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अध्याय 10: विभूति योग

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अध्याय 10: विभूति योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 10: विभूति योग

सार: नौवें अध्याय की बात सुनकर अर्जुन का मन और खुल गया। जिस विराट सत्ता की चर्चा हो रही थी, उसकी थोड़ी झलक वे अपनी आँखों से पाना चाहते थे। कृष्ण उन्हें अपनी विभूतियों की एक लम्बी माला सुनाते हैं। इस सृष्टि में हर श्रेणी का जो सबसे ऊँचा है, सबसे उजला है, वही उनका एक छोटा सा अंश है।

अर्जुन की जिज्ञासा

युद्ध की धूल अभी थमी नहीं थी, दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं, और रथ के भीतर एक और ही बातचीत चल रही थी। नौवें अध्याय में अर्जुन सुन चुके थे कि यह सारा जगत उसी एक के धागे में पिरोया हुआ है, और वह अपने भक्त को कभी नहीं छोड़ता। इस बात ने भीतर एक नई भूख जगा दी थी, कि जिस सत्ता की इतनी महिमा है, उसे ज़रा नज़दीक से, नाम लेकर, पहचान लिया जाए।

अर्जुन हाथ जोड़कर बोले, “आपने अपने बारे में जो कहा, उसे सुनकर मेरा मोह मिटता जा रहा है। पर मन अभी भी प्यासा है। आप कृपा करके बताइए, इस सृष्टि में आप किन-किन रूपों में फैले हुए हैं? मैं आपको कहाँ-कहाँ पहचानूँ?”

कृष्ण मुस्कुराए। बोले, “अच्छा, सुनिए। अपनी विभूतियों में से जो मुख्य हैं, वही कहता हूँ, क्योंकि पूरी सूची का तो कोई ओर-छोर ही नहीं। मेरे विस्तार का अंत न देवता जानते हैं, न बड़े-बड़े ऋषि, क्योंकि मैं ही तो उन सबका भी आदि हूँ।”

पहली पहचान, हृदय के भीतर

सबसे पहले कृष्ण बाहर की ओर इशारा नहीं करते, भीतर की ओर करते हैं।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥

“हे गुडाकेश (नींद को जीत लेने वाले अर्जुन), मैं हर प्राणी के हृदय में बैठी हुई आत्मा हूँ। सब भूतों का आदि भी मैं हूँ, मध्य भी मैं, और अंत भी मैं ही हूँ।” पहली विभूति किसी दूर पर्वत या नदी में नहीं, अपने ही सीने के भीतर छिपी है। जिसे हम खोजने कहीं और जाते हैं, वह पहले से ही भीतर बैठा है।

ब्रह्मांड की एक माला

फिर कृष्ण की वाणी एक माला की तरह खुलने लगती है। अचल पर्वतों में मैं हिमालय हूँ, बहती नदियों में गंगा। आदित्यों में विष्णु, चमकती ज्योतियों में तपता हुआ सूर्य, और नक्षत्रों में शीतल चन्द्रमा। वेदों में सामवेद, देवताओं में इन्द्र, इन्द्रियों में मन, और प्राणियों में उनकी चेतना।

वृक्षों में मैं पीपल हूँ, देव-ऋषियों में नारद, गंधर्वों में चित्ररथ, और सिद्धों में कपिल मुनि। महर्षियों में भृगु, यज्ञों में चुपचाप किया जाने वाला जप-यज्ञ, और शब्दों में वह पहला अक्षर ‘अ’। छंदों में गायत्री, महीनों में अगहन, और ऋतुओं में फूलों से लदा हुआ वसंत। घोड़ों में उच्चैःश्रवा, हाथियों में ऐरावत, और मनुष्यों में राजा।

दमन करने वालों में मैं दण्ड हूँ, और जीत की इच्छा रखने वालों में नीति। मुनियों में व्यास हूँ, और कवियों में शुक्राचार्य। और फिर वे एक बात कहते हैं जो अर्जुन को भीतर तक छू जाती है, “पांडवों में, हे पार्थ, मैं आप ही हूँ, धनंजय।” जिस मित्र के सामने वे यह सारी माला खोल रहे थे, उसी में भी अपना अंश देख रहे थे।

जहाँ भी तेज है, वह तेज मैं हूँ। जीतने वालों की जीत, यत्न करने वालों का यत्न, और भले लोगों की भलाई भी मैं ही हूँ। और वह सब कुछ हर लेने वाली मृत्यु भी मैं हूँ, तथा आगे जो कुछ जन्म लेना है, उसका आदि-स्रोत भी। कोमल गुणों में मैं कीर्ति हूँ, वाणी हूँ, स्मृति हूँ, बुद्धि हूँ, धैर्य और क्षमा हूँ। भाव यह है कि जीवन की हर सुंदर लहर के पीछे वही एक समुद्र खड़ा है।

इतनी सारी वस्तुओं में अपने को दिखाकर कृष्ण असल में अर्जुन के भटकते मन को एक-एक खूँटी थमा रहे थे। मन जहाँ भी जाए, किसी पर्वत पर, किसी नदी पर, किसी गुणी व्यक्ति पर, वहीं उसे उनकी याद हो आए। भक्ति के लिए कहीं दूर मूरत ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं, सारा संसार ही उनका पता देता चलता है।

संक्षेप का सूत्र

यह सूची सत्तर से भी ज़्यादा नामों तक जाती है, पर कृष्ण जानते हैं कि इतनी गिनती याद रखना कठिन है। इसलिए वे एक सीधा सूत्र थमा देते हैं।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्॥

“जहाँ भी आपको कोई ऐश्वर्यवान, सुंदर या तेजस्वी वस्तु दिखे, उसे मेरे तेज के एक अंश से उपजी हुई समझ लीजिए।” पूरी माला रटने की ज़रूरत नहीं। जहाँ आँख ठिठक जाए, जहाँ मन चौंककर रुक जाए, वहीं उनकी एक झलक बैठी है। एक ऊँचा पर्वत, एक सधी हुई कला, एक निर्मल हृदय, सब उसी एक तेज के टुकड़े हैं।

और अंत में वे इस सारे विस्तार को एक साँस में समेट देते हैं।

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥

“या इतने विस्तार से आपको क्या मिलेगा, अर्जुन? इस सारे जगत को मैंने अपने एक छोटे से अंश से थाम रखा है।” जिसे हम पूरा ब्रह्मांड कहते हैं, वह उनके एक टुकड़े भर में टिका है। उन्हें हम कितना भी जान लें, बाक़ी सदा अनंत ही रहेगा।

सार

एक वाक्य में कहें तो, जहाँ भी कुछ बड़ा, सुंदर या ज़बरदस्त दिखे, वह कृष्ण की एक नन्ही झलक है। यह अध्याय जैसे उँगली पकड़कर, एक-एक करके, पूरे संसार में उनका पता बताता है। और यह पता इसलिए बताया जा रहा है, ताकि अगला अध्याय आते ही वह पूरा रूप एक साथ आँखों के सामने खुल सके।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 42 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/10/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

10.1भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः

श्रीभगवानुवाच

भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥1॥

bhūya eva mahābāho śṛṇu me paramaṃ vacaḥ |
yat te ’haṃ prīyamāṇāya vakṣyāmi hitakāmyayā

भूयः
फिर
एव
भी
महाबाहो
हे महाबाहो
शृणु
सुनिए
मे
मेरे
परमम्
परम
वचः
वचन को
यत्
जिसे
ते
आपसे
अहम्
मैं
प्रीयमाणाय
प्रेम रखने वाले के लिए
वक्ष्यामि
कहूँगा
हितकाम्यया
हित की कामना से

अन्वय: महाबाहो, भूयः एव मे परमम् वचः शृणु, यत् अहम् प्रीयमाणाय ते हितकाम्यया वक्ष्यामि।

हे महाबाहो, मेरे परम वचन को फिर भी सुनिए, जिसे मैं मुझमें प्रेम रखने वाले आपके हित की कामना से आपसे कहूँगा।

10.2न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥2॥

na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ |
aham ādir hi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ

न
नहीं
मे
मेरी
विदुः
जानते
सुरगणाः
देवताओं के समूह
प्रभवम्
उत्पत्ति को
न
न ही
महर्षयः
महर्षि
अहम्
मैं
आदिः
आदि कारण
हि
क्योंकि
देवानाम्
देवताओं का
महर्षीणाम्
महर्षियों का
च
और
सर्वशः
सब प्रकार से

अन्वय: सुरगणाः मे प्रभवम् न विदुः, महर्षयः न (विदुः), हि अहम् सर्वशः देवानाम् महर्षीणाम् च आदिः।

मेरी उत्पत्ति को न देवताओं के समूह जानते हैं और न महर्षि, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का आदि कारण हूँ।

10.3यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥3॥

yo mām ajam anādiṃ ca vetti lokamaheśvaram |
asaṃmūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate

यः
जो
माम्
मुझे
अजम्
अजन्मा
अनादिम्
अनादि
च
और
वेत्ति
जानता है
लोकमहेश्वरम्
लोकों का महान् ईश्वर
असंमूढः
मोहरहित
सः
वह
मर्त्येषु
मनुष्यों में
सर्वपापैः
सब पापों से
प्रमुच्यते
मुक्त हो जाता है

अन्वय: यः माम् अजम् अनादिम् च लोकमहेश्वरम् वेत्ति, सः मर्त्येषु असंमूढः सर्वपापैः प्रमुच्यते।

जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों का महान् ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में मोहरहित होकर सब पापों से मुक्त हो जाता है।

10.4बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः

बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥4॥

buddhir jñānam asaṃmohaḥ kṣamā satyaṃ damaḥ śamaḥ |
sukhaṃ duḥkhaṃ bhavo ’bhāvo bhayaṃ cābhayam eva ca

बुद्धिः
बुद्धि
ज्ञानम्
ज्ञान
असंमोहः
मोह का अभाव
क्षमा
क्षमा
सत्यम्
सत्य
दमः
इन्द्रियों का संयम
शमः
मन का निग्रह
सुखम्
सुख
दुःखम्
दुःख
भवः
उत्पत्ति
अभावः
नाश
भयम्
भय
च
और
अभयम्
निर्भयता
एव
भी
च
और

अन्वय: बुद्धिः ज्ञानम् असंमोहः क्षमा सत्यम् दमः शमः सुखम् दुःखम् भवः अभावः भयम् च अभयम् एव च।

बुद्धि, ज्ञान, मोह का अभाव, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सुख, दुःख, उत्पत्ति, नाश, भय और निर्भयता भी।

10.5अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥5॥

ahiṃsā samatā tuṣṭis tapo dānaṃ yaśo ’yaśaḥ |
bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ

अहिंसा
अहिंसा
समता
समता
तुष्टिः
संतोष
तपः
तप
दानम्
दान
यशः
यश
अयशः
अपयश
भवन्ति
होते हैं
भावाः
भाव
भूतानाम्
प्राणियों के
मत्तः
मुझसे
एव
ही
पृथग्विधाः
नाना प्रकार के

अन्वय: अहिंसा समता तुष्टिः तपः दानम् यशः अयशः (इति) भूतानाम् पृथग्विधाः भावाः मत्तः एव भवन्ति।

अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश और अपयश, प्राणियों के ये नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं।

10.6महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥6॥

maharṣayaḥ sapta pūrve catvāro manavas tathā |
madbhāvā mānasā jātā yeṣāṃ loka imāḥ prajāḥ

महर्षयः
महर्षि
सप्त
सात
पूर्वे
पूर्व के
चत्वारः
चार
मनवः
मनु
तथा
तथा
मद्भावाः
मेरे भाव वाले
मानसाः
मन से उत्पन्न
जाताः
हुए हैं
येषाम्
जिनकी
लोके
संसार में
इमाः
ये
प्रजाः
प्रजा

अन्वय: सप्त महर्षयः, पूर्वे चत्वारः, तथा मनवः मद्भावाः मानसाः जाताः, येषाम् लोके इमाः प्रजाः।

सात महर्षि, उनसे पूर्व के चार तथा मनु, ये सब मेरे भाव वाले और मेरे मन से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह सारी प्रजा है।

10.7एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥7॥

etāṃ vibhūtiṃ yogaṃ ca mama yo vetti tattvataḥ |
so ’vikampena yogena yujyate nātra saṃśayaḥ

एताम्
इस
विभूतिम्
विभूति को
योगम्
योग को
च
और
मम
मेरी
यः
जो
वेत्ति
जानता है
तत्त्वतः
तत्त्व से
सः
वह
अविकम्पेन
अविचल
योगेन
योग से
युज्यते
युक्त होता है
न
नहीं
अत्र
इसमें
संशयः
संशय

अन्वय: यः मम एताम् विभूतिम् योगम् च तत्त्वतः वेत्ति, सः अविकम्पेन योगेन युज्यते, अत्र संशयः न।

जो मेरी इस विभूति और योग को तत्त्व से जानता है, वह अविचल योग से युक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।

10.8अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥8॥

ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate |
iti matvā bhajante māṃ budhā bhāvasamanvitāḥ

अहम्
मैं
सर्वस्य
सबकी
प्रभवः
उत्पत्ति का कारण
मत्तः
मुझसे
सर्वम्
सब
प्रवर्तते
प्रवृत्त होता है
इति
ऐसा
मत्वा
मानकर
भजन्ते
भजते हैं
माम्
मुझे
बुधाः
बुद्धिमान् लोग
भावसमन्विताः
श्रद्धा भाव से युक्त

अन्वय: अहम् सर्वस्य प्रभवः, मत्तः सर्वम् प्रवर्तते, इति मत्वा भावसमन्विताः बुधाः माम् भजन्ते।

मैं सबकी उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है, ऐसा मानकर श्रद्धा भाव से युक्त बुद्धिमान् लोग मुझे भजते हैं।

10.9मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥9॥

maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam |
kathayantaś ca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramanti ca

मच्चित्ताः
मुझमें चित्त लगाए हुए
मद्गतप्राणाः
मुझमें प्राण अर्पित किए हुए
बोधयन्तः
बोध कराते हुए
परस्परम्
आपस में
कथयन्तः
कथा कहते हुए
च
और
माम्
मेरी
नित्यम्
नित्य
तुष्यन्ति
संतुष्ट होते हैं
च
और
रमन्ति
रमण करते हैं
च
और

अन्वय: मच्चित्ताः मद्गतप्राणाः परस्परम् बोधयन्तः माम् नित्यम् कथयन्तः च तुष्यन्ति च रमन्ति च।

मुझमें चित्त लगाए हुए और मुझमें प्राण अर्पित किए हुए वे आपस में मेरा बोध कराते हुए और नित्य मेरी कथा कहते हुए संतुष्ट होते हैं और रमण करते हैं।

10.10तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥10॥

teṣāṃ satatayuktānāṃ bhajatāṃ prītipūrvakam |
dadāmi buddhiyogaṃ taṃ yena mām upayānti te

तेषाम्
उन
सततयुक्तानाम्
निरंतर मुझमें लगे हुए
भजताम्
भजने वालों को
प्रीतिपूर्वकम्
प्रेमपूर्वक
ददामि
देता हूँ
बुद्धियोगम्
बुद्धियोग
तम्
उस
येन
जिससे
माम्
मुझे
उपयान्ति
प्राप्त होते हैं
ते
वे

अन्वय: प्रीतिपूर्वकम् भजताम् सततयुक्तानाम् तेषाम् (अहम्) तम् बुद्धियोगम् ददामि, येन ते माम् उपयान्ति।

निरंतर मुझमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक मुझे भजने वाले उन लोगों को मैं वह बुद्धियोग देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।

10.11तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥11॥

teṣām evānukampārtham aham ajñānajaṃ tamaḥ |
nāśayāmy ātmabhāvastho jñānadīpena bhāsvatā

तेषाम्
उन पर
एव
ही
अनुकम्पार्थम्
अनुग्रह करने के लिए
अहम्
मैं
अज्ञानजम्
अज्ञान से उत्पन्न
तमः
अंधकार को
नाशयामि
नष्ट करता हूँ
आत्मभावस्थः
उनके अंतःकरण में स्थित होकर
ज्ञानदीपेन
ज्ञानरूप दीपक से
भास्वता
प्रकाशमान

अन्वय: तेषाम् एव अनुकम्पार्थम् अहम् आत्मभावस्थः भास्वता ज्ञानदीपेन अज्ञानजम् तमः नाशयामि।

उन पर ही अनुग्रह करने के लिए मैं उनके अंतःकरण में स्थित होकर प्रकाशमान ज्ञानरूप दीपक से अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट करता हूँ।

10.12परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्

अर्जुन उवाच

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥12॥

paraṃ brahma paraṃ dhāma pavitraṃ paramaṃ bhavān |
puruṣaṃ śāśvataṃ divyam ādidevam ajaṃ vibhum

परम्
परम
ब्रह्म
ब्रह्म
परम्
परम
धाम
धाम
पवित्रम्
पवित्र
परमम्
परम
भवान्
आप
पुरुषम्
पुरुष
शाश्वतम्
शाश्वत
दिव्यम्
दिव्य
आदिदेवम्
आदिदेव
अजम्
अजन्मा
विभुम्
सर्वव्यापी

अन्वय: भवान् परम् ब्रह्म, परम् धाम, परमम् पवित्रम्। (त्वाम्) शाश्वतम् दिव्यम् पुरुषम् आदिदेवम् अजम् विभुम् (आहुः)।

आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं। आपको शाश्वत दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहा जाता है।

10.13आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा

आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥13॥

āhus tvām ṛṣayaḥ sarve devarṣir nāradas tathā |
asito devalo vyāsaḥ svayaṃ caiva bravīṣi me

आहुः
कहते हैं
त्वाम्
आपको
ऋषयः
ऋषि
सर्वे
सब
देवर्षिः
देवर्षि
नारदः
नारद
तथा
तथा
असितः
असित
देवलः
देवल
व्यासः
व्यास
स्वयम्
स्वयं
च
और
एव
भी
ब्रवीषि
कहते हैं
मे
हमसे

अन्वय: सर्वे ऋषयः, तथा देवर्षिः नारदः, असितः, देवलः, व्यासः त्वाम् (एवम्) आहुः, स्वयम् च एव मे ब्रवीषि।

सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास आपको ऐसा ही कहते हैं, और आप स्वयं भी हमसे ऐसा ही कहते हैं।

10.14सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥14॥

sarvam etad ṛtaṃ manye yan māṃ vadasi keśava |
na hi te bhagavan vyaktiṃ vidur devā na dānavāḥ

सर्वम्
सब
एतत्
यह
ऋतम्
सत्य
मन्ये
मानते हैं
यत्
जो
माम्
हमसे
वदसि
कहते हैं
केशव
हे केशव
न
नहीं
हि
क्योंकि
ते
आपके
भगवन्
हे भगवन्
व्यक्तिम्
प्रकट स्वरूप को
विदुः
जानते
देवाः
देवता
न
न
दानवाः
दानव

अन्वय: केशव, यत् माम् वदसि, एतत् सर्वम् (अहम्) ऋतम् मन्ये। भगवन्, हि ते व्यक्तिम् देवाः न विदुः, दानवाः न (विदुः)।

हे केशव, जो कुछ आप हमसे कहते हैं, उस सबको हम सत्य मानते हैं। हे भगवन्, आपके प्रकट स्वरूप को न देवता जानते हैं और न दानव।

10.15स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥15॥

svayam evātmanātmānaṃ vettha tvaṃ puruṣottama |
bhūtabhāvana bhūteśa devadeva jagatpate

स्वयम्
स्वयं
एव
ही
आत्मना
अपने से
आत्मानम्
अपने को
वेत्थ
जानते हैं
त्वम्
आप
पुरुषोत्तम
हे पुरुषोत्तम
भूतभावन
हे प्राणियों को उत्पन्न करने वाले
भूतेश
हे प्राणियों के ईश्वर
देवदेव
हे देवों के देव
जगत्पते
हे जगत् के स्वामी

अन्वय: पुरुषोत्तम, भूतभावन, भूतेश, देवदेव, जगत्पते, त्वम् स्वयम् एव आत्मना आत्मानम् वेत्थ।

हे पुरुषोत्तम, हे प्राणियों को उत्पन्न करने वाले, हे प्राणियों के ईश्वर, हे देवों के देव, हे जगत् के स्वामी, आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं।

10.16वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥16॥

vaktum arhasy aśeṣeṇa divyā hy ātmavibhūtayaḥ |
yābhir vibhūtibhir lokān imāṃs tvaṃ vyāpya tiṣṭhasi

वक्तुम्
कहने के
अर्हसि
योग्य हैं
अशेषेण
संपूर्ण रूप से
दिव्याः
दिव्य
हि
क्योंकि
आत्मविभूतयः
अपनी विभूतियाँ
याभिः
जिन
विभूतिभिः
विभूतियों से
लोकान्
लोकों को
इमान्
इन
त्वम्
आप
व्याप्य
व्याप्त करके
तिष्ठसि
स्थित हैं

अन्वय: हि (त्वम्) दिव्याः आत्मविभूतयः अशेषेण वक्तुम् अर्हसि, याभिः विभूतिभिः त्वम् इमान् लोकान् व्याप्य तिष्ठसि।

अपनी उन दिव्य विभूतियों को आप ही संपूर्ण रूप से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों से आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।

10.17कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥17॥

kathaṃ vidyām ahaṃ yogiṃs tvāṃ sadā paricintayan |
keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo ’si bhagavan mayā

कथम्
कैसे
विद्याम्
जानें
अहम्
हम
योगिन्
हे योगेश्वर
त्वाम्
आपको
सदा
सदा
परिचिन्तयन्
चिन्तन करते हुए
केषु केषु
किन किन
च
और
भावेषु
भावों में
चिन्त्यः
चिन्तन करने योग्य
असि
हैं
भगवन्
हे भगवन्
मया
हमारे द्वारा

अन्वय: योगिन्, अहम् सदा परिचिन्तयन् त्वाम् कथम् विद्याम्? भगवन्, केषु केषु च भावेषु (त्वम्) मया चिन्त्यः असि?

हे योगेश्वर, सदा चिन्तन करते हुए हम आपको कैसे जानें? हे भगवन्, किन किन भावों में हम आपका चिन्तन करें?

10.18विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥18॥

vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana |
bhūyaḥ kathaya tṛptir hi śṛṇvato nāsti me ’mṛtam

विस्तरेण
विस्तार से
आत्मनः
अपने
योगम्
योग को
विभूतिम्
विभूति को
च
और
जनार्दन
हे जनार्दन
भूयः
फिर
कथय
कहिए
तृप्तिः
तृप्ति
हि
क्योंकि
शृण्वतः
सुनते हुए
न
नहीं
अस्ति
होती
मे
हमको
अमृतम्
अमृत को

अन्वय: जनार्दन, आत्मनः योगम् विभूतिम् च भूयः विस्तरेण कथय, हि अमृतम् शृण्वतः मे तृप्तिः न अस्ति।

हे जनार्दन, अपने योग और विभूति को फिर विस्तार से कहिए, क्योंकि यह अमृत सुनते हुए हमें तृप्ति नहीं होती।

10.19हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः

श्रीभगवानुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥19॥

hanta te kathayiṣyāmi divyā hy ātmavibhūtayaḥ |
prādhānyataḥ kuruśreṣṭha nāsty anto vistarasya me

हन्त
अच्छा
ते
आपसे
कथयिष्यामि
कहूँगा
दिव्याः
दिव्य
हि
निश्चय ही
आत्मविभूतयः
अपनी विभूतियाँ
प्राधान्यतः
प्रधानता से
कुरुश्रेष्ठ
हे कुरुश्रेष्ठ
न
नहीं
अस्ति
है
अन्तः
अन्त
विस्तरस्य
विस्तार का
मे
मेरे

अन्वय: कुरुश्रेष्ठ, हन्त, (अहम्) दिव्याः आत्मविभूतयः प्राधान्यतः ते कथयिष्यामि, हि मे विस्तरस्य अन्तः न अस्ति।

हे कुरुश्रेष्ठ, अच्छा, मैं अपनी दिव्य विभूतियों को प्रधानता से आपसे कहूँगा, क्योंकि मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।

10.20अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥20॥

aham ātmā guḍākeśa sarvabhūtāśayasthitaḥ |
aham ādiś ca madhyaṃ ca bhūtānām anta eva ca

अहम्
मैं
आत्मा
आत्मा
गुडाकेश
हे गुडाकेश
सर्वभूताशयस्थितः
सब प्राणियों के हृदय में स्थित
अहम्
मैं
आदिः
आदि
च
और
मध्यम्
मध्य
च
और
भूतानाम्
प्राणियों का
अन्तः
अन्त
एव
भी
च
और

अन्वय: गुडाकेश, अहम् सर्वभूताशयस्थितः आत्मा। अहम् भूतानाम् आदिः च मध्यम् च अन्तः एव च।

हे गुडाकेश, मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही प्राणियों का आदि, मध्य और अन्त भी हूँ।

10.21आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥21॥

ādityānām ahaṃ viṣṇur jyotiṣāṃ ravir aṃśumān |
marīcir marutām asmi nakṣatrāṇām ahaṃ śaśī

आदित्यानाम्
आदित्यों में
अहम्
मैं
विष्णुः
विष्णु
ज्योतिषाम्
ज्योतियों में
रविः
सूर्य
अंशुमान्
किरणों वाला
मरीचिः
मरीचि
मरुताम्
मरुतों में
अस्मि
हूँ
नक्षत्राणाम्
नक्षत्रों में
अहम्
मैं
शशी
चन्द्रमा

अन्वय: अहम् आदित्यानाम् विष्णुः, ज्योतिषाम् अंशुमान् रविः, मरुताम् मरीचिः अस्मि, नक्षत्राणाम् अहम् शशी।

आदित्यों में मैं विष्णु हूँ और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ। मरुतों में मैं मरीचि हूँ और नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ।

10.22वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥22॥

vedānāṃ sāmavedo ’smi devānām asmi vāsavaḥ |
indriyāṇāṃ manaś cāsmi bhūtānām asmi cetanā

वेदानाम्
वेदों में
सामवेदः
सामवेद
अस्मि
हूँ
देवानाम्
देवों में
अस्मि
हूँ
वासवः
इन्द्र
इन्द्रियाणाम्
इन्द्रियों में
मनः
मन
च
और
अस्मि
हूँ
भूतानाम्
प्राणियों में
अस्मि
हूँ
चेतना
चेतना

अन्वय: वेदानाम् सामवेदः अस्मि, देवानाम् वासवः अस्मि, इन्द्रियाणाम् च मनः अस्मि, भूतानाम् चेतना अस्मि।

वेदों में मैं सामवेद हूँ और देवों में इन्द्र हूँ। इन्द्रियों में मैं मन हूँ और प्राणियों में चेतना हूँ।

10.23रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्

रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥23॥

rudrāṇāṃ śaṃkaraś cāsmi vitteśo yakṣarakṣasām |
vasūnāṃ pāvakaś cāsmi meruḥ śikhariṇām aham

रुद्राणाम्
रुद्रों में
शंकरः
शंकर
च
और
अस्मि
हूँ
वित्तेशः
धन का स्वामी कुबेर
यक्षरक्षसाम्
यक्षों और राक्षसों में
वसूनाम्
वसुओं में
पावकः
अग्नि
च
और
अस्मि
हूँ
मेरुः
मेरु
शिखरिणाम्
शिखर वाले पर्वतों में
अहम्
मैं

अन्वय: रुद्राणाम् च शंकरः अस्मि, यक्षरक्षसाम् वित्तेशः (अस्मि), वसूनाम् च पावकः अस्मि, शिखरिणाम् अहम् मेरुः।

रुद्रों में मैं शंकर हूँ और यक्षों तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। वसुओं में मैं अग्नि हूँ और शिखर वाले पर्वतों में मेरु हूँ।

10.24पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥24॥

purodhasāṃ ca mukhyaṃ māṃ viddhi pārtha bṛhaspatim |
senānīnām ahaṃ skandaḥ sarasām asmi sāgaraḥ

पुरोधसाम्
पुरोहितों में
च
और
मुख्यम्
मुख्य
माम्
मुझे
विद्धि
जानिए
पार्थ
हे पार्थ
बृहस्पतिम्
बृहस्पति
सेनानीनाम्
सेनापतियों में
अहम्
मैं
स्कन्दः
स्कन्द
सरसाम्
जलाशयों में
अस्मि
हूँ
सागरः
समुद्र

अन्वय: पार्थ, पुरोधसाम् च मुख्यम् बृहस्पतिम् माम् विद्धि। सेनानीनाम् अहम् स्कन्दः, सरसाम् सागरः अस्मि।

हे पार्थ, पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति मुझे जानिए। सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ और जलाशयों में समुद्र हूँ।

10.25महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥25॥

maharṣīṇāṃ bhṛgur ahaṃ girām asmy ekam akṣaram |
yajñānāṃ japayajño ’smi sthāvarāṇāṃ himālayaḥ

महर्षीणाम्
महर्षियों में
भृगुः
भृगु
अहम्
मैं
गिराम्
वाणियों में
अस्मि
हूँ
एकम्
एक
अक्षरम्
अक्षर ओंकार
यज्ञानाम्
यज्ञों में
जपयज्ञः
जपयज्ञ
अस्मि
हूँ
स्थावराणाम्
स्थिर रहने वालों में
हिमालयः
हिमालय

अन्वय: महर्षीणाम् अहम् भृगुः, गिराम् एकम् अक्षरम् अस्मि, यज्ञानाम् जपयज्ञः अस्मि, स्थावराणाम् हिमालयः।

महर्षियों में मैं भृगु हूँ और वाणियों में एक अक्षर ओंकार हूँ। यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ और स्थिर रहने वालों में हिमालय हूँ।

10.26अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥26॥

aśvatthaḥ sarvavṛkṣāṇāṃ devarṣīṇāṃ ca nāradaḥ |
gandharvāṇāṃ citrarathaḥ siddhānāṃ kapilo muniḥ

अश्वत्थः
पीपल
सर्ववृक्षाणाम्
सब वृक्षों में
देवर्षीणाम्
देवर्षियों में
च
और
नारदः
नारद
गन्धर्वाणाम्
गन्धर्वों में
चित्ररथः
चित्ररथ
सिद्धानाम्
सिद्धों में
कपिलः
कपिल
मुनिः
मुनि

अन्वय: सर्ववृक्षाणाम् अश्वत्थः, देवर्षीणाम् च नारदः, गन्धर्वाणाम् चित्ररथः, सिद्धानाम् कपिलः मुनिः (अहम् अस्मि)।

सब वृक्षों में मैं पीपल हूँ और देवर्षियों में नारद हूँ। गन्धर्वों में मैं चित्ररथ हूँ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।

10.27उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥27॥

uccaiḥśravasam aśvānāṃ viddhi mām amṛtodbhavam |
airāvataṃ gajendrāṇāṃ narāṇāṃ ca narādhipam

उच्चैःश्रवसम्
उच्चैःश्रवा
अश्वानाम्
घोड़ों में
विद्धि
जानिए
माम्
मुझे
अमृतोद्भवम्
अमृत के साथ उत्पन्न
ऐरावतम्
ऐरावत
गजेन्द्राणाम्
श्रेष्ठ हाथियों में
नराणाम्
मनुष्यों में
च
और
नराधिपम्
राजा

अन्वय: अश्वानाम् अमृतोद्भवम् उच्चैःश्रवसम्, गजेन्द्राणाम् ऐरावतम्, नराणाम् च नराधिपम् माम् विद्धि।

घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न उच्चैःश्रवा मुझे जानिए। श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा मुझे जानिए।

10.28आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥28॥

āyudhānām ahaṃ vajraṃ dhenūnām asmi kāmadhuk |
prajanaś cāsmi kandarpaḥ sarpāṇām asmi vāsukiḥ

आयुधानाम्
शस्त्रों में
अहम्
मैं
वज्रम्
वज्र
धेनूनाम्
गौओं में
अस्मि
हूँ
कामधुक्
कामधेनु
प्रजनः
संतान उत्पत्ति का कारण
च
और
अस्मि
हूँ
कन्दर्पः
कामदेव
सर्पाणाम्
सर्पों में
अस्मि
हूँ
वासुकिः
वासुकि

अन्वय: आयुधानाम् अहम् वज्रम्, धेनूनाम् कामधुक् अस्मि, प्रजनः च कन्दर्पः अस्मि, सर्पाणाम् वासुकिः अस्मि।

शस्त्रों में मैं वज्र हूँ और गौओं में कामधेनु हूँ। संतान उत्पत्ति का कारण कामदेव मैं हूँ और सर्पों में वासुकि हूँ।

10.29अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॢणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥29॥

anantaś cāsmi nāgānāṃ varuṇo yādasām aham |
pitḷṇām aryamā cāsmi yamaḥ saṃyamatām aham

अनन्तः
अनन्त
च
और
अस्मि
हूँ
नागानाम्
नागों में
वरुणः
वरुण
यादसाम्
जलचरों में
अहम्
मैं
पितॢणाम्
पितरों में
अर्यमा
अर्यमा
च
और
अस्मि
हूँ
यमः
यम
संयमताम्
शासन करने वालों में
अहम्
मैं

अन्वय: नागानाम् च अनन्तः अस्मि, यादसाम् अहम् वरुणः, पितॢणाम् च अर्यमा अस्मि, संयमताम् अहम् यमः।

नागों में मैं अनन्त हूँ और जलचरों में वरुण हूँ। पितरों में मैं अर्यमा हूँ और शासन करने वालों में यम हूँ।

10.30प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥30॥

prahlādaś cāsmi daityānāṃ kālaḥ kalayatām aham |
mṛgāṇāṃ ca mṛgendro ’haṃ vainateyaś ca pakṣiṇām

प्रह्लादः
प्रह्लाद
च
और
अस्मि
हूँ
दैत्यानाम्
दैत्यों में
कालः
काल
कलयताम्
गणना करने वालों में
अहम्
मैं
मृगाणाम्
पशुओं में
च
और
मृगेन्द्रः
सिंह
अहम्
मैं
वैनतेयः
गरुड़
च
और
पक्षिणाम्
पक्षियों में

अन्वय: दैत्यानाम् च प्रह्लादः अस्मि, कलयताम् अहम् कालः, मृगाणाम् च अहम् मृगेन्द्रः, पक्षिणाम् च वैनतेयः।

दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ और गणना करने वालों में काल हूँ। पशुओं में मैं सिंह हूँ और पक्षियों में गरुड़ हूँ।

10.31पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥31॥

pavanaḥ pavatām asmi rāmaḥ śastrabhṛtām aham |
jhaṣāṇāṃ makaraś cāsmi srotasām asmi jāhnavī

पवनः
वायु
पवताम्
पवित्र करने वालों में
अस्मि
हूँ
रामः
राम
शस्त्रभृताम्
शस्त्रधारियों में
अहम्
मैं
झषाणाम्
मछलियों में
मकरः
मकर
च
और
अस्मि
हूँ
स्रोतसाम्
नदियों में
अस्मि
हूँ
जाह्नवी
गंगा

अन्वय: पवताम् पवनः अस्मि, शस्त्रभृताम् अहम् रामः, झषाणाम् च मकरः अस्मि, स्रोतसाम् जाह्नवी अस्मि।

पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ और शस्त्रधारियों में राम हूँ। मछलियों में मैं मकर हूँ और नदियों में गंगा हूँ।

10.32सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥32॥

sargāṇām ādir antaś ca madhyaṃ caivāham arjuna |
adhyātmavidyā vidyānāṃ vādaḥ pravadatām aham

सर्गाणाम्
सृष्टियों का
आदिः
आदि
अन्तः
अन्त
च
और
मध्यम्
मध्य
च
और
एव
भी
अहम्
मैं
अर्जुन
हे अर्जुन
अध्यात्मविद्या
अध्यात्मविद्या
विद्यानाम्
विद्याओं में
वादः
वाद
प्रवदताम्
विवाद करने वालों में
अहम्
मैं

अन्वय: अर्जुन, सर्गाणाम् आदिः अन्तः च मध्यम् च एव अहम्। विद्यानाम् अध्यात्मविद्या, प्रवदताम् वादः अहम्।

हे अर्जुन, सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य भी मैं ही हूँ। विद्याओं में मैं अध्यात्मविद्या हूँ और विवाद करने वालों में तत्त्व का निर्णय करने वाला वाद हूँ।

10.33अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥33॥

akṣarāṇām akāro ’smi dvaṃdvaḥ sāmāsikasya ca |
aham evākṣayaḥ kālo dhātāhaṃ viśvatomukhaḥ

अक्षराणाम्
अक्षरों में
अकारः
अकार
अस्मि
हूँ
द्वंद्वः
द्वन्द्व समास
सामासिकस्य
समासों में
च
और
अहम्
मैं
एव
ही
अक्षयः
अक्षय
कालः
काल
धाता
धारण पोषण करने वाला
अहम्
मैं
विश्वतोमुखः
सब ओर मुख वाला

अन्वय: अक्षराणाम् अकारः अस्मि, सामासिकस्य च द्वंद्वः, अहम् एव अक्षयः कालः, अहम् विश्वतोमुखः धाता।

अक्षरों में मैं अकार हूँ और समासों में द्वन्द्व समास हूँ। अक्षय काल मैं ही हूँ और सब ओर मुख वाला धारण पोषण करने वाला विधाता भी मैं हूँ।

10.34मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥34॥

mṛtyuḥ sarvaharaś cāham udbhavaś ca bhaviṣyatām |
kīrtiḥ śrīr vāk ca nārīṇāṃ smṛtir medhā dhṛtiḥ kṣamā

मृत्युः
मृत्यु
सर्वहरः
सबका हरण करने वाला
च
और
अहम्
मैं
उद्भवः
उत्पत्ति
च
और
भविष्यताम्
भविष्य में होने वालों की
कीर्तिः
कीर्ति
श्रीः
श्री
वाक्
वाणी
च
और
नारीणाम्
स्त्रियों में
स्मृतिः
स्मृति
मेधा
मेधा
धृतिः
धृति
क्षमा
क्षमा

अन्वय: सर्वहरः मृत्युः च अहम्, भविष्यताम् उद्भवः च (अहम्)। नारीणाम् कीर्तिः श्रीः वाक् च स्मृतिः मेधा धृतिः क्षमा (अहम्)।

सबका हरण करने वाली मृत्यु मैं हूँ और भविष्य में होने वालों की उत्पत्ति भी मैं हूँ। स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूँ।

10.35बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥35॥

bṛhatsāma tathā sāmnāṃ gāyatrī chandasām aham |
māsānāṃ mārgaśīrṣo ’ham ṛtūnāṃ kusumākaraḥ

बृहत्साम
बृहत्साम
तथा
तथा
साम्नाम्
साम मंत्रों में
गायत्री
गायत्री
छन्दसाम्
छन्दों में
अहम्
मैं
मासानाम्
महीनों में
मार्गशीर्षः
मार्गशीर्ष
अहम्
मैं
ऋतूनाम्
ऋतुओं में
कुसुमाकरः
फूलों को उत्पन्न करने वाला वसन्त

अन्वय: तथा साम्नाम् बृहत्साम, छन्दसाम् अहम् गायत्री, मासानाम् अहम् मार्गशीर्षः, ऋतूनाम् कुसुमाकरः।

साम मंत्रों में मैं बृहत्साम हूँ और छन्दों में गायत्री हूँ। महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ और ऋतुओं में फूलों को उत्पन्न करने वाला वसन्त हूँ।

10.36द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥36॥

dyūtaṃ chalayatām asmi tejas tejasvinām aham |
jayo ’smi vyavasāyo ’smi sattvaṃ sattvavatām aham

द्यूतम्
द्यूत
छलयताम्
छल करने वालों में
अस्मि
हूँ
तेजः
तेज
तेजस्विनाम्
तेजस्वियों में
अहम्
मैं
जयः
विजय
अस्मि
हूँ
व्यवसायः
निश्चय
अस्मि
हूँ
सत्त्वम्
सत्त्व
सत्त्ववताम्
सात्त्विक पुरुषों में
अहम्
मैं

अन्वय: छलयताम् द्यूतम् अस्मि, तेजस्विनाम् अहम् तेजः, जयः अस्मि, व्यवसायः अस्मि, सत्त्ववताम् अहम् सत्त्वम्।

छल करने वालों में मैं द्यूत हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ। मैं विजय हूँ, मैं निश्चय हूँ और सात्त्विक पुरुषों में सत्त्व हूँ।

10.37वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥37॥

vṛṣṇīnāṃ vāsudevo ’smi pāṇḍavānāṃ dhanaṃjayaḥ |
munīnām apy ahaṃ vyāsaḥ kavīnām uśanā kaviḥ

वृष्णीनाम्
वृष्णिवंशियों में
वासुदेवः
वासुदेव
अस्मि
हूँ
पाण्डवानाम्
पाण्डवों में
धनंजयः
धनंजय
मुनीनाम्
मुनियों में
अपि
भी
अहम्
मैं
व्यासः
व्यास
कवीनाम्
कवियों में
उशना
उशना
कविः
कवि

अन्वय: वृष्णीनाम् वासुदेवः अस्मि, पाण्डवानाम् धनंजयः, मुनीनाम् अपि अहम् व्यासः, कवीनाम् उशना कविः।

वृष्णिवंशियों में मैं वासुदेव हूँ और पाण्डवों में धनंजय हूँ। मुनियों में भी मैं व्यास हूँ और कवियों में उशना कवि हूँ।

10.38दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥38॥

daṇḍo damayatām asmi nītir asmi jigīṣatām |
maunaṃ caivāsmi guhyānāṃ jñānaṃ jñānavatām aham

दण्डः
दण्ड
दमयताम्
दमन करने वालों में
अस्मि
हूँ
नीतिः
नीति
अस्मि
हूँ
जिगीषताम्
विजय चाहने वालों में
मौनम्
मौन
च
और
एव
ही
अस्मि
हूँ
गुह्यानाम्
गुप्त रखने योग्य भावों में
ज्ञानम्
ज्ञान
ज्ञानवताम्
ज्ञानवानों में
अहम्
मैं

अन्वय: दमयताम् दण्डः अस्मि, जिगीषताम् नीतिः अस्मि, गुह्यानाम् च मौनम् एव अस्मि, ज्ञानवताम् अहम् ज्ञानम्।

दमन करने वालों में मैं दण्ड हूँ और विजय चाहने वालों में नीति हूँ। गुप्त रखने योग्य भावों में मैं मौन हूँ और ज्ञानवानों में ज्ञान हूँ।

10.39यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥39॥

yac cāpi sarvabhūtānāṃ bījaṃ tad aham arjuna |
na tad asti vinā yat syān mayā bhūtaṃ carācaram

यत्
जो
च
और
अपि
भी
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों का
बीजम्
बीज
तत्
वह
अहम्
मैं
अर्जुन
हे अर्जुन
न
नहीं
तत्
वह
अस्ति
है
विना
बिना
यत्
जो
स्यात्
हो सके
मया
मेरे
भूतम्
प्राणी
चराचरम्
चर या अचर

अन्वय: अर्जुन, यत् च अपि सर्वभूतानाम् बीजम्, तत् अहम्। यत् चराचरम् भूतम् मया विना स्यात्, तत् न अस्ति।

हे अर्जुन, जो सब प्राणियों का बीज है, वह भी मैं ही हूँ। ऐसा कोई चर या अचर प्राणी नहीं है, जो मेरे बिना हो सके।

10.40नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥40॥

nānto ’sti mama divyānāṃ vibhūtīnāṃ paraṃtapa |
eṣa tūddeśataḥ prokto vibhūter vistaro mayā

न
नहीं
अन्तः
अन्त
अस्ति
है
मम
मेरी
दिव्यानाम्
दिव्य
विभूतीनाम्
विभूतियों का
परंतप
हे परंतप
एषः
यह
तु
तो
उद्देशतः
संक्षेप से
प्रोक्तः
कहा गया
विभूतेः
विभूति का
विस्तरः
विस्तार
मया
मेरे द्वारा

अन्वय: परंतप, मम दिव्यानाम् विभूतीनाम् अन्तः न अस्ति। एषः विभूतेः विस्तरः तु मया उद्देशतः प्रोक्तः।

हे परंतप, मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है। विभूति का यह विस्तार तो मैंने संक्षेप से कहा है।

10.41यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसंभवम् ॥41॥

yad yad vibhūtimat sattvaṃ śrīmad ūrjitam eva vā |
tat tad evāvagaccha tvaṃ mama tejoṃśasaṃbhavam

यत् यत्
जो जो
विभूतिमत्
विभूति से युक्त
सत्त्वम्
वस्तु
श्रीमत्
शोभा से युक्त
ऊर्जितम्
बल से युक्त
एव
भी
वा
अथवा
तत् तत्
उस उस को
एव
ही
अवगच्छ
जानिए
त्वम्
आप
मम
मेरे
तेजोंशसंभवम्
तेज के अंश से उत्पन्न

अन्वय: यत् यत् विभूतिमत् श्रीमत् ऊर्जितम् एव वा सत्त्वम्, तत् तत् एव त्वम् मम तेजोंशसंभवम् अवगच्छ।

जो जो वस्तु विभूति से युक्त, शोभा से युक्त अथवा बल से युक्त है, उस उस को आप मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न जानिए।

10.42अथ वा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन

अथ वा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥42॥

atha vā bahunaitena kiṃ jñātena tavārjuna |
viṣṭabhyāham idaṃ kṛtsnam ekāṃśena sthito jagat

अथ वा
अथवा
बहुना
बहुत
एतेन
इस
किम्
क्या प्रयोजन
ज्ञातेन
जानने से
तव
आपको
अर्जुन
हे अर्जुन
विष्टभ्य
धारण करके
अहम्
मैं
इदम्
इस
कृत्स्नम्
संपूर्ण
एकांशेन
एक अंश से
स्थितः
स्थित हूँ
जगत्
जगत् को

अन्वय: अर्जुन, अथ वा एतेन बहुना ज्ञातेन तव किम्? अहम् इदम् कृत्स्नम् जगत् एकांशेन विष्टभ्य स्थितः।

अथवा हे अर्जुन, इस बहुत जानने से आपको क्या प्रयोजन है? मैं इस संपूर्ण जगत् को अपने एक अंश से धारण करके स्थित हूँ।