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अध्याय 7: ज्ञान-विज्ञान योग

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अध्याय 7: ज्ञान-विज्ञान योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 7: ज्ञान-विज्ञान योग

सार: यहाँ से गीता का स्वर बदलता है। अब तक कर्म और ज्ञान की बात थी, अब श्रीकृष्ण अपना असली परिचय खोलते हैं। वे कहते हैं कि सारी सृष्टि उन्हीं में पिरोई हुई है, जैसे धागे में मणियाँ, और उन्हें पूरी तरह पहचानने वाला हज़ारों में कोई एक ही निकलता है।

दोनों सेनाओं के बीच रथ अब भी खड़ा है। शंख शान्त हैं, धूल थमी हुई है, और अर्जुन का मन उस बात पर टिका है जो सारथी के वेश में खड़े सखा ने अभी कही थी। श्रीकृष्ण अर्जुन की ओर देखते हैं और अपनी वाणी को थोड़ा और गहरा कर लेते हैं, मानो अब वे कोई ऐसी बात कहने जा रहे हों जो अब तक परदे के पीछे रही।

वे कहते हैं, हे पार्थ, अब हम आपको वह ज्ञान देते हैं जिसके साथ विज्ञान भी जुड़ा है। ज्ञान यानी हमारे स्वरूप को जान लेना, और विज्ञान यानी उस जानने को अपने अनुभव में उतार लेना। यह दोनों जिसके भीतर एक हो जाएँ, उसके लिए फिर कुछ जानना बाकी नहीं रहता। और वे यह भी जोड़ देते हैं कि यह ज्ञान कहीं परदे में बंद नहीं है, यह तो सबके सामने खुला पड़ा है, पर इसे सचमुच जी लेने वाले बिरले ही निकलते हैं।

दो प्रकृतियाँ

श्रीकृष्ण अपनी बात एक सीधे चित्र से शुरू करते हैं। वे कहते हैं, हमारी दो प्रकृतियाँ हैं। एक नीची है, जिसे अपरा कहते हैं। इसी के आठ रूप हैं, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, और फिर मन, बुद्धि तथा अहंकार। यही वह जड़ पदार्थ है जिससे यह सारा दृश्य जगत बना है। दूसरी प्रकृति ऊँची है, परा, और वह है वह चेतन जीव-तत्त्व जो इस सारी सृष्टि को धारण किए हुए है। इन्हीं दोनों के मेल से सब प्राणी जन्म लेते हैं, और इन्हीं में सब लौट जाते हैं।

फिर वे एक बड़ी बात कहते हैं, जो पूरे अध्याय की रीढ़ है। हे धनंजय, हमसे परे कुछ भी नहीं। यह सारा जगत हम में उसी तरह पिरोया हुआ है, जैसे धागे में मणियाँ।

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥

हे धनंजय, हमसे बढ़कर और कुछ नहीं। यह सब कुछ हम में इस तरह गुँथा है, जैसे एक धागे में बहुत सारी मणियाँ। (गीता 7.7)

अर्जुन इस चित्र को समझते हैं। माला में मणियाँ अलग-अलग दिखती हैं, अपने-अपने रंग और रूप में, पर भीतर से उन्हें एक ही धागा पकड़े रहता है। वैसे ही संसार के अनगिनत रूप ऊपर से भिन्न लगते हैं, पर उन सबके भीतर एक ही तत्त्व बहता है।

हर चीज़ का सार

अब श्रीकृष्ण उस धागे को पहचानने का सरल रास्ता बताते हैं। वे कहते हैं, हे पार्थ, हमें कहीं दूर मत खोजिए, हमें हर चीज़ के सार में देखिए। हम जल का स्वाद हैं, हम सूरज और चाँद की चमक हैं, हम वेदों में गूँजता वह पवित्र अक्षर ॐ हैं, हम आकाश में शब्द हैं और मनुष्यों में उनका पौरुष। हम अग्नि का तेज हैं, हर प्राणी का जीवन हैं, तपस्वियों का तप हैं। और जो कुछ भी बीज है, हर अस्तित्व का मूल बीज हम ही हैं।

वे यह भी कहते हैं कि जो कुछ सत्त्व, रज और तम के भाव संसार में उठते हैं, वे सब हम से ही निकलते हैं, पर हम उनमें बँधे नहीं। जैसे सूरज पानी में झलकता है पर भीगता नहीं, वैसे ही हम इस सारी सृष्टि में हैं और फिर भी इससे परे हैं।

श्रीकृष्ण एक कटु सच्चाई भी सामने रखते हैं। वे कहते हैं, बहुत से लोगों का विवेक तरह-तरह की इच्छाओं ने चुरा लिया है, इसलिए वे छोटे-छोटे लक्ष्यों के पीछे भागते हैं और दूसरे-दूसरे रूपों को पूजते रहते हैं। फिर भी, जो श्रद्धा से किसी भी रूप की पूजा करता है, उसकी उस श्रद्धा को भी हम ही थाम कर दृढ़ कर देते हैं, क्योंकि हर सच्ची पूजा घूम-फिरकर हम तक ही पहुँचती है। भेद बस इतना है कि छोटे लक्ष्य वाले को छोटा फल मिलता है, और जो सीधे हमारी ओर आता है, वह हमें ही पा लेता है।

माया की चादर

तो फिर लोग इस सीधी बात को क्यों नहीं देख पाते? श्रीकृष्ण इसका कारण बताते हैं। वे कहते हैं, हमारी यह तीन गुणों वाली माया बड़ी कठिन है, इसे पार करना सहज नहीं। यही माया एक चादर की तरह लोगों की आँखों पर पड़ी रहती है, और वे रूपों को तो देखते हैं पर उनके पीछे के तत्त्व को चूक जाते हैं। पर जो हमारी शरण में आ जाता है, वह इस माया के पार निकल जाता है।

फिर वे बताते हैं कि उन तक आने वाले लोग कैसे-कैसे होते हैं।

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥

हे भरतश्रेष्ठ, चार तरह के पुण्यात्मा हमें भजते हैं, दुख में डूबा आर्त, जानने को आतुर जिज्ञासु, किसी वस्तु का इच्छुक अर्थार्थी, और वह ज्ञानी जो केवल हमें चाहता है। (गीता 7.16)

श्रीकृष्ण किसी को लौटाते नहीं। कोई पीड़ा लेकर आए, कोई प्रश्न लेकर, कोई ज़रूरत लेकर, या कोई केवल प्रेम लेकर, चारों दरवाज़े उन्हीं तक पहुँचते हैं। इन सब में वे ज्ञानी को अपने सबसे निकट मानते हैं, क्योंकि वह किसी और चीज़ के लिए नहीं, केवल उनके लिए आता है।

हज़ारों में एक

पर यहीं श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहते हैं जो अर्जुन को ठिठका देती है। वे कहते हैं, हज़ारों मनुष्यों में कोई एक हमें पाने का यत्न करता है, और उन यत्न करने वालों में भी कोई एक ही हमें सचमुच जान पाता है। यह जान लेना कि सब कुछ के भीतर एक ही है, इतना सहज नहीं। इसके लिए कई-कई जन्मों की यात्रा लग जाती है।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥

बहुत जन्मों के अंत में वह ज्ञानी हमारी शरण में आता है, यह जानकर कि वासुदेव ही सब कुछ हैं। ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ है। (गीता 7.19)

बहुत रास्ते चलकर, बहुत रूप देखकर, अंत में उसे यह भेद खुलता है कि जिसे वह जगह-जगह अलग-अलग खोजता रहा, वह तो हर जगह एक ही था।

इतना कहकर श्रीकृष्ण एक क्षण रुकते हैं। अर्जुन के भीतर अब वह प्रश्न उठने लगा है कि अंत समय में, जब देह छूट रही हो, इस एक को याद कैसे रखा जाए। रथ अब भी वहीं खड़ा है, पर अर्जुन की दृष्टि थोड़ी और भीतर मुड़ चुकी है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 30 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/7/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

7.1मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः

श्रीभगवानुवाच

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥1॥

mayy āsaktamanāḥ pārtha yogaṃ yuñjan madāśrayaḥ |
asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tac chṛṇu

मयि
मुझमें
आसक्तमनाः
आसक्त मन वाले
पार्थ
हे पार्थ
योगम्
योग को
युञ्जन्
अभ्यास करते हुए
मदाश्रयः
मेरे आश्रित
असंशयम्
संशयरहित
समग्रम्
समग्र रूप से
माम्
मुझे
यथा
जिस प्रकार
ज्ञास्यसि
आप जानेंगे
तत्
वह
शृणु
सुनिए

अन्वय: पार्थ, मयि आसक्तमनाः मदाश्रयः योगम् युञ्जन् (त्वम्) यथा माम् असंशयम् समग्रम् ज्ञास्यसि, तत् शृणु।

हे पार्थ, मुझमें आसक्त मन वाले और मेरे आश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए आप जिस प्रकार मुझे संशयरहित और समग्र रूप से जानेंगे, वह सुनिए।

7.2ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥2॥

jñānaṃ te ’haṃ savijñānam idaṃ vakṣyāmy aśeṣataḥ |
yaj jñātvā neha bhūyo ’nyaj jñātavyam avaśiṣyate

ज्ञानम्
ज्ञान
ते
आपको
अहम्
मैं
सविज्ञानम्
विज्ञान सहित
इदम्
यह
वक्ष्यामि
कहूँगा
अशेषतः
पूर्ण रूप से
यत्
जिसे
ज्ञात्वा
जानकर
न
नहीं
इह
इस लोक में
भूयः
फिर
अन्यत्
और कुछ
ज्ञातव्यम्
जानने योग्य
अवशिष्यते
शेष रहता है

अन्वय: अहम् ते इदम् सविज्ञानम् ज्ञानम् अशेषतः वक्ष्यामि, यत् ज्ञात्वा इह भूयः अन्यत् ज्ञातव्यम् न अवशिष्यते।

मैं आपको विज्ञान सहित यह ज्ञान पूर्ण रूप से कहूँगा, जिसे जानकर इस लोक में फिर और कुछ जानने योग्य शेष नहीं रहता।

7.3मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥3॥

manuṣyāṇāṃ sahasreṣu kaś cid yatati siddhaye |
yatatām api siddhānāṃ kaś cin māṃ vetti tattvataḥ

मनुष्याणाम्
मनुष्यों के
सहस्रेषु
हजारों में
कश्चित्
कोई एक
यतति
प्रयत्न करता है
सिद्धये
सिद्धि के लिए
यतताम्
प्रयत्न करने वाले
अपि
भी
सिद्धानाम्
सिद्धों में
कश्चित्
कोई एक
माम्
मुझे
वेत्ति
जानता है
तत्त्वतः
यथार्थ रूप से

अन्वय: मनुष्याणाम् सहस्रेषु कश्चित् सिद्धये यतति; यतताम् सिद्धानाम् अपि कश्चित् माम् तत्त्वतः वेत्ति।

हजारों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है। उन प्रयत्न करने वाले सिद्धों में भी कोई एक मुझे यथार्थ रूप से जानता है।

7.4भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥4॥

bhūmir āpo ’nalo vāyuḥ khaṃ mano buddhir eva ca |
ahaṃkāra itīyaṃ me bhinnā prakṛtir aṣṭadhā

भूमिः
पृथ्वी
आपः
जल
अनलः
अग्नि
वायुः
वायु
खम्
आकाश
मनः
मन
बुद्धिः
बुद्धि
एव
ही
च
और
अहंकारः
अहंकार
इति
इस प्रकार
इयम्
यह
मे
मेरी
भिन्ना
विभक्त
प्रकृतिः
प्रकृति
अष्टधा
आठ प्रकार की

अन्वय: भूमिः आपः अनलः वायुः खम् मनः बुद्धिः च अहंकारः एव इति इयम् मे प्रकृतिः अष्टधा भिन्ना।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार, इस प्रकार यह मेरी प्रकृति आठ प्रकार से विभक्त है।

7.5अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥5॥

apareyam itas tv anyāṃ prakṛtiṃ viddhi me parām |
jīvabhūtāṃ mahābāho yayedaṃ dhāryate jagat

अपरा
निम्न (अपरा)
इयम्
यह
इतः
इससे
तु
परन्तु
अन्याम्
दूसरी
प्रकृतिम्
प्रकृति को
विद्धि
जानिए
मे
मेरी
पराम्
श्रेष्ठ (परा)
जीवभूताम्
जीवरूप
महाबाहो
हे महाबाहो
यया
जिससे
इदम्
यह
धार्यते
धारण किया जाता है
जगत्
जगत्

अन्वय: महाबाहो, इयम् अपरा (प्रकृतिः); इतः तु अन्याम् जीवभूताम् मे पराम् प्रकृतिम् विद्धि, यया इदम् जगत् धार्यते।

हे महाबाहो, यह अपरा प्रकृति है। इससे भिन्न जीवरूप मेरी दूसरी परा प्रकृति को जानिए, जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।

7.6एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥6॥

etadyonīni bhūtāni sarvāṇīty upadhāraya |
ahaṃ kṛtsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayas tathā

एतद्योनीनि
इन दोनों से उत्पन्न
भूतानि
प्राणी
सर्वाणि
सब
इति
ऐसा
उपधारय
समझिए
अहम्
मैं
कृत्स्नस्य
सम्पूर्ण
जगतः
जगत् का
प्रभवः
उत्पत्ति
प्रलयः
प्रलय
तथा
और

अन्वय: सर्वाणि भूतानि एतद्योनीनि इति उपधारय। अहम् कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः तथा प्रलयः (अस्मि)।

सब प्राणी इन दोनों प्रकृतियों से उत्पन्न हैं, ऐसा समझिए। मैं सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति और प्रलय हूँ।

7.7मत्तः परतरं नान्यत्किं चिदस्ति धनंजय

मत्तः परतरं नान्यत्किं चिदस्ति धनंजय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥7॥

mattaḥ parataraṃ nānyat kiṃ cid asti dhanaṃjaya |
mayi sarvam idaṃ protaṃ sūtre maṇigaṇā iva

मत्तः
मुझसे
परतरम्
श्रेष्ठ
न
नहीं
अन्यत्
दूसरा
किञ्चित्
कुछ भी
अस्ति
है
धनंजय
हे धनंजय
मयि
मुझमें
सर्वम्
सब
इदम्
यह
प्रोतम्
गुँथा हुआ
सूत्रे
सूत्र में
मणिगणाः
मणियों के समूह
इव
जैसे

अन्वय: धनंजय, मत्तः परतरम् अन्यत् किञ्चित् न अस्ति। सूत्रे मणिगणाः इव इदम् सर्वम् मयि प्रोतम् (अस्ति)।

हे धनंजय, मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है। यह सब मुझमें उसी प्रकार गुँथा हुआ है जैसे सूत्र में मणियों के समूह।

7.8रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥8॥

raso ’ham apsu kaunteya prabhāsmi śaśisūryayoḥ |
praṇavaḥ sarvavedeṣu śabdaḥ khe pauruṣaṃ nṛṣu

रसः
रस
अहम्
मैं
अप्सु
जल में
कौन्तेय
हे कौन्तेय
प्रभा
प्रकाश
अस्मि
हूँ
शशिसूर्ययोः
चन्द्र और सूर्य में
प्रणवः
ओंकार
सर्ववेदेषु
सब वेदों में
शब्दः
शब्द
खे
आकाश में
पौरुषम्
पुरुषत्व
नृषु
मनुष्यों में

अन्वय: कौन्तेय, अहम् अप्सु रसः, शशिसूर्ययोः प्रभा, सर्ववेदेषु प्रणवः, खे शब्दः, नृषु पौरुषम् अस्मि।

हे कौन्तेय, मैं जल में रस हूँ, चन्द्र और सूर्य में प्रकाश हूँ। सब वेदों में ओंकार, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषत्व हूँ।

7.9पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥9॥

puṇyo gandhaḥ pṛthivyāṃ ca tejaś cāsmi vibhāvasau |
jīvanaṃ sarvabhūteṣu tapaś cāsmi tapasviṣu

पुण्यः
पवित्र
गन्धः
गन्ध
पृथिव्याम्
पृथ्वी में
च
और
तेजः
तेज
च
और
अस्मि
हूँ
विभावसौ
अग्नि में
जीवनम्
जीवन
सर्वभूतेषु
सब प्राणियों में
तपः
तप
च
और
अस्मि
हूँ
तपस्विषु
तपस्वियों में

अन्वय: (अहम्) पृथिव्याम् पुण्यः गन्धः च विभावसौ तेजः च अस्मि; सर्वभूतेषु जीवनम् च तपस्विषु तपः अस्मि।

मैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध और अग्नि में तेज हूँ। सब प्राणियों में जीवन और तपस्वियों में तप हूँ।

7.10बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥10॥

bījaṃ māṃ sarvabhūtānāṃ viddhi pārtha sanātanam |
buddhir buddhimatām asmi tejas tejasvinām aham

बीजम्
बीज
माम्
मुझे
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों का
विद्धि
जानिए
पार्थ
हे पार्थ
सनातनम्
सनातन
बुद्धिः
बुद्धि
बुद्धिमताम्
बुद्धिमानों की
अस्मि
हूँ
तेजः
तेज
तेजस्विनाम्
तेजस्वियों का
अहम्
मैं

अन्वय: पार्थ, माम् सर्वभूतानाम् सनातनम् बीजम् विद्धि। अहम् बुद्धिमताम् बुद्धिः तेजस्विनाम् तेजः अस्मि।

हे पार्थ, मुझे सब प्राणियों का सनातन बीज जानिए। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।

7.11बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥11॥

balaṃ balavatāṃ cāhaṃ kāmarāgavivarjitam |
dharmāviruddho bhūteṣu kāmo ’smi bharatarṣabha

बलम्
बल
बलवताम्
बलवानों का
च
और
अहम्
मैं
कामरागविवर्जितम्
कामना और आसक्ति से रहित
धर्माविरुद्धः
धर्म के अनुकूल
भूतेषु
प्राणियों में
कामः
काम
अस्मि
हूँ
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ

अन्वय: भरतर्षभ, अहम् बलवताम् कामरागविवर्जितम् बलम् च (अस्मि); भूतेषु धर्माविरुद्धः कामः अस्मि।

हे भरतश्रेष्ठ, मैं बलवानों का कामना और आसक्ति से रहित बल हूँ। प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम हूँ।

7.12ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥12॥

ye caiva sāttvikā bhāvā rājasās tāmasāś ca ye |
matta eveti tān viddhi na tv ahaṃ teṣu te mayi

ये
जो
च
और
एव
भी
सात्त्विकाः
सात्त्विक
भावाः
भाव
राजसाः
राजस
तामसाः
तामस
च
और
ये
जो
मत्तः
मुझसे
एव
ही
इति
ऐसा
तान्
उन्हें
विद्धि
जानिए
न
नहीं
तु
परन्तु
अहम्
मैं
तेषु
उनमें
ते
वे
मयि
मुझमें

अन्वय: ये च एव सात्त्विकाः भावाः, ये च राजसाः तामसाः (भावाः), तान् मत्तः एव इति विद्धि। अहम् तु तेषु न (अस्मि), ते मयि (सन्ति)।

जो भी सात्त्विक भाव हैं और जो राजस तथा तामस भाव हैं, उन सबको मुझसे ही उत्पन्न जानिए। परन्तु मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।

7.13त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥13॥

tribhir guṇamayair bhāvair ebhiḥ sarvam idaṃ jagat |
mohitaṃ nābhijānāti mām ebhyaḥ param avyayam

त्रिभिः
तीन
गुणमयैः
गुणों से बने
भावैः
भावों से
एभिः
इन
सर्वम्
सारा
इदम्
यह
जगत्
जगत्
मोहितम्
मोहित हुआ
न
नहीं
अभिजानाति
जानता है
माम्
मुझे
एभ्यः
इनसे
परम्
परे
अव्ययम्
अविनाशी

अन्वय: एभिः त्रिभिः गुणमयैः भावैः मोहितम् इदम् सर्वम् जगत् एभ्यः परम् अव्ययम् माम् न अभिजानाति।

गुणों से बने इन तीन प्रकार के भावों से मोहित हुआ यह सारा जगत् इनसे परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता।

7.14दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥14॥

daivī hy eṣā guṇamayī mama māyā duratyayā |
mām eva ye prapadyante māyām etāṃ taranti te

दैवी
अलौकिक
हि
क्योंकि
एषा
यह
गुणमयी
गुणों से बनी
मम
मेरी
माया
माया
दुरत्यया
पार करने में कठिन
माम्
मुझे
एव
ही
ये
जो
प्रपद्यन्ते
शरण लेते हैं
मायाम्
माया को
एताम्
इस
तरन्ति
पार कर जाते हैं
ते
वे

अन्वय: हि एषा गुणमयी मम दैवी माया दुरत्यया (अस्ति)। ये माम् एव प्रपद्यन्ते, ते एताम् मायाम् तरन्ति।

क्योंकि गुणों से बनी मेरी यह दैवी माया पार करने में कठिन है। जो मेरी ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।

7.15न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥15॥

na māṃ duṣkṛtino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ |
māyayāpahṛtajñānā āsuraṃ bhāvam āśritāḥ

न
नहीं
माम्
मेरी (शरण)
दुष्कृतिनः
दुष्कर्मी
मूढाः
मूढ़
प्रपद्यन्ते
शरण लेते हैं
नराधमाः
नीच मनुष्य
मायया
माया द्वारा
अपहृतज्ञानाः
हरे हुए ज्ञान वाले
आसुरम्
आसुरी
भावम्
भाव को
आश्रिताः
आश्रय लिए हुए

अन्वय: मायया अपहृतज्ञानाः आसुरम् भावम् आश्रिताः दुष्कृतिनः मूढाः नराधमाः माम् न प्रपद्यन्ते।

माया द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया है और जो आसुरी भाव का आश्रय लिए हुए हैं, वे दुष्कर्मी, मूढ़ और नीच मनुष्य मेरी शरण नहीं लेते।

7.16चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥16॥

caturvidhā bhajante māṃ janāḥ sukṛtino ’rjuna |
ārto jijñāsur arthārthī jñānī ca bharatarṣabha

चतुर्विधाः
चार प्रकार के
भजन्ते
भजते हैं
माम्
मुझे
जनाः
लोग
सुकृतिनः
पुण्यकर्मी
अर्जुन
हे अर्जुन
आर्तः
दुखी
जिज्ञासुः
जानने की इच्छा वाला
अर्थार्थी
धन चाहने वाला
ज्ञानी
ज्ञानी
च
और
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ

अन्वय: अर्जुन, भरतर्षभ, आर्तः जिज्ञासुः अर्थार्थी च ज्ञानी (इति) चतुर्विधाः सुकृतिनः जनाः माम् भजन्ते।

हे अर्जुन, हे भरतश्रेष्ठ, चार प्रकार के पुण्यकर्मी लोग मुझे भजते हैं। वे हैं दुखी, जिज्ञासु, धन चाहने वाले और ज्ञानी।

7.17तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥17॥

teṣāṃ jñānī nityayukta ekabhaktir viśiṣyate |
priyo hi jñānino ’tyartham ahaṃ sa ca mama priyaḥ

तेषाम्
उनमें
ज्ञानी
ज्ञानी
नित्ययुक्तः
नित्य मुझमें युक्त
एकभक्तिः
अनन्य भक्ति वाला
विशिष्यते
श्रेष्ठ है
प्रियः
प्रिय
हि
क्योंकि
ज्ञानिनः
ज्ञानी को
अत्यर्थम्
अत्यन्त
अहम्
मैं
सः
वह
च
और
मम
मुझे
प्रियः
प्रिय

अन्वय: तेषाम् नित्ययुक्तः एकभक्तिः ज्ञानी विशिष्यते, हि ज्ञानिनः अहम् अत्यर्थम् प्रियः, सः च मम प्रियः।

उनमें नित्य मुझमें युक्त और अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है, क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।

7.18उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥18॥

udārāḥ sarva evaite jñānī tv ātmaiva me matam |
āsthitaḥ sa hi yuktātmā mām evānuttamāṃ gatim

उदाराः
उदार
सर्वे
सब
एव
ही
एते
ये
ज्ञानी
ज्ञानी
तु
परन्तु
आत्मा
मेरा स्वरूप
एव
ही
मे
मेरा
मतम्
मत
आस्थितः
स्थित है
सः
वह
हि
क्योंकि
युक्तात्मा
मुझमें युक्त मन वाला
माम्
मुझ
एव
ही
अनुत्तमाम्
सर्वोत्तम
गतिम्
गति में

अन्वय: एते सर्वे एव उदाराः, तु ज्ञानी आत्मा एव (इति) मे मतम्, हि सः युक्तात्मा अनुत्तमाम् गतिम् माम् एव आस्थितः।

ये सब ही उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है, यह मेरा मत है। क्योंकि वह मुझमें युक्त मन वाला मुझ सर्वोत्तम गति में ही स्थित है।

7.19बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥19॥

bahūnāṃ janmanām ante jñānavān māṃ prapadyate |
vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā sudurlabhaḥ

बहूनाम्
बहुत
जन्मनाम्
जन्मों के
अन्ते
अन्त में
ज्ञानवान्
ज्ञानवान्
माम्
मुझे
प्रपद्यते
प्राप्त होता है
वासुदेवः
वासुदेव
सर्वम्
सब कुछ
इति
ऐसा जानकर
सः
वह
महात्मा
महात्मा
सुदुर्लभः
अत्यन्त दुर्लभ

अन्वय: बहूनाम् जन्मनाम् अन्ते ज्ञानवान् वासुदेवः सर्वम् इति माम् प्रपद्यते; सः महात्मा सुदुर्लभः।

बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानवान् मनुष्य सब कुछ वासुदेव ही है, ऐसा जानकर मुझे प्राप्त होता है। वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

7.20कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥20॥

kāmais tais tair hṛtajñānāḥ prapadyante ’nyadevatāḥ |
taṃ taṃ niyamam āsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā

कामैः
कामनाओं द्वारा
तैः तैः
उन उन
हृतज्ञानाः
हरे हुए ज्ञान वाले
प्रपद्यन्ते
शरण लेते हैं
अन्यदेवताः
अन्य देवताओं की
तम् तम्
उस उस
नियमम्
नियम का
आस्थाय
आश्रय लेकर
प्रकृत्या
प्रकृति से
नियताः
प्रेरित
स्वया
अपनी

अन्वय: तैः तैः कामैः हृतज्ञानाः स्वया प्रकृत्या नियताः (जनाः) तम् तम् नियमम् आस्थाय अन्यदेवताः प्रपद्यन्ते।

उन उन कामनाओं से जिनका ज्ञान हर लिया गया है, वे अपनी प्रकृति से प्रेरित होकर उस उस नियम का आश्रय लेकर अन्य देवताओं की शरण लेते हैं।

7.21यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥21॥

yo yo yāṃ yāṃ tanuṃ bhaktaḥ śraddhayārcitum icchati |
tasya tasyācalāṃ śraddhāṃ tām eva vidadhāmy aham

यः यः
जो जो
याम् याम्
जिस जिस
तनुम्
देवरूप को
भक्तः
भक्त
श्रद्धया
श्रद्धा से
अर्चितुम्
पूजना
इच्छति
चाहता है
तस्य तस्य
उस उस की
अचलाम्
अचल
श्रद्धाम्
श्रद्धा को
ताम्
उसी
एव
ही
विदधामि
स्थिर करता हूँ
अहम्
मैं

अन्वय: यः यः भक्तः याम् याम् तनुम् श्रद्धया अर्चितुम् इच्छति, तस्य तस्य ताम् एव श्रद्धाम् अहम् अचलाम् विदधामि।

जो जो भक्त जिस जिस देवरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस उस भक्त की उसी श्रद्धा को मैं अचल कर देता हूँ।

7.22स तया श्रद्धया युक्तस्तस्या राधनमीहते

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्या राधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥22॥

sa tayā śraddhayā yuktas tasyā rādhanam īhate |
labhate ca tataḥ kāmān mayaiva vihitān hi tān

सः
वह
तया
उस
श्रद्धया
श्रद्धा से
युक्तः
युक्त होकर
तस्याः
उस देवता की
राधनम्
आराधना
ईहते
करता है
लभते
प्राप्त करता है
च
और
ततः
उससे
कामान्
कामनाओं को
मया
मेरे द्वारा
एव
ही
विहितान्
विधान किए हुए
हि
निश्चय ही
तान्
उन

अन्वय: सः तया श्रद्धया युक्तः तस्याः राधनम् ईहते, ततः च मया एव विहितान् तान् कामान् हि लभते।

वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की आराधना करता है और उससे उन कामनाओं को प्राप्त करता है, जो निश्चय ही मेरे द्वारा ही विधान की गई हैं।

7.23अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥23॥

antavat tu phalaṃ teṣāṃ tad bhavaty alpamedhasām |
devān devayajo yānti madbhaktā yānti mām api

अन्तवत्
नाशवान्
तु
परन्तु
फलम्
फल
तेषाम्
उन
तत्
वह
भवति
होता है
अल्पमेधसाम्
अल्प बुद्धि वालों का
देवान्
देवताओं को
देवयजः
देवताओं को पूजने वाले
यान्ति
प्राप्त होते हैं
मद्भक्ताः
मेरे भक्त
यान्ति
प्राप्त होते हैं
माम्
मुझे
अपि
भी

अन्वय: तु तेषाम् अल्पमेधसाम् तत् फलम् अन्तवत् भवति। देवयजः देवान् यान्ति, मद्भक्ताः अपि माम् यान्ति।

परन्तु उन अल्प बुद्धि वालों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे प्राप्त होते हैं।

7.24अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥24॥

avyaktaṃ vyaktim āpannaṃ manyante mām abuddhayaḥ |
paraṃ bhāvam ajānanto mamāvyayam anuttamam

अव्यक्तम्
अव्यक्त
व्यक्तिम्
व्यक्त भाव को
आपन्नम्
प्राप्त हुआ
मन्यन्ते
मानते हैं
माम्
मुझे
अबुद्धयः
बुद्धिहीन लोग
परम्
परम
भावम्
भाव को
अजानन्तः
न जानते हुए
मम
मेरे
अव्ययम्
अविनाशी
अनुत्तमम्
सर्वोत्तम

अन्वय: अबुद्धयः मम अव्ययम् अनुत्तमम् परम् भावम् अजानन्तः अव्यक्तम् माम् व्यक्तिम् आपन्नम् मन्यन्ते।

बुद्धिहीन लोग मेरे अविनाशी और सर्वोत्तम परम भाव को न जानते हुए मुझ अव्यक्त को व्यक्त भाव में आया हुआ मानते हैं।

7.25नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥25॥

nāhaṃ prakāśaḥ sarvasya yogamāyāsamāvṛtaḥ |
mūḍho ’yaṃ nābhijānāti loko mām ajam avyayam

न
नहीं
अहम्
मैं
प्रकाशः
प्रकट
सर्वस्य
सबके लिए
योगमायासमावृतः
योगमाया से ढका हुआ
मूढः
मोहित
अयम्
यह
न
नहीं
अभिजानाति
जानता है
लोकः
जनसमुदाय
माम्
मुझे
अजम्
अजन्मा
अव्ययम्
अविनाशी

अन्वय: योगमायासमावृतः अहम् सर्वस्य प्रकाशः न (अस्मि); अयम् मूढः लोकः माम् अजम् अव्ययम् न अभिजानाति।

योगमाया से ढका हुआ मैं सबके सामने प्रकट नहीं होता। यह मोहित जनसमुदाय मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।

7.26वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥26॥

vedāhaṃ samatītāni vartamānāni cārjuna |
bhaviṣyāṇi ca bhūtāni māṃ tu veda na kaś cana

वेद
जानता हूँ
अहम्
मैं
समतीतानि
बीते हुए
वर्तमानानि
वर्तमान
च
और
अर्जुन
हे अर्जुन
भविष्याणि
भविष्य के
च
और
भूतानि
प्राणियों को
माम्
मुझे
तु
परन्तु
वेद
जानता
न
नहीं
कश्चन
कोई भी

अन्वय: अर्जुन, अहम् समतीतानि वर्तमानानि च भविष्याणि च भूतानि वेद; माम् तु कश्चन न वेद।

हे अर्जुन, मैं बीते हुए, वर्तमान और भविष्य के प्राणियों को जानता हूँ। परन्तु मुझे कोई भी नहीं जानता।

7.27इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वंद्वमोहेन भारत

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वंद्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥27॥

icchādveṣasamutthena dvaṃdvamohena bhārata |
sarvabhūtāni saṃmohaṃ sarge yānti paraṃtapa

इच्छाद्वेषसमुत्थेन
इच्छा और द्वेष से उत्पन्न
द्वंद्वमोहेन
द्वन्द्व के मोह से
भारत
हे भारत
सर्वभूतानि
सब प्राणी
संमोहम्
अत्यन्त मोह को
सर्गे
सृष्टि में
यान्ति
प्राप्त होते हैं
परंतप
हे परंतप

अन्वय: भारत, परंतप, इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वंद्वमोहेन सर्वभूतानि सर्गे संमोहम् यान्ति।

हे भारत, हे परंतप, इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्व के मोह से सब प्राणी सृष्टि में जन्म लेते ही अत्यन्त मोह को प्राप्त होते हैं।

7.28येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥28॥

yeṣāṃ tv antagataṃ pāpaṃ janānāṃ puṇyakarmaṇām |
te dvaṃdvamohanirmuktā bhajante māṃ dṛḍhavratāḥ

येषाम्
जिन
तु
परन्तु
अन्तगतम्
नष्ट हो गया
पापम्
पाप
जनानाम्
लोगों का
पुण्यकर्मणाम्
पुण्यकर्म करने वाले
ते
वे
द्वंद्वमोहनिर्मुक्ताः
द्वन्द्व के मोह से मुक्त
भजन्ते
भजते हैं
माम्
मुझे
दृढव्रताः
दृढ़ निश्चय वाले

अन्वय: तु येषाम् पुण्यकर्मणाम् जनानाम् पापम् अन्तगतम्, ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ताः दृढव्रताः माम् भजन्ते।

परन्तु पुण्यकर्म करने वाले जिन लोगों का पाप नष्ट हो गया है, वे द्वन्द्व के मोह से मुक्त और दृढ़ निश्चय वाले होकर मुझे भजते हैं।

7.29जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥29॥

jarāmaraṇamokṣāya mām āśritya yatanti ye |
te brahma tad viduḥ kṛtsnam adhyātmaṃ karma cākhilam

जरामरणमोक्षाय
जरा और मृत्यु से मुक्ति हेतु
माम्
मेरा
आश्रित्य
आश्रय लेकर
यतन्ति
प्रयत्न करते हैं
ये
जो
ते
वे
ब्रह्म
ब्रह्म को
तत्
उस
विदुः
जानते हैं
कृत्स्नम्
सम्पूर्ण
अध्यात्मम्
अध्यात्म को
कर्म
कर्म को
च
और
अखिलम्
समस्त

अन्वय: ये जरामरणमोक्षाय माम् आश्रित्य यतन्ति, ते तत् ब्रह्म, कृत्स्नम् अध्यात्मम्, अखिलम् कर्म च विदुः।

जो मेरा आश्रय लेकर जरा और मृत्यु से छूटने के लिए प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और समस्त कर्म को जानते हैं।

7.30साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥30॥

sādhibhūtādhidaivaṃ māṃ sādhiyajñaṃ ca ye viduḥ |
prayāṇakāle ’pi ca māṃ te vidur yuktacetasaḥ

साधिभूताधिदैवम्
अधिभूत और अधिदैव के सहित
माम्
मुझे
साधियज्ञम्
अधियज्ञ के सहित
च
और
ये
जो
विदुः
जानते हैं
प्रयाणकाले
मरण काल में
अपि
भी
च
और
माम्
मुझे
ते
वे
विदुः
जानते हैं
युक्तचेतसः
मुझमें युक्त चित्त वाले

अन्वय: ये माम् साधिभूताधिदैवम् साधियज्ञम् च विदुः, ते युक्तचेतसः प्रयाणकाले अपि च माम् विदुः।

जो मुझे अधिभूत और अधिदैव के सहित तथा अधियज्ञ के सहित जानते हैं, वे मुझमें युक्त चित्त वाले मरण काल में भी मुझे जानते हैं।