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अष्टावक्र गीता · प्रकरण 19: आत्मविश्रान्ति

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पाठ्य-संगति

‘आत्म-विश्रान्ति’ उन्नीसवाँ प्रकरण है। आत्मा में विश्राम। यहाँ ‘विश्राम’ शब्द एक नये अर्थ में आता है, कोई ठहराव या छुट्टी नहीं, बल्कि अपने ही भीतर की वह स्थिति जहाँ कुछ करना शेष नहीं रहता।

आधुनिक काल में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी ‘गीताञ्जलि’ (1910) की कई कविताओं में इसी आत्म-विश्रान्ति की भाव-दशा को बंगाली में उतारा। 1913 के नोबेल-पुरस्कार-व्याख्यान में उन्होंने इसी अनुभूति का सन्दर्भ दिया था।

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 19

आत्मविश्रान्ति

अपनी ही महिमा में विश्राम · 8 श्लोक

जनक के आठ श्लोक। हर एक का अन्त एक ही पंक्ति से होता है, “स्वमहिम्नि स्थितस्य मे”, अपनी ही महिमा में स्थित मुझ को। प्रश्न की शैली में जनक एक-एक करके हर श्रेणी को विदा कर देते हैं।

इस प्रकरण का सारा बल आत्म-विश्रान्ति पर है, आत्मा में विश्राम। एक ऐसी ठहरी हुई दशा जिसमें कोई प्रयास नहीं बचता। यह स्थिति बौद्ध परम्परा की ‘विश्राम-कौसल्य’ से अद्भुत रूप से मिलती है, यद्यपि दोनों धाराएँ अलग-अलग जड़ों से उठीं।

अब तक

जीवन्मुक्ति के बाद अब आत्म-विश्रान्ति। भीतर का ठहर जाना।

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जनक एक चित्र से आरम्भ करते हैं। हृदय के भीतर बहुत से विचार धँसे रहते हैं, जैसे माँस में काँटे। और जैसे आँख में पड़े काँटे को उसी आँख से नहीं देखा जा सकता, उसके लिए चिमटा चाहिए, वैसे ही इन विचार रूपी काँटों को निकालने के लिए तत्त्व का बोध चाहिए। जनक कहते हैं, वही चिमटा हमने उठाया, और अपने हृदय की गहराई से अनेक प्रकार के विचारों के काँटे एक-एक करके निकाल बाहर किए।

श्लोक 1

तत्त्वविज्ञानसंदंशमादाय हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया॥

काँटे निकल जाने पर जो शेष रहा, वही अपनी महिमा में ठहरा हुआ ‘मैं’ है। और अब जनक उसी ठहराव से एक-एक श्रेणी को विदा करने लगते हैं। जब अपने ही स्वरूप में स्थित हो जाएँ, तो धर्म कहाँ, काम कहाँ, अर्थ कहाँ, और भले-बुरे का विवेक भी कहाँ रह जाता है। द्वैत और अद्वैत का भेद भी वहीं ठहर जाता है, क्योंकि भेद करने वाला ही अपने में लीन है। और फिर समय का ढाँचा भी ढह जाता है, बीता हुआ कहाँ, आने वाला कहाँ, यह वर्तमान भी कहाँ; देश और दिशा कहाँ, और नित्यअनित्य का नाप भी कहाँ, उस के लिए जो अपनी ही महिमा में बैठा है।

श्लोक 2 · 3

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता।
क्व द्वैतं क्व च वाद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥

क्व भूतं क्व भविष्यद्वा वर्तमानमपि क्व वा।
क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥

अब जनक और भी भीतर के भेदों को छोड़ते हैं। वेदान्त जिस आत्मा और अनात्मा के अन्तर पर सारा विचार खड़ा करता है, जनक उसी अन्तर को भी विदा कर देते हैं; आत्मा कहाँ, अनात्मा कहाँ, शुभ कहाँ, अशुभ कहाँ, और चिन्ता तथा चिन्ता का अभाव भी कहाँ। फिर वे चेतना की उन तीनों अवस्थाओं को छोड़ते हैं जिनमें यह सारा संसार घूमता है। जागना कहाँ, स्वप्न कहाँ, गहरी नींद कहाँ; और जिसे लोग चौथी अवस्था तुरीय कहते हैं वह भी कहाँ, और भय तो कहाँ ही, उस के लिए जो अपनी ही महिमा में स्थित है।

श्लोक 4 · 5

क्व चात्मा क्व चनात्मा वा क्व शुभं क्वाशुभं तथा।
क्व चिन्ता क्व च वाचिन्ता स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥

क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा।
क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥

अब स्थान और काल का अन्तिम जाल भी जनक के हाथ से छूट जाता है। दूर कहाँ, पास कहाँ, बाहर कहाँ, भीतर कहाँ, स्थूल कहाँ, सूक्ष्म कहाँ; चेतना तो किसी नाप में बँधती ही नहीं, न उसका कोई आर-पार है। और तब वे जीवन-मरण की उस सीमा को भी पार कर जाते हैं जिससे सारा भय जन्म लेता है। मृत्यु कहाँ, जीवन कहाँ, लोक कहाँ, और इन लोकों का व्यवहार कहाँ; यहाँ तक कि लय और समाधि भी कहाँ। जो पहले से ही उस दशा में बैठा है जिसे लोग समाधि कहते हैं, उसके लिए समाधि भी एक श्रेणी मात्र है, अपनी ही महिमा में स्थित उस ‘मैं’ के लिए।

श्लोक 6 · 7

क्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं क्वाभ्यन्तरं क्व वा।
क्व स्थूलं क्व च वा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥

क्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोकाः क्वास्य क्व लौकिकम्।
क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥

और अन्त में जनक तीन बार एक ही शब्द दोहराते हैं, “अलम्”, बस, अब और नहीं। धर्म-अर्थ-काम, इस त्रिवर्ग की कथा बस। योग की कथा भी बस। और तत्त्व-ज्ञान की कथा भी बस। जिसे आत्मा में विश्राम मिल गया, उसके लिए अब कोई और कथा शेष नहीं रहती। यहीं उन्नीसवाँ प्रकरण ठहर जाता है, अपनी ही महिमा में।

श्लोक 8

अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम्।
अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि॥

॥ आत्मविश्रान्ति ॥