजम् (च अस्मि)।

प्राप्त करने योग्य परम धाम, भरण पोषण करने वाला, स्वामी, साक्षी, निवास, शरण और निःस्वार्थ हितकारी मैं हूँ। उत्पत्ति, प्रलय, आधार, निधान और अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।

9.19तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥19॥

tapāmy aham ahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmy utsṛjāmi ca |
amṛtaṃ caiva mṛtyuś ca sad asac cāham arjuna

तपामि
तपता हूँ (सूर्यरूप से)
अहम्
मैं
अहम्
मैं
वर्षम्
वर्षा को
निगृह्णामि
रोकता हूँ
उत्सृजामि
बरसाता हूँ
च
और
अमृतम्
अमृत
च
और
एव
ही
मृत्युः
मृत्यु
च
और
सत्
सत्
असत्
असत्
च
और
अहम्
मैं
अर्जुन
हे अर्जुन

अन्वय: अर्जुन, अहम् तपामि, अहम् वर्षम् निगृह्णामि उत्सृजामि च। अमृतम् च एव मृत्युः च सत् असत् च अहम् (एव अस्मि)।

हे अर्जुन, मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, मैं ही वर्षा को रोकता हूँ और बरसाता हूँ। अमृत और मृत्यु, सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

9.20त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥20॥

traividyā māṃ somapāḥ pūtapāpā yajñair iṣṭvā svargatiṃ prārthayante |
te puṇyam āsādya surendralokam aśnanti divyān divi devabhogān

त्रैविद्याः
तीनों वेदों को जानने वाले
माम्
मेरा
सोमपाः
सोमरस पीने वाले
पूतपापाः
पापों से शुद्ध हुए
यज्ञैः
यज्ञों द्वारा
इष्ट्वा
पूजन करके
स्वर्गतिम्
स्वर्ग की प्राप्ति
प्रार्थयन्ते
चाहते हैं
ते
वे
पुण्यम्
पुण्य फल रूप
आसाद्य
पाकर
सुरेन्द्रलोकम्
इन्द्रलोक को
अश्नन्ति
भोगते हैं
दिव्यान्
दिव्य
दिवि
स्वर्ग में
देवभोगान्
देवताओं के भोगों को

अन्वय: त्रैविद्याः सोमपाः पूतपापाः यज्ञैः माम् इष्ट्वा स्वर्गतिम् प्रार्थयन्ते। ते पुण्यम् सुरेन्द्रलोकम् आसाद्य दिवि दिव्यान् देवभोगान् अश्नन्ति।

तीनों वेदों को जानने वाले, सोमरस पीने वाले और पापों से शुद्ध हुए लोग यज्ञों द्वारा मेरा पूजन करके स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं। वे पुण्य फल रूप इन्द्रलोक को पाकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोगों को भोगते हैं।

9.21ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥21॥

te taṃ bhuktvā svargalokaṃ viśālaṃ kṣīṇe puṇye martyalokaṃ viśanti |
evaṃ trayīdharmam anuprapannā gatāgataṃ kāmakāmā labhante

ते
वे
तम्
उस
भुक्त्वा
भोगकर
स्वर्गलोकम्
स्वर्गलोक को
विशालम्
विशाल
क्षीणे
क्षीण होने पर
पुण्ये
पुण्य
मर्त्यलोकम्
मृत्युलोक में
विशन्ति
प्रवेश करते हैं
एवम्
इस प्रकार
त्रयीधर्मम्
तीनों वेदों के धर्म का
अनुप्रपन्नाः
आश्रय लेने वाले
गतागतम्
आना जाना
कामकामाः
भोगों की कामना वाले
लभन्ते
पाते हैं

अन्वय: ते तम् विशालम् स्वर्गलोकम् भुक्त्वा पुण्ये क्षीणे मर्त्यलोकम् विशन्ति। एवम् त्रयीधर्मम् अनुप्रपन्नाः कामकामाः गतागतम् लभन्ते।

वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों के धर्म का आश्रय लेने वाले, भोगों की कामना वाले लोग बार बार आना जाना पाते हैं।

9.22अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥22॥

ananyāś cintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate |
teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yogakṣemaṃ vahāmy aham

अनन्याः
अनन्य भाव वाले
चिन्तयन्तः
चिन्तन करते हुए
माम्
मेरा
ये
जो
जनाः
लोग
पर्युपासते
सब प्रकार से उपासना करते हैं
तेषाम्
उन
नित्याभियुक्तानाम्
नित्य मुझमें लगे हुओं का
योगक्षेमम्
योग और क्षेम (प्राप्ति और रक्षा)
वहामि
वहन करता हूँ
अहम्
मैं

अन्वय: ये अनन्याः जनाः माम् चिन्तयन्तः पर्युपासते, तेषाम् नित्याभियुक्तानाम् योगक्षेमम् अहम् वहामि।

जो अनन्य भाव वाले लोग मेरा चिन्तन करते हुए सब प्रकार से मेरी उपासना करते हैं, नित्य मुझमें लगे हुए उन लोगों का योग और क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।

9.23येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥23॥

ye ’py anyadevatā bhaktā yajante śraddhayānvitāḥ |
te ’pi mām eva kaunteya yajanty avidhipūrvakam

ये
जो
अपि
भी
अन्यदेवताः
अन्य देवताओं को
भक्ताः
भक्त
यजन्ते
पूजते हैं
श्रद्धया
श्रद्धा से
अन्विताः
युक्त
ते
वे
अपि
भी
माम्
मुझे
एव
ही
कौन्तेय
हे कौन्तेय
यजन्ति
पूजते हैं
अविधिपूर्वकम्
विधि के बिना

अन्वय: कौन्तेय, ये अपि श्रद्धया अन्विताः भक्ताः अन्यदेवताः यजन्ते, ते अपि माम् एव अविधिपूर्वकम् यजन्ति।

हे कौन्तेय, जो भक्त श्रद्धा से युक्त होकर अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, यद्यपि विधि के बिना।

9.24अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥24॥

ahaṃ hi sarvayajñānāṃ bhoktā ca prabhur eva ca |
na tu mām abhijānanti tattvenātaś cyavanti te

अहम्
मैं
हि
क्योंकि
सर्वयज्ञानाम्
सब यज्ञों का
भोक्ता
भोक्ता
च
और
प्रभुः
स्वामी
एव
ही
च
और
न
नहीं
तु
परन्तु
माम्
मुझे
अभिजानन्ति
जानते
तत्त्वेन
तत्त्व से
अतः
इसलिए
च्यवन्ति
गिरते हैं (पुनर्जन्म पाते हैं)
ते
वे

अन्वय: हि अहम् एव सर्वयज्ञानाम् भोक्ता च प्रभुः च। तु ते माम् तत्त्वेन न अभिजानन्ति, अतः च्यवन्ति।

क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ। परन्तु वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए वे गिरते हैं।

9.25यान्ति देवव्रता देवान्पितॢन्यान्ति पितृव्रताः

यान्ति देवव्रता देवान्पितॢन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥25॥

yānti devavratā devān pitḷn yānti pitṛvratāḥ |
bhūtāni yānti bhūtejyā yānti madyājino ’pi mām

यान्ति
जाते हैं
देवव्रताः
देवताओं के व्रत वाले
देवान्
देवताओं को
पितॢन्
पितरों को
यान्ति
जाते हैं
पितृव्रताः
पितरों के व्रत वाले
भूतानि
भूतों को
यान्ति
जाते हैं
भूतेज्याः
भूतों को पूजने वाले
यान्ति
जाते हैं
मद्याजिनः
मेरा पूजन करने वाले
अपि
भी
माम्
मुझे

अन्वय: देवव्रताः देवान् यान्ति, पितृव्रताः पितॢन् यान्ति, भूतेज्याः भूतानि यान्ति, मद्याजिनः अपि माम् यान्ति।

देवताओं का व्रत रखने वाले देवताओं को पाते हैं, पितरों का व्रत रखने वाले पितरों को पाते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को पाते हैं। और मेरा पूजन करने वाले मुझे ही पाते हैं।

9.26पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥26॥

patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati |
tad ahaṃ bhaktyupahṛtam aśnāmi prayatātmanaḥ

पत्रम्
पत्र
पुष्पम्
पुष्प
फलम्
फल
तोयम्
जल
यः
जो
मे
मुझे
भक्त्या
भक्ति से
प्रयच्छति
अर्पण करता है
तत्
उस
अहम्
मैं
भक्त्युपहृतम्
भक्ति से अर्पित को
अश्नामि
ग्रहण करता हूँ
प्रयतात्मनः
शुद्ध चित्त वाले का

अन्वय: यः मे भक्त्या पत्रम् पुष्पम् फलम् तोयम् प्रयच्छति, (तस्य) प्रयतात्मनः तत् भक्त्युपहृतम् अहम् अश्नामि।

जो शुद्ध चित्त वाला भक्त मुझे भक्ति से पत्र, पुष्प, फल, जल अर्पण करता है, उस भक्ति से अर्पित को मैं ग्रहण करता हूँ।

9.27यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥27॥

yat karoṣi yad aśnāsi yaj juhoṣi dadāsi yat |
yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣva madarpaṇam

यत्
जो
करोषि
आप करते हैं
यत्
जो
अश्नासि
आप खाते हैं
यत्
जो
जुहोषि
आप हवन करते हैं
ददासि
आप दान देते हैं
यत्
जो
यत्
जो
तपस्यसि
आप तप करते हैं
कौन्तेय
हे कौन्तेय
तत्
वह
कुरुष्व
कीजिए
मदर्पणम्
मुझे अर्पण

अन्वय: कौन्तेय, यत् करोषि, यत् अश्नासि, यत् जुहोषि, यत् ददासि, यत् तपस्यसि, तत् मदर्पणम् कुरुष्व।

हे कौन्तेय, आप जो करते हैं, जो खाते हैं, जो हवन करते हैं, जो दान देते हैं और जो तप करते हैं, वह सब मुझे अर्पण कीजिए।

9.28शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥28॥

śubhāśubhaphalair evaṃ mokṣyase karmabandhanaiḥ |
saṃnyāsayogayuktātmā vimukto mām upaiṣyasi

शुभाशुभफलैः
शुभ और अशुभ फल वाले
एवम्
इस प्रकार
मोक्ष्यसे
आप मुक्त हो जाएँगे
कर्मबन्धनैः
कर्मबन्धनों से
संन्यासयोगयुक्तात्मा
संन्यासयोग से युक्त चित्त वाले
विमुक्तः
मुक्त होकर
माम्
मुझे
उपैष्यसि
आप प्राप्त होंगे

अन्वय: एवम् शुभाशुभफलैः कर्मबन्धनैः मोक्ष्यसे। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तः माम् उपैष्यसि।

इस प्रकार आप शुभ और अशुभ फल वाले कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाएँगे। संन्यासयोग से युक्त चित्त वाले आप मुक्त होकर मुझे प्राप्त होंगे।

9.29समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥29॥

samo ’haṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo ’sti na priyaḥ |
ye bhajanti tu māṃ bhaktyā mayi te teṣu cāpy aham

समः
समान
अहम्
मैं
सर्वभूतेषु
सब प्राणियों में
न
नहीं
मे
मेरा
द्वेष्यः
द्वेष का पात्र
अस्ति
है
न
नहीं
प्रियः
प्रिय
ये
जो
भजन्ति
भजते हैं
तु
परन्तु
माम्
मुझे
भक्त्या
भक्ति से
मयि
मुझमें
ते
वे
तेषु
उनमें
च
और
अपि
भी
अहम्
मैं

अन्वय: अहम् सर्वभूतेषु समः। मे द्वेष्यः न अस्ति, प्रियः न (अस्ति)। तु ये माम् भक्त्या भजन्ति, ते मयि (सन्ति), अहम् च अपि तेषु (अस्मि)।

मैं सब प्राणियों में समान हूँ, मेरा कोई द्वेष का पात्र नहीं है और कोई प्रिय भी नहीं है। परन्तु जो मुझे भक्ति से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।

9.30अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥30॥

api cet sudurācāro bhajate mām ananyabhāk |
sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ

अपि
भी
चेत्
यदि
सुदुराचारः
अत्यन्त दुराचारी
भजते
भजता है
माम्
मुझे
अनन्यभाक्
अनन्य भाव से
साधुः
साधु
एव
ही
सः
वह
मन्तव्यः
मानने योग्य है
सम्यक्
ठीक
व्यवसितः
निश्चय वाला
हि
क्योंकि
सः
वह

अन्वय: सुदुराचारः अपि चेत् अनन्यभाक् माम् भजते, सः साधुः एव मन्तव्यः, हि सः सम्यक् व्यवसितः।

यदि अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है। क्योंकि उसने ठीक निश्चय कर लिया है।

9.31क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥31॥

kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati |
kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati

क्षिप्रम्
शीघ्र ही
भवति
हो जाता है
धर्मात्मा
धर्मात्मा
शश्वत्
सदा रहने वाली
शान्तिम्
शान्ति को
निगच्छति
प्राप्त करता है
कौन्तेय
हे कौन्तेय
प्रतिजानीहि
निश्चय जानिए
न
नहीं
मे
मेरा
भक्तः
भक्त
प्रणश्यति
नष्ट होता

अन्वय: (सः) क्षिप्रम् धर्मात्मा भवति, शश्वत् शान्तिम् निगच्छति। कौन्तेय, प्रतिजानीहि, मे भक्तः न प्रणश्यति।

वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली शान्ति को प्राप्त करता है। हे कौन्तेय, निश्चय जानिए कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।

9.32मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥32॥

māṃ hi pārtha vyapāśritya ye ’pi syuḥ pāpayonayaḥ |
striyo vaiśyās tathā śūdrās te ’pi yānti parāṃ gatim

माम्
मेरा
हि
क्योंकि
पार्थ
हे पार्थ
व्यपाश्रित्य
आश्रय लेकर
ये
जो
अपि
भी
स्युः
हों
पापयोनयः
पाप योनि वाले
स्त्रियः
स्त्रियाँ
वैश्याः
वैश्य
तथा
तथा
शूद्राः
शूद्र
ते
वे
अपि
भी
यान्ति
प्राप्त होते हैं
पराम्
परम
गतिम्
गति को

अन्वय: पार्थ, हि ये अपि पापयोनयः स्युः, स्त्रियः वैश्याः तथा शूद्राः, ते अपि माम् व्यपाश्रित्य पराम् गतिम् यान्ति।

हे पार्थ, जो पाप योनि वाले भी हों, और स्त्रियाँ, वैश्य तथा शूद्र भी, वे सब मेरा आश्रय लेकर परम गति को प्राप्त होते हैं।

9.33किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥33॥

kiṃ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayas tathā |
anityam asukhaṃ lokam imaṃ prāpya bhajasva mām

किम्
क्या
पुनः
फिर (कहना)
ब्राह्मणाः
ब्राह्मण
पुण्याः
पुण्यशील
भक्ताः
भक्त
राजर्षयः
राजर्षि
तथा
तथा
अनित्यम्
अनित्य
असुखम्
सुखरहित
लोकम्
लोक को
इमम्
इस
प्राप्य
पाकर
भजस्व
भजिए
माम्
मुझे

अन्वय: पुनः पुण्याः ब्राह्मणाः तथा भक्ताः राजर्षयः किम् (वक्तव्यम्)। इमम् अनित्यम् असुखम् लोकम् प्राप्य माम् भजस्व।

फिर पुण्यशील ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों के विषय में तो कहना ही क्या। इस अनित्य और सुखरहित लोक को पाकर आप मुझे भजिए।

9.34मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥34॥

manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru |
mām evaiṣyasi yuktvaivam ātmānaṃ matparāyaṇaḥ

मन्मनाः
मुझमें मन वाले
भव
होइए
मद्भक्तः
मेरे भक्त
मद्याजी
मेरा पूजन करने वाले
माम्
मुझे
नमस्कुरु
नमस्कार कीजिए
माम्
मुझे
एव
ही
एष्यसि
आप प्राप्त होंगे
युक्त्वा
युक्त करके
एवम्
इस प्रकार
आत्मानम्
अपने को
मत्परायणः
मेरे परायण

अन्वय: मन्मनाः मद्भक्तः मद्याजी भव, माम् नमस्कुरु। एवम् मत्परायणः आत्मानम् युक्त्वा माम् एव एष्यसि।

मुझमें मन वाले, मेरे भक्त और मेरा पूजन करने वाले होइए, मुझे नमस्कार कीजिए। इस प्रकार मेरे परायण होकर अपने को मुझमें युक्त करके आप मुझे ही प्राप्त होंगे।