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अंग 1116

अंग
1116
राग तुखारी
राग: तुखारी · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
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बिनु भै किनै न प्रेमु पाइआ बिनु भै पारि न उतरिआ कोई ॥
भउ भाउ प्रीति नानक तिसहि लागै जिसु तू आपणी किरपा करहि ॥
तेरी भगति भंडार असंख जिसु तू देवहि मेरे सुआमी तिसु मिलहि ॥4॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा के डर-अदब के बिना किसी भी मनुष्य ने (परमात्मा का) प्रेम प्राप्त नहीं किया। कोई भी मनुष्य (परमात्मा के) डर-अदब के बिना (संसार-समुंद्र से) पार नहीं लांघ सका (कोई भी विकारों से बच नहीं सका)। हे नानक ! (कह-हे प्रभू !) उसी मनुष्य के हृदय में आपका डर-अदब आपका प्रेम-प्यार पैदा होता है जिस पर आप अपनी मेहर करता है। हे मेरे स्वामी ! (आपके घर में) आपकी भगती के बेअंत खजाने भरे हुए हैं। (पर ये खजाने) उस (मनुष्य) को मिलते हैं जिसको आप (स्वयं) देता है। 4। 3।
तुखारी महला 4 ॥
नावणु पुरबु अभीचु गुर सतिगुर दरसु भइआ ॥
दुरमति मैलु हरी अगिआनु अंधेरु गइआ ॥
गुर दरसु पाइआ अगिआनु गवाइआ अंतरि जोति प्रगासी ॥
जनम मरण दुख खिन महि बिनसे हरि पाइआ प्रभु अबिनासी ॥
हरि आपि करतै पुरबु कीआ सतिगुरू कुलखेति नावणि गइआ ॥
नावणु पुरबु अभीचु गुर सतिगुर दरसु भइआ ॥1॥
मारगि पंथि चले गुर सतिगुर संगि सिखा ॥
अनदिनु भगति बणी खिनु खिनु निमख विखा ॥
हरि हरि भगति बणी प्रभ केरी सभु लोकु वेखणि आइआ ॥
जिन दरसु सतिगुर गुरू कीआ तिन आपि हरि मेलाइआ ॥
तीरथ उदमु सतिगुरू कीआ सभ लोक उधरण अरथा ॥
मारगि पंथि चले गुर सतिगुर संगि सिखा ॥2॥
प्रथम आए कुलखेति गुर सतिगुर पुरबु होआ ॥
खबरि भई संसारि आए त्रै लोआ ॥
देखणि आए तीनि लोक सुरि नर मुनि जन सभि आइआ ॥
जिन परसिआ गुरु सतिगुरू पूरा तिन के किलविख नास गवाइआ ॥
जोगी दिगंबर संनिआसी खटु दरसन करि गए गोसटि ढोआ ॥
प्रथम आए कुलखेति गुर सतिगुर पुरबु होआ ॥3॥
दुतीआ जमुन गए गुरि हरि हरि जपनु कीआ ॥
जागाती मिले दे भेट गुर पिछै लंघाइ दीआ ॥
सभ छुटी सतिगुरू पिछै जिनि हरि हरि नामु धिआइआ ॥
गुर बचनि मारगि जो पंथि चाले तिन जमु जागाती नेड़ि न आइआ ॥
सभ गुरू गुरू जगतु बोलै गुर कै नाइ लइऐ सभि छुटकि गइआ ॥
दुतीआ जमुन गए गुरि हरि हरि जपनु कीआ ॥4॥
त्रितीआ आए सुरसरी तह कउतकु चलतु भइआ ॥
सभ मोही देखि दरसनु गुर संत किनै आढु न दामु लइआ ॥
आढु दामु किछु पइआ न बोलक जागातीआ मोहण मुंदणि पई ॥
भाई हम करह किआ किसु पासि मांगह सभ भागि सतिगुर पिछै पई ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: तुखारी महला 4॥ हे भाई ! (जिस मनुष्य को) गुरू के सतिगुरू के दर्शन हो गए। (यह गुरू-दर्शन उस मनुष्य के लिए) तीर्थ-स्नान है। (उस मनुष्य के लिए) अभीच (नक्षत्र का) पवित्र दिन है। (गुरू के दर्शन की बरकति से उस मनुष्य की) खोटी मति की मैल काटी जाती है। (उस मनुष्य के अंदर से) आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी वाला अंधकार दूर हो जाता है। हे भाई ! (जिस मनुष्य ने) गुरू के दर्शन कर लिए। (उसने अपने अंदर से) अज्ञान (-अंधेरा) दूर कर लिया। उसके अंदर परमात्मा की ज्योति ने अपना प्रकाश कर दिया। (गुरू के दर्शन की बरकति से उस मनुष्य ने) अविनाशी प्रभू (का मिलाप) हासिल कर लिया। उस मनुष्य के जनम से मरने तक के सारे दुख नाश हो गए। हे भाई ! गुरू (अमरदास अभिजीत पर्व के) तीर्थ स्नान (के समय) पर कुलखेत पर गया। हरी ने करतार ने स्वयं (गुरू के जाने के इस उद्यम को वहाँ इकट्ठे हुए लोगों के लिए) पवित्र दिन बना दिया। हे भाई ! (जिस मनुष्य को) गुरू के सतिगुरू के दर्शन हो गए। (यह गुरू-दर्शन उस मनुष्य के वास्ते) तीर्थ-स्नान है। (उस मनुष्य के लिए) अभीच (नक्षत्र का) पवित्र दिन है। 1। हे भाई ! अनेकों सिख गुरू (अमरदास जी) के साथ उस लंबे राह में गए। हे भाई ! हरेक छिन। निमख-निमख। कदम-कदम पर हर रोज परमात्मा की भगती (का अवसर) बना रहता था। हे भाई ! (उस सारे राह में) सदा परमात्मा की भक्ति का उद्यम बना रहता था। बहुत सारी दुनिया (गुरू का) दर्शन करने आती थी। जिन (भाग्यशाली मनुष्यों) ने गुरू के दर्शन किए। परमात्मा ने स्वयं उनको (अपने चरनों में) जोड़ लिया (भाव। जो मनुष्य गुरू का दर्शन करते हैं। उनको परमात्मा अपने साथ मिला लेता है)। हे भाई ! (तीर्थों पर इकट्ठी हुई) सारी लुकाई को (गलत रास्ते पर) बचाने के लिए सतिगुरू ने तीर्थों पर जाने का उद्यम किया था। सतिगुरू के साथ अनेकों सिख उस लंबे रास्ते में गए (थे)। हे भाई ! गुरू (अमरदास) जी पहले कुरूक्षेत्र पर पहुँचे। (वहाँ के लोगों के लिए वह दिन) गुरू सतिगुरू से संबंध रखने वाला पवित्र दिन बन गया। संसार में (भाव। दूर-दूर तक) (सतिगुरू जी के कुरूक्षेत्र आने की) ख़बर हो गई। बेअंत लोग (दर्शनों के लिए) आ गए। हे भाई ! (गुरू अमरदास जी के) दर्शन करने के लिए बहुत लोग आ पहुँचे। दैवी-स्वभाव वाले मनुष्य। ऋषि-स्वभाव वाले मनुष्य बहुत सारे आ के एकत्र हुए। हे भाई ! जिन (भाग्यशाली मनुष्यों) ने पूरे गुरू सतिगुरू के दर्शन किए। उनके (पिछले सारे) पाप नाश हो गए। हे भाई ! जोगी। नांगे। सन्यासी (सारे ही) छह भेषों के साधू (दर्शन करने आए)। कई किस्म के परस्पर शुभ-विचार (वह साधु लोग अपनी ओर से गुरू के दर पर) भेटा पेश कर के गए। हे भाई ! गुरू (अमरदास) जी पहले कुरूक्षेत्र पहुँचे । (वहाँ के लोगों के लिए वह दिन) गुरू सतिगुरू के साथ संबंध रखने वाला पवित्र दिन बन गया। 3। हे भाई ! फिर (गुरू अमरदास जी) यमुना नदी पर पहुँचे। सतिगुरू जी ने (वहाँ भी) परमात्मा का नाम ही जपा और जपाया। (यात्रियों से) सरकारी मसूल उगराहने वाले भी भेटा रख के (सतिगुरू जी को) मिले। अपने आप को गुरू का सिख कहलवाने वाले सबको (उन मसूलियों ने बिना मसूल लिए) पार लंघा दिया। गुरू के पीछे चलने वाली सारी लोकाई मसूल भरने से बच गई। (इसी तरह) हे भाई ! जिस-जिस ने परमात्मा का नाम सिमरा। जो मनुष्य गुरू के वचनों पर चलते हैं। गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलते हैं। जमराज (रूपी) मसूलिया उनके नजदीक नहीं फटकता। हे भाई ! (जो) लोकाई गुरू का आसरा लेती है। (जमराज मसूलिया उसके नज़दीक नहीं आता)। हे भाई ! अगर गुरू का नाम लिया जाए (यदि गुरू की शरण पड़ के हरी-नाम जपा जाए) तो (नाम लेने वाले) सारे (जम-जागाती की धौंस से) बच जाते हैं। हे भाई ! फिर (गुरू अमरदास जी) यमुना नदी पर पहुँचे। सतिगुरू जी ने (वहाँ भी) परमात्मा का नाम जपा और जपाया। 4। हे भाई ! (दो तीर्थों से होकर सतिगुरू अमरदास जी) तीसरी जगह गंगा पहुँचे। वहाँ एक अजीब तमाशा हुआ। संत-गुरू (अमरदास जी) के दर्शन करके सारी दुनिया मस्त हो गई। किसी (भी मसूलिए) ने (किसी भी यात्री से) आधी कौड़ी (मसूल भी) वसूल ना किया। हे भाई ! (मसूलियों की) गोलकों में आधी कौड़ी महसूल ना पड़ा। मसूलिए यूँ हैरान से हो के बोलने के योग्य ना रहे। (कहने लगे) – हे भाई ! हम (अब) क्या करें। हम किससे (मसूल) माँगें। ये सारी दुनिया ही भाग के गुरू की शरण जा पड़ी है (और।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! परमात्मा के डर-अदब के बिना किसी भी मनुष्य ने (परमात्मा का) प्रेम प्राप्त नहीं किया।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।