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अंग 1111

अंग
1111
राग तुखारी
राग: तुखारी · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक हउमै मारि पतीणे तारा चड़िआ लंमा ॥1॥
गुरमुखि जागि रहे चूकी अभिमानी राम ॥
अनदिनु भोरु भइआ साचि समानी राम ॥
साचि समानी गुरमुखि मनि भानी गुरमुखि साबतु जागे ॥
साचु नामु अंम्रितु गुरि दीआ हरि चरनी लिव लागे ॥
प्रगटी जोति जोति महि जाता मनमुखि भरमि भुलाणी ॥
नानक भोरु भइआ मनु मानिआ जागत रैणि विहाणी ॥2॥
अउगण वीसरिआ गुणी घरु कीआ राम ॥
एको रवि रहिआ अवरु न बीआ राम ॥
रवि रहिआ सोई अवरु न कोई मन ही ते मनु मानिआ ॥
जिनि जल थल त्रिभवण घटु घटु थापिआ सो प्रभु गुरमुखि जानिआ ॥
करण कारण समरथ अपारा त्रिबिधि मेटि समाई ॥
नानक अवगण गुणह समाणे ऐसी गुरमति पाई ॥3॥
आवण जाण रहे चूका भोला राम ॥
हउमै मारि मिले साचा चोला राम ॥
हउमै गुरि खोई परगटु होई चूके सोग संतापै ॥
जोती अंदरि जोति समाणी आपु पछाता आपै ॥
पेईअड़ै घरि सबदि पतीणी साहुरड़ै पिर भाणी ॥
नानक सतिगुरि मेलि मिलाई चूकी काणि लोकाणी ॥4॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (जिन मनुष्यों के अंदर) सर्व-व्यापक प्रभू की ज्योति जग उठती है। वह (अपने अंदर से) अहंकार को मार के (परमात्मा के चरणों में) सदा टिके रहते हैं। 1। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (माया के हमलों की ओर से) सचेत रहते हैं। (उनके अंदर से) अहंकार वाली दशा समाप्त हो जाती है। (उनके अंदर) हर वक्त आत्मिक जीवन की सूझ की रौशनी बनी रहती है। (उनकी सुरति) सदा कायम रहने वाले परमात्मा में टिकी रहती है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों की सुरति सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहती है। (उनको ये दशा अपने) मन में प्यारी लगती है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा ही सचेत रहते हैं। गुरू ने उनको आत्मिक जीवन देने वाला सदा-स्थिर हरी-नाम बख्शा होता है। उनकी लिव परमात्मा के चरणों में लगी रहती है। हे भाई ! गुरमुखों के अंदर परमात्मा की ज्योति का प्रकाश हो जाता है। वे हरेक जीव में उसी ईश्वरीय-ज्योति को बसता समझते हैं। पर अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री भटकना के कारण गलत रास्ते पर पड़ी रहती है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के अंदर आत्मिक जीवन की सूझ का प्रकाश हुआ रहता है। उनका मन (उस रौशनी में) परचा रहता है। (माया के हमलों की ओर से) सचेत रहते हुए ही उनकी जीवन की रात बीतती है। 2। हे भाई ! (जिस मनुष्य के हृदय-आकाश में ‘तारा चढ़िआ लंमा’। उसके अंदर से) सारे अवगुण समाप्त हो जाते हैं। (उसके अंदर) गुण अपना ठिकाना बनाते हैं। उस मनुष्य को एक परमात्मा ही हर जगह मौजूद दिखाई देता है। उसके बिना और कोई दूसरा नहीं दिखता। हे भाई ! (जिस मनुष्य के अंदर ‘तारा चढ़िआ लंमा’। उसको) हर जगह एक परमात्मा ही बसता दिखता है। उसके बिना कोई और उसको दिखाई नहीं देता। उस मनुष्य का मन अंतरात्मे (हरी-नाम में) परचा रहता है। जिस (परमात्मा) ने जल-थल तीनों भवन हरेक शरीर बनाए हैं वह मनुष्य उस परमात्मा के साथ गुरू के माध्यम सें गहरी सांझ बनाए रखता है। हे नानक ! (जिस मनुष्य के हृदय-आकाश में ‘तारा चढ़िआ लंमा’। वह अपने अंदर से) त्रैगुणी माया का प्रभाव मिटा के उस परमात्मा में समाया रहता है जो सारे जगत का मूल है जो सारी ताकतों का मालिक है और जो बेअंत है। हे नानक ! गुरू से वह मनुष्य ऐसी मति हासिल कर लेता है कि उसके सारे अवगुण गुणों में समा जाते हैं। 3। हे भाई ! (जिनके हृदय-आकाश में ‘तारा चढ़िआ लंमा’। उनके) जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो गए। उनकी कोझी जीवन-चाल खत्म हो गई। वह (अपने अंदर से) अहंकार दूर करके (प्रभू चरणों में) जुड़ गए। उनका शरीर (विकारों के हमलों के मुकाबले के लिए) अडोल हो गया। हे भाई ! गुरू ने जिस जीव-स्त्री का अहंकार दूर कर दिया। वह (लोक-परलोक में) शोभा वाली हो गई। उसके सारे ग़म सारे दुख-कलेश समाप्त हो गए। उसकी जिंद परमात्मा की ज्योति में मिली रहती है। वह अपने आत्मिक जीवन की सदा पड़ताल करती रहती है। हे भाई ! जो जीव-स्त्री इस लोक में गुरू के शबद में जुड़ी रहती है। वह परलोक में (जा के) प्रभू-पति को भा जाती है। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री को गुरू ने (अपने शबद में) जोड़ के प्रभू के साथ मिला दिया। उसको दुनिया की मुथाजी नहीं रह जाती। 4। 3।
तुखारी महला 1 ॥
भोलावड़ै भुली भुलि भुलि पछोताणी ॥
पिरि छोडिअड़ी सुती पिर की सार न जाणी ॥
पिरि छोडी सुती अवगणि मुती तिसु धन विधण राते ॥
कामि क्रोधि अहंकारि विगुती हउमै लगी ताते ॥
उडरि हंसु चलिआ फुरमाइआ भसमै भसम समाणी ॥
नानक सचे नाम विहूणी भुलि भुलि पछोताणी ॥1॥
सुणि नाह पिआरे इक बेनंती मेरी ॥
तू निज घरि वसिअड़ा हउ रुलि भसमै ढेरी ॥
बिनु अपने नाहै कोइ न चाहै किआ कहीऐ किआ कीजै ॥
अंम्रित नामु रसन रसु रसना गुर सबदी रसु पीजै ॥
विणु नावै को संगि न साथी आवै जाइ घनेरी ॥
नानक लाहा लै घरि जाईऐ साची सचु मति तेरी ॥2॥
साजन देसि विदेसीअड़े सानेहड़े देदी ॥
सारि समाले तिन सजणा मुंध नैण भरेदी ॥
मुंध नैण भरेदी गुण सारेदी किउ प्रभ मिला पिआरे ॥
मारगु पंथु न जाणउ विखड़ा किउ पाईऐ पिरु पारे ॥
सतिगुर सबदी मिलै विछुंनी तनु मनु आगै राखै ॥
नानक अंम्रित बिरखु महा रस फलिआ मिलि प्रीतम रसु चाखै ॥3॥
महलि बुलाइड़ीए बिलमु न कीजै ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: तुखारी महला 1॥ हे भाई ! (जो जीव-स्त्री परमात्मा के नाम से वंचित रहती है। वह) कोझे भुलेखे में पड़ कर जीवन-राह से टूट जाती है। बार-बार गलतियां करके पछताती रहती है। (ऐसी जीव-स्त्री) प्रभू-पति की कद्र नहीं समझती। (माया के मोह की नींद में) गाफिल हो रही (ऐसी जीव-स्त्री) को प्रभू-पति ने भी मानो त्याग दिया होता है। हे भाई ! माया के मोह में सोई हुई जिस जीव-स्त्री को प्रभू-पति ने प्यार करना छोड़ दिया। (माया के मोह की नींद में सोए रहने के इस) अवगुण के कारण त्याग दिया। उस जीव-स्त्री की जिंदगी की रात दुखदाई हो जाती है (उसकी सारी उम्र दुखों में बीतती है)। वह स्त्री काम में क्रोध में अहंकार में (सदा) दुखी होती रहती है। उसको अहंकार चिपका रहता है। उसको ईष्या चिपकी रहती है। हे भाई ! परमात्मा के हुकम के अनुसार जीवात्मा (तो आखिर शरीर छोड़ के) चल पड़ती है। और शरीर मिट्टी की ढेरी हो के मिट्टी के साथ मिल जाता है। पर। हे नानक ! परमात्मा के नाम से भूली हुई जीव-स्त्री सारी उम्र भूलें कर करके (अनेकों दुख सहेड़ के) पछताती रहती है। 1। हे प्यारे (प्रभू-) पति ! मेरी एक विनती सुन- आप अपने घर में बस रहा है। पर मैं (आपसे विछुड़ के विकारों में) दुखी हैं के राख की ढेरी हैं रही हॅूँ। अपने (प्रभू-) पति के बिना (प्रभू-पति से विछुड़ी जीव-स्त्री को) कोई प्यार नहीं करता। (इस हालत में फिर) क्या कहना चाहिए। क्या करना चाहिए। (हे जीव-स्त्री !) परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम (दुनिया के) सब रसों से श्रेष्ठ रस है; गुरू के शबद के द्वारा यह नाम-रस जीभ से पीते रहना चाहिए। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना (जीवात्मा का और) कोई संगी कोई साथी नहीं। (नाम से टूट के) बहुत सारी दुनिया जनम-मरण के चक्करों में पड़ी रहती है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा का नाम-लाभ कमा के प्रभू की हजूरी में पहुँच जाया जाता है। (हे भाई !) परमात्मा का सदा स्थिर नाम (जपा कर। इसकी बरकति से) आपकी मति (विकारों के हमलों से) अडोल हैं जाएगी। 2। हे भाई ! सज्जन प्रभू जी ! (हरेक जीव-स्त्री के) हृदय-देश में बस रहे हैं। (पर नाम-हीन जीव-स्त्री दुखों में घिर के उसको) परदेस में बसता जान के (दुखों से बचने के लिए) तरले-भरे संदेशे भेजती है। (नाम से टूटी हुई) अंजान जीव-स्त्री (अपने ऊपर चढ़ाए हुए सहेड़े हुए दुखों के कारण) रोती है। विरलाप करती है और उस सज्जन-प्रभू जी को बार-बार याद करती है। (नाम से वंचित हुई) अंजान जीव-स्त्री (सहेड़े हुए दुखों के कारण) विलाप करती है। प्रभू-पति के गुण चेते करती है। (और तरले लेती है कि) प्यारे प्रभू को कैसे मिलूँ। (जिस देश में वह बसता है। उसका) रास्ता (अनेकों विकारों की) मुश्किलों से भरा हुआ है। मैं वह रास्ता जानती भी नहीं हॅूँ। मैं उस पति को कैसे मिलूँ। वह तो (इन विकारों की रुकावटों के) उस पार रहता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जो विछुड़ी हुई जीव-स्त्री गुरू के शबद के द्वारा अपना तन अपना मन उसके हवाले कर देती है। वह उसको मिल जाती है। हे भाई ! परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला एक ऐसा वृक्ष है जिसको ऊँचे आत्मिक गुणों के फल लगे रहते हैं (गुरू के शबद द्वारा अपना तन-मन भेटा करने वाली जीव-स्त्री) प्रीतम प्रभू को मिल के (उस वृक्ष के फलों का) स्वाद चखती रहती है। 3। हे प्रभू की हजूरी में बुलाई हुई (जीव-सि्त्रए) ! देर नहीं करनी चाहिए।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (जिन मनुष्यों के अंदर) सर्व-व्यापक प्रभू की ज्योति जग उठती है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।